Wednesday, January 30, 2008

मैदान में आइये, जन सेवक जी !!

(भाषा पर कबाड़ खाने में चल रही बहस में बार बार ये अनाम बन्धु कुछ कुछ कहने कि कोशिश करते हैं. समझना मुश्किल है कि वो अनाम क्यों रहना चाहते हैं. खैर, उनकी मरजी. अजित वडनेरकर की टिप्पणी पढ़ कर लगा जन सेवक महाशय की बात खुले मैदान में आनी चाहिए. इसलिए इसी स्वतंत्र पोस्ट के तौर पर लगा रहा हूँ. प्रार्थना जन सेवक जी से यह है कि अगर आपको लगता है कि आप कोई अपराध नहीं कर रहे हैं तो ध्यान रखियेगा कि नाम छुपाने से पाठकों को चिढ़ हो सकती है.)

अशोक पांडे जी,

अच्छा तो आपको ग्रामर की सही स्पैलिंग आती है. आपने मेरी टिप्पणी में हिंदी वर्तनी की गलतियों पर ध्यान क्यों नहीं दिया?

यही वो गूढ़ प्रश्न है जिसका उत्तर जाने बिना भाषा पर चलने वाली सभी बहसें बेमानी साबित होंगी.

आपने 'सच्ची मुची' को दुरस्त करते हुए सच्ची मुच्ची नहीं लिखा. आपने सिर्फ ग्रामर की स्पैलिंग गलत होने पर ही जोर दिया.

देखा जाए तो बात बहुत छोटी है लेकिन विश्लेषण करेंगे तो असली बात निकल आएगी.

मैं तो आपके बारे में नहीं जानता, लेकिन ऐसा लगता है कि आपके गाँव में अंग्रेजी का अब भी हव्वा है और थोड़ा बहुत अंग्रेजी जानने वाले आप अकेले व्यक्ति वहाँ हैं. आपको अच्छा भी लगता होगा कि गाँव के बच्चे कहते हैं कि देखो अशोक भाईसाहब को अंग्रेजी भी आती है.

बात यही है. यही मूल मंत्र है. समस्या की जड़ यही है, जिस पर मैं आप सबका ध्यान कब से खींचने की कोशिश कर रहा हूँ. अब जो मैं लिखने जा रहा हूँ उस बात पर कृपया ध्यान देना अशोक पांडे जी और अगर हो सके तो दिलीप मंडल भाई भी.

1- जब हम गलत हिंदी लिखते या बोलते हैं तो उसे कूल समझा जाता है.
2- जो भाषा के भ्रष्ट इस्तेमाल की ओर ध्यान खींचता है उसे कूपमंडूक और विघ्नसंतोषी बताया जाता है.
3- कहा जाता है कि भाषा तो बहता पानी है, उसे शुद्ध बनाने वाले ही भाषा के दुश्मन हैं.
4- मेरी जिस चलताऊ टिप्पणी में आपने ग्रामर की स्पैलिंग गलत होने की बात कही है उसीमें हिंदी के छह शब्दों की स्पैलिंग भ्रष्ट है. लेकिन आपने उधर ध्यान नहीं दिया.
5- धयान इसलिए नहीं दिया क्योंकि हिंदी की गलतियाँ हैं ना यार. सब चलता है. हिंदी तो अभी आकार ग्रहण कर ही रही है. ये सब तो होगा.
6- गलती अंग्रेजी में नहीं होनी चाहिए क्योंकिः
अ) वह साहबों की भाषा है, ब) वह पढ़े लिखों की भाषा है, स) अंग्रेजी में गलती वही करता है जो अनपढ़ या पिछड़ा होता है, जो अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में नहीं पढ़ा होता है, अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में इसलिए नहीं पढ़ा होता क्योंकि उसके माता पिता गरीब होते हैं.
7- अंग्रेजी के किसी उपसंपादक से पूछिए कि गलत भाषा का इस्तेमाल करने वाले को किस नजर से देखा जाता है.
8- हिंदी लिखने वाले को बाकायदा समझाया जाता है (और समझाने वाले अब वही लोग हैं जिनके माता पिता गरीब थे और उन्हें कॉन्वेंट नहीं भेज सके) कि गलत लिखो, गलत बोलो. इसे बौद्धिक जामा पहनाने के लिए कहा जाता है -- सड़क की भाषा बोलो यार.

मेरा नतीजाः मैं समझता हूँ कि हिंदी बरतने वाले एक तो अंग्रेजी के भौकाल से निकलें. हिंदी को लेकर हीनग्रंथि न रखें और ये भी न समझें कि अगर उन्हें अंग्रेजी आती है तो वो साहब हो गए या फिर साहब जैसे हो गए.

कोई गलतफहमी न हो इसलिए जोर देकर कहना चाहता हूँ कि -- अंग्रेजी सीखें. जरूर सीखें और साहित्यिक अंग्रेजी सीखें. लेकिन हिंदी में बेबात अंग्रेजी सिर्फ ज्ञान बघारने के लिए न डालें, जरूरत हो तभी डालें.

आप सभी बहुत विद्वान लोग हैं. उम्मीद रखता हूँ कि मेरी इस टिप्पणी को निजी हमला नहीं माना जाएगा. उम्मीद तो ये भी करता हूँ कि कबाड़खाने का कोई सदस्य इसे बाकायदा एक स्वतंत्र पोस्ट की तरह प्रकाशित भी करेगा.

लेकिन साहब, आपका ब्लॉग. आप मालिक हैं.

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पोस्ट में मेरी टिप्पणी का ज़िक्र है इसलिए लिख रह हूँ.

Apparently हिन्दी में एक saying है.. सब धान बाईस पसेरी.. आप ने वाही कर दिया.... दिलीप कुमार को happy birth day कहने पर objection raise करने वाला में ही था. लेकिन आपने मुझे उन लोगों के rank में put कर दिया जो language fanatic हैं. what I mean is that यार तुसी समझते हो न की this hindi fundamentalism is you know चलने वाला नही है. you are right... language को river के माफिक flow करने देना चाहिए... but you know... पुराने type की thinking hold करने वाले एकदम stupid बात करते हैं. After all हिन्दी को इस globalised world में survive करना है या नही?

Dilip, you are a genius. नही सच्ची मुची... jokes apart. Oh, by the way, who cares about लिंग भेद यार. as long as आप अपनी बात explain कर सकते हैं... किसे फुरसत है without any reason हिन्दी के grammer का रोना रोये... I mean, you know... why bother !!

And believe me you, में ख़ुद यही मानता हूँ, अगर हमारे आपके जैसे लोग language को open up .... your know.. open up नही करेंगे, ताब तक these hindi walas will not learn.

Keep it up, buddy.

9 comments:

Ashok Pande said...

धन्यवाद जोशी जी! मैं खुद यह नेक कार्य करने वाला था कि आप ने इनायत कर दी. मैं तो इन जनसेवक जी को बाकायदा कबाड़खाने की सदस्यता देने का प्रस्ताव देना चाहता हूं. कबाड़ख़ाने में कोई मालिक या नौकर नहीं होता. अगर उन के पास कुछ उम्दा कबाड़ है तो वे बाकायदा यहां प्रस्तुत करें. हिन्दी ही नहीं बेहतर भाषा कबाड़खाने का सरोकार है. मुझे बचपन से मेरे पिताजी सलाह दिया करते थे कि चाहे सवाल का जवाब ग़लत हो जाए, जवाब की भाषा ग़लत नहीं होनी चाहिए. मुझे खराब हिन्दी सुनकर उतना ही बुरा लगता है जितना खराब अंग्रेज़ी सुनकर या अपनी कुमाऊंनी को खराब सुनकर. और हां, मेरे हिन्दी के गुरुजी श्री बसन्त कुमार भट्ट जी कहा करते थे कि जो भी एक भाषा का आदर करता है, उसे किसी भी भाषा को सीखने में दिक्कत नहीं होती. आ जाइए जन सेवक जी, कबाड़ख़ाने में अभी बहुत जगह है. सच्ची मुच्ची.

Mired Mirage said...

अनाम जी की टिप्पणी से बहुत हद तक सहमत हूँ । वैसे लगता है राजेश जोशी जी ने अपनी टिप्पणी मजाक में लिखी है । And believe me you, से लगता है शायद नैनी के नामी स्कूल में पढ़े हैं ।

घुघूती बासूती

Ashok Pande said...

घुघूती जी, वह अंग्रेज़ी राजेश जोशी की लिखी नहीं है जिसे पढ़ कर आपको नैनी (Should I presume that you mean Nainital) किसी नामी स्कूल की झलक मिली. वह अंग्रेज़ी जनसेवक जी द्वारा हमारे दो कौड़ी के कबाड़ख़ाने में दिलीप मंडल की एक पोस्ट पर पर चलताऊ टिप्पणी (वही ऐसा बताते हैं) में प्रयोग में लाई गई थी. जहां तक राजेश जोशी का सवाल है, इस पोस्ट की मात्र शुरुआती पंक्तियां उनकी लिखी हुई हैं. राजेश जोशी फ़िलहाल बीबीसी लन्दन में कार्यरत हैं. उनकी पढ़ाई नैनीताल के किसी नामी स्कूल में नहीं, निखालिस पहाड़ियों की बसासत वाले भाबर के गांव गौलापार में हुई थी. उन्हें अंग्रेज़ी भी आती है, हिन्दी भी और शानदार कुमाऊंनी भी.

संजय बेंगाणी said...

धयान = ध्यान

Mired Mirage said...

जानकारी के लिए धन्यवाद ।
घुघूती बासूती

अभय तिवारी said...

क्या भौकाल बनाया है.. भाई भौकाल शब्द बड़े रोज़ बात सुना (पढ़ा).. आनन्द आ गया.. और इसी आनन्द ने टिपियाने पर मजबूर कर दिया..
जनसेवक को कोई नया खिलाड़ी न समझे.. पुराने साथी हैं जब कोई बात उनको खल जाती है तो अपनी बेबाक राय से हमें ज़रूर अवगत कराते हैं..

munish said...

sama baandh diya ap logo ne! i am not involved in this discussion 'cos pronunciation is related to my bread n butter and i can't afford to take it for granted. if u ever notice me uttering wrong hindi n urdu pls. chk me always n i'll be obliged.so far angrezi is concerned i think accent enhances its beauty as itz a global lingua franca!

Jan Sevak said...

Dear Abhay,

I think you understand what I mean when I write a comment or react to a post. Not because you have said sweet things about me but because the way you took my comments on your Farsi. I remember having commented on your Farsi and I still regret that you have stopped practicing this language.

However, this debate on the changing face of Hindi is getting interesting by the minute.

Aap bhi kuch likhenge to achha lagega.

anil yadav said...

अपना सेवक मामूली पढ़ा-लिखा नहीं पूरा मिडिल पास है। अब भी सपनों में वह लालटेन जला के बैठता है और उसे इंग्लिस मात्तर के बेंत पड़ते हैं।