Friday, January 8, 2010

साल २०१०: वैचारिक आग्रह घट गया है नई पीढ़ी में- दानी

हमारी सहृदय पाठिका श्रीमती आशा जोगलेकर ने साहित्यकारों की राय पढ़ने के बाद कहा है-

'बड़े-बड़े लेखकों के कथन हैं, क्या कहें. पर कुछ भी अच्छा नहीं है यह कहना गलत है. जीवनापेक्षा बढ़ी है इसके बावजूद कि हर दिन नई बीमारियां पैदा हो रही हैं. गरीबी कम हुई है इसके बावजूद कि महंगाई बढ़ रही है... और जनजागरण तो तब भी हुआ था जब लोग इससे कहीं अधिक गरीब थे. जरूरत है रुक कर विचार करने की, कि बेतहाशा भागते जाना है या दिशा बदलनी है. भ्रष्टाचार है...और बहुत है, पर इसके लिये भी लेखक और समाचार-माध्यम आवाज़ उठा रहे हैं, उठायेंगे.'

आशा जी की बात से भले ही पूरी तरह से इत्तेफ़ाक न रखा जा सके फिर भी उनकी राय निराशा का नकार तो करती ही है. आइये देखते हैं आज की सूची में शामिल साहित्यकार क्या सोचते हैं-


डॉक्टर सूर्यबाला (वरिष्ठ कथाकार-व्यंग्यकार): मुझे ध्यान में आता है कि कोलंबिया विश्वविद्यालय (न्यूयॉर्क) में एक छात्र ने मुझसे पूछा था कि जिस तरह की दुनिया की आप कल्पना करती हैं, जो सम्बन्ध आपके पात्र जीते हैं, जिस विश्व की आकांक्षा वे करते हैं, क्या आप सोचती हैं कि यथार्थ के धरातल पर वैसा कभी हो पायेगा?...तो इतने आदर्शों में जीने का अर्थ? इसके जवाब में मैंने कहा था कि मुझे मालूम है कि ऐसा कभी संभव नहीं हो पायेगा लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि हम सपने देखना छोड़ दें. एक अहम् बात यह भी है कि जब हम बहुत अच्छा सोचेंगे, दूसरों से उन विचारों को बांटेंगे, तो कम से कम हम अपने आस-पास एक छोटी ही सही, ख़ूबसूरत दुनिया बनाने में कामयाब होंगे.


साहित्य जगत में मेरे चाहने या न चाहने से एक साल के अन्दर कुछ नहीं होने वाला. फिर भी अच्छे साहित्य-सृजन की इच्छा बनी रहेगी. मेरी कामना है कि हम रचनाकार अपनी आत्ममुग्धता और स्वकेन्द्रीयता से मुक्त होकर ईमानदारी और पारदर्शिता से समाज की तरफ भी देखें. ज्ञान और शिक्षा ने हमें विनम्र और समझदार नहीं बनाया है. हम बातें ऊंची-ऊंची करते हैं लेकिन जीवन में उस सहजता और पारदर्शिता का निर्वाह नहीं कर पाते. लेकिन यही तो इस यांत्रिक जीवन की थोड़ी सी लाचारियाँ भी हैं.

राजेन्द्र दानी (वरिष्ठ कथाकार): मैं एक अच्छा आदमी बनने के प्रयास में हमेशा सकारात्मक सोचता हूँ लेकिन आस-पास का माहौल निराश करता है. साल २०१० में सब कुछ चमत्कारिक रूप से बदल जाएगा, ऐसी मुझे उम्मीद नहीं है. अभी मैं निरंजन श्रोत्रिय की एक कहानी पढ़ रहा था, उसका शीर्षक है- 'जानवर'. इस कहानी में होता यह है कि पति-पत्नी सो रहे हैं और रात के वक्त कोई उनका दरवाज़ा खटखटाता है. वे इस डर से दरवाज़ा नहीं खोलते कि कोई जानवर होगा. सुबह पति उठता है तो देखता है कि भीड़ लगी हुई है और वहां एक शव पड़ा हुआ है. पति के मन में कौंधता है कि हो न हो यह वही शख्स है जो रात में मदद के लिए दरवाज़ा खटखटा रहा था.
बहरहाल, पति घर लौटता है तो पत्नी पूछती है कि इतनी देर क्यों लगा दी, क्या हुआ था. तो पति कहता है कि कुछ नहीं, कोई जानवर मर गया है.

हमारे आस-पास भी यही माहौल है. आज खुशियों का इजहार भी ज्यादा दूर तक नहीं पहुंचता. वैसे मुझे उम्मीदें तो बहुत हैं नए साल से. अभी हमने आमिर खान की 'थ्री ईडियट्स' देखी जबलपुर में. मैं था, ज्ञान जी थे, पंकज स्वामी थे, अरुण यादव थे. तो उस फिल्म ने हमें खुश कर दिया. फिल्म में बड़े ही ह्यूमरस तरीके से पूरी विट के साथ यह दिखाया गया है कि अकादमिक अथवा यांत्रिक शिक्षा से कोई सचमुच का शिक्षित नहीं हो जाता.

साहित्य के अलावा फिल्मों से समाज में बड़ा बदलाव आ सकता है. अब फिल्मों की परम्परागत भाषा और उसका मुहावरा बदल रहा है. अब वह घिसी-पिटी बात नहीं है कि 'अ ब्वाय मीट्स अ गर्ल.' एक और बात जो मैं २०१० में घटित होते देखना चाहूंगा कि साहित्यकारों की पुरानी पीढ़ी का नयी पीढ़ी से आत्मीय और गहरा संवाद स्थापित होना चाहिए. नई पीढ़ी के लोग अपने कैरियर को लेकर अति महत्वाकांक्षी हैं और उनमें वैचारिक आग्रह कम हो गया है.

सुधीर रंजन सिंह (कवि-आलोचक): अब तो लगता है कि दुनिया अपनी समझ से बाहर होती जा रही है और इसके कसूरवार भी हमीं लोग हैं. जाहिर है एक समय हम दुनिया को बदलने की बात करते थे, व्याख्या की नहीं. लेकिन दुनिया हमारे न चाहते हुए भी इतनी दूर तक बदल गयी है कि व्याख्याकार पीछे छूट गए. अब भी हमें लगता है कि व्याख्या में ही बदलने का काम संभव है.

जनता का जीवन सुकून से गुज़रे इस बात की गारंटी कोई नहीं दे सकता. होता यह है कि जो संस्कृति कर्म है, उसको जनता एक भिन्न वस्तु मान लेती है. संस्कृति कर्म के प्रति जनता में एक दायित्वहीनता है और संस्कृतिकर्मियों के यहाँ जनता को लेकर एक क़िस्म की बेफ्रिकी है. एक कलाकार अपने आत्मविश्वास में महत्वाकांक्षा से इस प्रकार ग्रस्त हो जाता है कि वह किसी तरह से जीवन को उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं रहता. दूसरी तरफ जनता यह सोचती है कि यह तो कला है और पहुँच से बाहर है. आखिर हमारे पास जीवन निर्वाह के लिए नीरस गद्यात्मक संसार है. कला और जीवन एक नहीं है लेकिन उनको मुझमें (जनता + कलाकार में) एक होना होगा. मेरे उत्तरदायित्व की एकता में एक होना होगा. यही सूत्र हो सकता है.

साल २०१० में मैं चाहूंगा कि हमारा लेखन, हमारी कलात्मक अभिव्यक्तियाँ ज्यादा से ज्यादा हों और हमें वर्त्तमान सत्ता-संरचना पर एक दबाव समूह की तरह काम करना होगा. यह तभी संभव है जब साहित्य में मात्रात्मक एवं गुणात्मक परिवर्त्तन होंगे.

बोधिसत्व (कवि, हालिया कविता संग्रह 'दुःख तंत्र’): मुझे उम्मीद यह है कि कविता में कथा तत्व की वापसी होगी क्योंकि बिना कहानी के न कविता जीवित रही है न रहेगी. अगर हम संसार भर के काव्य को ध्यान में रखें तो वही कवितायें जीवित नजर आती हैं जिनमें कहीं न कहीं कथा और चरित्र हैं. आप भारतीय मध्यकालीन साहित्य को ही ले लें, सूर, तुलसी, जायसी या आधुनिक काल के निराला, प्रसाद, टैगोर या अन्य बड़े कवि....तो इनकी सारी बड़ी रचनाएँ एक कथा कहती हैं और चरित्र प्रस्तुत करती हैं. आज की कविता में भी जो चरित्र प्रधान कवितायें हैं, वे ज्यादा पढ़ी जाती हैं, ज्यादा चर्चा में रहती हैं और ज्यादा लोगों को जोड़ती हैं और उनके स्मरण में रहती हैं. मेरी ही कवितायें 'माँ का नाच', 'पागलदास' और 'शांता' लोगों के जहन में मेरी ही दूसरी कविताओं की बनिस्बत ज्यादा गहरे बैठी हुई हैं क्योंकि इनमें कथा है, चरित्र हैं.

आज यह परिभाषित करना जरूरी है कि आम जनता क्या है? क्योंकि जो साहित्य आज लिखा जा रहा है वह किस टाइप की जनता के लिए है...जिसमें आप बदलाव लाना चाह रहे हैं. यह भ्रम भी दूर हो जाना चाहिए कि लिखने से जनता का कुछ भला होता है या समाज में परिवर्त्तन होता है या आर्थिक विसंगतियां दूर हो जाती हैं या साम्प्रदायिक दंगे रुक जाते हैं या किसानों की आत्महत्याएं रुक जाती हैं...तो यह समझना चाहिए कि कविता लिखने से बाल मजदूरी या दहेज़ प्रथा भी दूर नहीं होगी.

कविता आज कहने को तो 'उर्वर प्रदेश' में बतायी जा रही है लेकिन वह भयानक बंजर प्रदेश में भटक रही है... और २०१० में या २०२० तक में भी मुझे नहीं लगता कि वह सचमुच की काव्य-भूमि में लौटेगी. मैं चाहूंगा कि हम जितनी जल्दी चमत्कार पैदा करने वाली कवितायें लिखने से छुटकारा पा लें, उतना ही अच्छा होगा.

डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी (आलोचक, अध्यापक): आनेवाले समय में हमारी आर्थिक-राजनीतिक स्थितियों में तेज़ी से बदलाव आयेगा. हम वैश्वीकरण, विदेशी पूंजी और काला-धन के दबाव का मुकाबला स्वदेशी पूंजी तथा अपने संसाधनों के माध्यम से कर सकेंगे. तय है हमें अपने पैरों पर खड़ा होना होगा... और हमारे लघु-कुटीर उद्योग धंधे, जिनको अभी तक हमने तिरष्कृत किया है और हाशिये पर रखा है, उन्हीं पर हमें ज्यादा ध्यान केन्द्रित करना होगा. विभिन्न रूपों में जो अर्थ की सत्ता है उसे आम आदमी तक बांटना पड़ेगा. तभी हम अपने देश का समग्र विकास कर सकते हैं. शिक्षा और स्वास्थ्य की सामान सुविधाएं देकर दलितों, वंचितों तथा आदिवासियों की स्थितियों में सुधार लाना होगा.

हमारे पुराने सामाजिक ढाँचे निरंतर टूट रहे हैं और सामाजिक रूपांतरण की प्रक्रिया बहुत तेज़ हो गयी है. शादी-विवाह के प्रसंगों में एक तरह का खुलापन आया है. इसी तरह छुआछूत आदि सन्दर्भों में भी व्यापक परिवर्त्तन परिलक्षित किये जा रहे हैं. जहां तक राजनीतिक स्थितियों का सवाल है तो जनता का मौजूदा राजनीति से मोहभंग हुआ है. संकीर्ण हितों के स्थान पर हिन्दुस्तान की जनता बहुत व्यापक परिवर्त्तन की आकांक्षी है इसलिए वह बड़े दलों के स्थान पर छोटे और क्षेत्रीय दलों को स्वीकार करने में गुरेज़ नहीं करती. हम देख सकते हैं कि साम्प्रदायिक ताकतें हताश होकर छद्म रूप से वामपंथी पैंतरे खोज रही हैं और उनका एकमात्र लक्ष्य सत्ता पर काबिज़ होना है. २०१० में इस प्रक्रिया में कोई बदलाव आता मुझे नहीं दीखता.

साहित्य जगत में अब केवल कल्पना की दुनिया से काम नहीं चलेगा. हमें यथार्थ को ठीक से पहचानना होगा. नारेबाजी के स्थान पर आम आदमी की दुनिया का चित्रण अपनी रचनाओं में करना होगा. हमारे साहित्य से गाँवों को लगभग देशनिकाला दे दिया गया है, जो थोड़ा-बहुत आते भी हैं तो वे स्मृतियों के गाँव हैं. साल २०१० में हमें इस पर ध्यान देना चाहिए.

तुषार धवल (कवि, कविता-संग्रह 'पहर यह बेपहर का'): यह उपभोक्तावादी ताकतों से जोरदार युद्ध करने का समय है. बाज़ार इतनी तेजी से हमला कर रहा है कि सबको बस भागो और भोगो ही सूझ रहा है. मनुष्य के सोचने और विचार करने की शक्ति पर हमला करके उसे भोथरा बनाने का खेल जारी है. ऐसे में मैं चाहता हूँ कि कुछ ऐसा हो कि मानव के भीतर का मानव बचा रहे. वह मशीन न बन जाए. उपभोग की वस्तु न बन जाए. उसके भीतर की तरलता सुरक्षित रहे. आज आदमी का आदमी से जुड़ाव समाप्त होता जा रहा है ख़ास तौर पर मुंबई जैसे महानगरों में.

साहित्य जगत में एक तरह के विभ्रम की स्थिति है. यह तय नहीं हो पा रहा है कि हम किस दिशा में जाएँ. हमारी रचनाओं का कथ्य क्या हो, शिल्प क्या हो...खास कर कविता में. यह ऐसा समय है जब सारे वाद समाप्त हो गए हैं. दक्षिण या वाम का कोई सपना साकार नहीं होता दिख रहा है. सब ध्वस्त हैं. बाज़ार ने इसे बुरी तरह प्रभावित किया है. साहित्य में जो समर्पित गतिविधियाँ थीं वे अब तात्कालिक सफलता और झटपट यशप्राप्ति की कसरतों में तब्दील हो गयी हैं. तरह-तरह के गुट और रैकेट चल रहे हैं. यह भी उपभोक्तावाद का असर है.

लेकिन मेरे मन में एक बड़ी उम्मीद है. खास कर अपनी पीढ़ी के कवियों से यह उम्मीद है कि कोई रास्ता निकलेगा. अब भी साहित्य में समर्पित लोग बचे हुए हैं ...और २०१० में तो नहीं, पर लगता है कि अगले ५-१० वर्षों में साहित्य की दिशा तय हो जायेगी.

(जारी)

स्कॉच व्हिस्की के कुछ रहस्य



गेलिक भाषा में एक शब्द होता है - "usquebaugh", जिसका अर्थ हुआ "जीवनजल". ध्वनि के आधार पर यह शब्द कालान्तर में "usky" बन गया. जब अंग्रेज़ी भाषा ने इसे अपनाया तो यह बन गया "व्हिस्की". चाहे इसे स्कॉच व्हिस्की कहा जाए, चाहे स्कॉच चाहे व्हिस्की, दुनिया भार में इसके मुरीदों की संख्या बढ़ती चली गई है.

स्कॉटलैण्ड ने "स्कॉच" शब्द पर अपना एकाधिकार बनाया हुआ है. किसी भी व्हिस्की को स्कॉच तब कहा जाएगा जब वह स्कॉटलैण्ड में बनी हुई हो. स्कॉच की टक्कर की व्हिस्की बनाने में जापान को भी माहिर माना जाता है, लेकिन परम्परा ऐसी है कि वहां की व्हिस्की को स्कॉच के समकक्ष नहीं माना जा सकता.

"Eight bolls of malt to Friar John Cor wherewith to make aqua vitae"

वर्ष १४९४ में स्कॉटलैण्ड के कर-विभाग के दस्तावेज़ों में उक्त प्रविष्टि वहां स्कॉच निर्माण का सबसे पुराना उपलब्ध दस्तावेज़ है. जितनी मात्रा में मॉल्ट का इस प्रविष्टि में वर्णन है, उससे करीब डेढ़ हज़ार बोतलें बनाई जा सकती हैं. यानी व्हिस्की का उत्पादन बड़े पैमाने पर तभी होने लगा था.

मिथकों के अनुसार सन्त पैट्रिक ने व्हिस्की को डिस्टिल करने की प्रक्रिया को पांचवीं सदी में आयरलैण्ड में प्रचारित किया. डिस्टिलिंग के ये रहस्य डैलरियाडिक स्कॉटिशों के साथ इसी शताब्दी में उनके साथ किन्टैयर नामक एक स्थान पर ५०० ईस्वी के साल स्कॉटलैण्ड पहुंचे. सन्त पैट्रिक ने डिस्टिल करने की प्रक्रिया स्पेन और इटली में सीखी थी, जहां सम्भवतः लोग इस बारे में पहले से जानते थे.

डिस्टिलेशन की प्रक्रिया सबसे पहले इत्र बनाने में इस्तेमाल की गई. बाद में इस की मदद से वाइन बनाई गईं. बाद में इस प्रक्रिया से खमीर चढ़े अनाजों की मदद से "जीवनजल" बनाने की शुरुआत उन देशों में हुई जहां अंगूर उतनी ज़्यादा मात्रा में नहीं उगते थे. इस द्रव को हर जगह "जीवनजल" ही कहा गया क्योंकि इसका उत्पादन केवल मठों में होता था और तमाम तरह की बीमारियों से निबटने को इसका केवल औषधीय उपयोग किया जाता था. यहां तक कि चेचक के इलाज में इसका उपयोग होता था. बारहवीं शताब्दी में आयरलैण्ड के मठों में बाकायदा डिस्टिलरियां स्थापित हो चुकी थीं.




स्कॉटलैण्ड का महान रेनेसां-सम्राट जेम्स चतुर्थ (१४८८-१५१३) इन द्रवों का शौकीन था. १५०६ में डैन्डी नामक स्थान पर उसके आगमन के साल राजकोष की एक प्रविष्टि दिखाती है कि एक स्थानीय हज्जाम को राजा के लिए "जीवनजल" की सप्लाई के एवज में अच्छी ख़ासी रकम का भुगतान किया गया. यहां एक हज्जाम का ज़िक्र अचम्भे में नहीं डालता. १५०५ में गिल्ड ऑव सर्जन बारबर्स को एडिनबर्ग में जीवनजल के उत्पादन का एकाधिकार सौंप दिया गया था. इस तथ्य से यह जाहिर होता है है कि अल्कोहल की औषधीय महत्ता को स्वीकार कर लिया गया था. दीगर है कि हज्जामों के पास उस ज़माने में बाकायदा चिकित्सकीय कौशल हुआ करता था.

वैज्ञानिक निपुणता की कमी और पुरातन उपकरणों की मदद से बनने वाला यह द्रव सम्भवतः काफ़ी ज़बरदस्त पोटैन्सी वाला होता रहा होगा और शायद यदा-कदा हानिकारक भी. १५वीं शताब्दी में मठों के छिन्न भिन्न होने की वजह से बहुत सारे भिक्षुओं के सामने रोज़ीरोटी का संकट आन खड़ा हुआ तो उनमें से कुछ ने दारू बनाने की अपनी विशेषज्ञता को रोज़गार बना लेना ही बेहतर समझा. इस के बाद डिस्टिलिंग की जानकारी जल्दी जल्दी फैलना शुरू हुई.

इसकी बढ़ती लोकप्रियता जब स्कॉटिश संसद तक पहुंची तो सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उसने मॉल्ट और उससे बनने वाले उत्पाद पर बाकायदा टैक्स लागू कर दिया. १७०७ में इंग्लैण्ड द्वारा स्कॉटिश बाग़ियों के दमन की शुरुआत के साथ ही इन टैक्सों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हो गई. बहुत सारी डिस्टिलरियां भूमिगत हो गईं.

टैक्स वसूलने वाले दलों और अवैध दारू-निर्माताओं के बीच खूनी संघर्ष आम हो गए. अगले डेढ़ सौ सालों तक स्मगलिंग और अवैध शराब का बोलबाला रहा. कई बार तो ताबूतों के भीतर रख कर शराब की स्मगलिंग की जाती थी.
१८२० के दशक तक हाल यह था कि बावजूद हर साल १४००० अवैध डिस्टिलरियों को नष्ट किए जाने के स्कॉटलैण्ड में पी जाने वाली आधी से ज़्यादा शराब नकली या अवैध होती थी.



कानून का ऐसा दुरुपयोग देखते हुए ड्यूक ऑव गॉर्डन ने व्हिस्की उत्पादन को वैधता देने का प्रस्ताव रखा. १८२३ में एक्साइज़ एक्ट पारित हुआ जिसके मुताबिक दस पाउन्ड की रकम के एवज़ में शराब बनाने का लाइसेन्स जारी किये जाने का कानून पारित हुआ. उत्पादित की गई व्हिस्की पर प्रति गैलन एक नियत आबकारी टैक्स लगाए जाने का प्रावधान हुआ. इस से अगले दस सालों के भीतर स्मगलिंग पूरी तरह समाप्त हो गई. और दर असल आज की सबसे नफ़ीस शराब बनाने वाली डिस्टिलरियां स्मगलरों द्वारा इस्तेमाल की गई जगहों पर स्थापित की गईं.

इस आबकारी कानून ने स्कॉच व्हिस्की उद्योग की नींव डाली. इसके अलावा दो और बातें हुईं जिनकी वजह से स्कॉच-उद्योग को बहुत फ़ायदा पहुंचा.

अब तक हम ने मॉल्ट व्हिस्की का ही ज़िक्र किया है. लेकिन १८३१ में एनीयास कोफ़ी नामक एक शराबनिर्माता ने ऐसी तकनीक ईजाद की कि अनाज को डिस्टिल कर के थोड़ा हल्के स्वाद वाली व्हिस्की बना पाना सम्भव हो गया. इस प्रकार माल्ट व्हिस्की के साथ साथ ग्रेन व्हिस्की बना पाने में महारत रखने के कारण स्कॉटलैण्ड ने समूचे यूरोपीय बाज़ार पर अपना सिक्का जमा लिया.

दूसरी बात इत्तफ़ाक़न घटी. १८८० के दशक में फिलॉक्सेरा नाम के एक कीड़े ने फ़्रांस भर के अंगूर - बागानों को तहसनहस कर डाला था. जल्द ही फ़्रांस भर के घरों से वाइन और ब्रान्डी का भंडार खत्म होने लगा. स्कॉटलैण्ड के शराब-निर्माताओं ने अपना मौका ताड़ा और जब तक फ़्रांस का दारू-उद्योग सम्हलता यूरोप भर में ब्रान्डी की जगह स्कॉच व्हिस्की ने ले ली थी.

तब से स्कॉच व्हिस्की बनी हुई है. प्रतिबन्धों, युद्धों, क्रान्तियों, मन्दी वगैरह के बावजूद बनी हुई है. संसार भर में आज दो
सौ से ज़्यादा देशों में स्कॉच व्हिस्की की बड़े पैमाने पर खपत होती है.

जल्द ही आपको स्कॉच व्हिस्की के कुछ आलीशान ब्रान्ड्स के बारे में बताऊंगा.

फ़िलहाल एक छोटी सी दिलचस्प जानकारी. आप को पता है दुनिया में सबसे महंगी स्कॉच व्हिस्की कौन सी है? हैरान मत होइयेगा. Macallan 1926 की एक बोतल ७५,००० डॉलर यानी करीब तीसेक लाख रुपये की बिकी. कम्पनी द्वारा जारी एक वक्तव्य में बताया गया था कि यह बोतल सियोल की एक दुकान की सेफ़ में रखी हुई थी. पूरा भुगतान किये जाने के बाद ही बोतल ग्राहक को सौंपी गई.



वैसे अगर आप इसे लेना चाहें तो अब यह ब्रान्ड बाज़ार में समाप्त हो चुका है. खुले बाज़ार में कम्पनी इसे मात्र ३८,००० डॉलर यानी करीब सोलह लाख रुपये में बेच रही थी. अब बाज़ार में यह उपलब्ध नहीं है लेकिन आप इसे चखना ही चाहते हैं तो न्यू जेरेसी बोरगाटा होटल कैसीनो एन्ड स्पा में ३३०० डॉलर प्रति पैग के हिसाब से जेब ढीली करने को तैयार रहिये.

हम यहाँ आए थे और कोई अर्थ नहीं था हमारे होने का


मात्र इक्कीस बरस का लघु जीवन लेकिन तमाम तरह बड़ी इच्छाओं और उम्मीदों से भरापूरा। राजनीतिक , सामाजिक सामाजिक रूप से सक्रिय जीवन और ह्रूदय में पलते - पनपते उद्गार। कुछ ऐसा ही जीवन और जगत पाया पोलैंड की एक अन्चीन्ही कवयित्री ग्राज़्यना क्रोस्तोवस्का ने।

आधुनिक पोलिश कविता के बड़े नामों -विस्वावा शिम्बोर्स्का और हालीना पोस्वियातोव्सका की कवितायें आप इसी जगह पढ़ चुके हैं। ये वे नाम हैं जिनके कारण पोलैंड के साहित्य के जरिए एक दुनिया से परिचित होते हैं और अपनी दुनिया को एक नई निगाह से देखने के लिए कोशिश की एक धूप , रोशनी और हवा को भरपूर जगह देने वाली एक खिड़की खुलती - सी दीखती है। इसी क्रम में आज ग्राज़्यना क्रोस्तोवस्का की एक कविता प्रस्तुत है।ग्राज़्यना का जन्म २१ अक्टूबर १९२१ को लुबलिन में हुआ था और नाज़ी जर्मनी के काल में वह भूमिगत संगठन के० ओ० पी० की सक्रिय सदस्य थीं। उन्हें और उनकी बहन को ८ मई १९४१ को गेस्टापो ने गिरफ़्तार कर लिया गया और कुछ महीनों के बाद खास तौर पर महिला बंदियों के लिए बनाए गए रावेन्सब्रुक ( जर्मनी ) के यातना शिविर में डाल दिया गया था और वहीं १८ अप्रेल १९४२ को उनकी दु:खद मृत्यु भी हुई। मात्र इक्कीस बरस का लघु जीवन जीने वाली इस कवयित्री की कविताओं से गुजरते हुए साफ लगता है कि वह तो अभी ठीक तरीके से इस दुनिया के सुख - दु:ख और छल -प्रपंच को समझ भी नहीं पाई थी कि अवसान की घड़ी आ गई। इस युवा कवि की कविताओं में सपनों के बिखराव से व्याप्त उदासी और तन्हाई से उपजी की तड़प के साथ एक सुन्दर संसार के निर्माण की आकांक्षा को साफ देखा जा सकता है। तो लीजिए प्रस्तुत हैं ग्राज़्यना क्रोस्तोवस्का की एक कविता का हिन्दी अनुवाद :

ग्राज़्यना क्रोस्तोवस्का की एक कविता ( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )
परायी धरती

नीची इमारतों की खामोश भूरी कतार
और उसी की तरह भूरा - भूरा आसमान
यह भूरापन जिसमें नहीं बची है कोई उम्मीद।
उदासी में डूबे अलहदा किस्म के इंसानों के झुण्ड
भयानक तस्वीरें, अनोखी अजनबियत और बहुत ज्यादा सन्नाटा।

इस मृत खालीपन में
घर की याद घसीटती है अपनी ओर
जिससे उपजता है सूनापन
घेरती है पीली कठोर और गूँगी निराशा
जिसमें दम घुटता है भावनाओं का
और वे भटकती हैं अँधेरे - अंधे कोनों में।
सुनो , बावजूद इसके
आजाद जंगलों में अंकुरित होते हैं नए - नन्हें वृक्ष।

क्या हमें? क्या हमें सहन करना है?
यह सब जो विद्यमान है शान्तचित्त।
मैं खोती जा रही हूँ अनुभव अपने अस्तित्व का
कुछ नहीं देख पा रही हूँ
न ही कर रही हूँ किसी सूत्र का अनुसरण।
हम यह जो छोड़े जा रहे हैं निशान
वे इस परायी रूखी धरती पर
वे कितने छिछले हैं कितने प्राणहीन।
मात्र इतना
कि हम यहाँ आए थे
और कोई अर्थ नहीं था हमारे होने का।
( रावेन्सब्रुक ,१९४२)
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ग्राज़्यना क्रोस्तोवस्का की दो अन्य कवितायें 'कर्मनाशा' पर उपलब्ध हैं।

Thursday, January 7, 2010

साल २०१०: साहित्य में निजीकरण बढ़ेगा- मंगलेश डबराल

अशोक कुमार पाण्डेय युवा कवि हैं और कहानियां भी लिखते हैं. हमारी इस सीरीज को अब तक पढ़कर उन्होंने स्वागत योग्य टिप्पणी की है- 'आर्थिक क्षेत्र में तो यह सच ही है कि अभी कहीं कोई उम्मीद की किरण नहीं दिख रही. सामाजिक क्षेत्र में भी पुनरुत्थानवादी ताकतों के बरक्स कोई वैकल्पिक समाज निर्माण की तैयारी स्पष्ट नहीं दिखाई देती, पर कोशिशें पूरी ईमानदारी से हो रही हैं इसमें कोई दो राय नहीं. साहित्य में तो यही बहुत है कि पुरस्कार और मठाधीशों की जगह साहित्य बहस के केन्द्र में आये। आमीन!!!' उनकी इस सहभागिता का हम स्वागत करते हैं.
वैसे आज की प्रस्तुति में साहित्यकारों की बातें पढ़कर आपको ऐसा लगेगा कि आशाओं और निराशाओं के भंवर का सर बड़ी तेज़ी से चकरा रहा है-


आग्नेय (वरिष्ठ कवि): मैंने तो आँखें बंद कर रखी हैं और कान भी. निजी ज़िंदगी में जो चीज़ें हो रही हैं वही व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण होती हैं. जैसे कोई किसी से बहुत प्यार करता हो और वह दुनिया से चला जाए, या परिवार का कोई सदस्य विक्षिप्त हो जाए तो उसकी ज़िंदगी में भूचाल आ सकता है. अब सरकारें किसकी बनती हैं, राहुल गांधी पीएम बनेंगे या नहीं या अमेरिकी संस्कृति हमला कर रही है आदि सवाल मेरी ज़िंदगी में बहुत मायने नहीं रखते. देखना यह चाहिए कि एक व्यक्ति; एक नागरिक की ज़िंदगी में क्या हो रहा है. मनुष्य की यात्रा को विचारधारा के चश्मे से देखना संभव नहीं है...ठीक भी नहीं है.

टीएस इलियट ने कहा था कि आप किसी चीज़ की उम्मीद न करें क्योंकि वह उम्मीद किसी ग़लत चीज़ के लिए होगी. जैसे मैं कहूं कि दालों के भाव कम हो जाएँ या साग-सब्जी-फल वगैरह सस्ते हो जाएँ… तो यह उम्मीद करना भी ग़लत ही साबित होता है. अब जैसे जलवायु का संकट है… तो वह किसी ख़ास तरह के राष्ट्रों की साजिश नहीं है, बल्कि यह पूरी मानव सभ्यता का संकट है. ओबामा और मनमोहन सिंह मनुष्य ही हैं. ग्लोबल वार्मिंग को हम अमेरिका का संकट नहीं कह सकते.

अपनी पृथ्वी का भविष्य भी चमकीला नहीं है. मनुष्य जबसे इस पृथ्वी पर है उसने चींटियों, मधुमक्खियों, पशुओं यहाँ तक कि मछलियों की जगह भी छीन ली है. कोई इन जीव-जंतुओं से पूछे कि मनुष्य ने उनके साथ शुरू से ही क्या सुलूक किया है? वैसे भी माना जा रहा है कि चीजें अंत की तरफ बढ़ रही हैं. मेरा पूरा विश्वास है कि पृथ्वी पर जीवन का अंत होने वाला है और इसे कोई रोक नहीं सकता.
साहित्य में मुझे लग रहा है कि यह बड़े लेखन का दौर नहीं है. संगीत में भी बीथोवन और मोजार्ट अब कहाँ पैदा हो रहे हैं?


मंगलेश डबराल (वरिष्ठ कवि): साल २००९ के अंत में पीएम डॉक्टर मनमोहन सिंह ने कांग्रेस के इंदिरा भवन का शिलान्यास करते हुए दिल्ली में कहा कि देश में आतंकवाद, साम्प्रदायिकता, नक्सलवाद और क्षेत्रवाद- ये चार बड़ी चुनौतियां हैं. पीएम खुद यह भूल गए कि गरीबी एक बहुत बड़ी समस्या है. बाज़ारवाद के समर्थक पीएम को बढ़ती हुई गरीबी नहीं दिखाई देती. जब तक भारत अमेरिकापरस्ती नहीं छोड़ता है और बाज़ारवाद का साथ नहीं छोड़ता है...अगर भारत यह मान कर चल रहा है कि सारी समस्याओं का हल दमन के जरिये किया जा सकता है तो वह भ्रम है. पीएम द्वारा गिनाई गयी चार चुनौतियों से भी बड़ी चुनौती नव-उदारीकरण और भूमंडलीकरण है.


मेरा मानना है कि नए साल में लगभग यूरोपीय यूनियन की तर्ज़ पर एशियाई देशों की यूनियन बनाने की पहल होना चाहिए. इससे बहुत सारी समस्याएं हल हो जायेंगी.

साल २०१० में मुझे आशंका है कि साहित्य में निजीकरण और निगमीकरण का दौर चलेगा. संस्कृति के दूसरों हिस्सों में कार्पोरेटाईजेशन हो ही रहा है. चित्रकला में भी वे लोग घुस गए हैं. देखिये कि केन्द्रीय साहित्य अकादमी का जो 'रवीन्द्रनाथ ठाकुर पुरस्कार' है, इसकी धनराशि कोरिया की बहुराष्ट्रीय कंपनी सैमसंग देने जा रही है. यह पुरस्कार ८ भाषाओं में है. सोचिये कि कितने साहित्यकार इस धनराशि के लपेटे में आ जायेंगे. यह ख़तरे की घंटी है. लेखकों को सचेत हो जाना चाहिए. साहित्य में निजी पूंजी का प्रवेश बड़ा नुकसान पहुंचाएगा. इस बात की क्या गारंटी है कि कल को साहित्य अकादमी के मुख्य पुरस्कारों को कोई निजी कंपनी प्रायोजित नहीं करने लगेगी.

दूसरी बात यह है कि एक तरफ हम गांधी जी द्वारा उपयोग में लाई गयी कई चीज़ों को दुनिया भर में जगह-जगह से इकट्ठा करने की मुहिम छेड़े हुए हैं और दूसरी तरफ हम रवीन्द्रनाथ ठाकुर के नाम का पुरस्कार बहुराष्ट्रीय निगम को सौंप रहे हैं.

साहित्य में वैचारिक और नैतिक गिरावट आती जा रही है. इसके बढ़ते जाने की आशंका है. साहित्य देश के साधारण जन से दूर जा रहा है. इसकी दिशा खाते-पीते मध्य-वर्ग की तरफ है. मुझे लगता है कि साहित्य को साधारण जन के निकट ही रहना चाहिए. एक उम्मीद यह भी है कि साल २०१० में महिला और दलित लेखन से कोई महत्वपूर्ण कृति आयेगी.


सुधा अरोड़ा (वरिष्ठ कथाकार): आज जैसी स्थितियां हैं उसमें बदलाव की गुंजाइश बहुत कम दिखाई दे रही है. आम जनता महंगाई की चक्की में पिस रही है...पूरा परिदृश्य ही काफी निराशाजनक है. राजनेताओं में जिस तरह भ्रष्टाचार पनपा हुआ है उसका कोई तोड़ नज़र नहीं आता. देश की बागडोर जिनके हाथ में है अगर वही भ्रष्ट हों तो आम जनता कितना भी बड़ा आन्दोलन क्यों न खड़ा कर ले, उससे क्या होगा...और आन्दोलन जनता खड़ा कैसे करेगी जबकि उसके ही जीने के लाले पड़े हुए हैं. न्याय-व्यवस्था का ढांचा चकनाचूर हो चुका है. अभी रुचिका का मामला ही देख लीजिये...

साहित्य जगत में भी मुझे निराशाजनक परिदृश्य दीखता है. जब लेखकों के अपने कोई नैतिक मूल्य नहीं हैं, जब उनमें ग़लत को ग़लत कहने का माद्दा नहीं है, सच सुनने-सुनाने का साहस नहीं है, सच्चाई के पक्ष में खड़े होने का दम नहीं है तो ऐसे लेखकों द्वारा रचे गए साहित्य से हम क्या उम्मीद करेंगे? लेखन में मैं कई बार मोहभंग की स्थिति से गुजर चुकी हूँ और आज भी समझ लीजिये कि वही दौर चल रहा है.

कुमार अम्बुज (कवि, हालिया कविता-संग्रह 'अतिक्रमण’): पेड़ों और फसलों के लिए धरती पर लगातार कम होती जगह. पानी की मुश्किल. साम्राज्यवादी, पूंजीवादी समाज का रचाव और फैलाव. विकास के जनविरोधी प्रस्ताव. प्रतिरोध और आन्दोलनों की अनुपस्थिति. ये कुछ चिंताएं हैं जिनसे अक्सर मैं इधर घिरा रहता हूँ. जैसे इन सब बातों के बीच एक तार जुड़ा है जो इन्हें एक साथ रखता है. इन पर अलग-अलग विचार किया जाना शायद संभव नहीं. इन पर एक साथ ही गौर करना जरूरी होगा. यह एक कुल चरित्र है और आफत है जो इस समय हमारे सामने रोज-रोज एक बड़े रूप में सामने आती जा रही है.


ऐसे में गुजरते वर्ष की एक रात बीतने भर से, किसी नयी सुबह में एक फैसलाकुन उम्मीद संभव नहीं. लेकिन प्रयास हों कि मध्यवर्ग में कुछ उपभोग वृत्ति कम हो, उसकी बाज़ार केन्द्रित आक्रामकता में कमी आये और वह मनुष्यता को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही चीज़ों के प्रति अपना प्रतिरोधात्मक विवेक दिखा असके तो यह नए साल की उपलब्धि होगी. वह सूचना और ज्ञान से संचालित होने के साथ-साथ संवेदना और करुणा से भी चालित हो. फासिज्म के जितने लक्षण इटली और ख़ास तौर पर हिटलर की जर्मनी में दिखने लगे थे, वे सब आज हमारे देश में उपस्थित हैं. यही हमारे समय का प्रधान सांस्कृतिक लक्षण है. राजनीति से इसका सीधा गठजोड़ है और सामाजिक संबंधों को संस्कृति के नाम पर इसमें शामिल कर दिया गया है. राजनीति अप्रत्याशित भ्रष्टाचार के पराक्रमों का उदाहरण बन कर रह गयी है. नए साल में इन सब में अचानक कोई कमी आ सकेगी, ऐसी कोई आशा व्यर्थ है.

लेकिन मैं साहित्य से उम्मीद करता हूँ. यह ठीक है कि साहित्य अपनी भूमिका उतनी प्रखरता से नहीं निभा पा रहा है कि इस पतनशील और फासिस्ट समाज से लड़ने के लिए समुचित मार्गदर्शन और प्रेरणा दे सके. लेकिन साहित्य ही वह जगह होगी जहां से ऐसी प्रवृत्तियों की पहचान संभव हो सकेगी और प्रतिरोध के कुछ उपाय भी दिखेंगे. साहित्य में, ख़ास तौर पर कहानी में, बीच-बीच में कलावाद का ज़ोर भी उठता दिखाई देता है, उसकी जगह जीवन के उत्स, संताप और स्वप्नशीलता के जीवंत तत्वों को देखने की आशा की जानी चाहिए. हिन्दी कहानी, कविता और उपन्यास जहां तक आ गए हैं, वहां से एक नए प्रस्थान एवं अग्रगामिता की शुभकामना भी है.
लेकिन सारी आशाएं अंततः सकर्मक क्रियाओं से ही फलीभूत हो सकती हैं इसलिए हम सबके नागरिक प्रयास भी जरूरी होंगे.

एकांत श्रीवास्तव (कवि, हालिया कविता-संग्रह 'बीज से फूल तक'): मैं कामना करता हूँ कि यह जो असमान छूती मंहगाई है वह नीचे उतरे ताकि एक बहुत साधारण व्यक्ति अपनी जेब की हैसियत के अनुसार अपना ठीक-ठीक जीवनयापन कर सके. मगर उत्तर-पूंजीवाद में यह संभावना कम बनती दिखाई दे रही है.

मैं यह मानता हूँ कि वर्त्तमान साहित्य से ही भविष्य की भूमिका बनती है. मैं चाहूंगा कि भविष्य का साहित्य पाठकों के अधिक करीब हो और उसका रास्ता दिमाग के साथ-साथ दिल से होकर भी गुज़रे. जैसा कि डॉक्टर रामविलास शर्मा ने कहा है कि सिर्फ विचारबोध से साहित्य पैदा नहीं होता, उसके लिए भाव-बोध ज़रूरी है.


.......(जारी

चीख और हुल्लड़ के बीच संगीत

विनोद भारद्वाज कुछ अरसे तक नवभारत टाइम्स में विभिन्न विषयों पर छोटे-छोटे मगर काफ़ी विचारोत्तेजक लेख लिखते रहे। आज पढ़ते हैं संगीत के बदलते स्वरूप पर उनके तात्कालिक विचार। यह छोटा सा आलेख तेरह साल पहले मार्च 1996 में छपा था मगर इसकी प्रासंगिकता आज बढ गई है। वैसे यह लेख अरसा पहले अपने संगीत ब्लॉग पर भी मैं पोस्ट कर चुका हूँ.



चीख और हुल्लड़ के बीच संगीत

विनोद भारद्वाज
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एक प्रसिद्ध पश्चिमी मानवशास्त्री ने कहीं कहा था कि एक समाज शायद चित्रकला के बिना रह सकता है लेकिन संगीत के बिना रहना उसके लिये असंभव है। वैसे तो प्रागैतिहासिक गुफा चित्र यह बात अच्छी तरह से बताते हैं कि आदिम मनुष्य भी रचना को अपने लिये जरूरी मानता था पर शायद संगीत एक अधिक केंद्रीय और जरूरी अभिव्यक्ति है। वैसे अगर हम 'केंद्रीय विधा' सरीखी बहसों में न उलझें (एक जमानें में हिंदी आलोचक इस पर बहस करते थे कि कविता केंद्रीय विधा है या कहानी), तो भी संगीत के पक्ष में कुछ महत्वपूर्ण बातें की जा सकती हैं। पश्चिम के एक अध्ययन में एक दिलचस्प तथ्य सामने आया था कि मोत्सार्ट का संगीत सुनकर व्यक्ति अधिक बुद्धिमान और 'सभ्य' हो जाता है। शायद इस बात का मतलब यह नहीं है कि आप ज्यों ही मोत्सार्ट सुनना शुरू करेंगे त्यों ही आपकी आई क्यू बढ़ जाएगी पर इस तथ्य से कौन इनकार करेगा कि संगीत हर तरह के आदमियों की मानसिकता को उद्वेलित करता है, उसे बेहतर बनाता है। कुमार गंधर्व या भीमसेन जोशी को सुनकर श्रोता निश्चय ही एक बुद्धिमान और बेहतर इंसान बनता है। इस तरह का श्रेष्ठ संगीत श्रोता रुलाता भी है और उसे आम ज़िंदगी से ऊपर भी ले आता है। अच्छा संगीत सिर्फ़ मनोरंजन ही नहीं है - विचार भी है। मीठा और सजावटी संगीत चित्त को प्रसन्न करता है। पर जिस संगीत में विचार भी हो वह मानसिकता को प्रसन्नता से भी परे ले जाता है। मिसाल के लिये जब मैं किशोरी अमोनकर का गाया राग भूप सुनता हूँ तो लगता है कि जैसे गायिका आपको विचार भी दे रही है। शायद इसीलिये कहा गया है कि श्रेष्ठ संगीत बुद्धिमान बनाता है।

एक हिंदी कवि ने अपनी कविता में कहा था कि सड़क पर साधारण काम करने वाला मकैनिक अगर हजारा सिंह का गिटार सुन कर बहुत प्रसन्न और मगन है, तो इस संगीत-अनुभव को भीमसेन जोशी सुनने वाले तथाकथित श्रेष्ठ श्रोताओं के अनुभव से खराब क्यों माना जाए? इस सवाल में एक तरह की सच्चाई है। साधारण जन का संगीत से प्रेम विशिष्ट श्रोताओं से कम नहीं है। दरअसल विशिष्ट श्रोताओं की भी एक महान नकली दुनिया है। सिर्फ़ संगीत की दुनिया में ही नहीं कला, सिनेमा, साहित्य आदि की दुनिया में भी फ़ैशनेबल और हाइब्रो होने का नकली दिखावा सामने आता रहा है।

अंग्रेज़ी कवि टी एस एलियट की एक प्रसिद्ध कविता में कहा गया है कि प्रदर्शनी में 'स्त्रियां आ जा रही हैं और मिकेलांजेलो के बारे में बतिया रही हैं।' यहां कवि फ़ैशनेबल कला रसिकों पर चोट कर रहा है- स्त्रियों पर नहीं। धनी और फ़ैशनेबल वर्ग की पार्टियों में हुसैन, गणेश पाइन या रविशंकर की बात कर के लोग अपने को उम्दा टेस्ट रखने वाला साबित करते हैं। लेकिन इस तरह के फ़ैशनेबल लोग सच्चे और गंभीर किस्म के कला रसिकों की दुनियां निरर्थक नहीं बना देते हैं।

हाल में एक फ़्रांस के अध्ययन के बारे में पढ़ा था कि पश्चिम की युवा पीढ़ी भयंकर रुप में तेज़ाबी और शोर से भरे संगीत को सुन कर बहरी हो रही है। किशोर वाकमैन या डिस्कमैन पर जो शोर से भरा संगीत सुन रहे हैं वह उनके कान के पर्दों पर सीधा प्रहार कर रहा है। महान जर्मन संगीतकार लुडविग फ़ान बिथोवन अपने अंतिम वर्षों में बहरे हो गए थे। उनके बारे में कहा जाता है कि उनकी कालजयी रचना नवीं सिंफ़नी का पहला कार्यक्रम समाप्त हुआ था, तो वह श्रोताओं की प्रशंसा में बजायी गई तालियों के शोर को भी सुनने लायक नहीं रह गए थे। लेकिन बिथोवन दूसरे कारणों से बहरे हुए थे। आज के युवा श्रोता अगर तथाकथित 'हैडबैंगर' (सरतोडू) संगीत को सुन कर अपने कान के परदे भी फोड़ने के लिये तैयार हैं तो यह एक अलग तरह की समस्या है। इसका सम्बन्ध पश्चिम की अत्यधिक यंत्रविधि पर आश्रित और उपभोक्तावाद की कैदी हो चुकी सभ्यता से भी है। वहां का युवा वर्ग विलाल्दी या मोत्सार्ट के कर्णप्रिय संगीत से आसानी से अपने आप को जोड़ नहीं पाता है। एक तेज़ाबी और शोर से भरी हुई नशीली दवाओं की दुनिया में आत्मघाती ढंग से खोई हुई संवेदना उसे अपनी लगती है।

पश्चिम के सबसे लोकप्रिय संगीत चैनल एम टी वी अपने विज्ञापनों में यह बात गर्व से कहता है कि 'हम अच्छे टेस्ट के कारण नहीं पहचाने जाते हैं।' यानी अच्छा, संतुलित कर्णप्रिय, विचारशील संगीत आप ही को मुबारक हो-हम तो सरतोड़ू संगीत के रसिया हैं। इस तरह का संगीत गैर पश्चिमी देशों में भी लोकप्रिय हुआ है।

एक ज़माने के सोवियत संघ की लौह दीवार भी पॉप संगीत से बच नहीं सकी थी। चेकोस्लोवाकिया आदि देशों में युवा वर्ग सत्ता से अपना विरोध दिखाने के लिये भी पॉप संगीत की शरण में चला जाता था। वहां बाकयदा अंडरग्राउंड संगीत में पॉप संगीत का मिजाज़ एक अलग तरह की 'डिसिडेंट' मानसिकता से जुड़ा था।

दरअसल एम टी वी का विज्ञापन जब 'गुड टेस्ट' पर सीधा हमला करना चाहता है, तो उसका एक अर्थ व्यवस्था से विरोध ज़ाहिर करने में भी है। पश्चिमी उपभोक्ता समाज के ऊबे हुए किशोर साठ के दशक में जब 'ट्यून इन, टर्न ऑन, ड्राप आउट,' के आकर्षक नारों से चमत्कृत हुए थे, तो वे एक साइकेडेलिक दुनिया में चले गए। लड़ने के इरादे से नहीं, बल्कि वे यथार्थ से भागना चाहते थे। नशीली दवाओं, तेज़ संगीत ने उन्हें एक अंधेरे बंद कमरे से दूसरे बंद कमरे में जाने की राह दिखाई। साठ के दशक में बीटल्स का संगीत उस दौर में एक तरह का प्रोटेस्ट नज़र आता था। पर आज के तेज़ाबी, तामसी और 'राक्षसी' हैवी मैटल संगीत के सामने अब बीटल्स के गाने कर्णप्रिय और अर्थपूर्ण दिखाई देने लगे हैं।

बीटल्स गायकों ने पंडित रविशंकर के सितारे और महर्षि महेश योगी के मेडीटेशन में भी दिलचस्पी ली थी। दिलचस्प बात यह है कि आज पंडित रविशंकर एम टी वी की आलोचना कर रहे हैं और दूसरे शास्त्रीय संगीतकार उन पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने ही सबसे पहले पॉप संगीत का गुरु बनने की कोशिश की थी। आज जब ध्वनि प्रदूषण पर भी ध्यान दिया जा रहा है तो 'चीख' और 'हुल्लड़' में फ़र्क करने की एक जेनुइन ज़रूरत भी नज़र आ रहा है।

(नवभारत टाइम्स से आभार सहित)

Wednesday, January 6, 2010

वर्ष २०१०: 'शब्दों के गढ़ों और मठों से बाहर आयें साहित्यकार'

आबिद सुरती, प्रोफ़ेसर कमला प्रसाद और निदा फाज़ली की नए साल पर दी गयी राय को लेकर हमें मिली प्रीतेश बारहठ की टिप्पणी उत्साहित करती है. उन्होंने लिखा है- 'मेरा मानना यह है कि प्रतिभाशाली लोग थोड़े में छलकते नहीं हैं, उनकी दृष्टि हमेशा गहरी और व्यापक होती है इसलिये किसी साहित्यकार का नववर्ष के उत्सवों में नाचना तो संभव नहीं है, इनसे सूखे आशावाद के नाम पर गाना भी नहीं गवाया जा सकता है. लेकिन इस बहाने इन्हें कुरेदकर आप जो राह पूछ रहे हैं वही श्रेष्ठ है, क्योंकि चुप्पी टूटेगी तो बदलाव की आशा भी जागेगी, तब तारीख़ के साथ शायद दिन भी बदले.' आज प्रस्तुत हैं यह रायशुमारी-


लीलाधर जगूड़ी (वरिष्ठ कवि): एक उम्मीद तो यही है कि साल २००९ में जो काम नहीं कर सका वे २०१० में जरूर कर सकूंगा. दूसरी उम्मीद यह करता हूँ कि साल २०१० साल २००९ की पुनरावृत्ति न हो. मैं चाहता हूँ की खेती-बाड़ी और बागवानी संबंधी उत्पादनों के बारे में भारत में एक नयी शुरुआत हो. राष्ट्रीयता के बारे में विचारों को लेकर बदलाव आना चाहिए. अब अपनी-अपनी अंतरराष्ट्रीयता न हो बल्कि सबकी एक जैसी अंतरराष्ट्रीयता हो तो अच्छा होगा. हम राष्ट्रों के नागरिक होते हुए भी विश्व नागरिकता की और बढ़ सकें तो संयुक्त राष्ट्र संघ को वीजा जारी करने का अधिकार मिल जाएगा...वरना काहे का संयुक्त राष्ट्र संघ?

साहित्य जगत में इस समय मुझे दो ख़तरे स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं जो २००९ ने पैदा नहीं किये लेकिन २००९ में वे पुख्ता अवश्य हुए हैं. एक तो कविता के प्रति लगावाहीनता की बात जाहिर की गयी है जो एक अभिशाप से कम नहीं है. कवियों को कविता की ताकत और उसकी लोकप्रियता के बारे में फिर से सोचना चाहिए. दूसरा खतरा यह है कि गद्य को कविता की शक्ति से वंचित किया जा रहा है. यह गद्य के लिए शुभ लक्षण नहीं है. साहित्य अपनी तमाम विधाओं में आगे बढ़ता हुआ नहीं दिख रहा है. उम्मीद है कि २०१० में निबंधों और नाटकों की एक नयी शुरुआत होगी ताकि गद्य में काव्य-गुण बचा रह सके.


चंद्रकांत देवताले (वरिष्ठ कवि): जो उम्मीदें १९५० में थीं वे निरंतर कम होती जा रही हैं. भले ही लोग मुझे निराशावादी होने के कटघरे में खड़ा कर दें, इस देश की वास्तविक जनता के लिए मुझे २०१० में कोई उम्मीद नज़र नहीं आती. यह सारा तमाशा अर्थशास्त्र का हो रहा है और ज़िंदगी की बुनियादी समस्याएं नेपथ्य में ढंकी हुई हैं.

भविष्य में मैं चाहूंगा कि शिक्षा के सामान अवसर हों. जो शिक्षा अमीर आदमी के बेटे-बेटियों को मिलती है वही इस देश के गरीब आदमी के बच्चों को मिलना चाहिए. स्वास्थ्य सुविधाएं, स्वच्छता की सुविधाएं गाँवों, दलित बस्तियों और झुग्गी-झोपड़ियों में...सब जगह एक जैसी होना चाहिए. जनता के प्रतिनिधि, वे चाहे संसद में हों या विधानसभाओं में...यदि वे सदन का बहिष्कार करते हैं तो राष्ट्रीय संवैधानिक शपथ की अवमानना के आरोप में उन पर मुक़दमा चलाया जाए और उनकी सदस्यता समाप्त की जाए. न्याय-प्रणाली का जो अन्याय गरीब, कमज़ोर और असमर्थ लोग भुगत रहे हैं, वह तुरंत समाप्त होना चाहिए. यह सपना पूरा होना बहुत कठिन है, इसलिए मुझे अधिक उम्मीद नज़र नहीं आती.

साहित्य बिरादरी से मैं यही अपेक्षा करूंगा कि वे शब्दों के गढ़ों और मठों से बाहर आयें तथा जितना संभव हो, अपना प्रतिरोध सड़क पर दर्ज़ कराएं.

पंकज बिष्ट (कथाकार-उपन्यासकार): मैं उम्मीद करता हूँ कि हमारे शासक वर्ग में बेहतर समझ जाग्रत होगी. दूसरी ओर मैं देश की आम जनता से भी उम्मीद करता हूँ कि अगले वर्षों में वह अपने अधिकारों के प्रति अधिक सचेत होगी और अपने साथी नागरिकों के प्रति एक न्यायिक दृष्टिकोण अपनाएगी.

देश की आर्थिक नीतियों से जो वर्ग सबसे ज्यादा लाभान्वित है, उसे यह समझना चाहिए कि यह सब किसकी कीमत पर हो रहा है. लोग विस्थापित हो रहे हैं, उनकी ज़मीनें छीनी जा रही हैं. अगर विकास इस कीमत पर हो रहा है तो चेत जाना चाहिए. अगर लोगों को जीने के अधिकार नहीं मिलेंगे तो जो तथाकथित आर्थिक सफलताएं इस राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में नज़र आ रही हैं, वे ज्यादा दिन नहीं टिकेंगी.

हिन्दी साहित्य के सम्बन्ध में मैं यह चाहता हूँ कि इसकी सरकारों पर निर्भरता घटे. सबसे बड़ी बात मैं यह देखना चाहूंगा कि सरकार द्वारा हो रही पुस्तकों की थोक खरीद बंद हो. इस प्रवृत्ति ने पूरे हिन्दी साहित्य को ख़त्म कर दिया है. अगर हमें अपने साहित्य को बचाना है तो हमारी पुस्तकों का वास्तविक ख़रीदार पाठक-वर्ग तैयार करना होगा.


डॉक्टर विजय बहादुर सिंह (आलोचक, सम्पादक 'वागर्थ'): साल २०१० में लगता है कि लोगों का क्षोभ और ग़ुस्सा बढ़ेगा. न्याय की आकांक्षा ज्यादा प्रबल होगी. जनतांत्रिक संस्थाएं और उसकी जो प्रक्रिया है, उनकी नैतिक उपस्थिति पर लोग संदेह से भरते चले जायेंगे.

सोच रहा हूँ कि आज़ादी के बाद से समाज का लोप हुआ है और सत्ता समाजभक्षी ताक़त के रूप में सामने आयी है. मजबूर होकर लोगों को इस समाज को ज़िन्दा करना होगा ताकि सरकारें समाज के गर्भ से ही पैदा हो सकें. अगर ऐसा होगा तभी कुछ उम्मीद की जा सकती है.

साहित्य से मैं हमेशा यह कामना करता हूँ कि वह लोगों के संघर्ष की क्षमता को और अधिक उद्दीप्त करे. वह लोकचित्त के अधिक करीब आये. ऐसा तभी संभव है जब रचनाकार अपने ज़मीनी यथार्थ को अपनी स्वाधीन आँखों से देखने का सामर्थ्य प्रदर्शित करेगा.


राजेश जोशी (वरिष्ठ कवि): इच्छा तो होती है कि देश में बहुत सारी जो चीज़ें बरसों से अनसुलझी पड़ी हैं उन्हें सुलझाया जाए. उम्मीद है कि आतंकवाद के खिलाफ़ जो लम्बी लड़ाई चल रही है, उसका सकारात्मक हल २०१० में निकलेगा और दुनिया से इस तरह की हिंसा समाप्त होगी. हम कामना करते हैं कि विकास के रास्ते पर देश इस ढंग से चले कि बेकारी, गरीबी और हर तरह की असमानता दूर हो. रोज़गार के नए-नए अवसर पैदा हों.

एक बात गौर करने लायक है कि सांस्कृतिक स्तर पर साल २००९ बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण गुज़रा है. पूरे साल व्यर्थ की उठापटक चलती रही है, संगठनों एवं साहित्यकारों को लेकर विवाद हुए हैं. ज्यादा सृजनात्मक कार्य नहीं हुआ. अकादमियां भी निरर्थक ढंग के विवादों में घिर गयी हैं. इस पर सरकारों को गंभीरता से सोचना चाहिए और इसे सुधारना भी चाहिए. अकादमियां सृजन और कला से जुड़ी होती है इसलिए उन्हें संचालित करने की जिम्मेदारी इसी क्षेत्र से जुड़े लोगों को सौपना चाहिए. मेरा यह भी कहना है कि जिस तरह दिल्ली साहित्य अकादमी का अध्यक्ष अशोक चक्रधर को बनाया गया वह ठीक नहीं हुआ. दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित एक समझदार राजनीतिज्ञ हैं लेकिन इस मामले में उनकी हठधर्मिता गैरवाजिब थी. चक्रधर मेरे मित्र हैं, पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं लेकिन वह हिन्दी काव्य-मंचों के लोकप्रिय कवि हैं. हिन्दी साहित्य अकादमी एक गंभीर साहित्यिक संस्थान है. उसमें किसी गंभीर साहित्यकर्मी को लाना चाहिए था.

.......(जारी)

अगर आलू के बराबर हो गए आतंकी



लीलाधर जगूड़ी हमारे समय के बड़े कवियों में शुमार किए जाते हैं. उत्तराखण्ड के टिहरी ज़िले के धंगणगांव में एक जुलाई १९४४ को जन्मे जगूड़ी जी के प्रमुख संग्रह हैं - शंखमुखी शिखरों पर (१९६४), नाटक जारी है (१९७२), इस यात्रा में (१९७४), रात अभी मौजूद है (१९७६), बची हुई पृथ्वी (१९७७), घबराये हुए शब्द (१९८१), ’ईश्वर की अध्यक्षता में’ (१९९९), ख़बर का मुंह विज्ञापन से ढंका है (२००९) इत्यादि.

साहित्य अकादेमी पुरुस्कार से सम्मानित जगूड़ी जी के संग्रह ’ईश्वर की अध्यक्षता में’ से दो कविताएं:


एक ख़बर
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अकसर
आतंकवादी सड़कों के किनारे गन्ने के खेतों में छिप जाते हैं
इसलिए गन्ना जलवाया जा रहा है


रामदीन कुछ गहरे डूबकर बोला -
गन्ना महंगा गुड़ बन जाए, महंगी चीनी बन जाए
गन्ने को कीड़ा लग जाए

इसी तरह का रोग है कि गन्ने में आतंकवादी छिप जाए


सुलहदीन बोला -
अचरज नहीं कि पीपल वाले भूत से ज़्यादा
गन्ने से डर लग जाए


मातादीन बोला - गन्ने से उगता है उद्यम
और हर उद्यम में जा छिपता है आतंकवादी


रामदीन भी पलट कर बोला -
पर अगर आलू के बराबर हो गए आतंकी
गोली-बारूद आलुओं में से चलने लगे
मान लीजिए वे अरहर में छिप जाएं
धान में छिप जाएं
सारे अन्न-क्षेत्र में आतंकी ही आतंकी हों
वे अड़ जाएं और इतने बढ जाएं
कि साग भाजियों में भी कीड़ों की तरह पड़ जाएं
तब भाई मातादीन हम अपना क्या-क्या जलाएंगे ?


गरीब वेश्या की मौत
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कल-पुर्जों की तरह थकी टांगें, थके हाथ
उसके साथ


जब जीवित थी
लग्गियों की तरह लंबी टांगें
जूतों की तरह घिसे पैर
लटके होठों के आस-पास
टट्टुओं की तरह दिखती थी उदास


तलवों में कीलों की तरह ठुके सारे दुख
जैसे जोड़-जोड़ को टूटने से बचा रहे हों


उखड़े दाँतों के बिना ठुकी पोपली हँसी
ठक-ठकाया एक-एक तन्तु
जन्तु के सिर पर जैसे
बिन बाए झौव्वा भर बाल


दूसरे का काम बनाने के काम में
जितनी बार भी गिरी
खड़ी हो जा पड़ी किसी दूसरे के लिए


अपना आराम कभी नहीं किया अपने शरीर में


दाम भी जो आया कई हिस्सों में बँटा


बहुतों को वह दूर से
दुर्भाग्य की तरह मज़बूत दिखती थी
ख़ुशी कोई दूर-दूर तक नहीं थी
सौभाग्य की तरह
कोई कुछ कहे, सब कर दे
कोई कुछ दे-दे, बस ले-ले
चेहरे किसी के उसे याद न थे
दीवार पर सोती थी

बारिश में खड़े खच्चर की तरह
ऐसी थकी पगली औरत की भी कमाई
ठग-जवांई ले जाते थे


धूपबत्तियों से घिरे
चबूतरे वाले भगवान को देखकर
किसी मुर्दे की याद आती थी


सदी बदल रही थी
सड़क किनारे उसे लिटा दिया गया था
अकड़ी पड़ी थी
जैसे लेटे में भी खड़ी हो


उस पर कुछ रुपए फिंके हुए थे अंत में
कुछ जवान वेश्याओं ने चढाए थे
कुछ कोठा चढते-उतरते लोगों ने


एक बूढा कहीं से आकर
उसे अपनी बीवी की लाश बता रहा था
एक लावारिस की मौत से
दूसरा कुछ कमाना चाहता था


मेहनत की मौत की तरह
एक स्त्री मरी पड़ी थी


कल-पुर्जों की तरह
थकी टांगें, थके हाथ
उसके साथ अब भी दिखते थे


बीच ट्रैफ़िक
भावुकता का धंधा करने वाला
अथक पुरुष विलाप जीवित था

लगता है दो दिन लाश यहाँ से हटेगी नहीं.

(फ़ोटो: उत्तरकाशी में अपनी पौत्री मिष्टी के साथ जगूड़ी जी)

Tuesday, January 5, 2010

वर्ष २०१०: साहित्यकारों की राय- 'दिन नहीं बदलेगा, तारीख़ बदल जायेगी'

नए साल के मौके पर बतौर कर्मकांड जीवन के चकमक क्षेत्रों के जगमगाते लोगों से यह जानने की कोशिश की जाती है कि उनकी क्या-क्या उम्मीदें हैं. हमने तय किया कि इस बारे में धूल-धूसरित हिन्दी जगत के नए-पुराने रचनाकर्मियों को टटोला जाए और पता किया जाए कि उनकी आशंकाएँ-कुशंकाएँ क्या हैं. सो, अमल यह हुआ कि बातचीत होती गयी और क्रम बनता गया. यह बातचीत विजयशंकर चतुर्वेदी ने की है. अब विनती यह है कि साहित्य की हर विधा से जुड़े लोग शामिल होकर यह कारवां आगे ले जाएँ.


आबिद सुरती (पेंटर, कार्टूनिस्ट, कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार): नए साल में मैं देखना चाहूंगा कि अपनी संस्कृति को कैसे सुरक्षित रखा जाए. यह जो वैश्वीकरण आगे बढ़ रहा है वह सब कुछ तहस-नहस किये डाल रहा है. यह अमेरिकी संस्कृति है जो पूरी दुनिया पर छाती जा रही है और सब कुछ खाती जा रही है. यह हर हाल में रुकना चाहिए.

मैं मानता और कहता हूँ कि भारतीय संस्कृति दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है और अमेरिकी संस्कृति दुनिया में सबसे घटिया है. आज के बच्चे टिफिन में नूडल्स लेकर स्कूल जाते हैं, जिनमें कोई पौष्टिकता नहीं होती कोई विटामिन नहीं होता. हमारी संस्कृति में माँ बाजरे की रोटी पर घी चुपड़ कर देती थी. अमेरिकी संस्कृति जहां भी जाती है, वायरस की तरह वहां की लोक-संस्कृति को चट कर जाती है.

चित्रकारिता जगत में नया साल खुशियाँ लेकर आयेगा. आज हुसैन, रज़ा, सुजा, गायतोंडे आदि की पेंटिंग्स लाखों-करोड़ों में बिकती हैं. इस दुनिया का विस्तार हो रहा है. आज एनीमेशन आ गया है, कार्टून चैनल्स हैं, कार्टून फ़िल्में बनती हैं...इससे सैकड़ों नए-नए कलाकारों को खपने की जगह मिलती है. पहले स्थान बहुत सीमित था. आज के दौर को आप कार्टूनिस्टों का स्वर्णयुग कह सकते हैं. साल २०१० में पेंटर भी अच्छा काम और दाम पायेंगे.'

प्रोफेसर कमला प्रसाद (आलोचक, सम्पादक 'वसुधा'): मैं इस व्यवस्था में लगातार ह्रास देखता हूँ और इसीके बढ़ते जाने की आशंका है क्योंकि इसमें जैसे-जैसे गरीबी और अमीरी की खाई बढ़ेगी, देश में पैसे का कब्ज़ा बढ़ेगा. चुनाव में, राजनीति में पैसे का कब्ज़ा बढ़ेगा. अमरीकी दोस्ती सघन होगी तो आतंकवाद, नस्लवाद, क्षेत्रवाद बढ़ेगा. हर समस्या का निदान क़ानून-व्यवस्था की समस्या माना जाएगा. नक्सलवाद की समस्या के लिए सेना की तरफ देखा जाएगा...तब हम क्या उम्मीद कर सकते हैं...साल २०१० में...२०११ में और उसके आगे के वर्षों में भी...



जबसे यह भूमंडलीकरण का राज आया है तबसे विकास की थोथी चर्चा होती है. समता की बात नहीं होती...तो ऐसे में कैसा जनतंत्र? रूसो ने कहा है कि ऐसे किसी जनतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती जिसमें समता न हो...आज हमारे देश के हर आदमी के अवचेतन में अज्ञात भय और अमूर्त गुस्सा व्याप्त है. यह जनतंत्र के चरित्र का सबसे घातक पहलू है.

ऐसी परिस्थितियों में उम्मीद की किरण हमारी जागरूक युवा पीढ़ी है और जो जागरूक मीडिया वाले लगातार विपरीत परिस्थितियों में सकारात्मक बातें जनता के सामने रखते चलते हैं, उनसे भी आने वाले समय में उम्मीद बंधती है. यह मीडिया बड़ी-बड़ी साजिशों को विफल करके नई उम्मीदों को जन्म देता है. अगले साल उन्हीं उम्मीदों के विस्तार की आशा करता हूँ. जनता में सामूहिक भाव-बोध आने वाले समय में सामाजिक परिवर्त्तन का कारक बनेगा. मैं अब भी मानता हूँ कि कला और संस्कृति का क्षेत्र तथा माध्यम अग्रगामी है और यही परिवर्त्तन की राह दिखाएगा.


निदा फाज़ली (मशहूर शायर): मुझे कोई उम्मीद नहीं है. पिछला साल अपने दुखों के साथ चला जाता है और नया साल अपने ग़मों के साथ आता है. मेरा एक शेर है-


'रात के बाद नए दिन की सहर आयेगी

दिन नहीं बदलेगा, तारीख़ बदल जायेगी.'


...सो कैलेण्डर बदलता है, कैलेण्डर के बाहर का माहौल नहीं बदलता. वह २००९ हो, २०१० हो या कोई और साल हो... बाहर की फिजायें, हवाएं, सदायें जस की तस रहती हैं.

बहुत बड़ी बात यह है कि भाजपा ने इंडिया शाइनिंग का नारा दिया था, कांग्रेस इंडिया इज शाइनिंग कह रही है...लेकिन जिस देश में नंदीग्राम हो, सिंगूर हो, भिंड हो, मुरैना हो, मोतिहारी हो... और ऐसे ही अनेक अंधेरों के क्षेत्र फैले हुए हों जो देश की आबादी के तीन चौथाई से ज्यादा हैं...वहां बहुत उम्मीद क्या करना...बस इन्हीं लोगों के लिए भूख है... मंहगाई है...महामारियां हैं...२००९ में भी थीं और क्या आप कह सकते हैं कि २०१० में नहीं रहेंगी?



आज़ादी से अब तक... और ब्रिटिश राज में तथा उसके पहले से भी आम आदमी का शोषण हमारी तहजीब की पहचान रहा है...पुराने युग में भी था...२०१० में भी रहेगा. नए साल के लिए मेरा कोई सुझाव नहीं है... बस इतना कहता हूँ कि भगवान ने इंसान को बनाया तो शैतान को भी नहीं मारा...रामकथा में दिलचस्पी रावण के कारनामों के चलते कायम रहती है...यही २०१० में होगा...इक़बाल का एक शेर है-


'गर तुझे फ़ुरसत मयस्सर हो तो पूछ अल्लाह से

क़िस्सा-ए-आदम को रंगीं कर गया किसका लहू.'


फ़िल्मी गीत-संगीत एक व्यापार है और व्यापार चलता रहता है. एक बात गौर करने लायक है और वो यह कि पहले फिल्मों की दुनिया में प्रवेश पाने के लिए जो पासपोर्ट मिलता था वह इस आधार पर मिलता था कि आपने कितनी बढ़िया शायरी की है, आप कितने जहीन हैं, आपकी कितनी किताबें छप चुकी हैं. शैलेन्द्र, साहिर, राजा मेंहदी अली खाँ, भारत व्यास आदि गीतकार यही पासपोर्ट लेकर दाखिल हुए थे. आज हालत यह है कि अगर आपमें ये विशेषताएं हैं तो आपको बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा. वजह यह है कि जैसा लिखवाने वाला वैसा ही लिखने वाला.

नए साल के लिए मैं अपना एक दोहा पाठकों को भेंट करना चाहता हूँ-


'किरकिट, नेता, एक्टर, हर महफ़िल की शान

स्कूलों में क़ैद है, ग़ालिब का दीवान.'


नई नस्ल के लिए मेरा यही सन्देश होगा कि वे स्कूलों में क़ैद ऐसे कई गालिबों को आज़ाद कराएं और उनका नेताओं, एक्टरों और क्रिकेटरों से ज्यादा सम्मान करें. शुक्रिया...धन्यवाद!"

ढिमिक डिमिक डमरू कर बाजे: पण्डित छन्नूलाल मिश्र




पण्डित छन्नूलाल मिश्र जी की कई रचनाओं को कबाड़खा़ने पर पहले भी लगाया जाता रहा है.

आज़मगढ़ ज़िले में जन्मे छन्नूलाल जी को पहली संगीत दीक्षा उनके पिता पण्डित बद्री प्रसाद मिश्र जी ने दी. बाद में किराना घराने के उस्ताद अब्दुल ग़नी ख़ां ने उन्हें संगीत की बारीकियां सिखाईं.

पण्डित जी ने खयाल, ठुमरी, दादरा, कजरी, चैती और भजनों की असंख्य कम्पोज़ीशन्स गाई हैं. १९९५ में उत्तर प्रदेश सरकार के नौशाद सम्मान से नवाज़े जा चुके छन्नूलाल मिश्र जी उत्तर भारत के सबसे लोकप्रिय संगीतकारों में हैं.

आज आप को उनकी आवाज़ में सुनवाते हैं उनके अल्बम शिव विवाह से एक रचना:

Monday, January 4, 2010

डागर बन्धुओं के स्वर में राग जयजयवन्ती



समकालीन ध्रुपद गायन में डागर बन्धुओं का दर्ज़ा निर्विवाद रूप से सबसे ऊपर माना जाता है. इन्दौर के दरबार में गायक था डागर परिवार. उस्ताद नसीरुद्दीन डागर का देहान्त १९३६ के साल मात्र ४१ की वय में हो गया था. उनके बड़े बेटों नसीर मोहिउद्दीन डागर और नसीर अमीनुद्दीन डागर ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया. सन १९६६ में नसीर मोहिउद्दीन डागर के इन्तकाल के बाद उनके छोटे भाइयों उस्ताद नसीर ज़हीरुद्दीन डागर और उस्ताद नसीर फ़ैयाज़ुद्दीन डागर ने कमान सम्हाली.

ध्रुपद-धमार की गौरवशाली परम्परा के चमकीले सितारे उस्ताद नसीर ज़हीरुद्दीन डागर और उनके सहोदर उस्ताद नसीर फ़ैयाज़ुद्दीन डागर क्रमशः १९३२ और १९३४ में जन्मे थे. उनके दादाजान अल्लाबन्दे खान डागर बहुत बड़े गवैये माने जाते थे. इन दोनों भाइयों ने बहुत छोटी आयु से ही बाकायदा गायन सीखना शुरू कर दिया था. आलाप और कम्पोज़ीशन की अलग अलग सतहों पर उनका कमाल उनकी गायकी की खास पहचान है.

आज सुनिये उनकी आवाज़ों में ध्रुपद शैली में गाया गया राग जयजयवन्ती.

Sunday, January 3, 2010

एक पंक्ति


ये उज्रे - इम्तहाने जज्बे -दिल कैसा निकल आया,
मैं इल्जाम उसको देता था कुसुर अपना निकल आया।
* मोमिन