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Tuesday, September 30, 2008

डा शिवमंगल सिंह सुमन की कविता: आभार

कबाड़खाने के एक साल पूरा होने के उपलक्ष्य में डा शिवमंगल सिंह सुमन (जीवनकालः १९१५-२००२) की लिखी कविता आभार स्वरूप पेश है। शिवमंगल सिंह सुमन को सन् १९७४ में साहित्य अकादमी पुरस्कार और सन् १९९९ में पद्म भूषण से नवाजा गया है।

आभार

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।
जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं,
सीमित पग डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं।
दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रमाद
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

साँसों पर अवलम्बित काया, जब चलते-चलते चूर हुई,
दो स्नेह-शब्द मिल गये, मिली नव स्फूर्ति, थकावट दूर हुई।
पथ के पहचाने छूट गये, पर साथ-साथ चल रही याद
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

जो साथ न मेरा दे पाये, उनसे कब सूनी हुई डगर
मैं भी न चलूँ यदि तो क्या, राही मर लेकिन राह अमर।
इस पथ पर वे ही चलते हैं, जो चलने का पा गये स्वाद
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

कैसे चल पाता यदि न मिला होता मुझको आकुल अंतर
कैसे चल पाता यदि मिलते, चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर
आभारी हूँ मैं उन सबका, दे गये व्यथा का जो प्रसाद
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।

Tuesday, April 22, 2008

चंद्रकांत देवताले

अशोक ने पिछले दिनों देवताले जी की एक कविता लगाई थी जो माँ के बारे में थी - मैं बेटी के बारे में लिखी एक कविता लगा रहा हूँ !

प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता !

तुम्हारी निश्चल आंखें
चमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश में

प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता
ईथर की तरह होता है
जरूर दिखायी देती होंगी नसीहतें
नुकीले पत्थरों -सी

दुनिया भर के पिताओं की लम्बी कतार में
पता नहीं कौन-सा कितना करोड़वां नम्बर है मेरा
पर बच्चों के फूलोंवाले बगीचे की दुनिया में तुम अव्वल हो
पहली कतार में मेरे लिए

मुझे माफ करना
मैं अपनी मूर्खता और प्रेम में समझा था
मेरी छाया के तले ही
सुरक्षित रंग-बिरंगी दुनिया होगी
तुम्हारी

अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गई हो
मैं खुश हूं सोचकर
कि मेरी भाषा के अहाते से परे है तुम्हारी परछाई !

प्रेम, गिलहरी और गाय

यह हर किसी के नसीब में नहीं होता कि उसे सुबह सुबह उठा कर उसकी भाषा का कोई बड़ा कवि अपनी नवीनतम कविता का पहला ड्राफ़्ट पढ़ कर सुनाए और इसरार करने पर फ़ोन पर ही लिखा भी दे.

मेरे साथ अभी सुबह सुबह ऐसा ही हुआ.

जब जगूड़ी जी ने ये दो कविताएं मुझे सुनाईं तो मुझे लगा कि यह कवि आयु के साथ साथ और बड़े विषयों की तरफ़ बढ़ रहा है जो हिन्दी में बहुत देखा नहीं जाता. जगूड़ी जी न सिर्फ़ एक कवि के रूप में मेरे पसंदीदा हैं, एक शानदार और खुले-फ़क्कड़ इन्सान के रूप में मैंने उन्हें कभी अपना हमउम्र समझा है, कभी गुरू माना है, कभी बड़ा भाई और कभी पितासदृश. एक सिपाही की मामूली नौकरी से जीवन शुरू करने वाले जगूड़ी जी के अनुभवों का संसार बहुत विस्तृत है और ज्ञान की उनकी कोठरियों तलक बिना सेंध मारे नहीं पहुंचा जा सकता. मैं पिछले कई वर्षों से उनसे एक औपन्यासिक या संस्मरणात्मक गद्य हिन्दी समाज को देने की गुज़ारिश कर चुका हूं.उम्मीद है ऐसा जल्द होगा. आमीन!

कबाड़ख़ाने के पाठक पहले भी जगूड़ी जी को पढ़ चुके हैं. साहित्य अकादमी पुरुस्कार से सम्मानित पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी जी की दो बिल्कुल ताज़ा और अप्रकाशित कविताएं आपके लिए खा़सतौर पर:

1

प्रेम


प्रेम ख़ुद एक भोग है जिसमें प्रेम करने वाले को भोगता है प्रेम
प्रेम ख़ुद एक रोग है जिसमें प्रेम करने वाले रहते हैं बीमार
प्रेम जो सब बंधनों से मुक्त करे, मुश्किल है
प्रेमीजनों को चाहिये कि वे किसी एक ही के प्रेम में गिरफ़्तार न हों
प्रेमी आएं और सबके प्रेम में मुब्तिला हों
नदी में डूबे पत्थर की तरह
वे लहरें नहीं गिनते
चोटें गिनते हैं
और पहले से ज़्यादा चिकने, चमकीले और हल्के हो जाते हैं

प्रेम फ़ालतू का बोझ उतार देता है,
यहां तक कि त्वचा भी.


2


गिलहरी और गाय के बहाने


कौन नहीं जानता ये अलग प्रजातियों के प्राणी हैं
पर एक दूसरे से काम लायक जो समाज बनाया जाता है
यह कोई देवताओं से नहीं बल्कि उनके प्रति मनुष्य की श्रद्धा से सीखे
तो नतीज़े कुछ और निकलेंगे

गिलहरी को मनुष्य पालतू नहीं बना सका या बनाना नहीं चाहता था
क्योंकि वह गाय जैसी दुधारू नहीं हो सकती
अगर होती भी तो आदमी कभी उसे दुह नहीं पाते

लतखोर गाय से लाख गुना चंचल है वह
एकदम पारे जैसी
पर पारे की चंचलता पारे को सिर्फ़ लुढ़का सकती है, छितरा सकती है
पारा अपने पैरों से पेड़ पर उतर-चढ़ नहीं सकता

गाय में भी एक ख़ास गाय है हिमालय की चंवरी गाय
जो संभवतः हूणों और खसों के साथ आई थी
जिसके बछड़े को याक कहते हैं
-दोनों की पूंछ के बनते हैं चंवर

चलते चलते भी याक स्थूल और स्थिर दिखाई देता है
चंचल गिलहरी की चंवर जैसी पूंछ देख कर
मुझे सुस्त चंवरी गाय और मोटा मन्द याक याद आये
- यह समुद्र देख कर हिमालय याद आने की तरह है

एक धरती की विराट जांघों के बीच आलोढ़ित जलाशय है
दूसरा उसके सिर पर चढ़कर जमा हुआ
-नीलाशय में पीठाधीश्वर,
महाशय श्वेताशय - मीठी नदियों का अक्षय स्रोत

जैसे किसी पहाड़ से भी दोगुनी-तिगुनी उसकी पगडंडी होती है
वैसे ख़ुद से दुगुनी-तिगुनी होती है गिलहरी की पूंछ
जिसके चेहरे और पूंछ में से कौन ज़्यादा चंचल है कुछ पता नहीं चलता
चंचल लहरों से बनी नदी का संक्षिप्ततम शरीर है गिलहरी
- पूंछ के अंतिम बाल तक धुली-खिली


मुंह से दुम तक की स्पंदित लहरियों में गिन नहीं पा रहा मैं एक भी लहर
गिलहरी की चंवराई चंचलता
क्या याक की घंटे जैसी लटकी ध्यानस्थ दुम बन सकती है?
जो अपनी पीठ पर बैठनेवाली मक्खियों को
हमेशा वैसे ही उड़ा देती है
जैसे दुनिया के अनर्थों से दूर रखने के लिये
हम उसे भगवानों पर डुलाते हैं

Friday, April 18, 2008

मां पर नहीं लिख सकता कविता

मां पर नहीं लिख सकता कविता

मां के लिए संभव नहीं होगी मुझसे कविता
अमर चिऊंटियों का एक दस्ता
मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है
मां वहां हर रोज़ चुटकी - दो- चुटकी आटा डाल जाती है

मैं जब भी सोचना शुरू करता हूं
यह किस तरह होता होगा
घट्टी पीसने की आवाज़
मुझे घेरने बैठ जाती है
और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनिया में ऊंघने लगता हूं

जब भी कोई मां छिलके उतारकर
चने, मूंगफली या मटर के दाने
नन्हीं हथेलियों पर रख देती है
तब मेरे हाथ अपनी जगह पर
थरथराने लगते हैं

मां ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिये
देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया

मैंने धरती पर कविता लिखी है
चन्द्रमा को गिटार में बदला है
समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूंगा

मां पर नहीं लिख सकता कविता

-चन्द्रकान्त देवताले जी की यह कविता मांओं पर लिखी गई श्रेष्ठतम कविताओं में से एक है : इस पूरे विश्व के साहित्य में: कहीं भी, कभी भी

Wednesday, April 16, 2008

प्रभु मेरी दिव्यता में सुबह-सबेरे ठंड में कांपते रिक्शेवाले की फटी कमीज़ ख़लल डालती है

प्रभु मेरी दिव्यता में
सुबह-सबेरे ठंड में कांपते
रिक्शेवाले की फटी कमीज़ ख़लल डालती है

मुझे दुख होता है यह लिखते हुए
क्योंकि यह कहीं से नहीं हो सकती कविता
उसकी कमीज़ मेरी नींद में सिहरती है
बन जाती है टेबल साफ़ करने का कपड़ा
या घर का पोछा
मैं तब उस महंगी शॉल के बारे में सोचती हूं
जो मैं उसे नहीं दे पाई

प्रभु मुझे मुक्त करो
एक प्रसन्न संसार के लिए
उस ग्लानि से कि मैं महंगी शॉल ओढ़ सकूं
और मेरी नींद रिक्शे पर पड़ी रहे.

'एक और प्रार्थना' शीर्षक यह कविता अनीता वर्मा की है. अनीता वर्मा जी को आप कबाड़ख़ाने में पहले भी पढ़ चुके हैं. विन्सेन्ट वान गॉग पर उनकी कविता भी यहां लगाई जा चुकी है. बहुत हर्ष का विषय है कि सन २००६ का प्रतिष्ठित बनारसीदास भोजपुरी सम्मान उन्हें उनके कविता संग्रह 'एक जन्म में सब' के लिये दिया गया है. ६ अप्रैल को उनके नगर रांची में उन्हें यह सम्मान हिन्दी के वरिष्ठ कवि श्री लीलाधर जगूड़ी़ द्वारा प्रदान किया गया. समारोह में हिन्दी के अनेक नामचीन्ह समकालीन कवि-आलोचक उपस्थित थे. उस अवसर का एक फ़ोटो मुझे कल अनीता जी के सौजन्य से मेल द्वारा प्राप्त हुआ.


इस अवसर पर कबाड़ख़ाना अनीता जी को बधाई प्रेषित करता है. वे दर असल आज की फ़तवेबाज़ और बगूलाभगत दार्शनिकता का पर्याय बन चुकी अधिकतर हिन्दी कविता से इतर बहुत संवेदनशील और सार्थक रचना करने वाले विरल कवियों में हैं. अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा भी कि कविता उनके लिए जीवन की तरह ही पवित्र, सुंदर और निष्कलुष है.

प्रस्तुत है उनकी एक कविता:

यथास्थिति

आप पहाड़ पर रहते हैं तो आ जाएं नीचे
आप ज़मीन पर हैं तो आइए ऊंचाई पर
पहाड़ की सुगंध क्या साथ आई है आपके
या आप उठा लाए हैं पहाड़
ज़मीन की घास पर न रखें पहाड़
उसे रहने दें यूं ही
घास मिट्टी की उजास है
और पहाड़ नदियों का पिता.

(भूलसुधार: ब्लॉगवाणी में प्रदर्शित किया जा रहा पोस्ट का शीर्षक भूल से ग़लत लग गया. कविता में "रिक्शेवाले की फटी कमीज़ " है, "रिक्शेवाले की नींद" नहीं. क्षमा करें. )

Thursday, April 10, 2008

एक बेरोज़गार की कविताएं

सुन्दर चन्द ठाकुर हिन्दी के नामी कवि हैं और कबाड़ख़ाने के कबाड़ियों में शुमार है उनका. यह अलग बात है कि आज तक उन्होंने अपने आलस्य के कारण यहां एक भी पोस्ट नहीं लगाई है. ख़ैर! अभी अभी नया ज्ञानोदय में उनकी कुछ कविताएं आई हैं. इन अच्छी कविताओं के शुरुआती पाठकों में मैं रहा हूं सो उनके आलस्य के बावजूद उनकी कविताएं यहां लगा रहा हूं. आशा है वे जल्द ही ख़ुद अपनी तरफ़ से कबाड़ख़ाने को नवाज़ेंगे.

एक बेरोज़गार की कविताएं

चांद हमारी ओर बढ़ता रहे

अंधेरा भर ले आग़ोश में

तुम्हारी आंखों में तारों की टिमटिमाहट के सिवाय

सारी दुनिया फ़रेब है

नींद में बने रहें पेड़ों में दुबके पक्षी

मैं किसी की ज़िन्दगी में ख़लल नहीं डालना चाहता

यह पहाड़ों की रात है

रात जो मुझसे कोई सवाल नहीं करती

इसे बेख़ुदी की रात बनने दो

सुबह

एक और नाकाम दिन लेकर आयेगी.

कोई दोस्त नहीं मेरा

वे बचपन की तरह अतीत में रह गए

मेरे पिता मेरे दोस्त हो सकते हैं

मगर बुरे दिन नहीं होने देते ऐसा

पुश्तैनी घर की नींव हिलने लगी है दीवारों पर दरारें उभर आई हैं

रात में उनसे पुरखों का रुदन बहता है

मां मुझे सीने से लगाती है उसकी हड्डियों से भी बहता है रुदन

पिता रोते हैं, मां रोती है फ़ोन पर बहनें रोती हैं

कैसा हतभाग्य पुत्र हूं, असफल भाई

मैं पत्नी की देह में खोजता हूं शरण

उसके ठंडे स्तन और बेबस होंठ

क़ायनात जब एक विस्मृति में बदलने को होती है

मुझे सुनाई पड़ती हैं उसकी सिसकियां

पिता मुझे बचाना चाहते हैं मां मुझे बचाना चाहती है

बहनें मुझे बचाना चाहती हैं धूप, हवा और पानी मुझे बचाना चाहते हैं

एक दोस्त की तरह चांद बचाना चाहता है मुझे

कि हम यूं ही रातों को घूमते रहें

कितने लोग बचाना चाहते हैं मुझे

यही मेरी ताक़त है यही डर है मेरा.

इस तरह आधी रात

कभी न बैठा था खुले आंगन में

पहाड़ों के साये दिखाई दे रहे हैं नदी का शोर सुनाई पड़ रहा है

मेरी आंखों में आत्मा तक नींद नहीं

देखता हूं एक टूटा तारा

कहते हैं उसका दिखना मुरादें पूरी करता है

क्या मांगूं इस तारे से

नौकरी!

दुनिया में क्या इस से दुर्लभ कुछ नहीं

मैं पिता के लिये आरोग्य मांगता हूं

मां के लिये सीने में थोड़ी ठंडक

बहनों के लिये मांगता हूं सुखी गृहस्थी

दुनिया में कोई दूसरा हो मेरे जैसा

ओ टूटे तारे

उसे बख़्श देना तू

नौकरी!

सितारो

मुझे माफ़ कर देना

तुम्हारी झिलमिलाहट में सिहर न सका

पहाड़ो

माफ़ करना

मुझे सिर उठा कर जीना न आया

पुरखो

मुझ पर ख़त्म होता है तुम्हारा वंश

मेरे जाने का वक़्त हुआ जाता है

मैं खुश हूं कि कोई दुश्मन नहीं मेरा

मुझ नाकारा के पास हैं उदार माता-पिता

इस उम्र में भी पालते-पोसते मुझे

मेरी चिन्ता में ख़ाक होते हुए

वे मर चुके होते तो

ज़िन्दगी कुछ आसान होती.

मैं क्यों चाहूंगा इस तरह मरना

राष्ट्रपति की रैली में सरेआम ज़हर पी कर

राष्ट्रपति मेरे पिता नहीं

राष्ट्रपति मेरी मां नहीं

वे मुझे बचाने नहीं आएंगे.

मैं जानता हूं मैं खोखला हो रहा हूं

खोखली मेरी हंसी

मेरा गुस्सा और प्यार

एक रैली में किसी ने कहा मुझे

उठा लें हथियार

मरना ही है तो लड़ कर मरें

मैं किसके ख़िलाफ़ उठाऊं हथियार

सड़क चलते आदमी ने कुछ नहीं बिगाड़ा मेरा

इस देश में कोई एक अत्याचारी नहीं

दूसरॊं का हक़ छीननए वाले कई हैं

मैं माफ़ ही कर सकता हूं सबको

इतना ही ताक़त बची है अब.

इस साल वसन्त में मेरी बेटी दो बरस की हो जाएगी

ख़ुशी आएगी हमारे घर में भी वसन्त में हम मनाएंगे

विवाह की तीसरी सालगिरह

मेरी बहन ने नौकरी के लिए की है किसी से बात

वसन्त तक मिलेगा जवाब

वसन्त आने में

एक जन्म का फ़ासला है.

उम्मीदो

शुक्रिया तुम्हारा तुम्हीं रोटी बनीं तुम्हीं नमक

ग़रीबी

तुमने मुझे रोटी और नमक बांटना सिखाया

आवारा कुत्तो

पूरी दुनिया जब दूसरे छोर पर थी इस छोर पर तुम थे मेरे साथ

बेघर

शाम के धुंधलके में

भोर का स्वागत करते हुए.

१०

मेरे काले घुंघराले बाल सफ़ेद पड़ने लगे हैं

कम हंसता हूं बहुत कम बोलता हूं

मुझे उच्च रक्तचाप की शिकायत रहने लगी है

अकेले में घबरा उठता हूं बेतरह

मेरे पास फट चुके जूते हैं

फटी देह और आत्मा

सूरज बुझ चुका है

गहराता अंधेरा है आंखों में

गहरा और गहरा और गहरा

और गहरा

मैं आसमान में सितारे की तरह चमकना चाहता हूं.

Tuesday, January 15, 2008

पांडुलिपियाँ

(कविता के बारे में कुछ सवाल। क्या कविता निजी होनी चाहिए या फिर सार्वजनिक? अगर ये एक निजी अनुभव है तो इसे सार्वजनिक क्यों बनाया जाये और अगर यह सर्व जन के लिए है तो कविता लिखने वाला (कवि नही, कविता लिखने वाला) इसे निजी उपक्रम क्यों माने? क्या कविता निजता में नही उपजती? जनगीत या प्रयाण गीत समाज की उथल पुथल के बीच से निकलते हैं मगर क्या कविता के बारे में भी यही बात कही जा सकती है? क्या वह हमेशा सर्वजन के लिए होनी चाहिए? विचार को ही लें। कुछ विचार नितांत निजी होते हैं, उसी तरह कविता भी नितांत निजी अनुभव क्यों नही होना चाहिए? यह सब लिख चुकने के बाद पंडा के उलाहने और दिपुली के उकसावे के जवाब में यह एकालाप:)

सहयात्रियों के साथ
बढ़ता था उस दिशा में जहाँ
सड़क अंतत:एक स्वप्न बन जाती है,
एक अनिश्चित अफ़वाह
या फिर एक अस्फुट,अर्थहीन मंत्र

देवताओं को तलाशता था
पेड़ों के तनों और
सूखी झाड़ियों के भीतर
पुरानी रंगीन थिगलियों को
हाथों में उठाए अचरज से सोचता
उनके निहितार्थ क्या रहे होंगे?

लकड़ी के प्राचीन बक्सों को खोलकर
कोई किवाड़,कोई कुंडी ढूँढता था
जहाँ किसी ने
सृष्टि के आरम्भ से अब तक
दस्तक न दी हो

एक कच्चा-सा विश्वास था मेरे भीतर
कि पुरानी पांडुलिपियों के नीचे
अवश्य दबा रहता होगा
किसी गुप्त सुरंग का प्रवेश द्वार
जहाँ से नदियों तक पहुँचा जा सकता हो

समय के प्रारम्भ में
लिखकर रख दिया था उन्हें
लगभग हर प्रवेश द्वार के आगे
उन्हें कोई छूता नहीं था
वे समय के अंत तक वहाँ रहीं
वृद्ध द्वारपालों की तरह

(लंदन,2001. नवंबर या दिसंबर में कभी)

Monday, December 10, 2007

बाबा त्रिलोचन:धरती का कवि अनंत में


बाबा नहीं रहे।

हम सबके बाबा त्रिलोचन २० अगस्त १९१७ को चिरानी पट्टी, सुल्तानपुर में जन्मे और ९ दिसम्बर २००७ को दिल्ली में अनंत यात्रा पर चले गए। इस कवि, लेखक, कोष निर्माता और संपादक का जीवन और साहित्य विविध और विपुल है। अपने अन्तिम वर्षों वे लगभग भुला से दिए गए थे।हिन्दी साहित्य और हिन्दी भाषी समाज का यह कमीनापन , यह क्रूरता नयी बात नहीं है।


'कबाड़खाना ' बाबा त्रिलोचन को याद करते हुए कृतज्ञता पूर्वक यह भी याद कर रह है कि १९९२ में अशोक पांडे के कविता संग्रह 'देखता हूँ सपने' का विमोचन उन्होंने ही किया था। शमशेर, नागार्जुन,केदार के बाद हिन्दी का यह बड़ा स्तंभ ढहा है। नमन।

बाबा की एक कविता:

परिचय की गाँठ


यूं ही कुछ मुस्काकर तुमने
परिचय की वो गांठ लगा दी!

था पथ पर मैं भूला भूला
फूल उपेक्षित कोई फूला

जाने कौन लहर ती उस दिन

तुमने अपनी याद जगा दी।


कभी कभी यूं हो जाता है
गीत कहीं कोई गाता है

गूंज किसी उर में उठती है

तुमने वही धार उमगा दी।


जड़ता है जीवन की पीड़ा
निस्-तरंग पाषाणी क्रीड़ा
तुमने अन्जाने वह पीड़ा
छवि के शर से दूर भगा दी।

(बाबा का फोटो इरफान कबाड़ी के संग्रह से साभार)

Thursday, December 6, 2007

६ दिसम्बर को याद करते हुए राही मासूम रज़ा की एक कविता








लेकिन मेरा लावारिस दिल

राही मासूम रज़ा

मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी

मंदिर राम का निकला

लेकिन मेरा लावारिस दिल
अब जिस की जंबील में कोई ख्वाब
कोई ताबीर नहीं है
मुस्तकबिल की रोशन रोशन
एक भी तस्वीर नहीं है
बोल ए इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल
ये लावारिस, ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल
आख़िर किसके नाम का निकला
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
बन्दा किसके काम का निकला
ये मेरा दिल है
या मेरे ख़्वाबों का मकतल
चारों तरफ बस खून और आंसू, चीखें, शोले
घायल गुड़िया
खुली हुई मुर्दा आंखों से कुछ दरवाजे
खून में लिथड़े कमसिन कुरते
एक पाँव की ज़ख्मी चप्पल
जगह जगह से मसकी साडी
शर्मिन्दा नंगी शलवारें
दीवारों से चिपकी बिंदी
सहमी चूड़ी
दरवाजों की ओट में आवेजों की कबरें
ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत
ए श्रीराम, रघुपति राघव, ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम
ये आपकी दौलत आप सम्हालें
मैं बेबस हूँ
आग और खून के इस दलदल में
मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।
* इसे भी देखें : http://mohalla.blogspot.com/2007/12/blog-post_8635.html

Tuesday, December 4, 2007

नंदीग्राम और तसलीमा पर लीलाधर जगूड़ी की एक छोटी कविता



विचारधारा की तरह
कहीं कहीं बची है चोटियों पर बर्फ



पर ठंड की तानाशाही
विचारधारा के बिना भी कायम है।



(यह एक अप्रकाशित रचना है। लीलाधर जगूड़ी जी का फोटो हमारे कबाड़ी फोटूकार मित्र रोहित उमराव का है)

Tuesday, November 27, 2007

वाम वाम वाम दिशा

वाम वाम वाम दिशा

शमशेर बहादुर सिंह


वाम वाम वाम दिशा,
समय साम्यवादी।
पृष्ठभूमि का विरोध अन्धकार-लीन। व्यक्ति ...
कुहास्पष्ट ह्रदय - भार, आज हीन।
हीनभाव, हीनभाव
मध्यवर्ग का समाज, दीन।


किन्तु उधर
पथ-प्रदर्शिका मशाल
कमकर की मुट्ठी में - किन्तु उधर:
आगे आगे जलती चलती है
लाल-लाल
वज्र- कठिन कमकर की मुट्ठी में
पथ-प्रदर्शिका मशाल।

भारत का
भूत-वर्तमान औ भविष्य का वितान लिए
काल- मान- विज्ञ मार्क्स-मान में तुला हुआ
वाम वाम वाम दिशा,
समय : साम्यवादी।

अंग - अंग एकनिष्ठ
ध्येय - धीर
सेनानी

वीर युवक
अति बलिष्ठ
वामपन्थगामी वह ...
समय: साम्यवादी।

लोकतंत्र-पूत वह
दूत, मौन, कर्मनिष्ठ
जनता का:
एकता-समन्वय वह ...
मुक्ति का धनंजय वह
चिरविजयी वय में वह
ध्येय-धीर
सेनानी

अविराम
वाम-पक्षवादी है ...
समय : साम्यवादी।