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Friday, July 24, 2015

पांच सौ अक्षरों में कैद बहस

‘द हिन्दू’ में 21 अक्टूबर को प्रकाशित लेख का अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय

फ़ोटो: इन्डियन एक्सप्रेस से साभार

पांच सौ अक्षरों में कैद बहस

रोहित धनकर

नई शिक्षा नीति के निर्माण में आम जन की भागीदारी स्वागतयोग्य है, मगर ट्विटर मार्का बहस सुसंगत निष्कर्षों तक नहीं पहुंचा सकती.

अप्रैल के महीने में मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने नई शिक्षा नीति के निर्माण के लिए आम जनता को आमंत्रित करने के फैसले की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि सरकार ने mygov वेबसाइट के जरिये "पहली बार आम नागरिक को नीतिनिर्माण के काम में हिस्सेदार बनाने का प्रयास किया है, जो अब तक चंद लोगों तक सीमित था." सरकार के इस कदम की सराहना की जानी चाहिए क्योंकि एक लोकतंत्र के भीतर नीतिनिर्माण में लोगों की ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी से ही बेहतर नीतियां बनती हैं. कम से कम सिद्धांत रूप में यह बात सही है.
      लेकिन वेबसाइट मेंलोगों की टिप्पणियों को 500 अक्षरों और चंद पूर्वनिर्धारित मुद्दोंतक सीमित कर दिया गया है. इस तरह आंशिक रूप से सेंसर की गयी रायशुमारी से ज्यादा से ज्यादा विखंडित और विरोधाभासी सुझाव ही जनता की ओर से मिल पाएंगे. हालांकि विरोधाभासी दृष्टिकोण स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान हैं, फिर भी उन्हें तर्कपूर्ण व व्यवस्थित किए जाने की जरूरत पड़ती है. दूसरे शब्दों में- अगर उन्हें शिक्षा पर एक व्यापक आधार वाले संवाद के उद्देश्य से एकत्र किया जा रहा है तो उन्हें सुविचारित तर्कके रूप में प्रकट करना होगा.
      दूसरे, महत्वपूर्ण दलीलें 500 अक्षरों के अतिसूक्ष्म दायरे में व्यक्त नहीं की जा सकतीं. 500 शब्दों की सीमा के बारे में कहा जा सकता है कि वेबसाइट पर फाइल अपलोड करने की भी छूट है, पर इस तरह अपलोड की गई फाइलें बहस का हिस्सा नहीं बन पातीं. इस तथ्य को वेबसाइट में मौजूद टिप्पणियों को देखकर भी समझा जा सकता है. इसलिए, यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं होगा कि जनता के विचारों को जानने का यह तरीका स्वयं विचारों के विखंडन का पक्षपोषण करता है.

विखंडित विवेक का दौर
मगर यह विखंडित विवेक का दौर है. समाज को इस मान्यता की ओर धकेला जा रहा है कि चिंतन का मतलब विचारों को टुकड़ों में यहां-वहां उछालना भर होता है. वैसे ही जैसे लोग ट्विटर में विचारों को उछालते रहते हैं. विचारों के ये टुकड़े दरअसल किसी खास सन्दर्भ में ही अर्थपूर्ण होते हैं. इस किस्म के विखंडित विचारों से निर्मित संवाद केवल अधपके तर्कों को ही तैयार करता है. वर्तमान सरकार द्वारा कराए जा रहे नीति सम्बन्धी विचार-विमर्श, चाहे इनकी पद्धति की वजह से कहें या फिर समझ की कमी के कारण,महज विचारों के विखंडित और अस्पष्ट बादलों के सामान हैं. यह ट्विटर युग का विवेक है.
      हमारी संस्कृति और राज-व्यवस्था की एक सामान्य प्रासंगिक पृष्ठभूमि कहीं नज़र नहीं आती. यह मान लेगा गलत होगा कि हम अपनी सांस्कृतिक, सामजिक, राजनीतिक और आर्थिक ज़रूरतों को एक सा ही समझते/देखते हैं. ट्वीट करने की थोड़ी-बहुत सार्थकता हो सकती है लेकिन कुल मिलाकर यह एक आधी-अधूरी राय ही है. इससे विचारों के आदान-प्रदान का भ्रम पैदा होता है मगर विचार करने वाले के वास्तविक तर्क और इरादे छुपे रह जाते हैं. शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर एक सुसंगत तर्क और व्यापक सहमति बनाने के लिए सन्दर्भ बताना बेहद ज़रूरी है.
      ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार नीति (पॉलिसी) एक तरह की दिशा या कार्य को निदेशित करने का सिद्धांत है जिसे किसी संगठन या व्यक्ति ने अपनाया अथवा प्रस्तावित किया हो. इसे विशिष्ट गतिविधियों या क्रियाओं को पैदा करने के लिए उपयोग में लाया जाता है. इसे किन्हीं खास सुझाओं और सिफारिशों की स्वीकार्यता को जांचने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
      मानव संसाधन मंत्रालय इसके द्वारा नियोजित सिलसिलेवार बहस-मुबाहिसे से शिक्षानीति की ऐसी ही रूपरेखा की उम्मीद कर रहा है. mygov वेबसाइट के मुताबिक मंत्रालय ने वेबसाइट पर जो समूह बनाया है उसका उद्देश्य "समावेशी, सहभागितापूर्ण और समग्र दृष्टिकोण से देश के लिए एक नई शिक्षा नीति तैयार करना है." वेबसाइट पर 'संवाद' आयोजित करने के अलावा मंत्रालय की एक "पूर्व परिभाषित सर्वेक्षण प्रश्नावली" के माध्यम से राष्ट्रव्यापी परामर्श एकत्र करने की भी योजना है. इसके लिए भी एक समूह का गठन हो चुका है, एक सरकारी अधिकारी की अध्यक्षता में, हालांकि यह अब तक रहस्यों में घिरा है- जिस जनता से नई नीति पर अपनी राय बताने की अपेक्षा की जा रही है, उसे भी इसके सदस्यों के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

दोषपूर्ण पद्धति
इस प्रकार शिक्षा नीति तैयार करने की पद्धति में कम से कम दो गंभीर समस्याएं हैं. पहली, ट्विटर मार्का विचारों की सही-सही व्याख्या की दरकार होती है. लेकिन यह व्याख्या उसी रहस्यमय समूह के हवाले कर दी गई है, जो एक सरकारी अधिकारी की अध्यक्षता में बनाया गया है. व्याख्या के लिए एक सामान्य वैचारिक रूपरेखा की जरूरत पड़ती है, जिसके बारे में चुप्पी साध ली गयी है या उसे सार्वजनिक नहीं किया गया है. इसलिए व्यक्त किए गए विचार पहले से तयशुदा नीतियों को पुष्ट करने के इरादे से तोड़े-मरोड़े जा सकते हैं. इसका मतलब यह हुआ कि एक छोटे से पसंदीदा समूह के पूर्व-निर्धारित निर्णयों को एक अप्रभावी जन-संवाद के जरिये सही ठहराया जा सकता है.
      दूसरी, सर्वानुमति बनाने के किसी आधारभूत निर्देशक सिद्धांतों के अभाव में इस कवायद का वही नतीजा निकलेगा जिसे शिक्षा के जाने-माने दार्शनिक जॉन व्हाइल "एचसीएफ समस्या" कहते हैं. समूची कवायद से ऐसे अस्पष्ट और अपुष्ट सुझावों का ढेर लग जाएगा, जिनके बीच सामाजिक न्याय और समता के मुद्दे गायब होंगे- क्योंकि इस तरह भिड़ाए गए इन मुद्दों पर कोई आसान सी सहमति उपलब्ध नहीं है. और इस तरह समाज की वास्तविक चिंताएं या तो महत्वहीन हो जाएंगी या सिरे से नदारद होंगी.
      इस विचार-विमर्श के प्रयोजन और उद्देश्य को समझने के लिहाज से प्राथमिक शिक्षा के लिए चुने गए 13 प्रकरणों का पाठ बड़ा दिलचस्प है. प्रत्येक प्रकरण का करीब 200 शब्दों में परिचय दिया गया है और साथ में विमर्श के लिए सवालों की एक सूची है. ज्यादातर सवाल इसके संचालन की बारीकियों से जुड़े हैं. नीति से इनका कोई खास संबंध नहीं है.
      उदाहरण के लिए, एक सवाल में यह पूछा गया है कि टेक्नोलॉजी का शिक्षकों की वास्तविक मौजूदगी को सुनिश्चित करने के लिए कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है. सवाल के गठन से ही स्पष्ट हो जाता है कि मुद्दा यह नहीं कि टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करनी चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि कैसे इसे इस्तेमाल करना चाहिए. अगर सवाल 'क्या' से शुरू होता तो यह शिक्षक की विश्वसनीयता, स्वायत्तता, जिम्मेदारी व सम्मान जैसे सभी महत्वपूर्ण मुद्दे उठाता. लेकिन 'कैसे' जोड़ देने से यह पहलेही तय हो गया कि शिक्षकों की कड़ाई से निगरानी करनी चाहिए और उन्हें दंड का भय दिखाना चाहिए. इसलिए 'क्या टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना चाहिए' जैसा सवाल एक नीति से जुड़ा सवाल बन जाता है, क्योंकि यह सामान्य सिद्धांतों के गिर्द घूमता है, जबकि 'कैसे' जुड़ने वाली चर्चा एक तकनीकी सवाल है जिसका नीति से कोई खास ताल्लुक नहीं बल्कि यह कार्यान्वयन का मसला है.वेबसाइट में ज्यादातर प्रश्न इसी मिजाज़ के हैं.
      यहां ध्यान देने लायक बात यह है कि प्रकरणों के परिचय में ही कई पूर्व निर्धारित नीतियां छुपी हुई हैं. उदाहरण के लिए, स्कूल स्तर पर परीक्षा सुधार वाला प्रकरण कहता है कि "परीक्षा सुधार शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को बदल देगा और अधिगम परिणामों में सुधार लाएगा." यह विचार के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा हो सकता था कि क्या 'परीक्षा-उन्मुख सुधार' सफल हो सकते हैं, अथवा वे 'परीक्षा के लिए पढ़ाई' को प्रोत्साहन देंगे और इस तरह समालोचनात्मक तार्किकता के लिए दी जाने वाली शिक्षा का ही बंटाधार कर डालेंगे. परीक्षा का डर क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्याओं में एक नहीं है? लेकिन यहां, परीक्षा-उन्मुख सुधार को आस्था के एक तत्व की तरह स्वीकार कर लिया गया है.
      मैं शिक्षा नीति पर सार्वजनिक बहस की मुखालिफत नहीं कर रहा हूं. न ही मैं शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा किए जाने के विरोध में हूं. एक लोकतांत्रिक देश में शिक्षा नीति पर फैसले लेने के लिए ये दोनों सामान रूप से आवश्यक हैं. दिक्कत सिर्फ इतनी है कि तयशुदा सवालों और पूर्व-निर्धारित प्रकरणों से गहरे और निष्पक्ष वाद-विवाद की संभावना सीमित हो जाती है.
      आज भारतीय शिक्षा तीन दिशाओं से खिंचाव महसूस कर रही है. पहली दिशा, शिक्षा को आर्थिक वृद्धि की जरूरतों के अनुरूप ढालने की वकालत की है. इसमें व्यावहारिक कौशल-निर्माण और पर्याप्त कार्यशक्ति तैयार करने पर जोर दिया जाता है. दूसरी दिशा शिक्षा को लोकतंत्र और सामाजिक न्याय को हासिल करने की ओर ले जाने की है. इसमें समाज, राजनीति, अर्थतंत्र की आलोचनात्मक समझ बनाने तथा ज्यादा समतामूलक व सामंजस्यपूर्ण समाज के लिए मूल्यों का ढांचा गढ़ने पर जोर दिया जाता है. तीसरी दिशा, जो दिन पर दिन मजबूत होती जा रही है, शिक्षा को भारतीय संस्कृति एवं इतिहास के एक खास नजरिये से जोड़ने का दबाव बनाती है. इसका जोर पाठ्यक्रम में हिन्दू नायकों, ग्रंथों और आचरण के लिए ज्यादा से ज्यादा जगह बनाने पर है. तीनों तरह के खिंचाव समाज और राज्य-व्यवस्था की जरूरतों के अलग-अलग दृष्टिकोणों को रेखांकित करते हैं. उदाहरण के लिए, पहला आर्थिक खिंचाव जहां बिकाऊ कौशलों पर जोर देता है, वहीं राजनीतिक आलोचना और सामाजिक न्याय के मुद्दों की उपेक्षा करता है. इसका परिणाम एक कार्यक्षम किन्तु दब्बू कार्यशक्ति और उपभोक्तावाद के विस्तार के रूप में प्रकट होगा. दूसरी ओर, एकमात्र सामाजिक न्याय के लिए शिक्षा को समर्पित कर देने का परिणाम वही होगा जिसे कोठारी आयोग की रिपोर्ट "बेरोजगार स्नातकों की फ़ौज” कहती है. जो सामाजिक न्याय हासिल करने में भी नाकामयाब होगी. और भारतीय संस्कृति व इतिहास की इकतरफा समझ पर जोर देने का परिणाम समाज में विभाजन और कडुआहट के बीजारोपण के रूप में प्रकट होगा. जो आर्थिक प्रगति के साथ-साथ लोकतंत्र तथा सामाजिक न्याय को भी नष्ट कर डालेगा.
      सरकार का ट्विटर मार्का बहस-मुबाहिसे पर जोर यह बताता है कि वह किसी दीर्धकालिक संवाद के पक्ष में नहीं है. पूर्व परिभाषित बिंदुओं और तयशुदा सवालों के जरिए संकीर्ण दायरे में सार्वजानिक बहस को खोलने की रणनीति वास्तविक नीतिगत मुद्दों पर बहस को पहले ही रोक देती है. इस तरह निर्णय कुछ चुनिन्दा हाथों तक सिमट जाते हैं. खुली लोकतांत्रिक बहस का भ्रम पैदा किया गया है लेकिन असल में जनता का दिमाग छोटे-छोटे मामूली विवरणों में उलझाया जा रहा है.
(रोहित धनकर अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, बंगलुरु में अकादमिक विकास विभाग के प्रोफ़ेसर व निदेशक हैं.

साथ ही वह दिगंतर, जयपुर के अकादमिक सलाहकार भी हैं.)

Wednesday, October 29, 2014

प्राइवेट स्कूल का आदर्श एक कंसल्टेंट एजेंसी की तरह काम करने का होता है

शिक्षा और स्कूल के हालात पर कल (28 अक्टूबर) के''हिंदू' में छपे शिक्षाविद रोहित धनकर के एक आलेख का हिंदी अनुवाद आप सब के मनन के लिए मित्र और सनातन कबाड़ी आशुतोष उपाध्याय ने उपलब्ध करवाया है. आशुतोष का अनूदित एक और लेख हाल ही में आप इस ठिकाने पर पढ़ चुके हैं. शुक्रिया आशुतोष! 

रोहित धनकर

गंभीर खतरे में स्कूल

रोहित धनकर 

राजस्थान सरकार ने हाल ही में 17,000 से ज्यादा स्कूलों को बंद करने का फैसला किया. इसी तरह महाराष्ट्र ने 14,000 और उड़ीसा ने 195 स्कूलों को बच्चों के बेहद कम नामांकन की बिना पर बंद करने का फरमान जारी किया. ये कोई इक्का-दुक्का उदाहरण नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक (सरकारी) शिक्षा व्यवस्था के पतन के स्पष्ट संकेत हैं.
उधर, प्राइवेट स्कूल व्यवस्था के दुर्गुणों को समझने के लिए एक ही उदाहरण काफी होगा. हाल ही में, एक अभिभावक ने अपने बेटे के स्कूल के अध्यापकों के उस रुख के बाबत बताया जो उसकी कमजोरी को लेकर था. विज्ञान, समाज विज्ञान और अंग्रेजी के अध्यापकों ने पिता से बच्चे की कमजोरियों को दुरुस्त करने की मांग की! हैरान-परेशान पिता के सवाल थे, "बच्चे के कक्षाकार्य पूरा न करने या स्कूल में दुर्व्यवहार करने आदि से निपटने की जिम्मेदारी क्या अध्यापक की नहीं है? अगर मेरा बच्चा घर में शैतानी करता है या हमारे कहने पर पढ़ता-लिखता नहीं है तो अभिभावक के बतौर उसे समझाना-बुझाना हमारी जिम्मेदारी है. इसके लिए हम अध्यापक से शिकायत करने नहीं जाते. मगर आजकल अध्यापक हर बात पर माता-पिता से क्यों शिकायत करते हैं?" पिता के मुताबिक, "बच्चे की पढ़ाई-लिखाई के लिए अध्यापक को जिम्मेदार होना चाहिए, जिस प्रकार उसकी कापी-किताब, पेन-पेन्सिल आदि की व्यवस्था के लिए माता-पिता जिम्मेदार हैं."
यह प्रवृत्ति जो अब तक मझोले और आला दर्जे के प्राइवेट स्कूलों में दिखा करती थी, अब सस्ते निजी स्कूलों में भी जगह बना रही है.

सरकारी स्कूलों का पतन
सरकारी स्कूल मर रहे हैं, क्योंकि वे काम नहीं करते. इस समस्या की शुरुआत 1950 के दशक के अंतिम वर्षों और 60 के दशक में तब हुई, जब स्कूलों की संख्या में इजाफे के साथ-साथ बुनियादी ढांचे और प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. अधिकतर राज्यों में, शिक्षक बहुत कम पगार पाते थे और स्कूल प्रशासन अक्षम था. राजस्थान जैसे राज्य में बड़ी संख्या में अप्रशिक्षित अध्यापक नियुक्त किये गए. इस सब बातों ने शिक्षा की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित किया. शिक्षकों का उत्साह जाता रहा और वे असंतुष्ट हो गए.
कुछ राज्य सरकारों ने 1950 के दशक के बीतते-बीतते स्कूल प्रशासन की जिम्मेदारी पंचायती राज पर डालनी शुरू की. इस कदम से स्कूल में स्थानीय राजनेताओं का दखल बढ़ गया और वे शिक्षकों के तबादलों में हस्तक्षेप करने लगे. इसके अलावा कम सुविधाओं, कम पगार, समय पर पगार देने में कोताही जैसे अनेक कारणों से शिक्षक स्कूलों से गैर-हाजिर रहने लगे. परिणामस्वरूप नए-नए उभर रहे शिक्षक संघों में आत्म-केन्द्रीयता की प्रवृत्ति पैदा होने लगी. स्कूल के कामकाज और शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान देने की जगह वे अपनी सुविधाओं व फायदों को तरजीह देने लगे. उनके इस रुख के लिए उन्हें शायद ही कोई जिम्मेदार ठहराए.
समस्याओं को गंभीरतापूर्वक सुलझाने के बजाय शिक्षा योजनाकारों व प्रशासकों ने शिक्षा की बढ़ती ज़रूरतों के मद्देनजर फौरी व चालू उपायों को प्राथमिकता दी. कई ऐसे महत्वपूर्ण कारक थे, जिन्होंने इस मानसिकता को तैयार करने में भूमिका निभाई, जैसे- ज्यादा स्कूलों की मांग, धन व अन्य संसाधनों की कमी, वोट की राजनीति का दबाव और सरोकार का अभाव. यह मानसिकता 60 के दशक के बाद लागू किए गए सभी शैक्षिक कार्यक्रमों में देखी जा सकती है- अनौपचारिक शिक्षा, शिक्षा कर्मी, डीपीईपी और सर्व शिक्षा अभियान. प्रत्येक स्तर पर इन कार्यक्रमों की आलोचना हुई और अनेक शिक्षाविदों ने इनकी अवधारणा और नियोजन में मौजूद समस्याओं के बारे में स्पष्ट रूप से आगाह किया. लेकिन इन कार्यक्रमों को कई स्वाभाविक समर्थक भी मिले जिन्होंने इनके पक्ष में तरह-तरह के कुतर्क गढ़ डाले और उन्हें शैक्षिक बदलाव के उदाहरणों के बतौर आगे बढ़ाया.

स्कूल का विचार
इन कार्यक्रमों के साथ बुनियादी समस्या यह रही कि इन्होंने स्कूल की अवधारणा को कमजोर किया. स्कूल का स्पष्ट उद्देश्य है- सीखना. और सीखने की प्रक्रिया शिक्षक और छात्र, दोनों से तल्लीनता की अपेक्षा करती है. विचारों के सतत एवं सुसंगत अन्वेषण के लिए तथा बौद्धिक श्रम व मानसिक अनुशासन के लिए निर्धारित समय व स्थान चाहिए. यह सब संभव नहीं अगर क्या सीखना है और कैसे सिखाना है, जैसे सवालों के समुचित उत्तर न तलाशे जाएं. इसलिए एक व्यवस्थित स्थान के रूप में स्कूल अपेक्षा करता है कि शिक्षक में बच्चों की बौद्धिक व भावनात्मक ज़रूरतों की पेशेवर समझ और उनके प्रति गहरी संवेदनशीलता तथा शिक्षणशास्त्रीय निर्णय की क्षमता हो. जब इन सब ज़रूरतों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जाता है तो स्कूल का विचार ही विद्रूप हो जाता है. पिछले पांच दशक से शिक्षा व्यवस्था दरअसल यही कुछ कर रही है.
उदाहरण के रूप में, अनौपचारिक शिक्षा परियोजना में करोड़ों रुपये खर्च किये गए और यह योजना पूरे देश में 1960 दशक के अंतिम वर्षों से 1990 दशक की शुरुआत तक चली. इस परियोजना में शिक्षण, शिक्षक प्रशिक्षण और शैक्षिक योजना के पेशेवर ज्ञान के विचार की पूरी तरह उपेक्षा की गयी. इस प्रकार पूरे देश में एक सन्देश फैलाया गया कि कोई भी पढ़ा सकता है. इसने स्कूलों के लिए अलग से समुचित जगह के विचार को दरकिनार कर यह साबित करने की कोशिश की कि शिक्षा के लिए किसी तरह के बुनियादी ढांचे की खास ज़रूरत नहीं है. इसने शिक्षक व छात्र दोनों की बौद्धिक ज़रूरतों की उपेक्षा की. कुल मिलाकर इसने शिक्षा, शिक्षक और स्कूल के विचार का अवमूल्यन किया.
जब तक इस गड़बड़झाले की असफलता का पता चलता, कई अन्वेषक राजस्थान में शिक्षा कर्मी जैसी अन्य पहलकदमियों के साथ हाज़िर हो गए. डीपीईपी कार्यक्रम भी लागू किये जाने के लिए लगभग तैयार था. सर्व शिक्षा अभियान समेत ऐसे तमाम कार्यक्रमों में पेशेवर ज्ञान, बौद्धिक श्रम, बच्चों के प्रति संवेदनशीलता और बुनियादी ढांचे की ज़रूरत जैसी बातों के बीच संतुलन बैठाने की कतई कोशिश नहीं हुई. कभी संवेदनशीलता को शैक्षिक ज्ञान के बरक्स खड़ा किया और कभी शिक्षक की स्कूल में लगातार मदद को उसके शैक्षिक ज्ञान के बरक्स. अच्छी शिक्षा की जरूरतों की स्पष्ट समझ के अभाव तथा पिछली खराब नीतियों का सीधा परिणाम आज स्कूलों के खात्मे के रूप में दिखाई पड़ रहा है.

बाजार का प्रवेश
इस बीच, शिक्षा की स्थिति से चिंतित अभिभावकों की बेचैनी को भुनाने के लिए निजी क्षेत्र आगे आ गया. आज प्राइवेट स्कूल दिन दूनी-रात चौगुनी रफ़्तार से बढ़ रहे हैं. कुछ विश्लेषक कहते हैं कि जहां सरकारी स्कूल व्यवस्था पतन की ओर अग्रसर है, वहीं प्राइवेट व्यवस्था बेहतर से बेहतरीन होती जा रही है.
यह झूठी धारणा संभवतः जान-बूझकर फैलाई जा रही है. प्राइवेट स्कूल मुनाफे के लिए काम करते हैं; यह तथ्य ही अपने आप में बच्चों के विकास की परवाह करने वाले अच्छे स्कूल की अवधारणा के विपरीत है. एक अच्छा स्कूल वह होता है जहां ज्ञान संजोया जाता है, जहां बुद्धि का विकास होता है, जहां बच्चे के प्रति संवेदनशीलता होती है और जहां आवश्यक संसाधनों की कमी नहीं होती. ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लालच में स्कूल मालिक अवधारणाओं की समझ की जगह प्रतियोगिता पर जोर देते हैं. प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों पर जानकारियों को रटने का दबाव होता है- और यह बात समझ का घोर अवमूल्यन करती है. वास्तविक समझ अवधारणात्मक स्पष्टता की मांग करती है. यह एक कठिन प्रक्रिया है और इसमें समय लगता है. प्राइवेट स्कूल स्वभावतः रट्टा आधारित पहली विधि को प्रोत्साहित करते हैं. दूसरे शब्दों में, वे एक अच्छे स्कूल की अपेक्षाओं का अवमूल्यन कर सीखने के मूल विचार को ही दरिद्र बना देते हैं.
इन सब के आगे, प्राइवेट शिक्षा व्यवस्था का सबसे हानिकारक पहलू कुछ और है- प्राइवेट स्कूल बच्चे के नैतिक विकास, समझ के विकास और व्यवहार की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते. उनका आदर्श एक कंसल्टेंट एजेंसी की तरह काम करने का होता है. अगर किसी बच्चे में कोई नैतिक या व्यवहारगत समस्या है तो ये स्कूल अभिभावक से उसे ठीक करवाने को कहेंगे. बच्चे की शैक्षिक कमजोरी के लिए ये प्राइवेट ट्यूशन करवाने की सलाह देंगे. किसी भी स्थिति में ये अपनी बुनियादी शैक्षिक जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं. इस तरह उनकी भूमिका बेहद सीमित हो जाती है, जो ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के अनुकूल है. ये स्कूल की अवधारणा का ही दिवाला निकाल देते हैं.
सरकारी स्कूलों में बच्चों के न पहुंचने और प्राइवेट स्कूलों में स्कूल की अवधारणा के ही सीमित हो जाने की इस दोहरी बीमारी के कारण स्कूल आज गंभीर खतरे में हैं. एक समाज के बतौर ऐसा प्रतीत होता है हम इस अहसास से बहुत दूर हैं कि सभ्यताएं शिक्षा पर निर्भर होती हैं और शिक्षा की प्राथमिक जगह स्कूल है. अगर स्कूल मरते हैं तो सभ्यताओं का भी पतन होता है. जब तक हम शिक्षा की समझ, नियोजन और कार्यान्वयन में श्रम की जरूरत को मान्यता नहीं देंगे, इस अधोगति को रोक नहीं सकेंगे और हमारे स्कूल या तो बंद हो जायेंगे या कंसल्टेंसी सेवाओं में बदल जायेंगे. उनकी जगह ट्यूशन की दुकानें खुल जायेंगी. बेशक इन स्थितियों को उलटने के लिए सही राजनीतिक और आर्थिक फैसलों की दरकार होगी, पर ये फैसले अगर गहरी शैक्षिक समझ के बिना लिए जाएंगे तो सफल नहीं होंगे.

(रोहित धनकर अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, बंगलुरु में अकादमिक विकास के निदेशक व प्रोफ़ेसर तथा
दिगंतर, जयपुर के मानद सचिव हैं.)

-28 अक्टूबर, 2014 को 'द हिंदू' में प्रकाशित आलेख, अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय