Saturday, August 23, 2008

कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।


आज सुनते है छाया गांगुली जी के सुमधुर और सधे हुए स्वर में हिंदोस्तानी शायरी के बाबा नज़ीर अकबराबादी की एक अति लोकप्रिय और सदाबहार रचना , हालांकि मौसम बारिशों का है लेकिन गुजरे फ़ागुन और आने वाले फ़ागुन को याद कर लेने में हर्ज ही क्या है !

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और डफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़म शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।


गुलज़ार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।


6 comments:

Udan Tashtari said...

बेहतरीन...आभार!!

दिनेशराय द्विवेदी said...

मेरी प्रिय रचनाओं में से एक। सुनवाने के लिए धन्यवाद।

मीत said...

अरे साहब .. आज का दिन आप की इस पोस्ट के नाम. न जाने कब से इंतज़ार था इस "कमाल" का ... शुक्रिया नहीं कहूँगा ....

शिरीष कुमार मौर्य said...

बढ़िया है चचा !

यूनुस said...

छाया जी को हम निजी तौर पर जानते हैं । विविध भारती में कई साल उनका सान्निध्‍य मिला । उनसे बहुत कुछ सीखा है । हम खुशनसीब हैं कि वो हमसे महज़ एक फोन की दूरी पर हैं । उनकी आवाज़ सुनना भला सा लगता है । रेडियोवाणी पर आप छायाजी की कई रचनाएं सुन सकते हैं ।

संजय पटेल said...

हाय कैसी करामाती काफ़ी लगाई सिध्दु भैया. शब्द को कोई छायाजी जैसी गायिका से साधना सीखे. कभी कभी बेइंतहा दु:ख होता है हमारा संगीत जगत ऐसी बेजोड़ गायिकाओं से बेरहमी से क्यों पेश आता है. क़ायदे से छाया दी के नाम से पाँच सौ रचनाएं होनीं चाहिये..एक विचित्र क़िस्म की साज़िश नज़र आती है म्युज़िक इंडस्ट्री में...यूनुस भाई इत्तेफ़ाक़ करेंगे आप मेरी बात से ?