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Saturday, June 29, 2013

वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया


गुलाम अली और आशा भोंसले के अल्बम ‘मेराज़-ए-ग़ज़ल’ से एक उम्दा ग़ज़ल –




दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया

जुदाइयों के ज़ख्म दर्द-ए-ज़िन्दगी ने भर दिए
तुझे भी नींद आ गयी मुझे भी सब्र आ गया

ये सुबह की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ
अब आईने में देखता हूँ मैं कहाँ चला गया

वो दोस्ती तो खैर अब नसीब-ए-दुश्मनां हुई
वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया

ये किस खुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई
वो लहर किस तरफ गई ये मैं कहाँ समा गया

Saturday, February 11, 2012

तुमुल कोलाहल कलह में मैं ह्रदय की बात रे मन


जयशंकर प्रसाद जी की कालजयी रचना कामायनी के 'निर्वेद' सर्ग के इस गीत को संगीत दिया था जयदेव ने और इसे गाया था आशा भोंसले ने. यह रचना १९७१ में रिलीज़ हुए अल्बम "एन अनफॉरगेटेबल ट्रीट" में संकलित है. इस संग्रह से कुछेक और रचनाएँ जल्द ही-



तुमुल कोलाहल कलह में मैं ह्रदय की बात रे मन

विकल होकर नित्य चचंल, खोजती जब नींद के पल,
चेतना थक-सी रही तब, मैं मलय की बात रे मन

चिर-विषाद-विलीन मन की, इस व्यथा के तिमिर-वन की
मैं उषा-सी ज्योति-रेखा, कुसुम-विकसित प्रात रे मन

जहाँ मरु-ज्वाला धधकती, चातकी कन को तरसती,
उन्हीं जीवन-घाटियों की, मैं सरस बरसात रे मन

पवन की प्राचीर में रुक जला जीवन जी रहा झुक,
इस झुलसते विश्व-दिन की मैं कुसुम-श्रृतु-रात रे मन

चिर निराशा नीरधार से, प्रतिच्छायित अश्रु-सर में,
मधुप-मुखर मरंद-मुकुलित, मैं सजल जलजात रे मन

Wednesday, June 29, 2011

हमारा यार है हम में हम को इंतजारी क्या

२००६ में आशा भोंसले ने यूनीवर्सल रेकॉर्डस से 'कहत कबीर' संग्रह जारी किया था. आशा भोंसले की आवाज़ में कबीर को सुनना बहुत सुखद अनुभव था. इस संग्रह से आपको सुनवाता हूं अपना पसंदीदा पीस. वैसे तो यह रचना आज से दो साल से अधिक समय पहले कबाड़ख़ाने पर लगाई जा चुकी है पर अब उसके प्लेयर ने काम करना बन्द कर दिया है. आनन्द लीजिए -




हम है इश्क मस्ताना हम को होशियारी क्या
रहें आजाद इस जग से हमें दुनिया से यारी क्या
जो बिछुड़े हैं पियारे से भटकते दरबदर फिरते
हमारा यार है हम में हम को इंतजारी क्या
खलक सब नाम अपने को बहुत कर सिर पटकता है
हमन गुरनाम सांचा है हमन दुनिया से यारी क्या
न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से
उन्हीं से नेह लागी है हम को बेकरारी क्या
कबीरा इश्क का माता दुई को दूर कर दिल से
जो चलना राह नाज़ुक है, हम सिर बोझ भारी क्या

Monday, May 23, 2011

धीरे धीरे तेरे प्यार में खोने लगे हम साजना


ग़ुलाम अली और आशा भोंसले के अल्बम "जेनेरेशन्स" से अब सुनिए एक और रचना. स्वर दे रहे हैं ग़ुलाम अली और आशा भोंसले

नैना रे नैना तो से लागे


१९८० के दशक में ग़ुलाम अली और आशा भोंसले ने मेराज़-ए-ग़ज़ल शीर्षक अल्बम में कुछ बेहतरीन ग़ज़लें पेश की थीं. उनमें से कुछ यहां पहले पोस्ट की जा चुकी हैं. कोई पच्चीस साल बाद यह जुगलबन्दी दोबारा सुनने को मिली. अहमद अनीस की रचनाओं को इस अल्बम में ग़ुलाम अली के सुपुत्र आमिर अली ने कम्पोज़ किया है

अल्बम की लॉन्च के समय ग़ुलाम अली ने कहा "मुझे नहीं मालूम था कि आमिर कम्पोज़ कर रहे हैं. मुझे बहुत हैरत हुई जब उन्होंने मुझसे इस बाबत बात की. मैंने यथासम्भव उनकी मदद की" गौरतलब है कि इस अल्बम पर कोई पांच साल की मेहनत लगी. आज इस अल्बम से पहले सुनिये आशा भोंसले को


Saturday, May 24, 2008

रहें आज़ाद इस जग में हमको दुनिया से यारी क्या


परसों मेरे मेलबॉक्स में हरी मिर्च वाले मनीष जोशी जी के दो मेल थे. पहली वाली के मार्फ़त से मुझे पंडित भीमसेन जोशी का गाया कबीरवाणी वाला पूरा अलबम था. उस से दो हिस्से आप पहले सुन चुके हैं. दूसरी वाली में एक और ज़बर्दस्त चीज़ थी. २००६ में आशा भोंसले ने यूनीवर्सल रेकॉर्डस से 'कहत कबीर' संग्रह जारी किया था. आशा भोंसले की आवाज़ में कबीर को सुनना बहुत सुखद अनुभव था. इस संग्रह से आपको सुनवाता हूं अपना पसंदीदा पीस.

Friday, April 18, 2008

यूं ही ज़रा सी कसक है दिल में, जो ज़ख़्म गहरा था, भर गया वो

गु़लाम अली और आशा भोंसले की जुगलबन्दी में बीसेक साल पहले आया अलबम 'मेराज-ए-ग़ज़ल' मेरे सर्वप्रिय संगीत-संग्रहों में एक है.

ख़ास तौर पर नासिर काज़मी की यह उदासीभरी मीठी ग़ज़ल :

गए दिनों का सुराग़ लेकर, किधर से आया किधर गया वो
अजीब मानूस अजनबी था, मुझे तो हैरान कर गया वो

न अब वो यादों का चढ़ता दरिया, न फ़ुरसतों की उदास बरखा
यूं ही ज़रा सी कसक है दिल में जो ज़ख़्म गहरा था, भर गया वो

वो हिज्र की रात का सितारा, वो हमनफ़स हमसुख़न हमारा
सदा रहे उसका नाम प्यारा, सुना है कल रात मर गया वो

वो रात का बेनवा मुसाफ़िर, वो तेरा शायर, वो तेरा नासिर
तेरी गली तक तो हमने देखा था, फिर न जाने किधर गया वो