Thursday, August 7, 2008

फिक्शन के सबसे क़रीब हैं वीडियो गेम्स



हारुकि मुराकामी से बातचीत

जापानी उपन्यासकार हारुकि मुराकामी दुनिया के सबसे ज़्यादा बिकने वाले लेखकों में से हैं। उनकी पिछली किताब `काफ्का ऑन द शोर´ ने बिक्री के उनके ही रिकॉर्ड तोड़े। 1949 में जन्मे मुराकामी 29 की उम्र तक अपना क्लब चलाते थे, जैज़ बजाते थे और सैंडविच बांधा करते थे। क्लब बेच दिया और एक दिन झटके से लेखक बन गए। उनकी लोकप्रियता इतनी है कि टोक्यो के हर घर में उनकी कोई न कोई किताब मिल जाएगी। उन्हें नए समय का ग्राहम ग्रीन कहा जाता है और नोबेल का दावेदार माना जाता है। और ऐसे भी आलोचकों की कमी नहीं, जो उन्हें `साहित्यिक लेखक´ बिल्कुल नहीं मानते। जॉन रे द्वारा किया गया उनका यह इंटरव्यू दो साल पहले `द पेरिस रिव्यू´ में छपा था। इन अंशों में आप उनके लेखक बनने की झलक पा सकते हैं।

लेखन की शुरुआत आपने कब की?

29 साल की उम्र में। बिल्कुल किसी अचंभे की तरह। लेकिन बहुत जल्दी मैंने अपनी क़लम के साथ तालमेल बिठा लिया था। मैंने एक आधी रात को किचन के प्लेटफार्म पर लिखने की शुरुआत की थी। मुझे पहली किताब पूरा करने में दस महीने का वक़्त लगा था। मैंने उसे एक प्रकाशक के पास भेजा और उस पर मुझे कोई पुरस्कार भी मिल गया। तो वह किसी सपने की तरह था, जो सच हो रहा था और मैं हैरत में उसे ताक रहा था। एक पल के बाद ही मैंने मान लिया कि हां यार, मैं तो लेखक बन गया हूं। बहुत आसानी से हो गया सब कुछ।

आपकी पत्नी की क्या प्रतिक्रिया थी आपके लेखक बनने पर?

उसने कुछ नहीं कहा था। जब मैंने उससे कहा, `अब मैं लेखक बन गया हूं´, वह अचंभे में पड़ गई और एक तरह से चकरा गई। चकरा इसलिए गई कि लेखक बनना हज़ार तरह के संघर्षों को न्यौता देना होता है।

आपके आदर्श कौन थे? किन जापानी लेखकों ने आप पर प्रभाव डाला?

जब मैं छोटा था, तो ज़्यादा जापानी साहित्य नहीं पढ़ता था। बड़ा होने पर भी नहीं पढ़ा। दरअसल, मैं जापानी संस्कृति से दूर भागना चाहता था। वह बहुत बोरिंग है। बहुत घुटन भरी।

पर आपके पिता तो जापानी साहित्य के टीचर थे?

हां, इसीलिए मैं दूर भागता था। शायद पिता-पुत्र का संबंध ही ऐसा होता है। मैं बहुत जल्दी पश्चिमी सभ्‍यता की ओर बढ़ा। जैज़ म्यूजिक सुनने लगा, दोस्तोयेवस्की, काफ्का, रेमंड शैंडलर पढ़ने लगा। ये सब मिलकर मेरी दुनिया बनाते थे, मेरा अपना आश्चर्यलोक। मैं जब चाहता था, अपने मन के भीतर सेंट पीटर्सबर्ग या वेस्ट हॉलीवुड चला जाता था। उपन्यास की ताक़त यही होती है : वह पाठक को अपने साथ ले चला जाता है। अब तो कोई भी कहीं जा सकता है, पर 1960 के दशक में ऐसा नहीं था। सो, कई जगहों पर अपनी कल्पनाओं के ज़रिए ही जाया जा सकता था, या उपन्यासों के ज़रिए। मैं उस जगह का संगीत सुनता था, और वहां मौजूद हो जाता था। ये एक कि़स्म की मन:स्थिति होती है, किसी स्वप्न की तरह।

और इसी ने आपको लेखन के लिए बेबस किया?

29 की उम्र में अचानक एक दिन मुझे लगा कि कुछ लिखना चाहिए। मैं यूं ही एक उपन्यास लिखने बैठ गया। क्या लिख रहा हूं, नहीं पता था। मैंने जापानी साहित्य का कोई शब्द पढ़ा ही नहीं था, इसलिए वह जापानी शैली में नहीं लिख पाया। चूंकि पश्चिमी साहित्य पढ़ा था, इसलिए शैली पश्चिमी हो गई, पर भाषा जापानी रही। इससे एक फ़ायदा यह हुआ कि पहली ही किताब से मेरी एक मौलिक स्टाइल बन गई।

आप अपनी किताबों का विश्लेषण नहीं करते, या नहीं होने देते? जैसे सपने का विश्लेषण करें, तो वे अपना असर खो देते हैं, कहीं वैसी ही बात तो नहीं?

जब आप कोई किताब लिख रहे होते हैं, तो दरअसल, आप जागते हुए सपना देख रहे होते हैं। असली सपने को तो आप कभी कंट्रोल नहीं कर सकते। किताब लिखते समय आप जाग रहे होते हैं, आप समय चुन सकते हैं, उसकी लंबाई चुन सकते हैं और सब कुछ चुन सकते हैं। मैं सुबह चार से पांच घंटे तक लिख सकता हूं और जब समय आता है, मैं रुक सकता हूं। रुकने के बाद अगली सुबह मैं फिर उसी जगह से शुरू कर सकता हूं। अगर यह असली सपना होता, तो ऐसा कभी नहीं हो पाता।

अपने किरदारों के बारे में बताइए, वे असल के कितना क़रीब हैं? क्या आपके नैरेटिव से अलग भी उनका महत्व है?

जब मैं अपने किरदार बुन रहा होता हूं, तो दरअसल अपने आसपास के लोगों को बहुत क़रीने से ऑब्ज़र्व कर रहा होता हूं। मुझे बहुत ज़्यादा बोलना पसंद नहीं। मैं दूसरों की कहानियां सुनता हूं। मैं यह तय करने की कोशिश नहीं करता कि वे किस कि़स्म के लोग हैं, सिर्फ़ ये जानने की कोशिश करता हूं कि वे क्या महसूस करते हैं, कैसे जीते हैं। मैं कोई चीज़ इससे ले लेता हूं, तो कोई चीज़ उससे। एक ही किरदार में मैं एक पुरुष और एक स्त्री के गुण डाल देता हूं। मुझे नहीं पता, यह यथार्थवादी तरीक़ा है या कल्पनावादी, लेकिन इतना जानता हूं कि मेरे किरदार असली लोगों से ज़्यादा असली हैं। साल के जिन छह-सात महीनों में मैं लिख रहा होता हूं, दरअसल, उस समय वे सारे लोग मेरे भीतर रह रहे होते हैं। वह एक पूरा ब्रह्मांड होता है।

आपके यहां वर्णन भी बहुत है?

आजकल तो वर्णन बहुत ज़रूरी हो गया है लेखन के लिए। मैं कभी सिद्धांतों की फि़क्र नहीं करता। मैं शब्दों के कम-ज़्यादा होने की भी चिंता नहीं करता। ज़रूरी यह है कि जो आप नैरेट कर रहे हैं, वह अच्छा है या ख़राब। इंटरनेट की दुनिया के कारण हमारे पास अब नई लोककथाएं बन रही हैं। हमें अब उन सब बातों को भी अपने लेखन में समोना है, सो हमें अपेक्षाकृत विस्तार में जाना ही पड़ेगा।

जब आपकी तुलना काफ्का या मारकेस से की जाती है, तो आप कहते हैं, वे साहित्यिक लेखक हैं। आप ख़ुद को साहित्यिक लेखक नहीं मानते?

मानता हूं, पर मैं समकालीन साहित्य का लेखक हूं। `क्लासिकल सेंस´ का नहीं। समकालीन साहित्य पहले से बहुत अलग है। जिस समय काफ्का लिख रहे थे, उस समय सिर्फ़ संगीत, किताबें और थिएटर हुआ करता था। अब इंटरनेट, फिल्में, रेंटल वीडियोज़ और बहुत कुछ हैं। बहुत ज़्यादा प्रतिस्पर्धा है। सबसे बड़ी समस्या तो समय की है। 19वीं सदी के आरामतलब तबक़े को देखिए, उसके पास कितना समय होता था, कितनी मोटी-मोटी किताबें पढ़ता था वह। चार-चार घंटे ऑपेरा में बैठा रहता था। पर अब समय पूरी तरह बदल गया है। अब दरअसल, कोई आरामतलब तबक़ा ही नहीं बचा। मॉबी-डिक या दोस्तोएवस्की पढ़ना अच्छा लगता है, लेकिन अब किसके पास इतना समय है। इसी रोशनी में देखिए, फिक्शन कितना बदल गया है। आपको शुरू से ही पाठक को गला पकड़कर अपनी रचना में खींचकर लाना होता है। समकालीन साहित्य के कथाकार, देखिए, कितनी अलग-अलग तकनीकों का प्रयोग कर रहे हैं, जैज़, म्यूजिक, फिल्मों, वीडियो गेम्स तक से अपने लिए तकनीकें ला रहे हैं। मुझे तो ऐसा लगता है कि आज के समय में वीडियो गेम्स फिक्शन के जितना क़रीब हैं, उतना कुछ और नहीं।

इतना छुप-छुपकर क्यों रहते हैं आप?

मैं अकेला रहने वाला जीव हूं। जब लेखक बन गया, और चल निकला, तो लोग पहचानने लगे। इसीलिए कभी न्यूयॉर्क रहता हूं, तो कभी लंदन। और अब यहां छोटे से क़स्बे क्योतो में रहता हूं। यहां गुमनाम रह सकता हूं। कोई पहचानता नहीं। कहीं भी जा सकता हूं। ट्रेन में सफ़र कर लूं, तो भी किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ता। सबको पता है कि टोक्यो में मेरा घर है। उन्हें लगता है कि मैं वहां रहता हूं। सो, अब भी वहां लोगों की भीड़ लगी रहती है, जिन्हें निराशा ही मिलती होगी। वहां मैं सड़क पर निकल जाऊं, तो भीड़ लग जाती है। मैं उससे घबराता हूं।

5 comments:

anurag vats said...

murkami ek pramparit lekhan ki upaj nhin hain, yh unke haq men hi rha...albatta yh kabaadkhane ki prampara ke anuroop post hai...badhai...

Ashok Pande said...

बहुत ज़रूरी पोस्ट गीत भाई! आपका अनुवाद हमेशा की तरह शानदार है -प्रवाह और ताज़गी से भरपूर.

sidheshwer said...

गीत भाई!
कल ही 'पहल-८८' आया. उसमें रोतरडम कविता महोत्सव पर आपका लेख पढकर रोमांचित हूं और आज देखिये कि हारुकि मुराकामी पर / का यह यह इंटरव्यू ! सचमुच बहुत ही बढिया.

विश्व साहित्य से मेरा राब्ता बहुत ही कम रहा है, जो रहा है उसके लिए दोस्त लोगों(अविनाश झा, राजेश कुमार, अशोक पांडे, आशुतोष उपाध्याय,प्रकाश चौधरी आदि) के सुझावों ने रास्ता दिखाया. मैं हारुकि मुराकामी को पढना चाहता हूं. देखें किताब कब, कैसे मिल पाती है.

बहुत ही उम्दा पोस्ट. बधाई.
और हां
'पहल' वाले लेख के लिये तो बल्ले- बल्ले!!

Pramod Singh said...

सही है. जियो हारुकि. इसी तरह से हिंदी में अब कोई 'द वाइंड अप बर्ड क्रॉनिकल' या 'डांस डांस डांस' का अनुवाद भी कर डाले.

Manish Kumar said...

अच्छा लगा इन के बारे में जानकर !