Wednesday, October 31, 2007

कामरेड दीनबंधु पन्त का पुरातन कबाड़ (संस्कृत में)


नैनीताल में मेरे क्लासफैलो थे कामरेड दीनबंधु पन्त। विचारधारा से वामपंथी कामरेड दीनबंधु पन्त की खासियत यह थी कि वे पारिवारिक पेशे से पुरोहित थे। जाहिर है संस्कृत पर उनकी गहरी पैठ थी। कबाड़ के निर्माण में उन्हें खासी दक्षता हासिल थी। पेश है खैनी (सुरती) की उनकी अद्वितीय परिभाषा :

वामहस्ते दक्षिणहस्तांगुष्ठे मर्दने फटकने मुखमार्जने विनियोगः

भारत के राष्ट्रीय पेय चाय पर उनकी दो रचनाएं भी अदभुत हैं :

शर्करा, महिषी दुग्धं सुस्वादम ममृतोपमम
दूरयात्रा श्रम्हरम चायम मी प्रतिग्रह्य्ताम


(अर्थात शक्कर तथा महिषी के दुग्ध से बनी, अमृत के समान सुस्वादु, दूर यात्रा का श्रम हर लेने वाली चाय को मैं ग्रहण करता हूँ। )

दूसरे श्लोक में चाय बनाने का तरीका और उसकी गरिमा का वर्णन है :

शर्करा, महिषी दुग्धं, चायं क्वाथं तथैव च
एतानि सर्ववस्तूनी कृष्ण्पात्रेषु योजयेत
सपत्नीकस्थ, सपुत्रस्थ पीत्वा विष्णुपुरम ययेत

(अर्थात शक्कर, महिषी के दुग्ध तथा चाय के क्वाथ को एकत्र करने के उपरांत इन समस्त वस्तुओं को एक कृष्ण पात्र में योजित किये जाने से बनी चाय को पत्नी तथा पुत्र के साथ पीने वाला सत्पुरुष सीधा देवलोक की यात्रा पर निकल जाता है।)

ऎसी उत्क्रृष्ट रचनाओं को कामरेड दीनबंधु पन्त ऋषि चूर्णाचार्य के नाम से रचते थे और इन्हें त्र्युष्टुप छंद कहा करते थे। दस बारह साल से उन से दुर्भाग्यवश मेरा सम्पर्क टूट गया है। पता नहीं वे कहाँ क्या कर रहे हैं। नैनीताल के किसी पुराने यार दोस्त को कुछ मालूमात हों तो बताने का एहसान करें।

इस पोस्ट को बहुत सारे नोस्टाल्जिया के साथ ख़त्म करता हुआ मैं चाय के बारे में उनकी विख्यात उक्ति उद्धृत कर रह हूँ :

यस्य गृहे चहा नास्ति, बिन चहा चहचहायते

(अर्थात बिना चाय वाला घर तथा उसका स्वामी बिन चाय के चहचहाता रहता है)

9 comments:

अनुनाद सिंह said...

वाह ! आनन्द आ गया।
बड़े मजेदार व्यक्तिव से परिचय कराया आपने।

[ आशुतोष ] said...

मेरे खयाल से कामरेड दीनबंधु पंत ने कई साल पहले वाम मार्ग से किनारा कर लिया था. दतअसल उनकी वैचारिक यात्रा संघ से शुरू हुई थी. ये श्लोक उसी दौर के हैं. कभी मेरा भी उनसे गहन सानिध्य रहा. कुछ साल पहले जब मेरी उनसे मुलाकात हुई, तो वह आपके हल्द्वानी में ही वकालत कर रहे थे. शायद अब भी वहीं हों. उनके श्लोकों की गर्द हटाने का शुक्रिया.

Rajesh Joshi said...

अद्भुत साहित्य.

इरफ़ान said...

थोड़ा सा दीनबंधु हमारे(कम)आपके(ज़्यादा)भीतर बसता है.वहीं तलाशें मिलेगा.

sidheshwer said...

हे दीनबंधु है काव्य तुम्हारा बहुत निराला
सुख समृद्धी दाता मन हरसाने वाला
कहां छिप गये प्यारे आवो
आकर अपना अनुपम काव्य सुनाओ
खाली घट सा रीत रहा है जीवन अपना
अावो मिलकर देखें कोई सुन्दर सपना ।
भाई । बहुत खूब । बल्ले ।

हर्षवर्धन said...

कॉमरेड, धर्म में आस्था, पुरोहित का काम।

Mired Mirage said...

पंत जी की रचनाएँ तो गजब की हैं । वैसे कुमाँऊ में चाय को जो स्थान दिया जाता है शायद ही कहीं दिया जाए । भरे पूरे घरों में दिन भर चाय बनती ही रहती है । किसी भी समय जाएँ तुरत प्रस्तुत की जाएगी ।
घुघूती बासूती

shailendra joshi said...

Itna hi kehna hai ki...shayad Nazeer jaise log aaj bhi hote hain.
Til ke Laddoo yaad aa gaye aur gud ke tapke waali chaay bhi apne pahar wali!

Prem Ballabh said...

Thanks Ashok for reminding this. We often heard some of these from the Mukharbindu of Deenbandhu. His "rolled- string" voice is ringing in my ears. If you meet, please pass my hello. In the Shoorti-Poem specially "phatkane" is one of the greatest!

The other short one: 'Bin chaha chahchahayate' is the one which brings the importance of Chay in Paharh!

Dhany ho Deen bandhu, Dhanyawad ho Ashok.