Friday, August 29, 2008

पानी में घिरे हुए लोग

पानी में घिरे हुए लोग
प्रार्थना नहीं करते
वे पूरे विश्वास से देखते हैं पानी को
और एक दिन
बिना किसी सूचना के
खच्चर बैल या भैंस की पीठ पर
घर-असबाब लादकर
चल देते हैं कहीं और

यह कितना अद्भुत है
कि बाढ़ चाहे जितनी भयानक हो
उन्हें पानी में थोड़ी-सी जगह ज़रूर मिल जाती है
थोड़ी-सी धूप
थोड़ा-सा आसमान
फिर वे गाड़ देते हैं खम्भे
तान देते हैं बोरे
उलझा देते हैं मूंज की रस्सियां और टाट
पानी में घिरे हुए लोग
अपने साथ ले आते हैं पुआल की गंध
वे ले आते हैं आम की गुठलियां
खाली टिन
भुने हुए चने
वे ले आते हैं चिलम और आग

फिर बह जाते हैं उनके मवेशी
उनकी पूजा की घंटी बह जाती है
बह जाती है महावीर जी की आदमकद मूर्ति
घरों की कच्ची दीवारें
दीवारों पर बने हुए हाथी-घोड़े
फूल-पत्ते
पाट-पटोरे
सब बह जाते हैं
मगर पानी में घिरे हुए लोग
शिकायत नहीं करते
वे हर कीमत पर अपनी चिलम के छेद में
कहीं न कहीं बचा रखते हैं
थोड़ी-सी आग

फिर डूब जाता है सूरज
कहीं से आती हैं
पानी पर तैरती हुई
लोगों के बोलने की तेज आवाजें
कहीं से उठता है धुआं
पेड़ों पर मंडराता हुआ
और पानी में घिरे हुए लोग
हो जाते हैं बेचैन

वे जला देते हैं
एक टुटही लालटेन
टांग देते हैं किसी ऊंचे बांस पर
ताकि उनके होने की खबर
पानी के पार तक पहुंचती रहे

फिर उस मद्धिम रोशनी में
पानी की आंखों में
आंखें डाले हुए
वे रात-भर खड़े रहते हैं
पानी के सामने
पानी की तरफ
पानी के खिलाफ

सिर्फ उनके अंदर
अरार की तरह
हर बार कुछ टूटता है
हर बार पानी में कुछ गिरता है
छपाक........छपाक.......

-केदारनाथ सिंह

13 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

एक सच्ची तस्वीर पेश करती रचना। पढवाने के लिए शुक्रिया।

तरूश्री शर्मा said...

एक अच्छी कविता पढ़वाने के लिए शुक्रिया।

anurag vats said...

mere pradesh men abhi zyadatar log pani men ghire hue hain...unke liye hm pani bahar log prarthna kr rhe hain!

महेन said...

बिहार में तो अभी यही हो रहा होगा। :(

"VISHAL" said...

badh me ghire logo ka chitran bakhoobi kiya hai aapne. ek achchhi aur gambhir rachana k liye dhanyabad.

sidheshwer said...

एक अच्छी कविता और एक अच्छी पोस्ट के लिये बधाई स्वीकर करें !

Udan Tashtari said...

पढ़वाने के लिए शुक्रिया।

सतीश पंचम said...

अच्छी संवेदनात्मक रचना है।

Manish Kumar said...

बिहार में आई बाढ़ की विभीषिका के बीच इस रचना को पढ़ना पीड़ितों के घावों का अंदाजा दे गया। सुक्रिया इस रचना को यहाँ प्रस्तुत करने का।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

केदारनाथ जी सघन संवेदना के
विरल शिल्पी हैं...
आभार इस प्रस्तुति के लिए.
======================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

ravindra vyas said...

शुक्रिया दोस्तों।

विनीता यशस्वी said...

wah ! kya khub kavita hai..

विनीता यशस्वी said...

wah ! kya khub kavita hai..