Monday, April 21, 2008

अलविदा फ़ैन्टम


नैनीताल के बिड़ला विद्यामन्दिर में मेरे पहले प्रधानाचार्य थे श्री एन. सी. शर्मा. बेहद आकर्षक व्यक्तित्व था उनका. स्कूलों में अध्यापकों के उपनाम रखे जाने की अक्षुण्ण परम्परा के चलते मुझसे पहले वाली पीढ़ियों ने उनका नाम फ़ैन्टम रख छोड़ा था. जिस तरह अपनी बहादुरी से कॉमिक वाला फ़ैन्टम दुनिया भर के अपराधियों को सबक सिखाया करता था उससे लगता था कि फ़ैन्टम का कभी भी कोई बाल-बांका नहीं कर सकता. ठीक ऐसा ही हमें अपने महान प्रिंसिपल साहब को देख कर लगा करता था. बीती १४ अप्रैल को उनका देहान्त हो गया. बदक़िस्मती से मुझे यह खबर आज सुबह अपने एक स्कूली साथी से मिली.



नैनीताल की सबसे ऊंची पहाड़ियों में एक शेर का डांडा की चोटी पर है बिड़ला विद्यामन्दिर. जिस साल मैंने वहां छात्रावास में दाखिला लिया था, स्कूल में कुल दो बड़े मैदान थे और एक छोटा. छोटा वाला फ़ील्ड नम्बर थ्री कहलाता था. आज फ़ील्ड नम्बर थ्री अपने आकार के हिसाब से दूसरे नम्बर पर है. हम जूनियर-सीनियर सभी बच्चे शाम के खेलने वाले घन्टे के दौरान इस फ़ील्ड में साप्ताहिक श्रमदान किया करते थे. एक पूरी की पूरी ऊबड़खाबड़ पहाड़ी को खोद कर कुछेक सालों में बाकायदा समतल किया गया और अब इस पर क्रिकेट मैच तक खेले जाते हैं. फ़ील्ड की दास्तान इस लिए बता रहा हूं क्योंकि हमारे फ़ैन्टम गुरूजी ने इस फ़ील्ड पर हर रोज़ श्रमदान किया: जूनियर और सीनियर दोनों के खेलने के घन्टों में और वह भी कई वर्षों तक. हाफ़ पैन्ट पहने शर्मा जी के हाथ में कभी फ़ावड़ा होता था कभी मिट्टी पत्थर ढोने वाली गाड़ी. नैनीताल स्टेशन से बिड़ला विद्यामन्दिर तक जीप चला कर लाने वाले नैनीताल के इतिहास में वे पहले शख़्स थे: यह सन १९७१ की बात है जब भले भले ड्राइवर स्कूल की आधी चढ़ाई तक पहुंचते पहुंचते दम तोड़ दिया करते थे.


वे बढ़िया खिलाड़ी थे, हमारे लिए मां-बाप-अभिभावक सब कुछ थे, और एक महान शिक्षाविद तो ख़ैर थे ही. उनके समय में बच्चों के सर्वांगीण विकास को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता था. आज जब तमाम बड़े पब्लिक स्कूलों में बच्चों के बोर्ड-परिणामों तक ही सारी मेहनत सीमित रहती है, शर्मा जी की कार्यशैली में हर चीज़ के लिए जगह थी. हमारे स्कूल में कारपेन्टरी, लोहे का काम, संगीत, चित्रकला, बाटिक, इलैक्ट्रोनिक्स भी सीखने को मिलता था और खेलने को बॉक्सिंग, जिम्नास्टिक्स जैसे खेल भी. स्कूल की लाइब्रेरी आज भी इलाके की सर्वश्रेष्ठ लाइब्रेरियों में एक है. अपवाद के तौर पर अगर कोई छात्र खेलने में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं लेता था तो उसके लिए लाइब्रेरी में विशेष व्यवस्था की जाती थी.



बिड़ला विद्यामन्दिर की टीमें शर्मा जी के समय में शहर की तमाम खेल-प्रतियोगिताओं में अव्वल आया करती थीं. उनके कार्यकाल में बिड़ला विद्यामन्दिर ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी भी देश को दिए. खेलों में उनकी रुचि का ही परिणाम रहा होगा कि उनके एक सुपुत्र चारु शर्मा आज देश के मशहूर क्रिकेट कमेन्टेटर हैं. फ़ुटबॉल टीम के बेहद शानदार गोलकीपर चारु भाई हमारे स्कूल की हर टीम में होते थे. १९८२ के एशियाड के दौरान तैराकी की कमेन्ट्री से अपने कैरियर का आगाज़ किया था उन्होंने.



एशियाड के समय की एक घटना याद आती है. एशियाड के समय देश में रंगीन टीवी आया था और ज़्यादातर बच्चे अपने घर जाकर इस का मज़ा लेना चाहते थे. स्कूल प्रिफ़ेक्ट्स और हाउस-कैप्टन्स के मार्फ़त हरेक बात प्रधानाचार्य महोदय के सामने पहुंचाई जाती थी. सुबह की असेम्बली के आखिर में फ़ैन्टम गुरुजी दो-चार मिनट कुछ न कुछ बताया करते थे: कभी कोई प्रेरक घटना, कभी कोई दिलचस्प बात, कभी कोई सूचना और अक्सर कोई लतीफ़ा. हमारे लिये ये दो-चार मिनट दिन के सबसे बहुमूल्य क्षण हुआ करते थे. खैर. जब एशियाड के समय छुट्टी देने का मसला उठा तो असेम्बली खत्म होते ही गुरूजी ने पूछा: "मानसून की छुट्टियों में जिन जिन बच्चों ने वर्ल्ड कप फ़ुटबॉल देखा था, वो अपने अपने हाथ खड़े करें." क़रीब पचास हाथ उठे. जिन जिन ने हाथ खड़े किए थे उन में से एक सीनियर से उन्होंने पूछा: "यूरोप की फ़ुटबॉल और हमारे यहां की फ़ुटबॉल में क्या अन्तर है?" इत्तेफ़ाक़ से सीनियर ने सही उत्तर दिया. "जिन जिन बच्चों ने हाथ खड़े किए हैं, वे सारे कल से छुट्टी पर जा सकते हैं." इस तरह के त्वरित फ़ैसले लेने में उन्हें कलकत्ता में बैठे मैनेजमैन्ट से कुछ नहीं पूछना होता था: ध्यान रहे इस तरह के पब्लिक स्कूलों में आजकल प्रधानाचार्य को एक ईंट तक यहां-वहां करने से पहले मैनेजमेन्ट से अनुमति लेनी होती है.


उन तक कोई भी बच्चा किसी भी तरह की शिकायत ले कर पहुंच सकता था. मैं ख़ुद एक बार लंच के समय मिले चावलों में आये दो पत्थरों को चम्मच में लेकर उनके द्फ़्तर चला गया था. मुझे हैरत हुई उन्हें मेरा नाम मालूम था. उन्होंने मेरे साथ जा कर खाना बनाने वाले स्टाफ़ की ख़बर ली और मेरी याददाश्त में इकलौती दफ़ा हमारे हॉस्टल की मेज़ पर हमारे साथ लंच किया. दूसरे हॉस्टल की मेज़ पर उनकी जगह नियत थी.


लंच के बाद उन्होंने मुझे अपने कमरे में बुलाया, अपनी अलमारी से मुझे एक चॉकलेट दी और मुझसे मेरी भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछा. मैंने जो कुछ कहा होगा, वह मुझे याद नहीं है मगर फ़ैन्टम गुरुजी ने जो कहा वह आज भी मेरे लिए सबसे बड़ा गुरुमंत्र है. मुझे सलाह देते हुए उन्होंने कहा था: "कैरियर नाम की चीज़ से घबराना कभी मत. वह एक भ्रामक शब्द है. जीवन में वह करना जो तुम्हारा अन्तर्मन तुम्हें करने को बोले. यानी वह करना जो तुम्हें लगे तुम सबसे अच्छा कर सकते हो. मां-बाप, भाई-बहन, गुरु-रिश्तेदार अपने अपने तरीकों से अपनी बात तुम पर लादेंगे. उस फेर में न आना. जब साठ साल के हो जाओगे तब तुम्हारे भीतर कोई पछतावा नहीं होना चाहिये."


१९८३ में वे इन्टरनेशनल पब्लिक स्कूल्स मीट में भाग लेने एक महीने के लिए इंग्लैण्ड गए थे. स्कूल के बच्चों में यह बात फैल चुकी थी कि मैनेजमेन्ट को शर्मा जी से निजात पाने का एक यही तरीका सूझा है. उस एक महीने में कलकत्ता से बिड़ला ग्रुप के कई बड़े अधिकारी स्कूल में आए और कुछ ही समय बाद अफ़वाहें सच निकलीं और शर्मा जी को प्रधानाचार्य का पद त्यागना पड़ा. अपने विदाई समारोह में उन्होंने एक बेहद मार्मिक भाषण दिया और हम सब बच्चे रोने लगे थे. हमें इस बात पर यकीन ही नहीं हो रहा था कि गुरुजी वाकई चले जाएंगे.


गुरुजी चले भी गए और बिड़ला विद्यामन्दिर को उस ज़माने से जानने वाले लोग, छात्र, कर्मचारीगण और अध्यापक इस बात को मानते हैं कि उनके जाने के बाद से हमारा स्कूल वैसी शान फिर अर्जित नहीं कर पाया.


फ़ैन्टम गुरुजी को श्रद्धांजलि.

(फ़ोटो के लिए आदरणीय गुरुजी श्री राजशेखर पन्त का आभार)

4 comments:

mamta said...

ऐसा अक्सर देखा गया है की जो लोग सही काम कर रहे होते है उनसे दूसरे लोग नाखुश रहते है। आपके फैंटम गुरूजी के बारे मे पढ़कर हमे यही महसूस हुआ ।
फैंटम गुरूजी को श्रद्धांजलि।

Dinesh Semwal said...

ashok mujha sharma ji ki bidayee par pradeep gupta urf jagjeewan ram ka gaya gaana yaad aa raha hai-o jaanay walay ho sakay to laut kay aana!! kaash yeh sach ho pata.

guru ji to shardhanjali kay saath.


dinesh semwal

Dinesh Semwal said...

ashok mujha sharma ji ki bidayee par pradeep gupta urf jagjeewan ram ka gaya gaana yaad aa raha hai-o jaanay walay ho sakay to laut kay aana!! kaash yeh sach ho pata.

guru ji to shardhanjali kay saath.


dinesh semwal

manish said...

Ashok bhai,
Phantom ko samay bhi nahi maar sakta. Woh hamare saath hardam rahenge aur jab tak ham me dam hai ham unke usoolon par chal ke unko amar karenge. Hame to woh 70 saal ke phantom yaad hain jo football field main school team ke saath khela karte the aur jinka rutba Mayo College tak chalta tha.
Raj Shekhar Sir se milo to mera praraam aur dhnyawaad jaroor kehna Phantam ki phto dene ke liye. Teyaad to ab aur ghani ho gayi.
Manish Misra