Thursday, May 26, 2011

शताब्दी के अन्त के लिए कविता


शताब्दी के अन्त के लिए कविता

चेस्वाव मीवोश

जब सब कुछ भला था
और गायब हो चुकी थी पाप की अवधारणा
और बिना सम्प्रदायों और कल्पनालोकों के
एक सार्वभौम शान्ति में
धरती तैयार थी
चीज़ों का इस्तेमाल करने और प्रसन्न होने के लिए.

अज्ञात कारणों से
मैं घिरा हुआ था
फ़रिश्तों और धर्मशास्त्रियों
दार्शनिकों और कवियों की किताबों से
और किसी उत्तर को खोजता था,
त्यौरियां चढ़ाए, मुंह बनाता हुआ
रातों को जगता, भोर में बड़बड़ाता.

मुझे जिस चीज़ ने इस कदर सताया
वह थोड़ी शर्मनाक थी.
उसका नाम लेने में
न तो चालाकी नज़र आएगी न समझदारी.
वह मनुष्यता के स्वास्थ्य के खिलाफ़
उपद्रव तक लग सकता है.

आह, मेरी स्मृति
मुझे छोड़ना ही नहीं चाहती
और उसके भीतर लोग रहते हैं
हरेक के पास अपना दर्द
हरेक के पास अपना मरना,
इसकी अपनी थरथराहट.

तो स्वर्ग सरीखे समुद्रतटों पर
निष्कपटता क्यों,
स्वास्थ्य के गिरजाघर के ऊपर
एक त्रुटिहीन आसमान?
क्या ऐसा इसलिए है कि
वह बहुत पुरानी बात है?

एक अरबी कथा के मुताबिक
एक सन्त पुरुष से
तनिक दुर्भावना के साथ ईश्वर ने कहा
"अगर मैंने लोगों के बता दिया होता
तुम कितने बड़े पापी हो
तो वे तुम्हारी प्रशंसा न करते."

"और अगर" सन्त ने जवाब दिया
"मैंने उन्हें बता दिया होता
कि आप कितने दयालु हैं
तो वे आपकी परवाह तक न करते."

दुनिया की संरचना के भीतर
दर्द और अपराधबोध
के उस काले मसले के साथ
किसका मुंह तकूं मैं,
या तो यहां नीचे
या उधर ऊपर
कोई भी ताकत
कारण और परिणाम को नष्ट नहीं कर सकती?

मत सोचो, मत करो याद
सलीब पर मौत को,
अलबत्ता वह मरता है हर रोज़,
वह इकलौता, सब को प्रेम करने वाला
जिसने बिना किसी ज़रूरत के
सहमति दी और
यातना देने वाली कीलों समेत
हरेक चीज़ को बने रहने की इजाज़त दी.

पूरी तरह गूढ़.
असम्भव जटिल.
बेहतर है वाणी पर रोक लगा दी जाए.
लोगों के लिए नहीं है यह भाषा.
प्रसन्नता को आशीष मिले.
अंगूर और फ़सल.
चाहे हर किसी को न मिले
शान्ति.

मैं कसम खाता हूं, मेरे भीतर शब्दों की कोई जादूगरी नहीं

पोलिश भाषा के बड़े कवि चेस्वाव मीवोश की दो और कविताएं


समर्पण

सुनो, तुम
जिन्हें मैं बचा न सका.
इस सादा बयान को समझने की कोशिश करो क्योंकि किसी और से मुझे शर्मिन्दगी होगी.
मैं कसम खाता हूं, मेरे भीतर शब्दों की कोई जादूगरी नहीं.
मैं तुमसे बात करता हूं जैसे कोई बादल या पेड़ करेगा ख़ामोशी से.

वही घातक था तुम्हारे लिए जिसने ताकत दी मुझे.
तुमने एक युग की विदाई को लिपझा दिया एक नए युग की शुरुआत से,
घृणा की प्रेरणा को काव्यात्मक सौन्दर्य से,
अन्धी ताकत को सम्पादित आकार से.

ये रही उथली पोलिश नदियों की घाटी. और एक विशालकाय पुल
सफ़ेद कोहरे में जाता हुआ. ये रहा एक टूटा शहर
और हवा फेंक रही है मूर्खों की चीखें तुम्हारी कब्र पर
जब मैं तुम से बात कर रहा हूं.

क्या है कविता जो
देशों और लोगों को न बचाए?
आधिकारिक झूठों के साथ एक सांठगांठ
नशेड़ियों का एक गीत, जिनके गले एक पल में काट डाले जाएंगे,
कॉलेज जाने वाली लड़कियों के लिए पाठ.
कि मुझे बग़ैर जाने अच्छी कविता चाहिए थी,
कि मैंने देर से उस के अकेले उद्देश्य को पाया,
इसमें और सिर्फ़ इसी में है मेरी मुक्ति.

लोग उड़ेला करते थे कब्रों पर मोटा अन्न या पोस्त के बीज
मृतकों को भोजन देने को जिन्होंने चिड़ियों का भेस धर कर आना था.
मैं यह किताब रख रहा हूं यहां तुम्हारे लिए, तुम जो एक बार जिए थे
ताकि अब तुम हमें मिलने आगे से न आया करो.

लोहार की दुकान

मुझे पसन्द आईं रस्सी से चलाई जाने वाली धौंकनियां
हाथ या पैर वाला एक पैडल - मुझे याद नहीं कौन सा था.
लेकिन वह फूंका जाना, और आग की लपट!
और आग में लोहे का एक टुकड़ा, चिमटियों से थामा हुआ,
लाल,
पीटा जाता हुआ हथौड़े से, मोड़ा गया घोड़े की नाल में,
फेंका गया पानी की बाल्टी में, छन्न-छन्न, भाप.

नालें पहनाने को बांधे गए घोड़े,
अपनी अयालें हिलाते हुए; और नदी किनारे घास
मरम्मत किए जाने की प्रतीक्षा में हलों की फालें, हथगाड़ियां, कुदालियां

प्रवेश पर, मिट्टी के फ़र्श पर मेरे नंगे पैर
यहां, गर्मी के थपेड़े; मेरे पीछे सफ़ेद बादल.
मैं देखता जाता हूं देखता जाता हूं. ऐसा लगता है मुझे इसी के लिए बुलाया गया था:
चीज़ों का गरिमागान करने को सिर्फ़ इसलिए कि वे हैं.

लिफ्टमैनों को सलाम

कथाकार सूरज प्रकाश ने ख़ास कबाड़ख़ाने के वास्ते यह रचना भेजी है. लुत्फ़ उठाइए:


ढाई फुट X साढ़े तीन फुट के भीतर चालीस बरस

पिछले दिनों पुणे में एक होटल में ठहरना हुआ. होटल एक मॉल की पांचवीं और छठी मंजि़ल पर था. पहली मंजि़ल से तीसरी मंजिल पर खाना-पीना, कुछ दुकानें और सिनेमाघर. इनके लिए लोग लिफ्ट का इस्‍तेमाल कम ही करते. चौथी मंजि़ल पर सिनेमाघरों के स्‍क्रीन के कारण लिफ्ट रुकती नहीं थी.

तो मैं होटल में आने-जाने के लिए जब भी लिफ्ट में गया, चाहे सुबह 6 बजे सैर पर जाने के लिए या देर रात कहीं से वापिस आने के लिए, लिफ्ट का बटन दबाते ही दरवाजा खुलता और मुझे उसके भीतर लिफ्टमैन खड़ा नज़र आता. दो-चार बार के बाद ही उसे पता चल गया था कि मैं होटल में रुका हूं तो वह बिना पूछे ही पांचवीं मंजिल का बटन दबा देता. उसे लिफ्ट के भीतर देखते ही मैं हर बार चौंक जाता और सोचने लगता – कितनी मुश्किल नौकरी है बेचारे की. होटल में कुल तीस कमरे हैं और दो लिफ्ट. ये तय है कि होटल में आने-जाने का समय आम तौर पर सुबह नौ-दस बजे और होटल के चैक-इन और चैक-आउट के समय ही ज्‍यादा होता होगा. ऐसे में जब लिफ्ट नहीं चल रही होती तो वह बेचारा किसी न किसी के द्वारा बटन दबाये जाने का इंतजार करता रहता होगा. खड़े-खड़े, क्‍योंकि लिफ्ट में स्‍टूल नहीं है. ये इंतज़ार कई-कई बार घंटों का भी रहता होगा. अगर वह लिफ्ट के बाहर भी खड़ा हो कर इंतज़ार करे तो एक तरफ होटल की लॉबी और दूसरी तरफ रिसेप्‍शन. वहां भी भला उससे बात करने वाला कौन होगा! वैसे भी लिफ्टमैन बेचारा सिर्फ फ्लोर नम्‍बर पूछने के अलावा बोलता ही कहां है. सुनने के नाम पर उसके हिस्‍से में लिफ्ट में कुछ पलों के लिए आये मुसाफिरों के आधे अधूरे वाक्‍य ही तो आते हैं जो हर मुसाफिर के जाने के बाद हमेशा के लिए आधे ही रह जाते हैं. लिफ्टमैन की पूरी जिंदगी ये आधे अधूरे वाक्‍य सुनते ही गुज़र जाती है. दुनिया भर के‍ लिफ्टमैन आधा-अधूरा सुनने और सिर्फ फ्लोर नम्‍बर पूछने के लिए अभिशप्‍त हैं.

पूछा था मैंने उस लिफ्टमैन से कि कितने घंटे की नौकरी है और कि क्‍या अजीब नहीं लगता बंद लिफ्ट में इस तरह से लगातार खड़े रहना और इंतज़ार करना कि कोई बटन दबाये तो लिफ्ट ऊपर या नीचे हो. वह झेंपी हुई हँसी हँसा था - साब, नौकरी यही है तो किससे शिकायत. दस घंटे की ड्यूटी होती है और बीच-बीच में रिलीवर आ जाता है. तब मैंने हिसाब लगाया था - यही लिफ्टमैन अकेला तो नहीं है जो लिफ्ट, यानी ढाई फुट X साढ़े तीन फुट की सुनसान जगह के भीतर खड़ा है. हमेशा बाहर से बटन दबाये जाने के इंतज़ार में. खुद बटन दबाये भी क्‍या हो जाने वाला है. अपनी मर्जी से लिफ्ट को कहीं और ले जा भी नहीं सकता. सिर्फ ऊपर या सिर्फ नीचे.

पुणे में ऐसे पचीसों इमारतें होंगी, महाराष्‍ट्र में सैकड़ों, पूरे देश में हजारों और पूरी दुनिया में लाखों जहां ढाई फुट X साढ़े तीन फुट के भीतर एक न एक लिफ्टमैन खड़ा किसी न किसी के द्वारा बाहर से बटन दबाये जाने का इंतज़ार कर रहा होगा और ये इंतज़ार वह ढाई फुट X साढ़े तीन फुट के भीतर तब तक करता रहेगा जब तक वह इस काम से रिटायर न हो जाये या उसे कोई बेहतर काम न मिल जाये. तब उसकी जगह कोई और वर्दीधारी, टाई लगाये दूसरा लिफ्टमैन आ जायेगा. अपनी उम्र के चालीस बरस वहां गुजारने के लिए. ढाई फुट X साढ़े तीन फुट की सुनसान जगह में. बाहर से बटन दबाये जाने के इंतज़ार में. आधे अधूरे संवाद सुनने के लिए अभिशप्‍त.

इससे पहले कि लिफ्टमैन मुझे सलाम करे और मेरा फ्लोर नम्‍बर पूछे, मैं दुनिया भर के ऐसे सारे लिफ्टमैनों को सलाम करता हूं.

Wednesday, May 25, 2011

दंगा भेजियो मौला

आमतौर पर मैं इस ब्लॉग पर कहानियां पोस्ट करने का हिमायती नहीं हूं, लेकिन जब आज मैंने सुबह अनिल यादव के पहले कहानी-संग्रह "नगरवधुएं अख़बार नहीं पढ़तीं" के प्रकाशन की सूचना के साथ यह भी कहा था कि आज उनके संग्रह से कुछ अंश यहां प्रस्तुत करूंगा तो मैंने पाया कि अनिल की एक कहानी दंगा भेजियो मौला अपने अपेक्षाकृत छोटे आकार के चलते पूरी की पूरी भी पोस्ट की जा सकती है. इस से आपको अनिल की भाषा और विषय के चुनाव में लिए जाने वाले सायास ज़ोख़िम की बानगी नज़र आएगी. प्रस्तुत है कहानी दंगा भेजियो मौला-


धूप इतनी तेज थी कि पानी से उठती भाप झुलसा रही थी. कीचड़ के बीच कूड़े के ऊंचे ढेर पर एक कतार में छह एकदम नये, छोटे-छोटे ताबूत रखे हुए थे. सामने जहां तक मोमिनपुरा की हद थी, सीवर के पानी की बजबजाती झील हिलोरें मार रही थी, कई बिल्लियों और एक गधे की फूली लाशें उतरा रही थीं.

हवा के साथ फिरते जलकुंभी और कचरे के रेलों के आगे काफी दूरी पर एक नाव पानी में हिल रही थी जिसकी एक तरफ अनाड़ी लिखावट में सफेद पेंट से लिखा था "दंगे में आएंगे" और नाव की नोंक पर जरी के चमकदार कपड़े का एक छोटा सा झंडा फड़फड़ा रहा था.

बदबू के मारे नाक फटी जा रही थी, बच्चों के सिवा सबने अपने मुंह गमछों और काफियों से लपेट रखे थे. पीछे बुरके और सलूके घुटनों तक खोंसे औरतों का झुंड था जिसमें रह-रह हिचकियां फूट रही. कभी-कभार रुलाई की महीन, कंपकंपाती कोई भटकी हुई तरंग और हवा उसे उड़ा ले जाती.

ये सभी बस्ती के उस पार कब्रिस्तान जाने के लिए नाव का इंतजार कर रहे थे. हवा में इठलाते झंडे वाली नाव थी कि जैसे चिढ़ा रही थी कि दंगा होगा तब इस पार आएगी वरना उसे यकीन नहीं है कि ताबूतों में लाशें या लाशों के नाम पर कुछ और.

तैर कर थक जाने के बाद, एक नंग-धड़ंग किशोर नाव में अकेला बैठा, मुंह बाए इस भीड़ को ताक रहा था. छह ताबूत मुंह बांधे कोई पचास लोगों की भीड़, चौंधियाता सूरज और पानी पर सांय-सांय करती बरसात की दोपहर. बस्ती के आधे डूबे मकानों में से किसी छत पर रेडियो से गाना आ रहा था.

अचानक लोग झल्लाकर नाव और लड़के को गालियां देने लगे. लड़का अदृश्य भाप से छन कर आती भुनभुनाहट को कान लगाये लगाये सुनने की कोशिश करता रहा लेकिन भीड़ थप्पड़, मुक्के लहराने लगी तो वह हड़बड़ा कर नाव से कूद पड़ा और फिर तैरने लगा. भीड़ फिर खामोश होकर धूप में लड़के की कौंधती पीठ ताकते हुए इंतजार करने लगी.

बड़ी देर बाद तीन लड़के यासीन, जुएब और लड्डन नाव लेकर इस पार आये और कई फेरे कर ताबूतों को उस पार के कब्रिस्तान में ले गये. नाव दिन भर बस्ती के असहनीय दुख ढोती रही.

शाम होते ही किनारों पर बसी कालोनियों की बत्तियां जलीं और सीवर की झील झिलमिल रोशनियों से सज गयी. लगता था कि यह कोई खूबसूरत सा शांत द्वीप है. रात गये लोग उन छह बच्चों को मिट्टी देकर मुंह बांधे प्रेतों के काफिले की तरह इस पार वापस लौटे.

ये चार लड़के और दो लड़कियां आज सुबह तक पानी में डूबे एक घर की छत पर खेल रहे थे. डेढ़ महीने से पानी में आधा डूबा मिट्टी के गारे का मकान अचानक भरभरा कर बैठ गया और वे डूब कर मर गये. थोड़ी ही देर में उनकी कोमल लाशें बिल्लियों की तरह फूलकर बहने लगीं. मकान की साबुत खड़ी रह गयी एक मुंडेर पर उनका खाना जस का तस धरा रह गया और जो राम जी के सुग्गे (ड्रैगनफ्लाई) उन्होंने पकड़ कर करघे के रेशमी धागों से बांधे थे वे अब भी वहीं उड़ रहे थे.

इन रंग-बिरंगी रेशमी पूंछ वाले पतंगों के पंखों की सरसराहट जितना जीवन वे छोड़ गये थे, वही इस सड़ती काली झील के ऊपर नाच रहा था. बाकी बस्ती सुन्न थी. पानी में डूबे घरों में उन बच्चों की मांओं की सिसकियों की तरह कुप्पियां भभक रही थीं.

नदी के किनारे बसे शहर के बाहरी निचले हिस्से में आबाद मोमिनपुरा का हर साल यही हाल होता था. बरसात आते ही पानी के साथ शहर भर का कूड़ा-कचरा मोमिनपुरा की तरफ बहने लगता और जुलाहे ताना-बाना, करघे समेट कर भागने लगते. इसी समय मस्जिद के आगे जुमे के रोज लालटेनें, नीम का तेल, प्लास्टिक के जूते और बांस की सीढ़ियां बेचने वाले अपना बाजार लगा लेते थे.

सबसे पहले मकानों के तहखानों में करघों की खड्डियों में पानी भरता और गलियों में अनवरत गूंजने वाला खड़क-खट-खड़क-खट-खड़क का रोटी की मिठास जैसा संगीत घुटने भर पानी में डूब कर दम तोड़ जाता. लोग बरतन-बकरियां, मुर्गियां, बुने अधबुने कपड़ों के थान और बच्चों को समेट कर शहर में ऊपर के ठिकानों की तरफ जाने लगते फिर भी एक बड़ी आबादी का कहीं ठौर नहीं था. वे मकानों की ऊपर की मंजिलों में चले जाते. एक मंजिला घरों की छतों पर सिरकियां, छोलदारियां लग जातीं.

इसी समय मोमिनपुरा की बिजली काट दी जाती क्योंकि पानी में करंट उतरने से पूरी बस्ती के कब्रिस्तान बन जाने का खतरा था. पावरलूम की मशीनें खामोश होकर डूबने लगतीं क्योंकि उन्हें इतनी जल्दी खोदकर कहीं और ले जाना संभव नहीं था. तभी दूसरे छोर पर बढियाई नदी के दबाव से पूरे शहर की सीवर लाइनें उफन कर उल्टी दिशा में बहने लगतीं. मैनहोलों पर लगे ढक्कन उछलने लगते और बीस लाख आबादी का मल-मूत्र बरसाती रेलों के साथ हहराता हुआ मोमिनपुरा में जमा होने लगता.

चतुर्मास में जब साधु-संतों के प्रवचन शुरू होते, मंदिरों में देवताओं के श्रृंगार उत्सव होते, कंजरी के दंगल आयोजित होते और हरितालिका तीज पर मारवाड़िनों के भव्य जुलूस निकलते तभी यह बस्ती इस पवित्र शहर का कमोड बन जाती थी. मोमिनपुरा को पानी सप्लाई करने वाले पंपिंग स्टेशन पर कर्मचारी ताला डालकर छुट्टी पर चले जाते क्योंकि कटी-फटी पाइप लाइनों के कारण मोमिनपुरा पूरे शहर में महामारी फैला सकता था.

मोमिनपुरा वाले चंदा लगाकर मल्लाहों से दस-बारह नावें किराए पर ले आते और वहां का जीवन अचानक शहर की बुनकर बस्ती की खड़कताल से बिदक कर बाढ़ में डूबे, अंधियारी कछारी गांव की चाल चलने लगता. मल्लाह नावें तो दे देते थे लेकिन यहां आकर चलाने के लिए राजी नहीं होते थे. थोड़ी ज्यादा आमदनी पर गू-मूत में नाव खेने से उन्हें एतराज नहीं था, डर था कि कई एकड़ की झील में अगर मुसलमान काट कर फेंक देंगे तो किसी को पता भी नहीं चलेगा.

हर घर की छत तक, कीचड़ में धंसा कर बांस की एक सीढ़ी लगा दी जाती. राशन, सौदा-सुल्फा लोग पास के बाजारों से ले आते. एक नाव दिन रात पास के मोहल्लों से पीने के पानी की फेरी करती रहती थी. लोग कपड़ों की फेरी करने नाव से पास के गांवों, शहरों में जाते, बच्चे दिन भर पानी में छपाका मारते या खामखां मछली पकड़ने की बन्सियां डालकर बैठे रहते. छतों पर टंगे लोग हर शाम सड़ते पैरों और जानलेवा खुजली वाले हिस्सों पर नीम का तेल पोतते. लुंगी, टोपी, बधना हर चीज में मौजूद झुंड की झुंड चीटियों से जूझते और पानी जल्दी उतरने की मन्नतें करते. महीना-पचीस दिन में काली झील सिकुड़ने लगती और बस्ती पर बीमारियां टूट पड़तीं. हैजा, गैस्ट्रो, डायरिया से सैकड़ो लोग मरते जिनमें ज्यादातर बच्चे होते. उन्हें दफनाने के कई महीने बाद कहीं जाकर रोटी के मिठास वाला संगीत फिर सुनाई देने लगता और जिंदगी धीरे-धीरे पटरी पर लौट आती.

इस साल डेढ़ महीना गया पानी नहीं उतरा. दानवाकार काली झील का दायरा फैलता ही जा रहा था. छतों पर टंगे लोग हैरत और भय से पानी को घूरते रहते. …एक दिन अचानक बढ़ता पानी बोलने लगा.

बस्ती की जिंदगी और इस पानी का रंग, रूप, नियति एक ही जैसे थे. आचमन करने और हाथ में जल लेकर गंगा-जमुनी तहजीब का हवाला देने के दिन कब के लद चुके थे. यह शहर अब इस पानी और बस्ती दोनों से छुटकारा पाना चाहता था. इस बार पानी कुछ कह रहा था… डभ्भक-डभ्भाक… डभ्भक-डभ्भाक… बस्ती के लोग सुनते थे लेकिन समझ नहीं पा रहे थे.

भोर के नीम अंधेरे में जब मोमिनपुरा के लोग एक दूसरे से नजरें चुराते हुए, कौओं की तरह पंजों से मुंडेरों को पकड़े शौच कर रहे होते ठीक उसी वक्त आगे मोटर साइकिलों, पीछे कारों पर सवार लोगों की प्रभात फेरी शहर से निकलती. शंख-घंटे-तुरहियां बजाते कई झुंड बस्ती से सटकर गुजरते हाई-वे की पुलिया पर रुकते, गगनभेदी नारों के बीच वे टार्चों की रोशनियां छतों पर टंगे जुलाहों पर मारते और कहकहे लगाते. फिर बूढ़े, जवान और किशोर एक साथ किलक कर गले बैठ जाने तक चिल्लाते रहते -

"पाकिस्तान में ईद मनायी जा रही है"

"डल झील में आतिशबाजी हो रही है" सुबह सूरज निकलने तक घंटे-घड़ियाल बजते रहते.

झील का पानी बोलता रहा. इस साल कई और नये अपशकुन हुए. मल्लाहों ने नावें देने से मना कर दिया, उनका कहना था कि जिस नाव से भगवान राम को पार उतारा था उसे भला गू-मूत में कैसे चला सकते हैं. म्यूनिसिपैलिटी ने इस साल पानी निकासी के लिए एक पंप नहीं लगाया, अफसरों ने लिख कर दे दिया सारे पंप खराब हैं, मरम्मत के लिए पैसा नहीं है, सरकार पैसा भेजेगी तो पानी निकाला जाएगा. लोक निर्माण विभाग ने घोषित कर दिया कि हाईवे की पुलिया से हर साल की तरह अगर पानी की निकासी की गयी तो जर्जर सड़क टूट सकती है और शहर का संपर्क बाकी जगहों से कट सकता है. आपदा राहत विभाग ने ऐलान कर दिया कि यह बाढ़ नहीं मामूली जलभराव है, इसलिए कुछ करने प्रश्न ही नहीं पैदा होता.

अस्पतालों ने मोमिनपुरा के मरीजों को भर्ती करने से मन कर दिया कि जगह नहीं है और संक्रमण से पूरे शहर में महामारी का खतरा है. पावरलूम की मशीनें और मकानों का मलवा खरीदने के लिए कबाड़ी फेरे लगाने लगे. पानी में डूबे मकानों का तय-तोड़ होने लगा. रियल इस्टेट के दलाल समझा रहे थे कि हर साल तबाही लाने वाली जमीन से मुसलमान औने-पौने में जितनी जल्दी पिन्ड छुड़ा लें उतना अच्छा है. यासीन की खाला ने अपने दूल्हा भाई को संदेश भेजा था कि मोमिनपुरा में अबकी न घर बचेगा न रोजगार बचेगा, इसलिए फिजूल की चौकीदारी करने बजाए जल्दी से कुनबे समेत यहां चले आएं, उनके बसने और रोटी का इंतजाम हो जाएगा. परवेज और इफ्फन के पूरे खानदान को उनके मामू जबरन अपने साथ घसीट ले गये थे.

परवेज और इफ्फन, ये दोनों भाई मोमिनपुरा के मशहूर स्पिनर थे. यासीन उस निराली टीम का कप्तान था जिसका कोई नाम नहीं था. इसके ज्यादातर खिलाड़ी ढरकी और तानी भरने की उम्र पार कर चुके थे. अब वे बिनकारी, डिजाइनिंग और फेरी के वक्त ग्राहकों से ढाई गुना दाम बताकर आधे पर तय-तोड़ करना सीख रहे थे. लेकिन यह सब वे अब्बुओं और फूफियों से काफी फटकारे-धिक्कारे जाने के बाद ही करते थे.

ज्यादातर समय वे तानों के रंग-बिरंगे धागों से घिरे मैदान में खपच्चियां गाड़ कर क्रिकेट की प्रैक्टिस किया करते थे. किट थी लुंगी, ढाका से आयी रबड़ की सस्ती चप्पलें और गोल नमाजी टोपी. गिजा थी बड़े का गोश्त और आलू का सालन. रियाज था तीन दिन में पचास गांवों की साइकिल से फेरी और कोच था टेलीविजन. शुएब अख्तर, सनत जयसूर्या, सचिन तेन्दुलकर, जोन्टी रोडस, डेरेल टफी, शेन वार्न सभी दिन में उनकी नसों में बिजली की तरह फिरते थे और रातों को सपने में आकर उनकी पसंद की लड़कियों और प्रेमिकाओं को हथिया ले जाते थे.

मोमिनपुरा की लड़कियां भी कैसी बेहया थीं जो छतों से छुप-छुप कर इशारे उन्हें करती थीं, तालियां उनके खेल पर बजातीं थीं लेकिन हरजाई हंसी हंसते हुए उन चिकनों की लंबी-लंबी गाड़ियों में बैठ कर फुर्र हो जाती थीं.

अब ये ब्लास्टर, स्विंगर और गुगलीबाज छतों पर गुमसुम लेटे आसमान में मंडराती चीलों को ताकते थे, भीतर कहीं घुमड़ती मस्जिद की अजान सुनते थे और नीचे बजबजाते पानी से बतियाते रहते थे.

खबर आयी कि बढ़ियाई नदी में पंप लगाये जा रहे हैं जिनका पानी भी इधर ही फेंका जाएगा. एक दिन हवा के थपेड़ों से पगलाये पानी ने यासीन से पूछा, "तुम्हारे अल्ला मियां कहां है? क्या अब भी…” यासीन ने कुढ़कर सोचा, अब यहां का गंधाता पानी निकालने के लिए भी क्या अल्ला मियां को ही आना होगा.

मल्लाहों के नाव देने से मना कर देने के बाद बस्ती के जैसे हाथ-पांव ही कट गये थे. ऐसे में पता नहीं कहां से पैसे इकट्ठा कर यासीन और उसके निठल्ले दोस्त एक पुरानी नाव खरीद लाये. टीम काम पर लग गयी. लड़कों ने पुरानी नाव को रंग-रोगन किया, जरी के एक टुकड़े पर एमसीसी लिख कर डंडे से टांग दिया. इस तरह उस गुमनाम टीम का मोमिनपुरा स्पोर्टिंग क्लब पड़ गया और दो चप्पुओं से बस्ती की जिंदगी सीवर के पानी में चलने लगी. फिर टीम मदद मांगने बाहर निकली.

पहले वे उन नेताओं, समाज सेवियों और अखबार वालों के पास गये जो दो बरस पहले हुए दंगे के दौरान बस्ती में आये थे और उन्होंने उनके बुजुर्गों को पुरसा दिया था. वे सभी गरदनें हिलाते रहे लेकिन झांकने नहीं आए. फिर वे सभी पार्टियों के नेताजियों, अफसरों-हाकिमों, स्वयंसेवी संगठनों के भाईजियों और मीडिया के भाईजानों पास गये.

हर जगह टीम के ग्यारह मुंह एक साथ खुलते, "जनाब, खुदा के वास्ते बस एक बार चल कर देख लीजिए हम लोग किस हाल में जी रहे हैं. पानी ऐसे ही बढ़ता रहा तो सारे लोग मर जाएंगे"

किसी ने सीधे मुंह बात नहीं की. पता चलते ही कि मोमिनपुरा वाले हैं उन्हें बाहर से टरका दिया जाता था. वे गू-मूत में लिथड़ी महामारी थे जिनसे हर कोई बचना चाहता था. फलां के पास जाओ, पहले कागज लाओ, देखते हैं… देख रहे हैं… देखेंगे… ऐसा करते हैं, वैसा करते हैं… सुनते-सुनते वे बेजार हो गये.

देर रात गये जब वे अपनी साईकिलें नाव पर लाद कर वे जब घरों की ओर लौटते, अंधेरी छतों से आवाजें आतीं, "क्या यासीन मियां वे लोग कब आएंगे?”

अंधेरे में लड़के एक दूसरे को लाचारी से ताकते रहते और नाव चुपचाप आगे बढ़ती रहती. टीम के लड़के दौड़ते रहे, लोग टरकाते रहे और बस्ती पूछती रही. एक रात बढ़ियाते पानी ने घर लौटते लड़कों से, "बेटा, अब वे लोग नहीं आएंगे"

"काहे?" यासीन ने पूछा.

तजुरबे की बात है उस दुनिया के लोग यहां सिर्फ दो बखत आते हैं या दंगे में या इलेक्शन में. गलतफहमी में न रहना कि वे यहां आकर तुम्हारे बदन से गू-मूत पोंछ कर तुम लोगों को दूल्हा बना देंगे. अगले ही दिन यासीन ने दांत भींचकर हर रात, सैकड़ो आवाजों में पूछे जाने वाले उस एक ही सवाल का जवाब नाव पर सफेद पेंट से लिख दिया – "दंगे में आएंगे" ताकि हर बार जवाब देना न पड़े.

काला पानी कब से लोगों से यही बात कह रहा था लेकिन वे जाने किससे और क्यों मदद की उम्मीद लगाये हुए थे. भोर की प्रभात फेरी में पाकिस्तानियों को ईद की मुबारकबाद देने वालों की तादाद बढ़ती जा रही थी. घंटे-घड़ियाल और शंख की ध्वनियां नियम और अनुशासन के साथ हर सुबह और गगनभेदी होती जा रही थीं.

छह बच्चों के दफनाने के बाद एमसीसी के लड़कों ने घर जाना बंद कर दिया था. तीन-चार लोग नाव पर रहते थे, बाकी एक ऊंचे मकान पर चौकसी करते थे. दो महीने से पानी में डूबे रहने के बाद अब मकान आये दिन गिर रहे थे. रात में गिरने वाले मकानों में फंसे लोगों की जान बचाने के लिए यह इंतजाम सोचा गया था.

दिन बीतने के साथ बदबूदार हवा के झोकों से नाव झील में डोलती रही, तीन तरफ से बस्ती को घेरे कालोनियों की रोशनियां काले पानी पर नाचती रहीं, हर रात बढ़ते पानी के साथ बादलों से झांकते तारों समेत आसमान और करीब आता रहा. सावन बीता, भादों की फुहार में भींगते शहर से घिरे दंड-द्वीप पर अकेली नाव में रहते काफी दिन बीत गये और तब लड़कों के आगे रहस्य खुलने लगे.

पानी, हवा, घंटे-घड़ियाल, मर कर उतराते जानवर, गिरते मकान, रोशनियों का नाच, सितारे और चींटियों के झुंड सभी कुछ न कुछ कह रहे थे. एक रात जब पूरी टीम बादलों भरे आसमान में आंखें गड़ाए प्रभात-फेरी का इंतजार कर रही थी, पानी बहुत धीमें से बुदबुदाया, "दंगा तो हो ही रहा है"

"कहां हो रहा है बे", यासीन के साथ पूरी टीम हड़बड़ा कर उठ बैठी.

रूंधी हुई मद्धिम आवाज में पानी ने कहा, "ये दंगा नहीं तो और क्या है. सरकार ने अफसरों को इधर आने से मना कर दिया है. डाक्टरों ने इलाज से मुंह फेर लिया है. जो पंप यहां लगने चाहिए उन्हें नदी में लगाकर पानी इधर फेंका जा रहा है. करघे सड़ चुके, घर ढह रहे हैं, बच्चे चूहों की तरह डूब कर मर रहे हैं. सबको इसी तरह बिना एक भी गोली-छुरा चलाये मार डाला जाएगा. जो बेघर-बेरोजगार बचेंगे, वे बीमार हो कर लाइलाज मरेंगे"

नाव की पीठ पर सिर पटकते हुए पानी रो रहा था.

टीम में सबसे छोटे गुगलीबाज मुराद ने सहम कर पूछा, "यासीन भाई हम सबको क्यों मार डाला जाएगा"

"क्योंकि हम लोग मुसलमान हैं बे. इतना भी नहीं जानते" यासीन तमतमा गया.

"हम लोग जिनके पास गये थे, क्या वे लोग भी हमें नहीं बचाने आएंगे?"

"आएंगे, आएंगे जब आमने सामने वाला दंगा होगा तब आएंगे"

उस रात के बाद पानी से टीम की एक साथ कोई बात नहीं हुई. सब अलग-अलग लहरों को घूरते और बतियाते रहे.

अगले जुमे को एमसीसी की टीम के सभी ग्यारह खिलाड़ियों ने फजर की नमाज के वक्त नाव में सिजदा कर एक ही दुआ मांगी, "दंगा भेजियो मोरे मौला, वरना हम सब इस नर्क में सड़ कर मर जाएंगे. गू-मूत में लिथड़ कर मरने की जिल्लत से बेहतर है कि खून में डूब कर मरें"

दो दिन बाद मोमिनपुरा में भरते पानी के दबाव से हाई-वे की पुलिया टूट गयी. काली झील कई जगहों से सड़क तोड़ कर उफनाती हुई पास के मोहल्लों और गांवों के खेतों में बह चली. घंटे-घड़ियाल-शंखों का समवेत शोर बर्दाश्त के बाहर हो गया.

प्रभात फेरी करने वालों की अगुवाई में शहर और गांवों से निकले जत्थे मोमिनपुरा पर चढ़ दौड़े. सीवर के बजबजाते पानी में हिंदू और मुसलमान गुत्थमगुत्था हो गये. अल्लाह ने हताश लड़कों की दुआ कबूल कर ली थी.

"नगरवधुएं अख़बार नहीं पढ़तीं" का प्रकाशन

श्रेष्ठ कबाड़ी अनिल यादव का पहला कहानी संग्रह "नगरवधुएं अख़बार नहीं पढ़तीं" आज प्रेस से छप कर आ गया है. अंतिका प्रकाशन से छपे इस संग्रह का ब्लर्ब अग्रणी कथाकार योगेन्द्र आहूजा ने लिखा है जबकि हमारे समय के बड़े चित्रकार अशोक भौमिक ने पुस्तक का मनमोहक आवरण तैयार किया है. अनिल को बधाई.


प्रस्तुत है पुस्तक का ब्लर्ब:

हिंदी में कहानी की दुनिया में इस वक्त एक खलबली, एक उत्तेजना, एक बेचैनी है । एक जद्दोजहद, जो शायद अभूतपूर्व है, जारी है कहानियों के लिये एक नया स्वरूप, नयी संरचना, नया शिल्प पाने की । इस जददोजहद का हिस्सा अनिल यादव की कहानियां भी हैं । इस समय जबकि संकल्पनायें टूट रही हैं, प्राथमिकतायें बदल रही हैं, हमारे राष्ट्रीय और सामाजिक जीवन में नयी सत्तायें और गठजोड़ उभर रहे हैं, जो निरंतर व्याख्या की मांग करते है, आर्थिक संबंध तेजी से बदल रहे हैं और उसके नतीजे में सामाजिक ढ़ांचा और यथार्थ जटिल से जटिलतर होते जा रहे हैं - स्वाभाविक है कि उन्हें व्यक्त करने की कोशिश में कहानी का स्वरूप वही न रहे, उसका पारंपरिक रूपाकार भग्न हो जाये । लेकिन अपने समकालीनों से अनिल यादव की समानता यहीं तक है, इतनी ही - और उनकी कहानियों का वैशिष्ट्य इसमें नहीं है ।

अनिल पूरी तरह सचेत हैं कि नये शिल्प के माने यह नहीं कि कहानी शिल्पाक्रान्त हो जाये या भाशिक करतब को ही कहानी मान लिया जाये । ऐसी रचना जिसमें चिंता न हो, विचार न हो, कोई प्क्ष न हो, किसी तरह की बौद्धिक मीमांसा न हो, वह महज लफ्जों का एक खेल होती है, कहानी नहीं । अनिल का सचेत चुनाव है, शायद मुश्किल और कष्टपूर्ण भी, कि वे कहानी की दुनिया में चल रहे इस फैशनेबल, आत्महीन खेल से बाहर रहेंगे । ऐसी कहानियां उनका लक्ष्य नहीं जो केवल क्लासिकी गद्य या वाक्यों की भंगिमाओं और हरकतों से लिख ली जाती हैं, जिनमें सिर्फ वाचा के स्वाद की गारंटी होती है, किसी तरह की समझ का वादा नहीं । वे कहानियों के लिये किसी ऐसे समयहीन वीरान में जाने से इंकार करते हैं जहां न परंपरा की गांठें हों, न इतिहास की उलझनें । वे अपने ही मुश्किल, अजाने रास्ते पर जाते हैं । तलघर, भग्न गलियों, मलिन बस्तियों, कब्रिस्तान, कीचड़, कचरे और थाने जैसी जगहों से वे कहानियां बरामद कर लाते हैं । तभी लिखी जाती हैं ‘नगरवधुएं अखबार नहीं पढ़तीं’ और ‘दंगा भेजियो मौला’ जैसी अद्वितीय ‘डार्क’ कहानियां, इस पुरानी बात को फिर याद दिलाती हुई कि एक संपूर्ण और प्राणवान रचना न केवल अनुभवों, विवरणों या सूचनाओं से बनती है, न केवल भव्य और आकर्षक शिल्प से । वह बनती है तकलीफ और त्रासदी के संदर्भों को मनु्ष्य की न्यायकामना के सातत्य में रख पाने से, यह याद दिला पाने से कि कुछ भी पूरी तरह व्यक्तिगत या तात्कालिक नहीं होता, हर अकस्मात के आगे और पीछे अदृश्य धागे होते हैं, हर शख्स के, हर घटना के पीछे एक पूरा इतिहास सक्रिय होता है । इसी तरह ‘लोक कवि का बिरहा’ और ‘लिबास का जादू’ में, अन्य कहानियों में भी, हम देखते हैं कहन का एक नया अंदाज, दृश्यों का अपूर्व रचाव, नैसर्गिक ताना बाना और संतुलित और सधा हुआ शिल्प, लेकिन अंततः उन्हें जो कहानी बनाता है वह है जीवन की एक मर्मी आलोचना । इन कहानियों का अनुभवजगत बहुत विस्तृत है, लेकिन उतना ही गझिन और गहरा भी । आज के कथा परिदृश्य में ‘लोक कवि का बिरहा’ जैसी कहानी का, जो एक ग्राम्य अंचल में एक लोकगायक के जीवन का, उसकी दहशतों, अपमान, अवसाद और संघर्श का मार्मिक आख्यान है, समकक्ष उदाहरण तलाश पाना मुश्किल होगा, और ऐसी कहानी शायद आगे असंभव होगी ।

इस वक्त हिंदी की दुनिया में हर जानी पहचानी चीज के अर्थो में तोड़ फोड़ की जा रही है । जहां अस्प्ष्टता को एक गुण मान लिया जाये वहां अर्थों की स्पष्टता भी एक अवगुण हो सकती है । इन कहानियों में न अस्प्ष्टता है, न चमकदार मुहावरे, न एकांत आत्मा का नाटक, न अनंत दूरी पर स्थित किसी सत्य को पाने की कोशिश या आकांक्षा, न आत्मालाप, न आत्मा पर जमी गर्द को मिटाने की कोशिश । लेकिन इनमें दर्द से भरे चेहरे बेशुमार हैं जिन्हें आप स्पर्श कर सकते हैं ।

पुस्तक मिलने का पता:

अंतिका प्रकाशन
सी-५६/यूजीएफ़-४
शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-II
ग़ाज़ियाबाद-२०१००५ (उ.प्र.)


(पुस्तक के कुछ अंश आज ही ज़रा देर में.)

Tuesday, May 24, 2011

तुम चलते हो उस धरती पर जिसे तुम भूल रहे हो


लिथुआनियाई मूल के चेस्वाव मीवोश (जून ३० १९११-अगस्त १४ २००४) पोलिश भाषा के जाने-माने कवि और अनुवादक थे. १९८० में मीवोश साहित्य के नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित हुए.

चेस्वाव मीवोश की दो कविताएं. अभी आगे भी आप उनकी कई कविताएं पढ़ेंगे -


इतना थोड़ा

इतना थोड़ा कहा मैंने.
छोटे थे दिन.

छोटे दिन.
छोटी रातें.
छोटे साल.

मैंने इतना थोड़ा कहा.
मैं कर ही नहीं सका.

मेरा दिल थक गया
ख़ुशी से
दुःख से
ललक से
उम्मीद से.

समुद्री दानव के जबड़े
मुझ पर कस रहे थे.

विवस्त्र पड़ा हुआ हुआ था मैं
रेगिस्तानी द्वीपों में.

संसार की सफ़ेद व्हेल ने
घसीट कर फेंका मुझे अपने गड्ढे में.

और अब मैं नहीं जानता
उस सब में यथार्थ क्या था.

भूल जाओ

भूल जाओ यातना
जो तुमने औरों को दी.
भूल जाओ यातना
जो तुम्हें मिली औरों से.
पानी भागता ही जाता है
चमकते हैं झरने और सूख जाते हैं
तुम चलते हो उस धरती पर जिसे तुम भूल रहे हो.

कभी-कभी तुम्हें सुनाई देती है किसी गीत की सुदूर टेक
इसका क्या मतलब है, तुम पूछते हो, कौन गा रहा ह?
बच्चों सरीखा गरमाता है सूरज
एक पोते और एक परपोते का जन्म होता है.
एक बार फिर तुम्हारा हाथ थाम कर तुम्हें रास्ता दिखाया जाता है.

नदियों के नाम रह जाते हैं तुम्हारे साथ,
कितनी अनन्त लगती हैं वे नदियां!
बंजर पड़े हैं तुम्हारे खेत,
शहर की मीनारें वैसी नहीं हैं जैसी हुआ करती थीं.
तुम खड़े रहते हो देहरी पर मौन.

कविता पर चेस्वाव मीवोश के विचार


पोलैण्ड के महाकवि चेस्वाव मीवोश (सही उच्चारण सुनने के लिए यहां जाएं)पिछली शताब्दी के बड़े कवियों में शुमार लिए जाते हैं. एक जगह उन्होंने कहा है: " ऐसा नहीं है कि मैं ईश्वर या कोई महानयक होना चाहता हूं. बस एक पेड़ में बदलने की चाहत है, पीढ़ियों तक बड़ा होते जाने की, बिना किसी को कोई नुकसान पहुंचाए."

देखिए कविता के बारे में कितनी आसानी से वे अपनी बात कहते हैं:

"कविता का उद्देश्य हमें यह याद दिलाना होता है कि एक ही व्यक्ति बने रहना कितना मुश्किल होता है, क्योंकि हमारा घर खुला हुआ है, दरवाज़ों में कोई ताले नहीं हैं और अदृश्य मेहमान अपनी इच्छा के मुताबिक उनमें से आ-जा सकते हैं."

मेरे अकेलेपन ने पूरी कर ली है अपनी पढ़ाई

एवा लिप्स्का की दो और कविताएं -


कोई नहीं

मैं इस लैण्डस्केप से सहमत हूं
जो है ही नहीं.

पिता थामे हुए एक वायोलिन
बच्चे उसकी ध्वनि को चाटते हुए.

एक झोंका
ग़ुलाब की पंखुड़ियों को सहलाता है.

फिर युद्ध. हम एक दूसरे की निगाह से दूर हो जाते हैं.
पूरे वाक्यों में ठुंसे शब्द छिपाए हुए हैं अपने को.

एक पुराने अपार्टमेन्ट हाउस में
गोधूलि में खड़ा
एक ख़ाली कमरा.

"कृपया सन्देश छोड़ जाएं"
कहता है कोई नहीं.


मेरा अकेलापन

मेरे अकेलेपन ने पूरी कर ली है अपनी पढ़ाई
वह समय का पाबन्द था और उसने बहुत मेहनत की.
उसे दिए गए तमाम तमग़े और इनामात.

लोकप्रिय है पाठ्यक्रम.
हज़ारों पाठक इस से गुज़रते हैं
चीज़ें लिखते हुए.
उन्हें मिटाते हुए.

वह शासन करने से आजिज़ आ चुका है
फ़्रेडरिक महान की तरह.

उसके अभी से कुछ शिष्य बन चुके हैं
डरे हुए और चापलूस.

सार्वजनिक है मेरा अकेलापन
वह बैठा है अपने पिंजरे में
कतर दिए जा चुके खा़मोशी के उसके पंख.

Monday, May 23, 2011

एवा लिप्स्का की एक कविता


८ अक्टूबर १९४५ को पोलैण्ड के क्राकोव में जन्मीं एवा लिप्स्का को पोलैण्ड के "न्यू वेव" कविता-आन्दोलन से जोड़ कर देखा जाता है. उनकी कविताओं के अनुवाद विश्व की तमाम भाषाओं में हुए हैं. समकालीन समाज में मनुष्य के रू-ब-रू अस्तित्ववादी परिस्थितियां उनकी कविता के केन्द्र में रहती हैं. आज उनकी एक कविता -

कविता-पाठ के वक़्त कुछ सवालात

आपका पसन्दीदा रंग कौन सा है?
सबसे खुशी का दिन?
क्या कोई कविता आपकी कल्पना से आगे निकली?
आपको कोई उम्मीद है?
आप डरा रही रही हैं हमें.
काला क्यों है आसमान?
समय को किसने गिरा दिया गोली मार कर?
समुद्र के ऊपर उड़ता वह एक ख़ाली हाथ था
या कोई हैट?
शादी की पोशाक के साथ
ग़मी का गुलदस्ता क्यों?
जंगली रास्तों के बजाय
अस्पतालों के गलियारे क्यों?
बीता समय क्यों, भविष्य क्यों नहीं?
आप ईश्वर में यकीन करती हैं? या नहीं?
आप डरा रही रही हैं हमें.
हम उड़ कर जा रहे हैं आप से दूर.

मैं कोशिश करती हूं उन्हें रोकने की
सीधे आग के भीतर उड़ जाने से.

धीरे धीरे तेरे प्यार में खोने लगे हम साजना


ग़ुलाम अली और आशा भोंसले के अल्बम "जेनेरेशन्स" से अब सुनिए एक और रचना. स्वर दे रहे हैं ग़ुलाम अली और आशा भोंसले

नैना रे नैना तो से लागे


१९८० के दशक में ग़ुलाम अली और आशा भोंसले ने मेराज़-ए-ग़ज़ल शीर्षक अल्बम में कुछ बेहतरीन ग़ज़लें पेश की थीं. उनमें से कुछ यहां पहले पोस्ट की जा चुकी हैं. कोई पच्चीस साल बाद यह जुगलबन्दी दोबारा सुनने को मिली. अहमद अनीस की रचनाओं को इस अल्बम में ग़ुलाम अली के सुपुत्र आमिर अली ने कम्पोज़ किया है

अल्बम की लॉन्च के समय ग़ुलाम अली ने कहा "मुझे नहीं मालूम था कि आमिर कम्पोज़ कर रहे हैं. मुझे बहुत हैरत हुई जब उन्होंने मुझसे इस बाबत बात की. मैंने यथासम्भव उनकी मदद की" गौरतलब है कि इस अल्बम पर कोई पांच साल की मेहनत लगी. आज इस अल्बम से पहले सुनिये आशा भोंसले को


एक ज़हनी दुनिया मे खर्च हो जाने से बचने के लिए

देहात के साधारण काम काजी लोगों की परस्पर बातचीत मुझे बहुत आकर्षित करतीं हैं। इन चर्चाओं मे गज़ब की सोच , एक अलग दृष्टिकोण, लय और आस्वाद घुले होते हैं. सीधी बहस न हो कर वहाँ असहमति के अद्भुत इशारे होते हैं........ एकदम कविता सुनने जैसा ! अभी कुछ माह पूर्व मैं कुल्लू मे एक टीस्टाल पर यह नायाब संवाद रेकार्ड कर गया. मैं इस की कविता बनाना चाहता हूँ. संवाद यहाँ बोल्ड फोंट्स मे दिए गए हैं . बाक़ी हिसा मेरी अपनी टिप्पणी है:




ऐसे बेखटके शामिल हो जाने का मन था
उस बात चीत में जहाँ एक घोड़े वाला
और कुछ संगतराश थे ढाबे के चबूतरों पर
ऐसे कि किसी को अहसास ही न हो


वहाँ बात हो रही थी
कैसे कोई कौम किसी दूसरे कौम से अच्छा हो सकता है
और कोई मुल्क किसी दूसरे मुल्क से

कि कैसे जो अंगरेज थे
उन से अच्छे थे मुसलमान
और कैसे दोनो ही बेहतर थे हमसे

कि क्या अस्सल एका था बाहर के कौमों में
मतलब ये जो मुसल्ले बगैरे होते हैं
कि हम तो देखने को ही एक जैसे थे ऊपर से
और अन्दर खाते फटे हुए

सही गलत तो पता नहीं हो भाई,
हम अनपढ़ आदमी, क्या पता ?
पर देखाई देता है साफ साफ
कि वो ताक़तवर है अभी भी

अभी भी जैसे राज चलता है हम पे
उनका ही— एह !

कौन गिनता है हमें
और कहाँ कितना गिनता है
डंगर की तरह जुते हुए हैं उन्ही की चाकरी में – एह !

तो केलङ से बरलचा के रास्ते में
जीह के ओर्ले तर्फ एक ज़रोङ मिलता है आप को – एह !
पेले तो क्या घर क्या पेड़ कुच्छ नहीं था
खाली ही तो था – एह !
अब रुळिङ्बोर केते कोई दो चार घर बना लिए हैं
नाले के सिरे पे जो भी लाल पत्थर है
लाल भी क्या होणा अन्दर तो सुफेदै है
सब बाढ़ ने लाया है
एक दम बेकार
फाड़ मारो , बिखर जाएगा
कुबद का खान ऊपर ढाँक पर है
पहाड़ से सटा हुआ एक दम काला पत्थर
लक्कड़ जैसा मुलायम और साफ
काम करने को सौखा – एह !


बल्ती लोग थे तो मुसलमान
पर काम बड़ा पक्का किया
सब पानी का कुहुल
सारी पत्थर की घड़ाई
लौह्ल का सारा घर मे कुबद इन लोग बनाया
अस्सल जिम्दारी लौह्ल मे इन के बाद आया
बड़ा बड़ा से:रि इनो ही कोता --- एह !
और बेशक धरम तब्दील नही किया
जिस आलू की बात आज वो फकर से करते हैं
पता है, मिशन वाले ने उगाया
पैले क्या था ?

और हमारा आदमी असान फरमोश
गदर हुआ तो नालो के अन्दर भेड़ बकरी की तरह काट दिया
औरत का ज़ेबर छीना
बच्चा मार दिया
ए भगवान
कितना तो भगा दिया बोला जोत लंघा के
देबी सींग ने
हमारा ताऊ ने
मुंशी साजा राम ने
सब रेम् दिल भलमाणस थे --- एह !

और बंगाली पंजाबी साब भादर लोगों ने क्या किया
अंग्रेज से मिल कर
सब कीम्ती कीम्ती आईटम अम्रीका और लन्दन पुचाया
अजाबघ्रर बनाने के लिए – एह !

ये सब तेज़ खोपड़ी
ताक़त पास मे हो तो दमाग और भी तेज़ घूमता
बहुत तेज़ी से और एकदम उलटा
फिर हो गया पूरा कौम बदनाम एकाध आदमी करके
एक मछली ,
सारा तलाप खन – खराप , एह !


और पत्थरों के बारे में जो बातें थीं
वो भी लगभग वैसी ही थीं
कि उन मे से कुछ दर्ज वाले होते हैं
और कुछ बिना दर्ज वाले होते हैं

कि परतें कैसे बैठी रहतीं हैं
एक पर एक चिपकी हुईं
कि कहाँ कैसी कितनी चोट पड़ने पर
दर्ज दिखने लग जाते हैं साफ – साफ
जैसा मर्ज़ी पत्थर ले आईए आप
और जहाँ तक घड़ाई की बात है
चाहे एक अलग् थलग दीवार चिननी हो
या नया घर ही बनाना हो
या कुछ भी
दर्ज वाले पत्थर तो बिल्कुल कामयाब नहीं हैं

आप ध्यान देंगे तो पता चलेगा
वह एक बिना दर्ज वाला पत्थर ही हो सकता है
जो गढ़ा जा सकता है मन मुआफिक़
कितने चाहे क्यूब काट लो उस के
और लम्बे में , मोटे में
कैसे भी डंडे निकाल लो
बस पहला फाड़ ठीक पड़ना चाहिए
और
बशर्ते कि मिस्त्री काँगड़े का हो – एह !

मिस्तरी तो कनौरिये भी ठीक हैं
कामरू का क़िला देखा है
बीर भद्दर वाला ?

अजी वो कनौरियों ने थोड़े बणाया
वो तो सराहणी रामपुरिए होणे

रेण देओ माहराज, काय के रामपुरिए
यहीं बल्हड़ थे सारे के सारे
सब साँगला में बस गए भले बकत में
रोज़गार तो था नहीं कोई
जाँह राजा ठाकर ले गया , चले गए – एह !

बुशैर का लाका है तो बसणे लायक , वाक़ई......

धूड़ बसणे लायक !
पूह तक तो बुरा ही हाल है
ढाँक ही ढाँक
नीचे सतलज – एह !

आगे आया चाँग- नको का एरिया
याँह नही बोलता कनौरी में , कोई नहीं
सारे के सारे भोट आ कर बस गए ऊपर से – एह !
बाँह की धरती भी उपजाऊ और घास भी मीठी

ञीरू से ले के ञुर्चा तक सब पैदावार
और पहाड़ के ऊपर रतनजोत – एह !

नीचे तो कुछ पैदा नहीं होता
और घास में टट्टी का मुश्क
हे भगवान .... घोड़े को भी पूरा नहीं होता
पेड़ पर फकत चुल्ली और न्यूज़ा – एह !

कनौर वाला नही खाता अनाज , कोई नहीं
तब तो भाषा भी अजीब है
न भोटी में, न हिन्दी में; अज्ज्ज्जीब ही

पर भाई जी
सेब ने उनो को चमका दिया है – एह !

हिमाचल मे जिस एरिया ने सेब खाया
देख लो
रंग ढंग तो चलो मान लिया
ज़बान ही अलग हो गई है !


सेब हमारे यहाँ था तो पहले से ही
पर जो बेचने वाला फल था
वह एक इसाई ले के आया था
ऐसा नही कि कुल्लू को सेब ने ही उठाया था
क्या क्या धन्दे थे कैसे कैसे
किस को मालूम नहीं ?

वो तो कोई गोकल राम था
जो पंडत नेहरू के ठारा बार पुकारने पे भी
तबेले में छिपा रहा था
पनारसा के निचली तरफ
और ठारा दिन उस की मशीन रुकी रही
पानी से चलती थी भले बकत में

लाहौर की बी ए थी अगले की
पर शरम के मारे बाहर नहीं आया
तो क़िस्मत भी बचारे की तबेले में बन्द हो गई
बेद राम था तेज़ आदमी
पैर पकड़ के ज़मीने कराई अपने नाम

सोसाटी बणा के – एह !
आज मालिक बना हुआ है
पलाट काट के बेच रहा है
कलोनी खड़ी कर दी अगले ने

कौण पूछ सकता है ?

मैं केता हूँ कि लग्गे रेणा पड़्ता है

क्या पता कब दरवाज़ा खुल जाए – एह !

आखीर मे जब वहाँ से चलने को हुआ चुपचाप
तो तय था कि बातों की जो परतें थीं
वे तो हू ब हू वैसी ही थीं
जैसी समुदायों , मुल्कों , पत्थरों, घोड़ों और तमाम
ऐसी चीज़ों के होने व बने रहने की शर्तें थीं
एक के भीतर से खुलती हुई दूसरी थी
कोई तीसरी भी
कहीं कहीं नज़र आ जाती
बारीकियों में छिपी हुईं
जहाँ कोई जाना नही चाहता था
सच बात तो यह है कि
बात कहने के लिए आप को आवाज़ नहीं होना होता
जब कि परतों को सुनने के लिए आप को पूरा एक कान
और देख पाने के लिए आँख हो जाना होता था

मुझे लगा कि यही समय था
बात चीत के बारे बात करने का

कि एक ज़हनी दुनिया मे खर्च हो जाने से बचने के लिए
कितनी बड़ी नैमत है बातचीत ?

बेवजह भारी हुए बिना और बेमतलब अकड़े बिना
कड़क चा सुड़कते हुए,
अभी से तुम कहते रह सकते हो अपनी बातें
क्यों कि एक दिन तुम चुप हो जाने वाले हो


इत्ता बड़ा सत्त
वैसे भी इस धम्मड़ धूस दुनिया में एक गप्प
ही तो है ,
और अंतिम वाक्य जिसे छोड़ कर चले जाने का
क़तई मन नहीं था --

कि न भी हो अगर गप्प
तो उपयोग इस सत्त का क्या है
जेह बताओ तुम – एह ?

कुल्लू – 25.3.2011