Friday, February 20, 2009

श्वेत.. धवल दिनों से वापसी और 'लाजो -लाजो'

लगता है कि पैरों में पहिये -से बँध गए हैं.नवंबर के महीने से सफ़र का जो सिलसिला चल निकला है , वह विराम नहीं ले रहा है. सफ़र पर जाने से पहले भाई विमल वर्मा जी की 'ठुमरी' पर उस्ताद शुजात हुसैन खान साहब को सुनकर गया था जो निरंतर भीतर गूँजता रहा. यह आवाज, यह सितार ,यह साज , यह सब कुछ एक सम्मोहन है. दरअसल यह वही आवाज थी जिसे सुनकर मेरे प्यारे कंप्यूटर जी अस्पताल की ओर जाने को तैयार हुए थे और मैं पैरों में पहिए बाँधकर औसत बर्फ़बारी के बाद श्वेत और धवल जैसे शब्दों को मूर्त करने का कारनामा करने वाले शहर में दाखिल होने के वास्ते चल पड़ा था .

अब लौट कर समस्या यह है कि रुटीन पर आने में कुछ रुकावट -सी आ रही है. क्या किया जाय ...सफ़र से लौटने के बाद ऐसा ही होता है अक्सर .. लगता है कि कुछ अच्छा , उम्दा , पसंदीदा सुने बिना 'शबो रोज का तमाशा' रास न आएगा. कंप्यूटर जी भी अस्पताल से लौट आये हैं.आइए आज एक बार फिर वही स्वर सुनते है..सम्मोहन से भरा.. उस्ताद शुजात हुसैन खान साहब की प्रस्तुति :'लाजो -लाजो'


3 comments:

डॉ .अनुराग said...

बेमिसाल .....

Ashok Pande said...

बहुत दिनों बाद आए बाबू जी! उम्दा माल लाए.

मैं ख़ुद मसरूफ़ था और बाक़ी कबाड़ी बेज़ार ...

टैम ठीक ना दीक्खै!

वैसे अब आप लौट आए हैं सो उम्मीद जगी रहेगी!

vijay gaur/विजय गौड़ said...

यूं यात्रा पर तो कोई भी जा सकता है, जनतंत्र है पर कबाडी भी ---!!!!
अच्छा है। हम ही मुगालते में थे कि दिहाडी-मजदूरी वालों के लिए जनतंत्र एक ढोंग है।