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Tuesday, July 28, 2009

प्रचण्ड और भारतीय अख़बारों का सुर

मुद्दा थोड़ा पुराना ज़रूर है मगर अप्रासंगिक नहीं. इसीलिए कबाड़ख़ाने के पाठकों के लिए यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है. नेपाल में जिन परिस्थितियों में कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहाल 'प्रचण्ड' ने इस्तीफ़ा दिया उससे एक बड़ी बहस शुरू हुई. यहाँ आनंद स्वरूप वर्मा नेपाल में माओवादियों की सफलता या असफलता की बजाए आपका ध्यान दिल्ली के हिंदी अख़बार और उनके संपादकों की विद्वता की ओर खींचना चाह रहे हैं. पढ़ा जाए.

नेपाल की घटनाओं पर भारतीय मीडिया का रुख अत्यंत शर्मनाक और हास्यास्पद रहा. अखबारों और खास तौर पर हिन्दी अखबारों की संपादकीय टिप्पणियों को देखकर हैरानी होती है और विश्वास नहीं होता कि इतने साहस के साथ कोई कैसे अपनी अज्ञानता को जनता तक पहुंचाता है. आम तौर पर इन टिप्पणियों में यह कहा गया कि प्रचण्ड अपनी जनमुक्ति सेना के ‘लड़ाकुओं’ को नेपाली सेना में भर्ती कराना चाहते थे जिसे कटवाल ने मना किया और फिर प्रचण्ड ने उन्हें बर्खास्त कर दिया.

जाहिर है कि अगर किसी पाठक को यह बात बतायी जा रही हो तो वह कटवाल के पक्ष में खड़ा होगा और प्रचण्ड की इस बात के लिए भर्त्सना करेगा. उसे राष्ट्रपति द्वारा उठाया गया कदम भी अत्यंत तर्कसंगत और न्यायोचित लगेगा. इन संपादकों ने यह बताने की जरूरत नहीं महसूस की कि जनमुक्ति सेना के सैनिकों को राष्ट्रीय सेना में शामिल किए जाने का मामला प्रचण्ड अथवा उनकी पार्टी नेकपा (माओवादी) का मामला नहीं है बल्कि यह नवंबर 2006 में सम्पन्न उस विस्तृत शांति समझौते का महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसके आधार पर राजनीतिक घटनाक्रमों का क्रमश: विकास होता गया.

कहने का अर्थ यह कि शांति प्रक्रिया का यह एक महत्वपूर्ण अवयव है. इन संपादकों ने यह भी बताने की जरूरत नहीं महसूस की कि माओवादियों और सरकार के बीच हुए इस शांति समझौते में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि न तो माओवादी और न सरकार तब तक अपनी सेनाओं में कोई नयी भर्ती नहीं करेंगे, जब तक दोनों सेनाओं का एकीकरण नहीं हो जाता. इसका उल्लंघन करते हुए कटवाल ने नेपाली सेना में 3000 लोगों की भर्ती की. दोनों सेनाओं की मॉनिटरिंग करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘अनमिन’ (यूनाइटेड नेशन्स मिशन इन नेपाल) ने प्रधानमंत्री को लिखा कि सेना में नयी भर्तियों को वह रोकें. प्रधानमंत्री ने अपने रक्षामंत्री के माध्यम से कटवाल को इस आशय का निर्देश दिया जिसे मानने से उसने साफ तौर पर मना कर दिया. इस तरह की 5-6 घटनाएं हुई जहां कटवाल ने सरकारी आदेशों की अवहेलना की.

सबसे मूर्खतापूर्ण संपादकीय ‘जनसत्ता’ में देखने को मिला. इसमें बताया गया था कि चूंकि प्रचंड अपने ‘हथियारबंद दस्ते के लोगों’को सेना में शामिल नहीं करा सके इसलिए उन्होंने कटवाल को बर्खास्त कर दिया. इसमें आगे कहा गया है कि “सेना का स्वरूप अपनी मर्जी के मुताबिक ढालने की उनकी जिद को स्वीकार नहीं किया जा सकता था. वरना कल वे यह भी कहते कि वे जो ‘जन अदालतें’ चलाते थे उनके‘न्यायाधीशों’को न्यायपालिका में जगह मिले. राज्यतंत्र के अपने उसूल, नियम और तकाजे होते हैं. कोई पार्टी या सरकार जब इनकी अनदेखी करती है तो निरंकुशता का खतरा पैदा होता है.”

‘दैनिक हिन्दुस्तान’ ने 5 मई 2009 को इस घटना पर जो संपादकीय लिखा उसका शीर्षक था– ‘प्रचंड अराजकता’. इसमें उसने लिखा – “... इस घटनाक्रम ने यह जता दिया है कि गुरिल्ला लड़ाई के लिए अपनाये गये ‘प्रचंड’ उपनाम छोड़कर सौम्य जननायक बनने की उनकी कोशिश दिखावटी थी और चीन व माओवादी दबावों के चलते वे नेपाल को सही नेतृत्व दे पाने में नाकाम रहे हैं. हिंसा और अधकचरी राजनीतिक शिक्षा के साथ महज 20 साल में माओवादी क्रान्ति की महत्वपूर्ण मंजिल पा लेने का भ्रम उन्हें अपने देश और अड़ोस पड़ोस की जमीनी हकीकत समझने नहीं दे रहा था. वे हर कीमत पर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सदस्यों को सेना में भर्ती करने पर आमादा थे.” संपादकीय में यह तो स्वीकार किया गया है कि युद्ध विराम समझौते में दोनों सेनाओं का एकीकरण शामिल था और सेनाध्यक्ष इन बातों को मानने के लिए तैयार नहीं थे. बावजूद इसके सेनाध्यक्ष की बर्खास्तगी को संपादक ने प्रचंड की ‘अराजकता’ घोषित किया.

नेपाल के संदर्भ में काफी विचार विमर्श के बाद वहां की सरकार ने और सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर माओवादियों के साथ यह समझौता किया कि दोनों सेनाओं का एकीकरण किया जाएगा.


‘दैनिक जागरण’ ने लिखा कि “कोई भी सेनाध्यक्ष यह स्वीकार नहीं करेगा कि कल तक हिंसा और उपद्रव का खेल खेल रहे लोग सेना का अंग बन जायं.”

‘दैनिक भास्कर’ ने भी माना है कि “सेनाध्यक्ष ने इसका ठीक ही विरोध किया क्योंकि यह सेना के राजनीतिकरण की निकृष्ट कोशिश थी.”

जाहिर है कि इस संपादक को भी जानकारी नहीं है कि सेनाध्यक्ष जिस बात को मानने से इनकार कर रहे थे वह एक राजनैतिक फैसला था और शांति समझौते का महत्वपूर्ण हिस्सा था. ‘राष्ट्रीय सहारा’ का मानना है कि सेना में जनमुक्ति सेना के जवानों को समायोजित कराने के जरिये प्रचंड “अपना राजनीतिक लक्ष्य साध्ने” की उम्मीद कर रहे थे. इसके बाद संपादक ने एक चेतावनी दी है-“प्रचंड सहित सभी माओवादियों को यह समझना चाहिए कि लोकशाही में और वह भी मिली जुली सरकार में अपनी इच्छा लादना संभव नहीं और यह लोकशाही के सिद्धांतों के भी विपरीत है”.

5 मई को ही ‘आज समाज’ के संपादक मधुकर उपाध्याय का ‘नेपाल फिर बेहाल’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने लिखा कि- “... सत्तारूढ़ गठबंधन के घटक दलों के विरोध के बावजूद दहाल ने अपनी पार्टी के कहने पर सेनाध्यक्ष के नाम यह आदेश जारी कर दिया कि पूर्व माओवादी लड़ाकों को सेना में भर्ती दी जाय. सेनाध्यक्ष ने, जाहिर है, इससे इनकार कर दिया और उसकी प्रतिक्रिया में दहाल ने उन्हें पद से हटा दिया...”. इसके आगे मधुकर जी ने बताया है कि किस तरह दुनिया में कहीं भी लड़ाई खत्म होने के बाद लड़ाकुओं को सेना में नहीं लिया जाता है. उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिंद फौज का भी उदाहरण दिया, जिसके सैनिकों को भारतीय सेना में नहीं शामिल किया गया. अब लेखक से कोई यह पूछे कि आपको इतना रिसर्च करने की जरूरत क्यों पड़ रही है. नेपाल के संदर्भ में काफी विचार विमर्श के बाद वहां की सरकार ने और सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर माओवादियों के साथ यह समझौता किया कि दोनों सेनाओं का एकीकरण किया जाएगा. जाहिर है कि लेखक को न तो इन समझौतों की जानकारी है और न नेपाल में दो सेनाओं के अस्तित्व की संवेदनशीलता से वह वाकिफ हैं.

‘नवभारत टाइम्स’ में संपादकीय टिप्पणी लिखने वाले को यह तो जानकारी थी कि शांति समझौते के तहत विभिन्न राजनीतिक दलों ने इस शर्त को मान लिया था. इसमें यह भी लिखा गया है कि कटवाल पहले की तरह अपने लिए ‘विशिष्ट अधिकार’ चाहते थे और 'इसके लिए उन्होंने सरकार से टकराव लेने में भी गुरेज नहीं किया. यह एकमात्र ऐसा संपादकीय है जिसमें स्वीकार किया गया है कि “ कटवाल की आड़ में राष्ट्रपति और सारे राजनीतिक दलों ने माओवादियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.”

अधिकांश लापरवाह संपादकों के मुकाबले कुछ ने समस्या को गंभीरता से देखने और उसकी पृष्ठभूमि के अधययन का प्रयास किया है. ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के 5 मई 2009 के संपादकीय के इस अंश को देखें-“...हालांकि माओवादियों को इस बात के लिए दोष दिया जा सकता है कि उन्होंने जल्दबाजी में और एकतरफा ढंग से काम किया लेकिन जनरल कटवाल ने आम तौर पर नागरिक नियंत्रण तथा खास तौर पर शांति प्रक्रिया के संदर्भ में जिस गैर जनतांत्रिक रवैये का प्रदर्शन किया, वह रवैया इस संकट की जड़ में है... जिस समय राजा ज्ञानेन्द्र के खिलाफ संघर्ष अपने चरम पर था सभी राजनीतिक दलों ने सैद्धांतिक तौर पर यह स्वीकार किया कि जनमुक्ति सेना को एक सुधारी और जनतांत्रिक बनायी गयी राष्ट्रीय सेना में मिला दिया जाए. लेकिन अब, जबकि गणराज्य की स्थापना हो चुकी है और नेपाल के संविधान के बनाए जाने का काम आगे बढ़ रहा है, नेपाली कांग्रेस और यहां तक कि नेकपा (एमाले) इस मुद्दे पर पीछे हटने लगी हैं. लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान जनरल कटवाल के रुख से हुआ है.”

इसी संपादकीय में उन घटनाओं का जिक्र है जब जनरल कटवाल ने लगातार सरकारी आदेशों का उल्लंघन किया. संपादकीय ने लिखा कि “कोई भी जनतांत्रिक व्यवस्था सेना प्रमुख की इस अनुशासनहीनता को बर्दाश्त नहीं कर सकती.” इसमें इस खतरे की तरफ भी इशारा किया गया कि शांति प्रक्रिया धवस्त हो सकती है. संपादकीय ने आगे लिखा- “...एमाले और नेपाली कांग्रेस के नेता माओवादियों का विरोध करने के नाम पर इतने अंधे हो गए हैं कि उन्होंने राष्ट्रपति यादव के कृत्य की प्रशंसा की जिसने नेपाल के नवजात जनतंत्र में नागरिक-सैनिक संबंधों के लिए एक खतरनाक नजीर की शुरुआत की है.”

‘दि एशियन एज’ भी अपनी अज्ञानता का परिचय देते हुए वही राग अलापता हुआ नजर आता है जो अधिकांश हिंदी अखबारों के संपादक अलापते रहे हैं. इसने राष्ट्रपति के कदम की इसलिए सराहना की है “ क्योंकि एक सिद्धांत में मजे 20 हजार माओवादियों के सेना में प्रवेश से इस संस्था के अस्थिर होने का खतरा था.”

Tuesday, April 22, 2008

चंद्रकांत देवताले

अशोक ने पिछले दिनों देवताले जी की एक कविता लगाई थी जो माँ के बारे में थी - मैं बेटी के बारे में लिखी एक कविता लगा रहा हूँ !

प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता !

तुम्हारी निश्चल आंखें
चमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश में

प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता
ईथर की तरह होता है
जरूर दिखायी देती होंगी नसीहतें
नुकीले पत्थरों -सी

दुनिया भर के पिताओं की लम्बी कतार में
पता नहीं कौन-सा कितना करोड़वां नम्बर है मेरा
पर बच्चों के फूलोंवाले बगीचे की दुनिया में तुम अव्वल हो
पहली कतार में मेरे लिए

मुझे माफ करना
मैं अपनी मूर्खता और प्रेम में समझा था
मेरी छाया के तले ही
सुरक्षित रंग-बिरंगी दुनिया होगी
तुम्हारी

अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गई हो
मैं खुश हूं सोचकर
कि मेरी भाषा के अहाते से परे है तुम्हारी परछाई !

प्रेम, गिलहरी और गाय

यह हर किसी के नसीब में नहीं होता कि उसे सुबह सुबह उठा कर उसकी भाषा का कोई बड़ा कवि अपनी नवीनतम कविता का पहला ड्राफ़्ट पढ़ कर सुनाए और इसरार करने पर फ़ोन पर ही लिखा भी दे.

मेरे साथ अभी सुबह सुबह ऐसा ही हुआ.

जब जगूड़ी जी ने ये दो कविताएं मुझे सुनाईं तो मुझे लगा कि यह कवि आयु के साथ साथ और बड़े विषयों की तरफ़ बढ़ रहा है जो हिन्दी में बहुत देखा नहीं जाता. जगूड़ी जी न सिर्फ़ एक कवि के रूप में मेरे पसंदीदा हैं, एक शानदार और खुले-फ़क्कड़ इन्सान के रूप में मैंने उन्हें कभी अपना हमउम्र समझा है, कभी गुरू माना है, कभी बड़ा भाई और कभी पितासदृश. एक सिपाही की मामूली नौकरी से जीवन शुरू करने वाले जगूड़ी जी के अनुभवों का संसार बहुत विस्तृत है और ज्ञान की उनकी कोठरियों तलक बिना सेंध मारे नहीं पहुंचा जा सकता. मैं पिछले कई वर्षों से उनसे एक औपन्यासिक या संस्मरणात्मक गद्य हिन्दी समाज को देने की गुज़ारिश कर चुका हूं.उम्मीद है ऐसा जल्द होगा. आमीन!

कबाड़ख़ाने के पाठक पहले भी जगूड़ी जी को पढ़ चुके हैं. साहित्य अकादमी पुरुस्कार से सम्मानित पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी जी की दो बिल्कुल ताज़ा और अप्रकाशित कविताएं आपके लिए खा़सतौर पर:

1

प्रेम


प्रेम ख़ुद एक भोग है जिसमें प्रेम करने वाले को भोगता है प्रेम
प्रेम ख़ुद एक रोग है जिसमें प्रेम करने वाले रहते हैं बीमार
प्रेम जो सब बंधनों से मुक्त करे, मुश्किल है
प्रेमीजनों को चाहिये कि वे किसी एक ही के प्रेम में गिरफ़्तार न हों
प्रेमी आएं और सबके प्रेम में मुब्तिला हों
नदी में डूबे पत्थर की तरह
वे लहरें नहीं गिनते
चोटें गिनते हैं
और पहले से ज़्यादा चिकने, चमकीले और हल्के हो जाते हैं

प्रेम फ़ालतू का बोझ उतार देता है,
यहां तक कि त्वचा भी.


2


गिलहरी और गाय के बहाने


कौन नहीं जानता ये अलग प्रजातियों के प्राणी हैं
पर एक दूसरे से काम लायक जो समाज बनाया जाता है
यह कोई देवताओं से नहीं बल्कि उनके प्रति मनुष्य की श्रद्धा से सीखे
तो नतीज़े कुछ और निकलेंगे

गिलहरी को मनुष्य पालतू नहीं बना सका या बनाना नहीं चाहता था
क्योंकि वह गाय जैसी दुधारू नहीं हो सकती
अगर होती भी तो आदमी कभी उसे दुह नहीं पाते

लतखोर गाय से लाख गुना चंचल है वह
एकदम पारे जैसी
पर पारे की चंचलता पारे को सिर्फ़ लुढ़का सकती है, छितरा सकती है
पारा अपने पैरों से पेड़ पर उतर-चढ़ नहीं सकता

गाय में भी एक ख़ास गाय है हिमालय की चंवरी गाय
जो संभवतः हूणों और खसों के साथ आई थी
जिसके बछड़े को याक कहते हैं
-दोनों की पूंछ के बनते हैं चंवर

चलते चलते भी याक स्थूल और स्थिर दिखाई देता है
चंचल गिलहरी की चंवर जैसी पूंछ देख कर
मुझे सुस्त चंवरी गाय और मोटा मन्द याक याद आये
- यह समुद्र देख कर हिमालय याद आने की तरह है

एक धरती की विराट जांघों के बीच आलोढ़ित जलाशय है
दूसरा उसके सिर पर चढ़कर जमा हुआ
-नीलाशय में पीठाधीश्वर,
महाशय श्वेताशय - मीठी नदियों का अक्षय स्रोत

जैसे किसी पहाड़ से भी दोगुनी-तिगुनी उसकी पगडंडी होती है
वैसे ख़ुद से दुगुनी-तिगुनी होती है गिलहरी की पूंछ
जिसके चेहरे और पूंछ में से कौन ज़्यादा चंचल है कुछ पता नहीं चलता
चंचल लहरों से बनी नदी का संक्षिप्ततम शरीर है गिलहरी
- पूंछ के अंतिम बाल तक धुली-खिली


मुंह से दुम तक की स्पंदित लहरियों में गिन नहीं पा रहा मैं एक भी लहर
गिलहरी की चंवराई चंचलता
क्या याक की घंटे जैसी लटकी ध्यानस्थ दुम बन सकती है?
जो अपनी पीठ पर बैठनेवाली मक्खियों को
हमेशा वैसे ही उड़ा देती है
जैसे दुनिया के अनर्थों से दूर रखने के लिये
हम उसे भगवानों पर डुलाते हैं

Friday, April 18, 2008

मां पर नहीं लिख सकता कविता

मां पर नहीं लिख सकता कविता

मां के लिए संभव नहीं होगी मुझसे कविता
अमर चिऊंटियों का एक दस्ता
मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है
मां वहां हर रोज़ चुटकी - दो- चुटकी आटा डाल जाती है

मैं जब भी सोचना शुरू करता हूं
यह किस तरह होता होगा
घट्टी पीसने की आवाज़
मुझे घेरने बैठ जाती है
और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनिया में ऊंघने लगता हूं

जब भी कोई मां छिलके उतारकर
चने, मूंगफली या मटर के दाने
नन्हीं हथेलियों पर रख देती है
तब मेरे हाथ अपनी जगह पर
थरथराने लगते हैं

मां ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिये
देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया

मैंने धरती पर कविता लिखी है
चन्द्रमा को गिटार में बदला है
समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूंगा

मां पर नहीं लिख सकता कविता

-चन्द्रकान्त देवताले जी की यह कविता मांओं पर लिखी गई श्रेष्ठतम कविताओं में से एक है : इस पूरे विश्व के साहित्य में: कहीं भी, कभी भी

Wednesday, April 16, 2008

प्रभु मेरी दिव्यता में सुबह-सबेरे ठंड में कांपते रिक्शेवाले की फटी कमीज़ ख़लल डालती है

प्रभु मेरी दिव्यता में
सुबह-सबेरे ठंड में कांपते
रिक्शेवाले की फटी कमीज़ ख़लल डालती है

मुझे दुख होता है यह लिखते हुए
क्योंकि यह कहीं से नहीं हो सकती कविता
उसकी कमीज़ मेरी नींद में सिहरती है
बन जाती है टेबल साफ़ करने का कपड़ा
या घर का पोछा
मैं तब उस महंगी शॉल के बारे में सोचती हूं
जो मैं उसे नहीं दे पाई

प्रभु मुझे मुक्त करो
एक प्रसन्न संसार के लिए
उस ग्लानि से कि मैं महंगी शॉल ओढ़ सकूं
और मेरी नींद रिक्शे पर पड़ी रहे.

'एक और प्रार्थना' शीर्षक यह कविता अनीता वर्मा की है. अनीता वर्मा जी को आप कबाड़ख़ाने में पहले भी पढ़ चुके हैं. विन्सेन्ट वान गॉग पर उनकी कविता भी यहां लगाई जा चुकी है. बहुत हर्ष का विषय है कि सन २००६ का प्रतिष्ठित बनारसीदास भोजपुरी सम्मान उन्हें उनके कविता संग्रह 'एक जन्म में सब' के लिये दिया गया है. ६ अप्रैल को उनके नगर रांची में उन्हें यह सम्मान हिन्दी के वरिष्ठ कवि श्री लीलाधर जगूड़ी़ द्वारा प्रदान किया गया. समारोह में हिन्दी के अनेक नामचीन्ह समकालीन कवि-आलोचक उपस्थित थे. उस अवसर का एक फ़ोटो मुझे कल अनीता जी के सौजन्य से मेल द्वारा प्राप्त हुआ.


इस अवसर पर कबाड़ख़ाना अनीता जी को बधाई प्रेषित करता है. वे दर असल आज की फ़तवेबाज़ और बगूलाभगत दार्शनिकता का पर्याय बन चुकी अधिकतर हिन्दी कविता से इतर बहुत संवेदनशील और सार्थक रचना करने वाले विरल कवियों में हैं. अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा भी कि कविता उनके लिए जीवन की तरह ही पवित्र, सुंदर और निष्कलुष है.

प्रस्तुत है उनकी एक कविता:

यथास्थिति

आप पहाड़ पर रहते हैं तो आ जाएं नीचे
आप ज़मीन पर हैं तो आइए ऊंचाई पर
पहाड़ की सुगंध क्या साथ आई है आपके
या आप उठा लाए हैं पहाड़
ज़मीन की घास पर न रखें पहाड़
उसे रहने दें यूं ही
घास मिट्टी की उजास है
और पहाड़ नदियों का पिता.

(भूलसुधार: ब्लॉगवाणी में प्रदर्शित किया जा रहा पोस्ट का शीर्षक भूल से ग़लत लग गया. कविता में "रिक्शेवाले की फटी कमीज़ " है, "रिक्शेवाले की नींद" नहीं. क्षमा करें. )

Thursday, April 10, 2008

एक बेरोज़गार की कविताएं

सुन्दर चन्द ठाकुर हिन्दी के नामी कवि हैं और कबाड़ख़ाने के कबाड़ियों में शुमार है उनका. यह अलग बात है कि आज तक उन्होंने अपने आलस्य के कारण यहां एक भी पोस्ट नहीं लगाई है. ख़ैर! अभी अभी नया ज्ञानोदय में उनकी कुछ कविताएं आई हैं. इन अच्छी कविताओं के शुरुआती पाठकों में मैं रहा हूं सो उनके आलस्य के बावजूद उनकी कविताएं यहां लगा रहा हूं. आशा है वे जल्द ही ख़ुद अपनी तरफ़ से कबाड़ख़ाने को नवाज़ेंगे.

एक बेरोज़गार की कविताएं

चांद हमारी ओर बढ़ता रहे

अंधेरा भर ले आग़ोश में

तुम्हारी आंखों में तारों की टिमटिमाहट के सिवाय

सारी दुनिया फ़रेब है

नींद में बने रहें पेड़ों में दुबके पक्षी

मैं किसी की ज़िन्दगी में ख़लल नहीं डालना चाहता

यह पहाड़ों की रात है

रात जो मुझसे कोई सवाल नहीं करती

इसे बेख़ुदी की रात बनने दो

सुबह

एक और नाकाम दिन लेकर आयेगी.

कोई दोस्त नहीं मेरा

वे बचपन की तरह अतीत में रह गए

मेरे पिता मेरे दोस्त हो सकते हैं

मगर बुरे दिन नहीं होने देते ऐसा

पुश्तैनी घर की नींव हिलने लगी है दीवारों पर दरारें उभर आई हैं

रात में उनसे पुरखों का रुदन बहता है

मां मुझे सीने से लगाती है उसकी हड्डियों से भी बहता है रुदन

पिता रोते हैं, मां रोती है फ़ोन पर बहनें रोती हैं

कैसा हतभाग्य पुत्र हूं, असफल भाई

मैं पत्नी की देह में खोजता हूं शरण

उसके ठंडे स्तन और बेबस होंठ

क़ायनात जब एक विस्मृति में बदलने को होती है

मुझे सुनाई पड़ती हैं उसकी सिसकियां

पिता मुझे बचाना चाहते हैं मां मुझे बचाना चाहती है

बहनें मुझे बचाना चाहती हैं धूप, हवा और पानी मुझे बचाना चाहते हैं

एक दोस्त की तरह चांद बचाना चाहता है मुझे

कि हम यूं ही रातों को घूमते रहें

कितने लोग बचाना चाहते हैं मुझे

यही मेरी ताक़त है यही डर है मेरा.

इस तरह आधी रात

कभी न बैठा था खुले आंगन में

पहाड़ों के साये दिखाई दे रहे हैं नदी का शोर सुनाई पड़ रहा है

मेरी आंखों में आत्मा तक नींद नहीं

देखता हूं एक टूटा तारा

कहते हैं उसका दिखना मुरादें पूरी करता है

क्या मांगूं इस तारे से

नौकरी!

दुनिया में क्या इस से दुर्लभ कुछ नहीं

मैं पिता के लिये आरोग्य मांगता हूं

मां के लिये सीने में थोड़ी ठंडक

बहनों के लिये मांगता हूं सुखी गृहस्थी

दुनिया में कोई दूसरा हो मेरे जैसा

ओ टूटे तारे

उसे बख़्श देना तू

नौकरी!

सितारो

मुझे माफ़ कर देना

तुम्हारी झिलमिलाहट में सिहर न सका

पहाड़ो

माफ़ करना

मुझे सिर उठा कर जीना न आया

पुरखो

मुझ पर ख़त्म होता है तुम्हारा वंश

मेरे जाने का वक़्त हुआ जाता है

मैं खुश हूं कि कोई दुश्मन नहीं मेरा

मुझ नाकारा के पास हैं उदार माता-पिता

इस उम्र में भी पालते-पोसते मुझे

मेरी चिन्ता में ख़ाक होते हुए

वे मर चुके होते तो

ज़िन्दगी कुछ आसान होती.

मैं क्यों चाहूंगा इस तरह मरना

राष्ट्रपति की रैली में सरेआम ज़हर पी कर

राष्ट्रपति मेरे पिता नहीं

राष्ट्रपति मेरी मां नहीं

वे मुझे बचाने नहीं आएंगे.

मैं जानता हूं मैं खोखला हो रहा हूं

खोखली मेरी हंसी

मेरा गुस्सा और प्यार

एक रैली में किसी ने कहा मुझे

उठा लें हथियार

मरना ही है तो लड़ कर मरें

मैं किसके ख़िलाफ़ उठाऊं हथियार

सड़क चलते आदमी ने कुछ नहीं बिगाड़ा मेरा

इस देश में कोई एक अत्याचारी नहीं

दूसरॊं का हक़ छीननए वाले कई हैं

मैं माफ़ ही कर सकता हूं सबको

इतना ही ताक़त बची है अब.

इस साल वसन्त में मेरी बेटी दो बरस की हो जाएगी

ख़ुशी आएगी हमारे घर में भी वसन्त में हम मनाएंगे

विवाह की तीसरी सालगिरह

मेरी बहन ने नौकरी के लिए की है किसी से बात

वसन्त तक मिलेगा जवाब

वसन्त आने में

एक जन्म का फ़ासला है.

उम्मीदो

शुक्रिया तुम्हारा तुम्हीं रोटी बनीं तुम्हीं नमक

ग़रीबी

तुमने मुझे रोटी और नमक बांटना सिखाया

आवारा कुत्तो

पूरी दुनिया जब दूसरे छोर पर थी इस छोर पर तुम थे मेरे साथ

बेघर

शाम के धुंधलके में

भोर का स्वागत करते हुए.

१०

मेरे काले घुंघराले बाल सफ़ेद पड़ने लगे हैं

कम हंसता हूं बहुत कम बोलता हूं

मुझे उच्च रक्तचाप की शिकायत रहने लगी है

अकेले में घबरा उठता हूं बेतरह

मेरे पास फट चुके जूते हैं

फटी देह और आत्मा

सूरज बुझ चुका है

गहराता अंधेरा है आंखों में

गहरा और गहरा और गहरा

और गहरा

मैं आसमान में सितारे की तरह चमकना चाहता हूं.

Wednesday, January 30, 2008

मैदान में आइये, जन सेवक जी !!

(भाषा पर कबाड़ खाने में चल रही बहस में बार बार ये अनाम बन्धु कुछ कुछ कहने कि कोशिश करते हैं. समझना मुश्किल है कि वो अनाम क्यों रहना चाहते हैं. खैर, उनकी मरजी. अजित वडनेरकर की टिप्पणी पढ़ कर लगा जन सेवक महाशय की बात खुले मैदान में आनी चाहिए. इसलिए इसी स्वतंत्र पोस्ट के तौर पर लगा रहा हूँ. प्रार्थना जन सेवक जी से यह है कि अगर आपको लगता है कि आप कोई अपराध नहीं कर रहे हैं तो ध्यान रखियेगा कि नाम छुपाने से पाठकों को चिढ़ हो सकती है.)

अशोक पांडे जी,

अच्छा तो आपको ग्रामर की सही स्पैलिंग आती है. आपने मेरी टिप्पणी में हिंदी वर्तनी की गलतियों पर ध्यान क्यों नहीं दिया?

यही वो गूढ़ प्रश्न है जिसका उत्तर जाने बिना भाषा पर चलने वाली सभी बहसें बेमानी साबित होंगी.

आपने 'सच्ची मुची' को दुरस्त करते हुए सच्ची मुच्ची नहीं लिखा. आपने सिर्फ ग्रामर की स्पैलिंग गलत होने पर ही जोर दिया.

देखा जाए तो बात बहुत छोटी है लेकिन विश्लेषण करेंगे तो असली बात निकल आएगी.

मैं तो आपके बारे में नहीं जानता, लेकिन ऐसा लगता है कि आपके गाँव में अंग्रेजी का अब भी हव्वा है और थोड़ा बहुत अंग्रेजी जानने वाले आप अकेले व्यक्ति वहाँ हैं. आपको अच्छा भी लगता होगा कि गाँव के बच्चे कहते हैं कि देखो अशोक भाईसाहब को अंग्रेजी भी आती है.

बात यही है. यही मूल मंत्र है. समस्या की जड़ यही है, जिस पर मैं आप सबका ध्यान कब से खींचने की कोशिश कर रहा हूँ. अब जो मैं लिखने जा रहा हूँ उस बात पर कृपया ध्यान देना अशोक पांडे जी और अगर हो सके तो दिलीप मंडल भाई भी.

1- जब हम गलत हिंदी लिखते या बोलते हैं तो उसे कूल समझा जाता है.
2- जो भाषा के भ्रष्ट इस्तेमाल की ओर ध्यान खींचता है उसे कूपमंडूक और विघ्नसंतोषी बताया जाता है.
3- कहा जाता है कि भाषा तो बहता पानी है, उसे शुद्ध बनाने वाले ही भाषा के दुश्मन हैं.
4- मेरी जिस चलताऊ टिप्पणी में आपने ग्रामर की स्पैलिंग गलत होने की बात कही है उसीमें हिंदी के छह शब्दों की स्पैलिंग भ्रष्ट है. लेकिन आपने उधर ध्यान नहीं दिया.
5- धयान इसलिए नहीं दिया क्योंकि हिंदी की गलतियाँ हैं ना यार. सब चलता है. हिंदी तो अभी आकार ग्रहण कर ही रही है. ये सब तो होगा.
6- गलती अंग्रेजी में नहीं होनी चाहिए क्योंकिः
अ) वह साहबों की भाषा है, ब) वह पढ़े लिखों की भाषा है, स) अंग्रेजी में गलती वही करता है जो अनपढ़ या पिछड़ा होता है, जो अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में नहीं पढ़ा होता है, अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में इसलिए नहीं पढ़ा होता क्योंकि उसके माता पिता गरीब होते हैं.
7- अंग्रेजी के किसी उपसंपादक से पूछिए कि गलत भाषा का इस्तेमाल करने वाले को किस नजर से देखा जाता है.
8- हिंदी लिखने वाले को बाकायदा समझाया जाता है (और समझाने वाले अब वही लोग हैं जिनके माता पिता गरीब थे और उन्हें कॉन्वेंट नहीं भेज सके) कि गलत लिखो, गलत बोलो. इसे बौद्धिक जामा पहनाने के लिए कहा जाता है -- सड़क की भाषा बोलो यार.

मेरा नतीजाः मैं समझता हूँ कि हिंदी बरतने वाले एक तो अंग्रेजी के भौकाल से निकलें. हिंदी को लेकर हीनग्रंथि न रखें और ये भी न समझें कि अगर उन्हें अंग्रेजी आती है तो वो साहब हो गए या फिर साहब जैसे हो गए.

कोई गलतफहमी न हो इसलिए जोर देकर कहना चाहता हूँ कि -- अंग्रेजी सीखें. जरूर सीखें और साहित्यिक अंग्रेजी सीखें. लेकिन हिंदी में बेबात अंग्रेजी सिर्फ ज्ञान बघारने के लिए न डालें, जरूरत हो तभी डालें.

आप सभी बहुत विद्वान लोग हैं. उम्मीद रखता हूँ कि मेरी इस टिप्पणी को निजी हमला नहीं माना जाएगा. उम्मीद तो ये भी करता हूँ कि कबाड़खाने का कोई सदस्य इसे बाकायदा एक स्वतंत्र पोस्ट की तरह प्रकाशित भी करेगा.

लेकिन साहब, आपका ब्लॉग. आप मालिक हैं.

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पोस्ट में मेरी टिप्पणी का ज़िक्र है इसलिए लिख रह हूँ.

Apparently हिन्दी में एक saying है.. सब धान बाईस पसेरी.. आप ने वाही कर दिया.... दिलीप कुमार को happy birth day कहने पर objection raise करने वाला में ही था. लेकिन आपने मुझे उन लोगों के rank में put कर दिया जो language fanatic हैं. what I mean is that यार तुसी समझते हो न की this hindi fundamentalism is you know चलने वाला नही है. you are right... language को river के माफिक flow करने देना चाहिए... but you know... पुराने type की thinking hold करने वाले एकदम stupid बात करते हैं. After all हिन्दी को इस globalised world में survive करना है या नही?

Dilip, you are a genius. नही सच्ची मुची... jokes apart. Oh, by the way, who cares about लिंग भेद यार. as long as आप अपनी बात explain कर सकते हैं... किसे फुरसत है without any reason हिन्दी के grammer का रोना रोये... I mean, you know... why bother !!

And believe me you, में ख़ुद यही मानता हूँ, अगर हमारे आपके जैसे लोग language को open up .... your know.. open up नही करेंगे, ताब तक these hindi walas will not learn.

Keep it up, buddy.

Saturday, January 12, 2008

हिन्दी ऐसी क्यों होती जा रही है?


राजकिशोर का ये लेख मैं नेट पर घूमते-घूमते पा गया. सोचा कबाड़ख़ाने में ठेल दिया जाए क्योंकि पिछले दिनों किन्ही अनाम महाशय ने इसी विषय पर कहना-न कहना, सब कह दिया. तब मैंने पंडा से कहा था कि चलो इसी बहाने कुछ बहस ही शुरू हो. आज राजकिशोर के इस लेख में वो नुक्ते हैं जिनपर बात आगे बढ़ाई जा सकती है. शायद. नेटवासियो, धीरज धरो. लेख कुछ अधिक ही विस्तृत बन पड़ा है.)


'प्रिंट मीडिया' को हम 'मुद्रित माध्यम' क्यों नहीं कहते? इस प्रश्न के उत्तर में ही जन माध्यमों में हिंदी भाषा के स्वरूप की पहचान छिपी हुई है। उसकी सार्मथ्य भी और उसकी दुर्बलता भी।

जब कलकत्ता से हिंदी साप्ताहिक 'रविवार' शुरू हो रहा था, उस समय मणि मधुकर हमारे साथ थे। कार्यवाहक संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह मीडिया पर एक स्तंभ शुरू करने जा रहे थे। प्रश्न यह था कि स्तंभ का नाम क्या रखा जाए। मणि मधुकर साहित्यिक व्यक्ति थे। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका था। उनसे पूछा गया, तो वे सोच कर बोले - संप्रेषण। सुरेंद्र जी ने बताया कि उन्हें 'माध्यम' ज्यादा अच्छा लग रहा है। अंत में स्तंभ का शार्षक यही तय हुआ। लेकिन सुरेंद्र प्रताप की विनोद वृत्ति अद्भुत थी। उन्होंने हंसते हुए मणि मधुकर से कहा, 'दरअसल, हम दोनों ही अंग्रेजी से अनुवाद कर रहे थे। आपने 'कम्युनिकेशन' का अनुवाद संप्रेषण किया और मैंने मीडियम या मीडिया का अनुवाद माध्यम किया।'

बदलती सोच

उस समय संप्रेषण और माध्यम एक ही स्थिति का वर्णन करने वाले शब्द लगते थे। आज वह स्थिति नहीं है। मीडिया के लिए आज कोई संप्रेषण शब्द सोच भी नहीं सकता। यह शब्द अब कम्युनिकेशन के लिए रूढ़ हो चुका है। मास कम्युनिकेशन को जन संप्रेषण कहा जाता है, मास मीडिया को जन माध्यम। जो बात ध्यान देने योग्य है, वह यह है कि 1977 में भी हिंदी पत्रकारिता पर अंग्रेजी की छाया दिखाई पड़ने लगी थी। कवर स्टोरी को आवरण कथा या आमुख कथा कहा जाता था। लेकिन आज कवर स्टोरी का बोलबाला है। जाहिर है कि अंग्रेजी अब अनुवाद में नहीं, सीधे आ रही है और बता रही है कि हम अनुवाद की संस्कृति से निकल कर सीधे अंग्रेजी के चंगुल में है। किसी टेलीविजन चैनल की भाषा कितनी जनोन्मुख है, इसका फैसला इस बात से किया जाता है कि उस चैनल पर अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कितना प्रतिशत होता है। ऐसे माहौल में अगर दूरदर्शन की भीषा पिछड़ी हुई, संस्कृतनिष्ठ और प्रतिक्रियावादी लगती है, तो इसमें हैरत की बात क्या है।

आजकल अखबारों में मीडिया की चर्चा बहुत ज्यादा होती है, हालांकि ज्यादातर इसका मतलब टीवी चैनलों से लगाया जाता है। अखबारों में अखबारों की चर्चा लगभग बंद है (पहले भी ज्यादा कहां होती थी?), क्योंकि प्रायः सभी अखबार एक ही राह पर चल रहे हैं और इस राह पर आत्मपरीक्षण के लिए इजाजत नहीं है। बहरहाल, इस तरह के स्तंभों के लिए माध्यम शब्द नहीं चलता, मीडिया का शोर जरूर है। इस बीच अखबारों को चिह्नित करने के लिए प्रिंट मीडिया शब्द चल पड़ा है। चूंकि मीडिया शब्द पहले से चल रहा था, इसलिए उसमें प्रिंट जोड़ देना आसान लगा। मुद्रित माध्यम या मुद्रित मीडिया लिखना अच्छा नहीं लगता -- इस तरह के संस्कृत मूल के या खिचड़ी शब्दों से हम अब बचने लगे हैं (क्योंकि यह पिछड़ेपन का प्रतीक है) और सीधे अंग्रेजी पर्यायों का इस्तेमाल करते हैं। 'रविवार' के समय भी मीडिया के लिए हिंदी का कोई मौलिक शब्द खोजने का श्रम नहीं किया गया था, लेकिन इतनी सभ्यता बची हुई थी कि अंग्रेजी शब्द के अनुवाद से काम चलाया गया।

हिंदी की दुकान

स्पष्ट है कि जो लोग हिंदी के उच्च प्रसार संख्या वाले दैनिक पत्रों में काम करते हैं, वे हिंदी की दुकान लगभग बंद कर चुके हैं और अंग्रेजी के हाथों लगभग बिक चुके हैं। लेकिन इसमें उनका कसूर नहीं है। जब मालिक लोग हिंदी पत्रकारिता का कायाकल्प कर रहे थे (वास्तव में यह सिर्फ काया का नहीं, आत्मा का भी बदलाव था), उस वक्त काम कर रहे हिंदी पत्रकारों ने अगर उनके साथ आज्ञाकारी सहयोग नहीं किया होता, तो उनमें से प्रत्येक की नौकरी खतरे में थी। आज भी कुछ घर-उजाड़ू या नए फैशन के स्वर्णपाश में फंसे हुए पत्रकारों को छोड़ हिंदी का कोई भी पत्रकार अंग्रेजी-पीड़ित हिंदी अपने मन से नहीं लिखता। उसे यह अपने ऊपर और अपने पाठकों पर सांस्कृतिक अत्याचार लगता है। वह झुंझलाता है, क्रुध्द होता है, हंसी उड़ाता है, कभी-कभी मिल-जुल कर कोई अभियान चलाने का सामूहिक निश्चय करता है, लेकिन आखिर में वही ढाक के तीन पात सामने आते हैं और वह अपना काम दी हुई भाषा में संपन्न कर उदास मन से घर लौट जाता है। उसके सामने एक बार फिर यह तथ्य उजागर होता है कि जिस अखबार में वह काम कर रहा है, वह अखबार उसका नहीं है, कि जिस व्यक्ति ने पूंजी निवेश किया है, वही तय करेगा कि क्या छपेगा, किस भाषा में छपेगा और किन तसवीरों के साथ छपेगा। कार्यक्रम ऊपर से मिलेगा, पत्रकार को सिर्फ 'इंप्लिमेंट' करना है।

ऐसा क्यों हुआ? किस प्रक्रिया में हुआ? यहां मैं एक और संस्मरण की शरण लूंगा। नवभारत टाइम्स के दिल्ली संस्करण से विद्यानिवास मिश्र विदा हुए ही थे। वे अंग्रेजी के भी विद्वान थे, पर हिंदी में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग बिलकुल नहीं करते थे। विष्णु खरे भी जा चुके थे। उनकी भाषा अद्भुत है। उन्हें भी हिंदी लिखते समय अंग्रेजी का प्रयोग आम तौर पर बिलकुल पसंद नहीं। स्थानीय संपादक का पद सूर्यकांत बाली नाम के एक सज्जन संभाल रहे थे। अखबार के मालिक-इंचार्ज समीर जैन को पत्रकारिता तथा अन्य विषयों पर व्याख्यान देने का शौक है। उस दिनों भी था। वे राजेंद्र माथुर को भी उपदेश देते रहते थे, सुरेंद्र प्रताप सिंह से बदलते हुए समय की चर्चा करते थे, विष्णु खरे को बताते थे कि पत्रकारिता क्या है और हम लोगों को तो खैर समझाते ही थे। सूर्यकांत बाली की विशेषता यह थी कि वे समीर जैन की हर स्थापना से तुरंत सहमत हो जाते थे, बल्कि उससे कुछ आगे भी बढ़ जाते थे। आडवाणी ने इमरजेंसी में पत्रकारों के आचरण पर टिप्पणी करते हुए ठीक ही कहा था कि उन्हें झुकने को कहा गया था, पर वे रेंगने लगे। मैं उस समय के स्थानीय संपादक को रेंगते हुए देखता था और अपने दिन गिनता था।

चाटुकार समाज

सूर्यकांत बाली संपादकीय बैठकों में हिंदी भाषा के नए दर्शन के बारे में समीर जैन के विचार इस तरह प्रगट करते जैसे वे उनके अपने विचार हों। समीर जैन की चिंता यह थी कि नवभारत टाइम्स युवा पीढ़ी तक कैसे पहुंचे। नई पीढ़ी की रुचिया पुरानी और मझली पीढ़ियों से भिन्न थीं। टीवी और सिनेमा उसका बाइबिल है। । सुंदरता, सफलता और यौन विषयों की चर्चा में उसे शास्त्रीय आनंद आता है। फिल्मी अभिनेताओं-अभिनेत्रियों की रंगीन और अर्ध-अश्लील तसवीरों में उसकी आत्मा बसती है। समीर जैन नवभारत टाइम्स को गंभीर लोगों का अखबार बनाए रखना नहीं चाहते थे। वे अकसर यह लतीफा सुनाते थे कि जब बहादुरशाह जफर मार्ग से, जहां दिल्ली के नवभारत टाइम्स का दफ्तर है, किसी बूढ़े की लाश गुजरती है, तो मुझे लगता है कि नवभारत टाइम्स का एक और पाठक चस बसा। समीर की फिक्र यह थी कि नए पाठकों की तलाश में किधर मुड़ें। इस खोज में भारत के शहरी युवा वर्ग के इसी हिस्से पर उनकी नजर पड़ी। उन्होंने हिंदी के संपादकों से कहा कि हिंदी में अंग्रेजी मिलाओ, वैसी पत्रकारिता करो जैसी नया टाइम्स ऑफ इंडिया कर रहा है, नहीं तो तुम्हारी नाव डूबने ही वाली है। सरकुलेशन नहीं बढ़ेगा, तो एडवर्टीजमेंट नहीं बढ़ेगा, रेवेन्य कम होगा और अंत में वी विल बी फोर्स्ड टु क्लोज डाउन दिस पेपर। इस भविष्यवाणी को गंभीरता को बाली ने समझा और हमें बताने लगे कि हमें विशेषज्ञ की जगह एक्सपर्ट, समाधान की जगह सॉल्यूशन, नीति की जगह पॉलिसी, उदारीकरण की जगह लिबराइजेशन लिखना चाहिए। एक दिन हमने उनके ये विचार 'पाठकों के पत्र' स्तंभ में एक छोटे-से लेख के रूप में पढ़े। उस लेख को हिंदी पत्रकारिता के नए इतिहास में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में स्थान मिलना चाहिए।

कोई चाहे तो इसे हिंदी की सार्मथ्य भी बता सकता है। हिंदी अपने आदिकाल से ही संघर्ष कर रही है। उसे उसका प्राप्य अभी तक नहीं मिल सका है। अपने को बचाने की खातिर हिंदी ने कई तरह के समझौते भी किए। अवधी, ब्रजभाषा, भोजपुरी, उर्दू आदि के साथ अच्छे रिश्ते बनाए। किसी का तिरस्कार नहीं किया। यहां तक कि उसने अंग्रेजी से भी दोस्ती का हाथ मिलाया। यह हिंदी की शक्ति है, जो शक्ति किसी भी जिंदा और जिंदादिल भाषा की होती है। इस प्रक्रिया में हिंदी हर पराई चीज का हिंदीकरण कर लेती है। अतः उसने अंग्रेजी शब्दों का भी हिंदीकरण किया। आजादी के बाद भी हिंदी अंग्रेजी शब्दों के हिंदी प्रतिशब्द बनाती रही। बजट, टिकट, मोटर और बैंक जैसे शब्द सीधे भी ले लिए गए, क्योंकि ये हिंदी के प्रवाह में घुल-मिल जा रहे थे और इनका अनुवाद करने के प्रयास में 'लौहपथगामिनी' जैसे असंभव शब्द ही हाथ आते थे। आज भी पासपोर्ट को पारपत्र कहना जमता नहीं है, हालांकि इस शब्द में जमने की संभावना है। लेकिन 1980-90 के दौर में जनसाधारण के बीच हिंदी का प्रयोग करने वालों में सांस्कृतिक थकावट आ गई और इसी के साथ उनकी शब्द निर्माण की क्षमता भी कम होती गई। उन्हीं दिनों हिंदी का स्परूप थोड़ा-थोड़ा बदलने लगा था, जब संडे मेल, संडे ऑब्जर्वर जैसे अंग्रेजी नामों वाले पत्र हिंदी में निकलने लगे। यह प्रवृत्ति 70 के दशक में मौजूद होती, तो हिंदी में रविवार नहीं, संडे ही निकलता या फिर आउटलुक के हिंदी संस्करण में साप्ताहिक लगाने की जरूरत नहीं होती, सीधे आउटलुक ही निकलता, जैसे इंडिया टुडे कई भाषाओं में एक ही नाम से निकलता है। 90 के दशक में जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया ने भारत की अंग्रेजी पत्रकारिता का चेहरा बदल डाला, उसे आत्मा-विहीन कर दिया, वैसे ही नए नवभारत टाइम्स ने हिंदी पत्रकारिता में एक ऐसी बाढ़ पैदा कर दी, जिसमें बहुत-से मूल्य और प्रतिमान डूब गए। बहरहाल, नवभारत टाइम्स का यह प्रयोग आर्थिक दृष्टि से सफल हुआ और अन्य अखबारों के लिए मॉडल बन गए। कुछ हिंदी पत्रों में तो अंग्रेजी के स्वतंत्र पन्ने भी छपने लगे।

भाषाई गरीबी

भाषा संस्कृति का वाहक होती है। प्रत्येक सांस्कृतिक बदलाव अपने लिए एक नई भाषा गढ़ता है। नक्सलवादियों की भाषा वह नहीं है जिसका इस्तेमाल गांधी और जवाहरलाल करते थे। आज के विज्ञापनों की भाषा भी वह नहीं है जो 80 के दशक तक होती थी। यह एक नई संस्कृति है जिसके पहियों पर आज की पत्रकारिता चल रही है। इसे मुख्य रूप से उपभोक्तावाद की संस्कृति कह सकते हैं, जिसमें किसी वैचारिक वाद के लिए जगह नहीं है। इस संस्कृति का केंद्रीय सूत्र रघुवीर सहाय बहुत पहले बता चुके थे -- उत्तम जीवन दास विचार। जैसे दिल्ली के प्रगति मैदान में उत्तम जीवन (गुड लिविंग) की प्रदर्शनियां लगती हैं, वैसे ही आज हर अखबार उत्तम जीवन को अपने झंग से परिभाषित करने लगा है। अपने-अपने ढंग से नहीं, अपने ढंग से, जिसका नतीजा यह हुआ है कि सभी अखबार एक जैसे ही नजर आते हैं - सभी में एक जैसे रंग, सभी में एक जैसी सामग्री, विचार-विमर्श का घोर अभाव तथा जीवन में सफलता पाने के लिए एक जैसी शिक्षा। अखबार आधुनिकतम जीवन के विश्वविद्यालय बन चुके हैं और पाठक सोचने-समझने वाला प्राणी नहीं, बल्कि मौन रिसीवर।

इसका असर हिंदी की जानकारी के स्तर पर भी पड़ा है। टीवी चैनलों में उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है जो शुध्द हिंदी के प्रति सरोकार रखते हैं। प्रथमतः तो ऐसे व्यक्तियों को लिया ही नहीं जाता। ले लेने के बाद उनसे मांग की जाती है कि वे ऐसी हिंदी लिखें और बोलें जो ऑडिएंस की समझ में आए। इस हिंदी का शुध्द या टकसाली होना जरूरी नहीं है। यह शिकायत आम है कि टीवी के परदे पर जो हिंदी आती है, वह अकसर गलत होती है। सच तो यह है कि अनेक हिंदी समाचार चैनलों के प्रमुख ऐसे महानुभाव हैं जिन्हें हिंदी आती ही नहीं और यह उनके लिए शर्म की नहीं, गर्वित होने की बात है। यही स्थिति नीचे के पत्रकारों की है। वे शायद अंग्रेजी भी ठीक से नहीं जानते, पर हिंदी भी नहीं जानते। चूंकि अच्छी हिंदी की मांग नहीं है और संस्थान में उसकी कद्रदानी भी नहीं है, उसलिए हिंदी सीखने की प्रेरणा भी नहीं है। हिंदी एक ऐसी अभागी भाषा है जिसे न जानते हुए भी हिंदी की पत्रकारिता की जा सकती है।

त्रासदी उर्फ ट्रेजेडी

प्रिंट मीडिया की ट्रेजेडी यह है कि टेलीविजन से प्रतिद्वंद्विता में उसने अपने लिए कोई नई या अलग राह नहीं निकाली, बल्कि वह टेलीविजन का अनुकरण करने में लग गया। कहने की जरूरत नहीं कि जब हिंदी क्षेत्र में टेलीविजन का प्रसार शुरू हो रहा था, तब तक हिंदी पत्रों की आत्मा आखिरी सांस लेने लग गई थी। पुनर्जन्म के लिए उसके पास एक ही मॉडल था, टेलीविजन की पत्रकारिता। मालिक लोग भी कुछ ऐसा ही चाहते थे। संपादक रह नहीं गए थे जो कुछ सोच-विचार करते और प्रिंट को इलेक्ट्रॉनिक का भतीजा बनने से बचा पाते। नतीजा यह हुआ कि हिंदी के ज्यादातर अखबार टेलीविजन की फूहड़ अनुकरण बन गए। इसका असर प्रिंट मीडिया की भाषा पर भी पड़ा। हिंदी का टेलीविजन जो काम कर रहा है, वह एक विकार-ग्रस्त भाषा में ही हो सकता है। अशुध्द आत्माएं अपने को शुध्द माध्यमों से प्रगट नहीं कर सकतीं। सो हिंदी पत्रों की भाषा भी भ्रष्ट होने लगी। एक समय जिस हिंदी पत्रकारिता ने राष्ट्रपति, संसद जैसे दर्जनों शब्द गढ़े थे, जो सबकी जुबान पर चढ़ गए, उसी हिंदी के पत्रकार प्रेसिडेंट, प्राइम मिनिस्टर जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने लगे। इसके साथ ही यह भी हुआ कि हिंदी पत्रों में काम करने के लिए हिंदी जानना आवश्यक नहीं रह गया। पहले जो हिंदी का पत्रकार बनना चाहता था, वह कुछ साहित्यिक संस्कार ले कर आता है। वास्तव में शब्द की रचनात्मक साधना तो साहित्य ही है। इसी नाते पहले हिंदी अखबारों में कुछ साहित्य भी छपा करता था। कहीं-कहीं साहित्य संपादक भी होते थे। लेकिन नए वातावरण में साहित्य का ज्ञान एक अवगुण बन गया। साहित्यकारों को एक-एक कर अखबारों से बाहर किया जाने लगा। हिंदी एक चलताऊ चीज हो गई -- गरीब की जोरू, जिसके साथ कोई भी कभी भी छेड़छाड़ कर सकता है। यही कारण है कि आब हिंदी अखबारों में अच्छी भाषा पढ़ने का आनंद दुर्लभ तो हो ही गया है, उनसे शुध्द लिखी हुई हिंदी की मांग करना भी नाजायज लगता है। जिनका हिंदी से कोई लगाव नहीं है, जिनकी हिंदी के प्रति कोई प्रतिबध्दता नहीं है, जो हिंदी की किताबे नहीं पढ़ते (सच तो यह है कि वे कोई भी किताब नहीं पढ़ते), उनसे यह अपेक्षा करना कि वे हिंदी को सावधानी से बरतें, उनके साथ अन्याय है, जैसे गधे से यह मांग करना ठीक नहीं है कि वह घोड़े की रफ्तार से चल कर दिखाए।

आगे क्या होगा? क्या हिंदी बच भी पाएगी? जिन कमियों और अज्ञानों के साथ आज हिंदी का व्यवहार हो रहा है, वैसी हिंदी बच भी गई तो क्या? लेकिन जो तमीज उतार सकता है, वह धोती भी खोल सकता है। इसलिए आशंका यह है कि धीरे-धीरे अन्य भारतीय भाषाओं की तरह हिंदी भी मरणासन्न होती जाएगी। आज हिंदी जितनी बची हुई है, उसका प्रधान कारण हिंदी क्षेत्र का अविकास है। आज अविकसित लोग ही हिंदी के अखबार पढ़ते हैं। उनके बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में जाने लगे हैं। जिस दिन यह प्रक्रिया पूर्णता तक पहुंच जाएगी, हिंदी पढ़ने वाले अल्पसंख्यक हो जाएंगे। विकसित हिंदी भाषी परिवार से निकला हुआ बच्चा सीधे अंग्रेजी पढ़ना पसंद करेगा। यह एक भाषा की मौत नहीं, एक संस्कृति की मौत है। कुछ लोग कहेंगे, यह आत्महत्या है। मेरा खयाल है, यह मर्डर है।