Wednesday, July 13, 2016

रिक रैनार्ट के चित्र - 2











रिक रैनार्ट के चित्र - 1

रिक रैनार्ट ने कला की शुरुआती दीक्षा 1970 के दशक के शुरुआती सालों में वेस्टर्न केन्टकी यूनिवर्सिटी से पाई. उनकी कला उसके बाद उत्तरोत्तर निखरती गयी और उन्होंने जर्मनी और कनाडा में अपने विषाक कैनवसों के एकल शोज़ किये. उनकी एक्सप्रेशनिस्ट कला को पहचाना जाने लगा था लेकिन तभी उन्होंने परिवार और व्यवसाय सम्हालने के उद्देश्य से कला से अवकाश ले लिया. कैम्पेन फाइनान्स रिफ़ॉर्म के क्षेत्र में उन्होंने बहुत ख्याति अर्जित की और उन पर फरवरी 2000 में 'टाइम' पत्रिका में कवर स्टोरी भी प्रकाशित हुई. इस दौरान कला के लिए उनका अनुराग पुनर्जीवित हुआ और उन्होंने अपनी एक अलग शैली स्थापित कर ली.

रिक रैनार्ट
 पेश हैं उनके कुछ चित्र.










Tuesday, July 12, 2016

दरख़्त को मैंने देखा और छाँव शायरी बन गई

मैं डरता हूँ 
- अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद


मैं डरता हूँ 
अपने पास की चीजों को
छू कर शायरी बना देते हैं

रोटी को मैं ने छुआ 
और भूख 
शायरी बन गई 

उँगली चाकू से कट गई
और ख़ून 
शायरी बन गया 

गिलास हाथ से गिर कर टूट गया 
और बहुत सी नज़में बन गईं 

मैं डरता हूँ
अपने से थोड़ी दूर की चीजों को 
देख कर 
शायरी बना देने से 
दरख़्त को मैंने देखा 
और छाँव 
शायरी बन गई 

छत से मैंने झाँका
और सीढ़ियाँ 
शायरी बन गईं

इबादत-ख़ाने पर मैंने निगाह डाली 
और ख़ुदा 
शायरी बन गया 

मैं डरता हूँ
अपने से दूर की चीजों को 
सोच कर 
शायरी बना देने से 

मैं डरता हूँ
तुम्हें सोच कर 
देख कर 
छू कर 
शायरी बना देने से

Monday, July 11, 2016

आग जो ये भी नहीं पूछती कि तुम लकड़ी के आदमी हो या दियासलाई

क्या आग सबसे अच्छी खरीदार है
-अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद


लकड़ी के बने हुए आदमी 
पानी में नहीं डूबते
और दीवारों से टाँगे जा सकते हैं 

शायद उन्हें याद होता है
कि आरा क्या है 
और दरख़्त किसे कहते हैं 

हर दरख़्त में लकड़ी की आदमी नहीं होते 
जिस तरह हर ज़मीन के टुकड़े में कोई कार-आमद चीज़ नहीं होती 

जिस दरख़्त में लकड़ी के आदमी 
या लकड़ी की मेज़
या कुर्सी
या पलंग नहीं होता 
आरा बनाने वाले उसे आग के हाथ बेच देते हैं 
आग सब से अच्छी ख़रीदार है
वो अपना जिस्म मुआवज़े में दे देती है 
मगर 
आग के हाथ गीली लकड़ी नहीं बेचनी चाहिए 
गीली लकड़ी धूप के हाथ बेचनी चाहिए
चाहे धूप के पास देने को कुछ न हो 
लकड़ी के बने हुए आदमी को धूप से मोहब्बत करनी चाहिए 
धूप उसे सीधा खड़ा होना सिखाती है 

मैं जिस आरे से काटा गया 
वो मक़्नातीस का था 
उसे लकड़ी के बने हुए आदमी चला रहे थे 
ये आदमी दरख़्त की शाखों से बनाए गए थे 
जब कि मैं दरख़्त के तने से बना
मैं हर कमज़ोर आग को अपनी तरफ़ खींच सकता था
मगर एक बार
एक जहन्नम मुझ से खिंच गया 

लकड़ी के बने हुए आदमी
पानी में बहते हुए 
दीवारों पर टंगे हुए
और क़तारों में खड़े हुए अच्छे लगते हैं
उन्हें किसी आग को अपनी तरफ़ नहीं खींचना चाहिए 
आग जो ये भी नहीं पूछती 
कि तुम लकड़ी के आदमी हो 
या मेज़
या कुर्सी
या दियासलाई

Sunday, July 10, 2016

उन लफ़्ज़ों में टूट कर जुड़ जाने से मोहब्बत नहीं रह जाती

कौन शायर रह सकता है
-अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद


लफ़्ज़ अपनी जगह से आगे निकल जाते हैं 
और ज़िंदगी का निज़ाम तोड़ देते हैं 

अपने जैसे लफ़्ज़ों का गठ बना लेते हैं 
और टूट जाते हैं 
उन के टूटे हुए किनारों पर 
नज़में मरने लगती हैं
लफ़्ज़ मरने लगती हैं 
लफ़्ज़ अपनी साख़्त और तक़दीर में 
कमज़ोर हो जाते हैं 
मामूली शिकस्त उन को ख़त्म कर देती है
उन में
टूट कर जुड़ जाने से मोहब्बत नहीं रह जाती 
इन लफ़्ज़ों से
बदसूरत और बेतरतीब नज़में बनने लगती हैं 

सफ़्फ़ाकी से काट दिए जाने के बाद 
उन की जगह लेने को 
एक और खेप आ जाती है 

नज़मों को मर जाने से बचाने के लिए
हर रोज़ उन लफ़्ज़ों को जुदा करना पड़ता है
और उन जैसे लफ़्ज़ों को हमले से पहले 
नए लफ़्ज़ पहुँचाने पड़ते हैं

जो ऐसा कर सकता है 
शायर रह सकता है

Saturday, July 9, 2016

फिर भी वो हमें नहीं मार सकते

अगर उन्हें मालूम हो जाए
-अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद

वो ज़िंदगी को डराते हैं
मौत को रिश्वत देते हैं
और उस की आँख पर पट्टी बाँध देते हैं

वो हमें तोहफ़े में ख़ंजर भेजते हैं
और उम्मीद रखते हैं 
हम ख़ुद को हलाक कर लेंगे

वो चिड़िया-घर में
शेर के पिंजरे की जाली को कमज़ोर रखते हैं 
और जब हम वहाँ सैर करने जाते हैं 
उस दिन वो शेर का रातिब बंद कर देते हैं 

जब चाँद टूटा फूटा नहीं होता 
वो हमें एक जज़ीरे की सैर को बुलाते हैं 
जहाँ न मारे जाने की ज़मानत का काग़ज़
वो कश्ती में इधर उधर कर देते हैं
अगर उन्हें मालूम हो जाए वो अच्छे क़ातिल नहीं 
तो वो काँपने लगें
और उन की नौकरियाँ छिन जाएँ

वो हमारे मारे जाने का ख़्वाब देखते हैं 
और ताबीर की किताबों को जला देते हैं 

वो हमारे नाम की क़ब्र खोदते हैं
और उस में लूट का माल छुपा देते हैं 

अगर उन्हें मालूम भी हो जाए 
कि हमें कैसे मारा जा सकता है 

फिर भी वो हमें नहीं मार सकते

Friday, July 8, 2016

ये एक क़त्ल-ए-आम का हल्फ़िया है

एक तलवार की दास्तान
-अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद


ये आईने का सफ़रनामा नहीं
किसी और रंग की कश्ती की कहानी है 
जिस के एक हज़ार पाँव थे 

ये कुँए का ठंडा पानी नहीं 
किसी और जगह के जंगली चश्मे का बयान है 
जिस में एक हज़ार मशालची
एक दूसरे को ढूँढ रहे होंगे

ये जूतों की एक नर्म जोड़ी का मामला नहीं 
जिस के तलवों में एक जानवर के नर्म
और ऊपरी हिस्से में उस की माद्दा की ख़ाल हमजुफ़्त हो रही है 

ये एक ईंट का क़िस्सा नहीं 
आग पानी और मिट्टी का फैसला 

ये एक तलवार की दास्तान है
जिस का दस्ता एक आदमी का वफ़ादार था 
और धड़ एक हज़ार आदमियों के बदन में उतर जाता था 
ये बिस्तर पर धुली धुलाई एडियाँ रगड़ने की तज़किरा नहीं 
एक क़त्ल-ए-आम का हल्फ़िया है
जिस में एक आदमी की एक हज़ार बार जाँ-बख़्शी की गई

Thursday, July 7, 2016

इसे मोहन जोदड़ों की ईंटों से चुना जा सकता है

वक़्त उनका दुश्मन है
-अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद


वो किसी गैलिलियो का इंतिज़ार नहीं कर रहे हैं
एक बड़ी घड़ी तैयार करने के लिए
जिसे शहर की एक यादगारी दीवार में नस्ब किया जा सके 

इस ख़ला में
हमारी तारीख़ की अक्कासी के अलावा
ख़वातीन के आलमी दिन पर 
झूला डाल सकता है

चीनी ताएफ़ा
बाँस से उछल कर इस में से गुज़र सकता है
इस में
एक लाश को मुख़्तसर कर के लटकाया जा सकता है 

इसे मोहन जोदड़ों की ईंटों से 
चुना जा सकता है

Wednesday, July 6, 2016

आँसू रिकॉर्ड-रूम में चले गए और तुम अपनी कोठरी में

समंदर ने तुम से क्या कहा 
-अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद


समंदर ने तुम से क्या कहा 
इस्तिग़ासा के वकील ने तुम से पूछा 
और तुम रोने लगीं 

जनाब-ए-आली ये सवाल ग़ैर-ज़रूरी है 
सफ़ाई के वकील ने तुम्हारे आँसू पोंछते हुए कहा 

अदालत ने तुम्हारे वकील पर एतराज़
और तुम्हारे आँसू मुस्तरद कर दिए 

आँसू रिकॉर्ड-रूम में चले गए 
और तुम अपनी कोठरी में 

ये शहर सतह-ए-समंदर से नीचे आबाद है 
ये अदालतें शहर की सतह से थी नीचे
और ज़ेर-ए-समाअत मुलज़िमों की कोठरियाँ
इन से भी नीचे 

कोठरी में कोई तुम्हें रेशम की एक डोर दे जाता है 
तुम हर पेशी तक एक शाल बुन लेती हो 
और अदालत बर्ख़ास्त हो जाने के बाद 
उसे उधेड़ देती हो 

ये डोर तुम्हें कहाँ से मिली 
सुपरिटेंडेंट ऑफ़ प्रज़ेंस ने तुम से पूछता है 
ये डोर एक शख़्स लाया था 

अपने पाँव में बाँध कर 
एक बला को ख़त्म करने के लिए 
एक पुर-पेच रास्ते से गुज़रने के लिए 

वो आदमी अब कहाँ है
ठंडे पानी में तुम्हें ग़ोता दे कर पूछा जाता है 

वो आदमी रास्ता खो बैठा 
समंदर ने तुम से यही कहा था

Tuesday, July 5, 2016

हम किसी को भी याद आ सकते हैं जब उसे कोई याद न आ रहा हो

ज़िंदगी हमारे लिए कितना आसान कर दी गई है
-अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद


ज़िंदगी हमारे लिए कितना आसान कर दी गई है 
किताबें
कपड़े जूते
हासिल कर सकते हैं
जैसा कि गंदुम हमें इमदादी क़ीमत पर मुहय्या की जाती है 
अगर हम चाहें
किसी भी कारख़ाने के दरवाज़े से 
बच्चों के लिए 
रद करदा बिस्कुट ख़रीद सकते हैं
तमाम तय्यारों रेल गाड़ियों बसों में हमारे लिए 
सस्ती नाशिश्तें रखी जाती हैं

अगर हम चाहें
मामूली ज़रूरत की क़ीमत पर 
थिएटर में आख़िरी क़तार में बैठ सकते हैं 
हम किसी को भी याद आ सकते हैं
जब उसे कोई याद न आ रहा हो

Monday, July 4, 2016

मेरा मतलब उस शब्द से है

एन.ई.ए. के 2015 फैलो और पोयट्री फाउन्डेशन की रूथ लिली फ़ैलोशिप के फाइनलिस्ट सैम साक्स मिशनर सेंटर फॉर राइटर्स में भी पोयट्री फैलो हैं और बैट सिटी रिव्यू के मुख्य सम्पादक के रूप में काम करते हैं. उनकी प्रकाशित चैपबुक्स के नाम हैं - अ गाइड टू अनड्रेसिंग योर मॉन्स्टर्स (2014) सैड बॉय/डिटेक्टिव (2015)और ऑल द रेज (2016).  पेश है उनकी एक कविता -

सैम साक्स

मजदूर दिवस
- सैम साक्स
                                                (हियु मिन्ह न्गुयेन के लिए)

मैंने चीज़ों को समझाने के लिए इतिहास का सहारा लिया और यह मेरी पहली ग़लती थी
जब मैं कहता हूँ इतिहास तो मेरा मतलब होता है वह पत्थर
जो सड़क किनारे आधा गड़ा हुआ देख चुका 
उससे ज़्यादा त्रासदियाँ जितनी देखता है
पानी का एक गिलास. मैं पानी को देखता हूँ
लेकिन मुझे फ़क़त धूल दिखाई देती है. मैं धूल को देखता हूँ
और वहां फ़क़त इतिहास है.  बुनियादी ढाँचे की एक टुकड़ा पीठ पर
मज़दूर आन्दोलन की बाबत लिखने के लिए यहाँ एक पंख है
और खून का एक कुआँ. यहाँ एक बाप है जो
अपने नंगे हाथों से रेलवे लाइन बनाने को अपने घर से जा रहा है. लिखो उन कानूनों को
जो उल्लुओं की आँखें नोंच लेते हैं, जो नदी और प्यासे के दरम्यान
दीवार बना देते हैं, जो परिवारों को एक नरक से खींचकर
दूसरे में डाल देते हैं.  उफ़, आदमियों का बनाया  
यह मेरा घर, उफ़, मैं - एक शख्स जो कभी-कभी गुज़रता है इसकी
तेज़ाब-कोठरियों से और पिछले दरवाज़े की धूल से
होता बाहर निकल जाता है. जब मैं कहता हूँ इतिहास तो
मेरा मतलब होता है उस से जो रहता है हमारे भीतर,
मेरा मतलब अपनी गरदन में पड़ी नकली सोने की चेन से होता है,
उस बीमारी से जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आती है
ईसामसीह के पहले से समय से, मेरा मतलब उस शब्द से है
जिसकी उत्पत्ति पानी की भीख मांग रहे एक लड़के में होती है.

(2016)

मोहब्बत को तुम ने हैरतज़दा कर देने वाली ख़ुश क़िस्मती नहीं समझा

आख़िरी दलील
-अफ़ज़ाल अहमद सैय्यद


तुम्हारी मोहब्बत
अब पहले से ज़्यादा इंसाफ़ चाहती है
सुब्ह बारिश हो रही थी 
जो तुम्हें उदास कर देती 
इस मंज़र को ला-ज़वाल बनने का हक़ था 

इस खिड़की को सब्ज़े की तरफ़ खोलते हुए 
तुम्हें एक मुहासरे में आए दिल की याद नहीं आई

एक गुमनाम पुल पर 
तुम ने अपने आप से मज़बूत लहजे में कहा 
मुझ अकेले रहना है 

मोहब्बत को तुम ने 
हैरतज़दा कर देने वाली ख़ुश क़िस्मती नहीं समझा 

मेरी क़िस्मत जहाज़-रानी के कारख़ाने में नहीं बनी 
फिर भी मैं ने समंदर के फ़ासले तय किए 
पुर-असरार तौर पर ख़ुद को ज़िंदा रक्खा 
और बे-रहमी से शाएरी की 

मेरे पास एक मोहब्बत करने वाले की 
तमाम ख़ामियाँ
और आख़िरी दलील है