Thursday, December 6, 2007

६ दिसम्बर को याद करते हुए राही मासूम रज़ा की एक कविता








लेकिन मेरा लावारिस दिल

राही मासूम रज़ा

मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी

मंदिर राम का निकला

लेकिन मेरा लावारिस दिल
अब जिस की जंबील में कोई ख्वाब
कोई ताबीर नहीं है
मुस्तकबिल की रोशन रोशन
एक भी तस्वीर नहीं है
बोल ए इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल
ये लावारिस, ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल
आख़िर किसके नाम का निकला
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
बन्दा किसके काम का निकला
ये मेरा दिल है
या मेरे ख़्वाबों का मकतल
चारों तरफ बस खून और आंसू, चीखें, शोले
घायल गुड़िया
खुली हुई मुर्दा आंखों से कुछ दरवाजे
खून में लिथड़े कमसिन कुरते
एक पाँव की ज़ख्मी चप्पल
जगह जगह से मसकी साडी
शर्मिन्दा नंगी शलवारें
दीवारों से चिपकी बिंदी
सहमी चूड़ी
दरवाजों की ओट में आवेजों की कबरें
ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत
ए श्रीराम, रघुपति राघव, ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम
ये आपकी दौलत आप सम्हालें
मैं बेबस हूँ
आग और खून के इस दलदल में
मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।
* इसे भी देखें : http://mohalla.blogspot.com/2007/12/blog-post_8635.html

16 comments:

अनुनाद सिंह said...

इसका मतलब है कि बाबर द्वारा हिन्दुओं पर किये अत्याचार के इस स्मारक के गिरने पर राही को खुशी नहीं हुई थी।

Sanjeet Tripathi said...

धर्म से उपर एक इंसान कीअभिवव्यक्ति!!
कम से कम मैं इसे इसी नज़रिए से पढ़ना चाहूंगा

ASAM said...

I do not understand hindi. Is it possible to put a language translate widget or whatever on your site so that non hindi people can read as well?

अफ़लातून said...

@ अनुनाद: "तीन नहीं ,अब तीस हजार,बचे न एक्को कब्र मजार" तुम्हारे जैसों को आजीवन खुशी न होगी।

Ashok Pande said...

संजीत भाई और अफलातून जी, आपका धन्यवाद। अनुनाद जी जैसे लोगों को तभी सुकून मिलेगा जब हमारे देश में रवांडा जैसा हाल हो जाए और दसियों लाख निरपराध मार दिए जाएँ। तब जा कर भी धर्मान्धता की खूनी प्यास नहीं बुझेगी। अनुनाद साहब, मुझे नहीं पता कि बाबरी मस्जिद तोड़े जाने पर आपको ख़ुशी हुई या नहीं, मगर मुझे अब तक यह समझ में नहीं आता कि किसी को भी इस बात से कैसे ख़ुशी हो सकती है। विभाजन के बाद हमारे देश की सबसे काली त्रासदी है छः दिसम्बर। अदम गोंडवी की एक पंक्ति है न : "गलतियां बाबर ने कीं जुम्मन का घर फिर क्यों जले" । खैर आप की बला से हों कोई अदम गोंडवी या हों कोई राही मासूम रज़ा।

Dear AP,

I am quite new to blogging and will definitely try to soon find the kind of widget you have suggested. I would be obliged if you could tell me about any such tool, in case you know about it.

Vineeta Yashswi said...

Mujhe lagta hai ki hume insaan ban kar rahna chahiye aur insaniyat ko apna dharma samjhna chahiye. Tabhi hum is mandir-masjid ke jhagro se bahar nikal sakte hai.

अनुनाद सिंह said...

आशोक पांडे जी,

दुनिया में आपको रवांडा ही मालूम है? अमेरिका भी है इस दुनिया में; इजरायल भी है और चीन भी है। हिन्दुओं को दुनिया अहिंसा का पाठ पढ़ाये, इससे बड़ी बिडम्बना क्या हो सकती है?

रही बात कविता की। इस तरह की कूड़ेदानी छाप हजारों कवितायें खोजने पर मिल जायेंगी। इससे कई गुना अधिक कवितायें इस महान कार्य की प्रशंशा में भी लिखी गयी हैं।

खैर छोड़िये, आप की दुनिया राही और गोंडवी की महानता तक ही सीमित है। गुलामी इतनी जल्दी अपना असर खत्म नहीं होने देती।

अनुनाद सिंह said...

और हाँ, बाबर के दोष के लिये जुम्मन का घर बिलकुल नहीं जलना चाहिये। पर यदि आज भी जुम्मन बाबर के ही जमाने में जीना चाहे तो वह बाबर से कम दोषी नही है!

अनुनाद सिंह said...

एक बात और छूट गयी थी। आप जब पोस्ट लिखते हैं तो क्या यह मान कर लिखते हैं कि आप सर्वज्ञानी हैं, जिससे आपके हाँ में सब लोग हाँ मिला देंगे। आप कह देंगे कि मार्क्स बाबा सबसे बड़े चिन्तक थे और सब लोग स्वीकार कर लेंगे? आप कह देंगे कि बाबरी मस्जिद का गिरना सबसे बड़ा कलंक है और लोग मान जायेंगे? औरों को भी सोचने की शक्ति मिली हुई है, जनाब !

Priyankar said...

राही जी की अच्छी-भली कविता पर अनुनाद की टिप्पणी से रवीन्द्रनाथ के एक उपन्यास का शीर्षक याद आया : 'चोखेर बाली' यानी 'आंख की किरकिरी' .

मुनीश ( munish ) said...

i dont want to b dragged into this controversy, but i think v.s. naipaul's comment is worth remembering here who called this action a 'natural reaction'.

दीपा पाठक said...

अनुनाद जी बात चल रही है राही मासूम रज़ा की कविता की और आपको मार्क्स पर गुस्सा आ गया? किसने कहा कि आपको मानना ही पङेगा कि वो सबसे बङे और सही विचारक थे? आप एक स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक हैं, आपके पास सोचने-समझने की शक्ति है, इससे किसने इंकार किया है? बात सिर्फ इतनी सी है कि आपका विश्वास जिस भी विचारधारा पर है वह इतना मजबूत तो होना चाहिए कि दूसरी विचारधारा की बात सामने आते ही आप असुरक्षित महसूस न करने लगे। हिंदुत्व जो भी हो इतना कमजोर तो नहीं ही होगा कि उसे खुद को बनाए रखने के लिए मस्ज़िद गिराने जैसी, गैर हिंदुओं को मारने जैसी हरकतें करनी पङे।

मेरे ब्लॉग पर निठल्ला चिंतन पर मुनिश ने भी एक टिप्पणी की है कि लोग गुजरात और ८४ के दंगों पर शोर मचाते हैं, कोई कश्मीर में मर रहे सुरक्षाकर्मियों की मौत पर क्यों नहीं बोलता? किसने कहा कि हम लोग उनके लिए संवेदनशील नहीं हैं? लेकिन अगर कुपवाङा में सीआरपीएफ का एक जवान आतंकवादियों से लङते हुए शहीद होता है तो क्या उसकी एवज गुजरात में एक मुस्लिम गर्भवती महिला का पेट फाङ कर बदला लेने को आप न्यायसंगत करार दे सकते हैं?

दरअसल इन बातों को विचारधारा से, आंकङों से या किसी दूसरे देशों के उदाहरणों के आधार पर समझने की बजाय खुद को उन परिस्थितियों पर रख कर देखा जाए, तो शायद हम तर्क-वितर्क करने की बजाय मसलों को ज्यादा संवेदनशील नजरिए से देख सकेंगे। जब हम या हमारे अपने जातीय हिंसा की आग के निशाने पर होते हैं तो परिस्थितियों को आंकने का हमारा नजरिया ज्यादा मानवीय होगा। मेरा वो आलेख भी मेरे अपने के निजी अनुभव पर ही है।

Ragini Sharma said...

People like Anunaad don't even deserve a mention. Sick people. Keep it up. Great going. And a note for you, Mr Munish: Please don't evade crucial questions. Thanks Deepa for making a clear statement.

दिलीप मंडल said...

3 दिसंबर 1992 को अयोध्या में था। उन तीन गुंबदों को टूटने से पहले देखा था। उस इमारत के आर्किटेक्ट और शैली को लेकर कई सवाल थे। लेकिन अब उन्हें दोबारा नहीं देखा जा सकता। तहास के विद्यार्थी के रूप में इस इमारत के टूटने का अफसोस है। किसी ऐतिहासिक हिंदू या सिख या ईसाई या किसी भी मत से जुड़ी मारत के टूटने से भी उतना ही दुख होगा। अगर उस ऐतिहासिक इमारत को बाबर ने किसी मंदिर को तोड़कर बनाया था तो भी हमारी संतानों को और आने वाली पीढ़ियों का हक बनता है कि उन्हें देखें और अतीत के साथ अपने सूत्र तलाशें। उन्हें सोमनाथ भी देखने को मिलता और वो हजारों बौद्ध और जैन धर्मस्थल भी जिन्हें अलग अलग समय में अलग अलग मतावलंबियों ने तोड़ दिया तो अच्छा होता।

हमारा वर्तमान अगर हमारी आने वाली पीढ़ियों को इन अनुभवों से वंचित कर दरिद्र बना रहे है तो ये पाप तो इतिहास में लिखा जाएगा अनुनाद सिंह। ऐतिहासक धरोहरों को मटाने वालों को, किसी और से नहीं, अपने बच्चों से माफी मांगनी चाहिए। अफसोस है कि लोगों को और अगली पीढ़ियों को बामियान में बुद्ध मूल रूप में देखने को नहीं मिलेगा। स्वाट घाटी में गांधार शैली में बनी प्रतिमाएं भी शायद ही बच पाएंगी। इराक में अमेरिकियों ने दजला फरात की सभ्यता यानी सभ्यता की आदिभूमि में जो विध्वंश किया है, म्युजि.म लूट लिए हैं, क्या उसे माफ किया जा सकता है। क्या उनका पाप सिर्फ इसलिए कम हो जाएगा कि वो ईसाई है और मुसलमानों को मार रहे हैं। कट्टरपन, दूसरे से खुद को बड़ा समझने का अहंकार, इतिहास से बदला लेने की कोशिश - हर रंग में निंदनीय है। मुसलमानों ने किया तो शर्म आनी चाहिए और ईसाई या हिंदुओं ने या यहूदियों ने किया तो भी। ऐसी बातों पर गर्व करने वाले बीमार हैं।

अनुनाद सिंह को अपनी बात कहने का हक है, चाहे वो गलत ही क्यों न हो। मुझे उनकी बात न मानने का भी हक है। हम दोनों को एक दूसरे से कभी सहमत हो जाने की संभावना तलाशने का भी हक है। सवाल अनुनाद सिंह की तरह सोचने वाले सभी लोगों से है - क्या वो नहीं चाहेंगे कि उनकी अगली पीढ़ियां ऐतिहासिक धरोहरों को देख पाएं? क्या उन सभी इमारतों को तोड़ देना चाहिए, उन सभी पांडुलिपियों को फूंक देना चाहिए, जिन पर आरोप है कि उनकी रचना के लिए या उस दौरान किसी समुदाय पर अन्याय हुआ था। जिस तरह महरौली की मुस्लिम शैली में बनी इमारतों के स्तंभों पर हिंदू देवी-देवता नजर आते हैं उसी तरह दक्षिण और मध्य भारत से लेकर हिमालय तक में सैकडो़ हिंदू मंदिरों के स्तंभों से लेकर फर्श और सीढ़ियों पर मुझे जैन और बौद्ध प्रतीक दिखते हैं। आपको भी दिखेंगे। तो क्या उन सबको तोड़ दिया जाए? फिर तो इस देश में बहुत कुछ तोड़ना पड़ेगा। धर्मस्थलों की इस तरह की ऑडिटिंग करा पाएंगे अनुनाद सिंह? म्युजियमों में तो हाहाकर मच जाएगा। ऐतिहासिक अन्याय को कहां कहां खत्म करेंगे? हिसाब तो आदवासी भी, जैन भी, बौद्ध भी और दलित और दूसरी अवर्ण जातियां और सभी जाति और धर्म की औरतें भी मांग सकती हैं। दे पाएंगे हिसाब? सोच लीजिए। और अपने आस पास के बच्चों से भी पूछ लीजिए कि क्या वो देश के हजारों मंदिरों, मस्जिदों और दूसरे पूजा स्थलों को गरा दिए जाने के पक्ष में है।

आशीष said...

dileep jee bahut achchee tarah se aapne apni baat kahee. anunaad jee or muneesh jee ki samajh mein bhee jaroor aayee hogi....hume koshish karte rahnee chahiye inhe sumjhane ki

शिरीष कुमार मौर्य said...

Kripaya ye saaf kar lein ki ye ANUNAD Singh kaun hai? Is tareh ke logon ko zyada tul kyon diya jae!