Wednesday, January 14, 2009

मकर संक्रांति पर गुलजार की प्रेम-पतंग!


रोज रात छत पर तारे आते हैं और आंखें झपकाकर कहते हैं कि कह दे। रोज रात चंद्रमा सिर पर आकर खड़ा हो जाता है और मुंह बनाकर कहता है -कह दे। पता नहीं, ये हवाएं कहां से चली आती हैं और हलचल मचाती हुई कह जाती हैं कि कह दे। और तो और अधखुली खिड़की में वह पीला फूल बार-बार झांककर कहता है कि कह दे। गुलजार हमारे दिल में दबी और होठों पर रूकी इन्हीं बातों को बहुत सादा लफ्जों में लेकिन दिलकश अंदाज में बयां कर देते हैं। बसंत अभी दूर है लेकिन गुलजार के गीत से बहती हवाएं हमेशा ही इश्क के मौसम को गुलजार रखती हैं। उनके गीतों की रंगतें, अदा और अंगड़ाई अजब-गजब हैं। गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड की वजह से स्लमडॉग सुर्खियों में है लेकिन इसी फिल्म में गुलजार का लिखा गीत जय हो पर किसी का ध्यान नहीं गया है। मकर संक्रांति के ठीक पहले यह गुलजार की मोहक प्रेम-पतंग है। उन्होंने इसे अपनी कल्पना की नर्म -अो-नाजुक ठुनकियों से उठान दी है। उनके पास दिल का ऐसा उचका है जिसकी मोहब्बत की रंग-बिरंगी महीन डोर कभी न खत्म होती है न कभी आहत करती है। उनमें इश्क के पेंच लड़ाने की अदाएं तो हैं लेकिन किसी प्रेम पतंग को काटने की आक्रामकता नहीं। कटना मंजूर है, काटना हरगिज नहीं। इस गीत में भी वे अपनी महीन बात को कहने के लिए कुदरत का एक हसीन दृश्य चुनते हैं जिसमें तारों भरी रात को वे जरी वाले नीले आसमान में और भी खूबसूरत बना देते हैं। फिर इसी नीले आसमान के नीचे वे जान गंवाने, कोयले पर रात बिताने और तारों से उंगली जलाने की मार्मिक बात कहते हैं। उनकी इस अदा पर कौन न मर जाए। जरा गौर कीजिए-
आजा जरी वाले नीले आसमान के तले/रत्ती रत्ती सच्ची मैंने जान गवाई है/नाच नाच कोयलों पे रात बिताई है/अंखियों की नींद मैंने फूंकों से उड़ा दी/गिन गिन तारे मैंने ऊंगली जलाई है।
प्रेम और विरह का कितना सुंदर खयाल और किस किस मारू अंदाज के साथ। गुलजार के गीत रात, आसमान, तारे और चंद्रमा से मिलकर बनते हैं। इस गीत में भी वे हैं। लेकिन अपने शब्दों का महकता हार बनाने के लिए वे शब्दों को फूलों की तरह चुनते हैं। इस गीत में रत्ती रत्ती, नाच नाच औऱ गिन गिन शब्दों के जरिये वे लगभग न पकड़ में आने वाले अमूर्त भावों को कितनी सहजता से अभिव्यक्त कर जाते हैं। और फिर उनकी असल कविता तो सच्ची मैंने जान गंवाईं, कोयलों पे रात बिताई और तारे से उंगली जलाई पंक्तियों में जिंदा होती है। ये है अकेलेपन की तड़प, प्रेम की घनी उपस्थिति। और फिर इसमें रात को शहद मानकर चख लेने की और काले काजल को काला जादू कहने की बातें हैं। लेकिन रूकिए, असल बात तो अब है। आंखें झुकी हैं, और लब पे रुकी बात को कह डालने की यह नाजुक घड़ी है। देखिए तो सही-
कब से हां कब से जो लब पे रूकी /कह दे कह दे हां कह दे/अब आंख झुकी है/ऐसी ऐसी रोशन आंखे/रोशन दोनों हीरे हैं , क्या? / आजा जिंद नीले शामियाने के तले। जय हो, जय हो।
आंखें झुकी हैं और यह एक हसीन मौका है। इसलिए अपने दिल की , होठों पे रूकी बात कह की गुजारिश है। इस बार मकर संक्रांति पर गुलजार की यह प्रेम-पतंग कट कर हमारे आंगन में आई है। इसे अपने दिल की डोर से बांधिए, मोहब्बत से उडाइए। हवा भी मेहरबान है और सूरज भी। क्या पता, आप जिसे चाहते हैं, वह भी इस बदलते मौसम में मेहरबान हो जाए। मकर संक्रांति की शुभकामनाएं।

11 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

गुलजार के लिखे यह बोल वाकई हेमशा से खूबसूरत हैं ..मकर सक्रांति की शुभकमनाएं

Mired Mirage said...

यह गीत अभी तक तो नहीं सुना था, अब सुनने की कोशिश करूँगी। इसके बारे में बताने के लिए धन्यवाद।
घुघूती बासूती

Ashok Pande said...

सुन्दर पोस्ट! सुन्दर पेन्टिंग!!

आप को भी शुभकामनाएं.

Suresh Chnadra Gupta said...

गुलजार के सभी गीत अच्छे हैं. यह गीत भी जितना अच्छा है, उस से कम अच्छा नहीं है, गुलजार और उनके गीतों के बारे में आपका लेख. फोटो भी बहुत सुंदर है.

एस. बी. सिंह said...

कटना मंजूर है, काटना हरगिज नहीं।

सही कहा रविन्द्र भाई। चलिए हम भी कटते हैं।

Irshad said...

wonderful ji wonderful

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

आपके को मकर संक्रन्ति पर्व की बहुत बहुत शुभ कामनाऍं

shelley said...

guljar to yu v sada bahar hain

दिवाकर प्रताप सिंह said...

मकर संक्राति पर्व की हार्दिक शुभकामना और बधाई ........

ravindra vyas said...

सभी का शुक्रिया।

Bhavesh Pandey said...

GULZAAR SAHAB SAAYAD SABD APNE BACHPAN KE SAPNO OR FANTASIES SE MOTIYO KI TARAH CHUN CHUN KAR LAATE HAIN....
SACH MAIN BAHUT ACHCHI POETRY OR SATH MAIN A R REHMAN KA SAANDAAR MUSIC....
AAP SABHI KO MAKAR SANKRANTI KI SUBHKAMNAYEN...
OR VYAS JI KO IS POST KE DHANYAVAAD...