Wednesday, January 14, 2009

अपनी मौत भी मरता है कैंसर

'अमर उजाला' के बरेली संस्करण में कार्यरत भाई योगेश्वर सुयाल इस साल कबाड़ियों की जमात में शामिल होने वाले पहले हैं. अच्छे पढ़े-लिखे आदमी हैं और हम आशा कर सकते हैं कि वे जब-तब हमें अपनी रचनात्मकता से रू-ब-रू होने का मौका देंगे. कबाड़ख़ाना उनका स्वागत करता है और इस मौके पर प्रस्तुत करता है उन्हीं के द्वारा उपलब्ध कराई गई उनकी एक बिल्कुल ताज़ा रपट:

लखीमपुर के बुजुर्ग किसान ने `लाइलाज´ कैंसर को बिना इलाज हराया

कैंसर अपनी मौत भी मरता है। इसके लिए न दवा या चीरे की जरूरत है, न ही कष्टकारी कीमो या रेडियो थेरेपी की। मगर कैंसर को हराने वाले ऐसे भाग्यशाली लड़ाके करोड़ों में एक होते हैं। लखीमपुर खीरी के किसान परागी लाल लोधी उन्हीं में से एक हैं। दाएं फेफड़े में कैंसर की गांठ के कारण डाक्टरों ने उन्हें आठ-दस महीनों का मेहमान मान लिया था। करीब छह सेमी लंबी यह गांठ बिना किसी इलाज के खत्म हो गई है।

जन साधारण भले ही इसे `चमत्कार´ माने मगर डाक्टर कहते हैं, कैंसर बिना किसी इलाज के भी ठीक होता है। पिछले अस्सी साल के चिकित्सा इतिहास में दुनिया भर में ऐसे 216 केस सामने आए हैं। सामान्यता इसका श्रेय प्रतिरोधक क्षमता को जाता है मगर परागी लाल में तो यह चमत्कार सत्तर बरस की उम्र में हुआ, जबकि प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है।
लखीमपुर में नई बस्ती निवासी धूम्रपान के शौकीन परागी लाल को 2007 की शुरुआत में बलगम में खून आने की शिकायत हुई। डाक्टरों ने उन्हें टीबी की दवाइयां खिलाईं। सीने में शूल के कारण दिल की दवाइयां भी दीं। महीने गुजर गए। वह ठीक नहीं हुए। नवंबर 2007 में यहां शील अस्पताल पहुंचे। एक्सरे और सीटी स्कैन से उसके दाएं फेफड़े में छह सेमी की गांठ दिखाई दी। ब्रोंकोस्कोपी से कैंसर की पुष्टि हुई और फिर दिल्ली की लाल पैथोलाजी ने भी बायोप्सी में छोटी कोशिकाओं का कैंसर पकड़ा, जो तेजी से बढ़ने के कारण `अतिघातक´ माना जाता है।

चिकित्सा शास्त्र के हिसाब से इलाज होता या नहीं, उनकी आठ-दस महीने से ज्यादा बचने की उ मीद नहीं थी, थोरेसिक सर्जन डा. पवन अग्रवाल कहते हैं। बूढ़ा मरीज होने के कारण सिर्फ कीमो और रेडियो थेरेपी करवाने को कहा, ताकि वह `चंद महीनोंं की बची-खुची जिंदगी´ थोड़े आराम से जी सकें। परागी लाल ने ऐसा कुछ नहीं करवाया। डाक्टर भी उसे भूल गए और इन नौ-दस महीनों में चमत्कार हो गया।

पिछले अगस्त में वह मूत्र संबंधी नई समस्या के कारण दुबारा यहां आए तो उन्हें `अन्यथा स्वस्थ´ पाकर डाक्टर भी चौंक गए। पुराने लक्षण गायब। सीटी स्कैन में फेफड़े की गांठ भी गायब। दिल्ली की लैब में सुरक्षित बायोप्सी की स्लाइडों की दुबारा जांच करवाई गई तो उसमें कैंसर ही था। मरीज में किसी भी प्रकार की सर्जरी या कीमो या रेडियो थेरेपी के चिह्न भी नहीं मिले।
हमने ऐसा सिर्फ किताबों में पढ़ा था, केजीएमयू लखनऊ से थोरेरिक सर्जरी में एमसीएच कर चुके डा. पवन बताते हैं। लंग कैंसर के प्राकृतिक रूप से ठीक होने के सिर्फ आठ केस ज्ञात हैं।

खुद परागी लाल कहते हैं : मैं ठीक हूं। मैंने बीड़ी, शराब और मांस छोड़ दिया था। सुबह जल्दी उठकर खेतों पर टहलना हमेशा की तरह जारी रखा। योग या जड़ी बूटियों के बारे में भी वह नहीं जानते हैं।

कई बीमारियां होती हैं और ठीक भी हो जाती हैं, मदीना में प्रिंस आफ सऊदी अरबिया के फिजीशियन रह चुके डा. सरकार हैदर कहते हैं। सारा खेल इम्यून सिस्टम का है। इतना जरूर है कि कैंसर जैसे रोग का अपने आप ठीक होना विरल मामला है।
ऐसे में परागी की कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। व्यापक जनहित का सवाल यह है कि मानव शरीर में ऐसी कौन सी प्रक्रिया है, जो कैंसर को ठीक कर देती है? इसका वैज्ञानिक प्रयोग कैसे अन्य कैंसर रोगियों में हो सकता है? परागी का खून यह पता लगाने के काम आ सकता है। इसे हमेशा के लिए सुरक्षित रखते हुए यह केस ब्रिटिश मेडिकल जर्नल को भी भेजा गया है।
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कैंसर पर नई दृष्टि

अमेरिकी के बाल्मीटोर में चिकित्सा, जनस्वास्थ्य समेत कई क्षेत्रों में अनुसंधान में रत जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी ने कैंसर शोध में नई दृष्टि प्रदान की है :
१. हर व्यक्ति के शरीर में कैंसर कोशिकाएं होती हैं मगर करोड़ों गुणा बढ़ने पर ही ये किसी जांच में पकड़ी जा सकती हैं।
२. अगर व्यक्ति की प्रतिरोधी प्रणाली मजबूत है तो कैंसर कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं।
३. कैंसर होने का मतलब है, व्यक्ति में बहुपोषणीय कमियां - वजहें कई हो सकती हैं - जेनेटिक, आबोहवा, भोजन या लाइफस्टाइल। भोजन और जीवनशैली बदलने से भी इससे उबर सकते हैं।
४. कीमो और रेडियोथेरेपी में अगर कैंसर कोशिकाएं खत्म होती हैं तो अच्छी कोशिकाएं भी। इनसे शुरुआती लाभ हो सकता है, मगर लंबे इस्तेमाल से इम्यून सिस्टम बैठने के कारण आदमी दूसरे संक्रमणों से मर सकता है।
५. कीमो और रेडियोथेरेपी से शरीर में विष बढ़ सकता है, जो अंतत: कैंसर कोशिकाओं के लिए खाद का काम करता है।
६. बेहतर है कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने का मौका न दिया जाए। चीनी कैंसर के लिए सबसे बढ़िया भोजन है, इसे बंद करें। इसका विकल्प है शहद, वह भी कम मात्रा में।
७. दूध से भी शरीर में यूकस बनता है, खासकर पेट और आंतों में, यूकस में भी कैंसर फलता है। दूध की बजाय बिना चीनी का सोया मिल्क लें।
८. अम्लीय माध्यम में कैंसर बढ़ता है। चाय, काफी, चाकलेट, धूम्रपान, शराब अम्ल बनाते हैं। मांस भी। इन्हें बंद करने का मतलब है कैंसर कोशिकाओं का भोजन बंद करना। परागीलाल ने भी यही किया।
९. कैंसर शरीर, मस्तिष्क और मन की बीमारी है। मन को चंगा रखें, घृणा, प्रतिस्पर्धा, तनाव से दूर रहें, कैंसर से लड़ने में मदद मिलेगी।
१०. आक्सीजन बहुल माहौल में कैंसर ज्यादा नहीं जी पाएगा। गहरी सांसें लें, सुबह शाम टहलें, कैंसर हारने लगेगा।



परागीलाल जी (ऊपर लगी तस्वीर उन्हीं की है) ने यही किया।

8 comments:

ANIL YADAV said...

जिजीविषा। परागीलाल की इस तस्वीर की आंखों में वो चीज है जिसने कैंसर को कुचल दिया। मैं उसे सलाम करता हूं।

swapandarshi said...
This comment has been removed by the author.
swapandarshi said...

Co-coincidently I was teaching about various type of skin cancers today and array of susceptibility due to differences in our genetic make up.

AT genetic level depending upon type of mutations/alleles we carry determines susceptibility of a given individual to a particular disease.

To some extent we all have mechanisms in our body to neutralize harmful chemical reactions, that eventually lead to cancer, but within a population, this ability/capacity differs among individuals.

This is something totally predictable, from the knowledge we have today.

sidheshwer said...

नए साल में नये कबाड़ी का स्वागत !
और
परागीलाल जी वाली खबर तो सचमुच एक वरदान है !बस शर्त यह है कि धैर्य हो और आम्तविश्वास भी !

Amit said...

sahi men yeh ek vardaan hai...

कविता वाचक्नवी said...

कई कमालों में एक कमाल खेतों में घूमने पर उपलब्ध प्राणवायु व प्राकृतिक जीवन का भी होगा।

उन्हें बधाई व दीर्घ स्वस्थ जीवन की शुभकामनाएँ।

Neeraj Singh said...

PREVENTION is better than Cure. We get good information about CANCER.

नीरज बसलियाल said...

काश जिंदगी इतनी ही मेहरबान होती |