Monday, April 6, 2009

हवा में पिरोता रोशनी के फूल


इसकी भाषा सपनों की है
चला जाता है दूर
दूसरे हृदयों की खोज में
अदृश्य खिड़कियां खोलता हुआ
दुख की छाया में बैठकर सुस्ताता
हवा में पिरोता रोशनी के फूल

अभी यह मेरे भीतर था
ब्रह्मांड से एकाकार बजता हुआ
टिक-टिक टक-टक मेरा समय

अब यह टेबल पर रखा है
मुझसे बाहर और अलग
कुछ अनजान हाथों में
दिल के माहिर रफ़ूगरों के बीच

जीवन की आभा दमकती है
इसके रक्तहीन मुख पर
इस तरह वह जीता है मेरे बग़ैर
खुली हवा में सांस लेता हुआ
देखता हुआ रंग, स्पर्श और चेहरे

किसी टेबल पर रखा है मेरा अकेलापन
मैं एक कोने में वह दूसरे कोने में
बेसुध होते हुए भी मैं इन्तज़ार करती हूं
उसके लौटने का
अंधेरे में टटोलती हूं अपना आसपास
वह भेजता है अपनी धड़कन
दूर कहीं ब्रह्मांड से.



(पहली बार अनीता वर्मा की हृदय शीर्षक की यह कविता कबाड़खाना पर भाई अशोक पांडे के जरिये ही पढ़ी थी लिहाजा यह पोस्ट कबाड़खाना पर फिर से मेरी पेंटिंग के साथ)

8 comments:

संध्या आर्य said...

किसी टेबल पर रखा है मेरा अकेलापन
मैं एक कोने में वह दूसरे कोने में
बेसुध होते हुए भी मैं इन्तज़ार करती हूं
उसके लौटने का
अंधेरे में टटोलती हूं अपना आसपास
वह भेजता है अपनी धड़कन
दूर कहीं ब्रह्मांड से.

बस यही एक इंतजार जिन्दगी है पर फासला इतनी है कि धडकने पहुचते पहुचते थोडी मद्द्म हो जाने के कारण हिम्मत दम तोड्ने लगती है......... और इंतजार और लम्बी हो जाती है....... कई जन्म एक ही जिवन मे जीना होता है ......... अपने अकेलेपन के साथ.......

Pratibha Katiyar said...

kahan to saath men hokar bhi log sun nahin paate aawaj tak ek doosre ki aur kahan koi door brhmand se bheji gayi dhadkano ko sun raha haim gun raha hai...bahut sunadar...bahut hi sundar...

रागिनी said...

जितनी सुंदर कविता उतनी ही सुंदर पेंटिंग ! बधाई हो व्यास जी!

एस. बी. सिंह said...

भीतर और बाहर के अकेलेपन को व्यक्त करती श्रेष्ठ प्रस्तुति।

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

कविता का सोपान बड़ा है लेकिन पेंटिंग की अधिक समझ मुझमें नहीं. मुझे तो कुछ कूचियाँ उदास दिखाई पड़ रही हैं. बस्स!

श्यामल सुमन said...

भावपूर्ण रचना। उदय प्रताप हयात कहते हैं कि-

तन्हाईयों से दिल्लगी अपने मकान में।
हम ह गए हैं अजनबी अपने मकान में।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Dr.Bhawna Kunwar said...

भावपूर्ण रचना...

ravindra vyas said...

aap sabhi ka bahut shukriya! vijayshankarji ne meri painting ki udasi ko padh liya, achha laga!