Showing posts with label अनीता वर्मा. Show all posts
Showing posts with label अनीता वर्मा. Show all posts

Sunday, November 30, 2014

बुजुर्गों से


बुजुर्गों से

- अनीता वर्मा

हम चलते रहे अपनी चाल
आपको पीछे
कर चुप्पी को अनसुनी कर
हम गिरते रहे अपने हाल
दरवेश किस्से सुनाते रहे नौजवान पैंचे लड़ाते रहे

इसी बीच बाजार में बिकने लगे नाती पोते.

(चित्र: वान गॉग की कलाकृति)

Saturday, November 29, 2014

तुम्हे प्यार कर सकूँगा अगर तुम न बोलो


न बोलो

- अनीता वर्मा


इस आवाज में मत बोलो
तुमने कहा
यह आत्मा की आवाज ‌और नदी की पवित्रता की है
इससे आगे क्या शेष रह जाएगा

मैं नहीं उठ पाऊँगा फिर
एक गहरे स्वप्न में जगा
मैं तुम्हे प्यार कर सकूँगा

अगर तुम न बोलो.

(चित्र: वान गॉग की कलाकृति)

Friday, November 28, 2014

रात के बाद


रात के बाद

- अनीता वर्मा


पवित्र प्यार
भोर की उजास
फिर लौटेंगे

रात के बाद

(चित्र: वान गॉग की कलाकृति)

Thursday, November 27, 2014

मैं रह सकती हूँ किसी भी शक्ल जो तुमसे गढ़ी जाती है

इसी तरह

- अनीता वर्मा

तुम शुरुआत हो इस अनन्त की

मैं रह सकती हूँ किसी भी शक्ल
जो तुमसे गढ़ी जाती है
तुम्हारे आकार ‌और अनुभव में
मैं किसी विश्वास की तरह हूँ
तुम्हारे बुखार में ठंडी बून्दों की तरह
तुम्हारे कोहराम में मौन की तरह
मैं हूँ तुम्हारे शुरुआत ‌और तुम्हारे अंत में

(चित्र: वान गॉग की कलाकृति)

Wednesday, November 26, 2014

एक ठोस सूरज मेरे भीतर जमी हुई शक्ल में है


ठोस सूरज

- अनीता वर्मा

बर्फ़ की बेआवाज़ चादर फ़ैली हुई है
जीवन से मृत्यु तक

पृथ्वी ख़ामोश है और धीरे-धीरे घूमती है
इच्छाओं की तरह
तारे चमकते हैं धीमे-धीमे
उन्हें कोई जल्दी नहीं है
एक ठोस सूरज मेरे भीतर जमी हुई शक्ल में है
मैं सोचती हूँ और नहीं सोचती
ख़याल सिर्फ़ मकड़जाल हैं
मस्तिष्क में चुपचाप अपने तार फैलाते हुए
दिन भर के कामों में उलझी हुई
मैं पाँव सिकोड़ती हूँ
उनके भीतर सो जाने के लिए

(चित्र: वान गॉग की कृति)

Tuesday, November 25, 2014

मैं बाहर हो जाती हूँ फूल से और पेड़ से


देखते हुए

- अनीता वर्मा

देखना, सोचना, समझना
यही मैंने सीखा है
यही मेरे मनुष्य होने की विशेषता है
पर कई बार देखते हुए सोचना कठिन होता है
और सोचते हुए समझना भी उतना ही कठिन

सोचती हूँ एक फूल को कैसे समझा जाए
क्या यह सम्भव है फूल में बदले बिना
कैसे महसूस किया जाए उसकी पंखुरियों का झरना एक-एक कर
मैं अगर झरी हुई पत्तियों वाला एक पेड़ हो पाती
तो समझ पाती उसका लुटा हुआ वैभव
देखती ख़ुद उसकी वीरानी को

देखने, सोचने, समझने में लौटना
फिर उनसे दूर जाने की तरह है
मैं बाहर हो जाती हूँ फूल से और पेड़ से
सोचती हूँ उसके रंग उनकी क़िस्मों के बारे में
बसंत के बारे में जब पंखुरियाँ फिर फूल तक लौट आएंगी
कोमल हो जाएगा पेड़ अपने हरे पत्तों में
फिर मैं जागूंगी अपनी निश्छलता में
और प्रेम करूंगी उतना
जितना वह है मेरे भीतर

(चित्र: वान गॉग की कृति 'पोर्ट्रेट ऑफ़ डॉ. गैशे)

Friday, October 31, 2014

एक हँसी है जो पछतावे जैसी है, और मायूसी उम्मीद की तरह


चेहरा

- अनीता वर्मा

इस चेहरे पर जीवन भर की कमाई दिखती है
पहले दुःख की एक परत
फिर एक परत प्रसन्नता की
सहनशीलता की एक और परत
एक परत सुन्दरता
कितनी क़िताबें यहाँ इकट्ठा हैं
दुनिया को बेहतर बनाने का इरादा
और ख़ुशी को बचा लेने की ज़िद.

एक हँसी है जो पछतावे जैसी है,
और मायूसी उम्मीद की तरह.
एक सरलता है जो सिर्फ़ झुकना जानती है,
एक घृणा जो कभी प्रेम का विरोध नहीं करती

आईने की तरह है स्त्री का चेहरा
जिसमें पुरूष अपना चेहरा देखता है,
बाल सँवारता है मुँह बिचकाता है
अपने ताकतवर होने की शर्म छिपाता है

इस चेहरे पर जड़ें उगी हुई हैं
पत्तियाँ और लतरें फैली हुई हैं
दो-चार फूल हैं अचानक आई हुई ख़ुशी के
यहाँ कभी-कभी सूरज जैसी एक लपट दिखती है
और फिर एक बड़ी सी खाली जगह.


Thursday, October 30, 2014

हमें वहीं जाना होता है बार बार


रात की तरह मृत्यु

- अनीता वर्मा

रात की तरह
मृत्यु की
परछाईं नहीं होती

वह सिर्फ़
हमें आग़ोश में
ले लेती है

हम छटपटाते हैं
सिर धुनते हुए
वापस लौटने को तत्पर

सुरंग के
दूसरे छोर पर
दिखता है एक हल्का प्रकाश
कुछ प्रिय चेहरे गड्ड-मड्ड

हमें
वहीं जाना होता है
बार बार

उन चेहरों का हिस्सा बनने.

Thursday, April 22, 2010

अनीता वर्मा की एक छोटी सी कविता

अनीता वर्मा जी समकालीन हिन्दी कविता में एक सुपरिचित नाम हैं. इस ब्लॉग पर उनकी कविताएं एकाधिक बार प्रस्तुत की गई हैं और भरपूर सराही गई हैं हाल ही में उन्हें शीला सिद्धान्तकर स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया है. उन्हें इस उपलब्धि के लिए कबाड़ख़ाना हार्दिक बधाई देता है. पढ़िये उनके पहले संग्रह से एक छोटी सी कविता:

बुज़ुर्गों से

हम चलते रहे अपनी चाल
आपको पीछे कर चुप्पी को अनसुनी कर
हम गिरते रहे अपने हाल
दरवेश क़िस्से सुनाते रहे नौजवान पेंचें लड़ाते रहे
इसी बीच बाज़ार में बिकने लगे नाती-पोते.

Monday, August 3, 2009

मुझे अचानक दिखाई दिये कहीं खिले हुए कुछ फूल

कल की सीरीज़ को जारी रखते हुए आज पढ़वा रहा हूं आपको अनीता वर्मा जी के दूसरे संग्रह 'रोशनी के रास्ते पर' से एक और कविता.

अनिंदो दा के साथ

कल शाम अनिंदो दा आये थे
उनके साथ हमने बीते दिनों को याद किया
कैसे निवारणपुर का नाम पड़ा था निवारणचंद्र दासगुप्ता के नाम पर
जिन्होंने आजीवन स्कूल में ही पढ़ाने का व्रत लिया था
और उनकी बेटी बासंती देवीके पिता और भाई विभूतिभूषण के जेल जाने पर
उनके धर्मपिता बने थे राजेन्द्रप्रसाद और मां बनीं कस्तूरबा
वे वर्धा में रहीं 'बा' के पास, उन्हीं से सब कुछ सीखा
अभी कुछ समय पहले तक रहती थीं चांडिल के पास निमडी में
समाज सेवा करती थीं और उन्हें इस बुरे समय से कोई लेना-देना नहीं था
अनिंदो दा ने बताया, उनके नाना ने कभी पढ़ाया था इंदिरा गांधी को
एक बार जब उनकी चिट्ठी आई थी
तभी सबने इस बात पर विश्वास किया था
और उनके नाना ने तीस रुपये माहवार पाते हुए
अपने आश्रम में पढ़ाया था सात आदिवासी लड़कों को
वे सभी अनिंदो दा के मामा थे
और उनमें से एक उपेन किस्कू अभी हाल में मिले थे उनसे
पहचाना था उसी पुराने आत्मीय रिश्ते से

गांव में चार महीने पहले से होता था जात्रा का अभ्यास
दूर-दूर से इकट्ठे होते छोते-बड़े सभी दालान पर
अलग-अलग रिहर्सल होती, कहीं बकासुर वध
कहीं छोटे बच्चों का नाच गान
दोपहर होते ही घंटी बजती और सभी एक पांत में बैठकर खाते
मोटे चावल का दाल-भात और आलू-पोस्ते की सब्ज़ी
अगले इतवार फिर सब तैयार
तब तक कोई ब्रांड नहीं था
सभी सस्ता पहनते मामूली खाना खाते
एक दूसरे का संग-साथ निभाते ख़ुश रहते

एक लड़का था सुब्रतो बागची जिसके पिता छोटे अधिकारी थे
अब वह प्रबंधन का बड़ा अधिकारी है
उसने बताया प्रबंधन पास किये लड़कों को
कि उसने अपने पिता से कुछ बातें सीखी थीं
जिनमें एक था सबसे उम्र के अनुसार रिश्ते बनाना
चाहे वह घर में काम करने वाला नौकर हो या ड्राइवर
दूसरा, जिस घर में जाना वहां साफ़-सफ़ाई के बाद
द्वार पर मिट्टी ठीक कर उसमें फूल-पौधे लगाना
जैसे ही साल-भर में फूलों के खिलने का मौसम आता
पिताजी का तबादला हो जाता
अंततः सुब्रतो ने एक दिन कर दिया इन्कार
कहा क्या फ़ायदा इससे, हमें तो अब चले ही जाना है यहां से
तब पिता ने कहा, तुम अगर नयी जगह में दूसरे घर में जाओगे
और पाओगे उसे साफ़ और फूलों से भरा तो कैसा लगेगा तुम्हें

शाम गहरी हो गई थी जब हमारी बातें ख़त्म हुईं
मुझे अचानक दिखाई दिये कहीं खिले हुए कुछ फूल
और तभॊ कोई लालटेन का शीशा साफ़ कर
उसे जला कर रख गया था.

(कबाड़ख़ाने में अनीता जी की कविताएं यहां भी:

प्रभु मेरी दिव्यता में सुबह-सबेरे ठंड में कांपते रिक्शेवाले की फटी कमीज़ ख़लल डालती है
प्रार्थना
वान गॉग के अन्तिम आत्मचित्र से बातचीत
सभ्यता के साथ अजीब नाता है बर्बरता का)

Sunday, August 2, 2009

वे गाते हैं कई पुराने गीत, जिन में आज की कोई ख़ुदगर्ज़ आवाज़ नहीं

अनीता वर्मा की कविता 'झारखंड' दरअसल अकेले झारखंड की कविता नहीं है. यह हमारे स्वातंत्र्योत्तर समाज में आए एक व्यापक राजनैतिक-सामाजिक पतन का दस्तावेज़ है.



झारखंड

हमने अल्बर्ट एक्का को चौराहे का पहरेदार बना दिया है
वह देखता रहता है दिन-रात भीड़, जुलूस, धरने और प्रदर्शन
उसकी आत्मा वहीं ज़मीन पर बैठी सुनती रहती है
नेताओं के झूठे बोल और आश्वासन
धूल, गर्द, गर्मी और पसीने के बीच वह देखता है हमारी धरती का गौरव
बड़े-बड़े होर्डिंग्स और पोस्टर
लालची और बेईमान चेहरे
गांवों-जंगलों से हांक कर लाए गए आदिवासियों की भोली निष्पाप सूरतें
वे कुछ नहीं समझते उनके हक़ में क्या है
न्याय क्या है लड़ाई क्या है
वे तो बस हथियार और जयजयकार हैं
शाम होते लौट जाते हैं अपने गांव
दिन-भर गुड़, चना, सत्तू, दाल-भात खाकर
फिर सोचते भी नहीं कोई करेगा उनका भला

रोज़ रात वे सब मिलते हैं
एक जगह बैठते हैं सब
बिरसा मुंडा, अल्बर्ट एक्का,जतरा, बुधू भगत,
सिद्धू कान्हू, तिलकामांझी, नीलांबर पीतांबर
मशालों के बॊचोबीच बैठे करते हैं गुफ़्तगू
फिर धीरे-धीरे इकठ्ठे होते हैं ढेरों जा चुके लोग
अपने-अपने ताबूतों को उठाए तीर-धनिष हथियारों से लैस
गाते हैं कई पुराने गीत, जिन में आज की कोई ख़ुदगर्ज़ आवाज़ नहीं
वे सब अब लौट कर नहीं आएंगे
और हममें ऐसा कुछ नहीं रह गया
कि हम उनके गीतों के पीछे-पीछे जा सकें कुछ दूर तक.

(कबाड़ख़ाने में अनीता जी की कविताएं यहां भी:

प्रभु मेरी दिव्यता में सुबह-सबेरे ठंड में कांपते रिक्शेवाले की फटी कमीज़ ख़लल डालती है
प्रार्थना
वान गॉग के अन्तिम आत्मचित्र से बातचीत
सभ्यता के साथ अजीब नाता है बर्बरता का)

*अल्बर्ट एक्का चौक रांची की फ़ोटो www.ranchi.net से साभार.

Monday, April 6, 2009

हवा में पिरोता रोशनी के फूल


इसकी भाषा सपनों की है
चला जाता है दूर
दूसरे हृदयों की खोज में
अदृश्य खिड़कियां खोलता हुआ
दुख की छाया में बैठकर सुस्ताता
हवा में पिरोता रोशनी के फूल

अभी यह मेरे भीतर था
ब्रह्मांड से एकाकार बजता हुआ
टिक-टिक टक-टक मेरा समय

अब यह टेबल पर रखा है
मुझसे बाहर और अलग
कुछ अनजान हाथों में
दिल के माहिर रफ़ूगरों के बीच

जीवन की आभा दमकती है
इसके रक्तहीन मुख पर
इस तरह वह जीता है मेरे बग़ैर
खुली हवा में सांस लेता हुआ
देखता हुआ रंग, स्पर्श और चेहरे

किसी टेबल पर रखा है मेरा अकेलापन
मैं एक कोने में वह दूसरे कोने में
बेसुध होते हुए भी मैं इन्तज़ार करती हूं
उसके लौटने का
अंधेरे में टटोलती हूं अपना आसपास
वह भेजता है अपनी धड़कन
दूर कहीं ब्रह्मांड से.



(पहली बार अनीता वर्मा की हृदय शीर्षक की यह कविता कबाड़खाना पर भाई अशोक पांडे के जरिये ही पढ़ी थी लिहाजा यह पोस्ट कबाड़खाना पर फिर से मेरी पेंटिंग के साथ)

Thursday, March 5, 2009

जब मैं पैदा हुई तो मुझमें दोष था क्योंकि मैं लड़की थी

अनीता वर्मा ने नए संग्रह 'रोशनी के रास्ते पर' से एकाध कविताएं यहां हाल में आप पढ़ चुके हैं. मैं जितनी बार इस किताब को पढ़ता हूं जीवन और कविता पर मेरा विश्वास गहराता जाता है. अनीता जी ने इस किताब में वाक़ई जादू किया है. जादू करने के लिए कोई जतन नहीं लगाया है, चीज़ों को और भी सादगी नवाज़ी गई है. मैं इस संग्रह से आपको अभी कई उल्लेखनीय चीज़ें पढ़वाऊंगा. इस सीरीज़ में फ़िलहाल ये दो कविताएं और प्रस्तुत हैं:

दोष

जब मैं पैदा हुई तो मुझमें दोष था
क्योंकि मैं लड़की थी
जब थोड़ी बड़ी हुई तब भी दोषी रही
क्योंकि मेरी बुद्धि लड़कों से ज़्यादा थी
थोड़ी और बड़ी हुई तो दोष भी बड़ा हुआ
क्योंकि मैं सुन्दर थी और लोग मुझे सराहते थे
और बड़ी होने पर मेरे दोष अलग थे
क्योंकि मैंने ग़लत का विरोध किया
बूढ़ी होने पर भी मैं दोषी रही
क्योंकि मेरी इच्छाएं ख़त्म नहीं हुई थीं
मरने पर भी मैं दोषी रही
क्योंकि इन सबके कारण असंभव थी मेरी मुक्ति.

रोशनी

उसका नाम रोशनी था
आदिवासी एक लड़की
जिसे बनना था नन
वह कभी पागलों सा करती
मोटे लाल पपोटे उसके
जंगली फूलों से दिखते
बोलती तो लकड़ी के दरवाज़े थरथराते
आरियों सी काटती उसकी चीख़

मुझे पता है मेरा अंत
यहीं कहीं है वह आसपास
फूल-फूल नहीं प्यार नहीं
मुरझाना है मुझे वसन्त में
सूरज बनना है
लाल एक पहाड़
कोई दो मुझे मेरी नींद

दिलासा एक आसान पत्थर था
जिस पर पतक देती वह सर
सिस्टर कैथरीन उसे बांहों में भर लेतीं
रोशनी मेरी बच्ची

कई वर्ष बाद मिली रोशनी
मेडिकल कॉलेज में
वह डॉक्टर बन रही थी
अच्छा करेगी वह
बच्चों को और स्त्रियों को
बच्चे, स्त्री, ग़रीब रोशनी.

Monday, February 23, 2009

सपनों की होती है हृदय की भाषा



अनीता वर्मा जी से सम्बन्धित पिछली पोस्ट में मैंने आपको बताया था कि दो-तीन साल पहले उनका बहुत बड़ा ऑपरेशन हुआ था. उस भीषण सर्जरी में काफ़ी समय तक उनके हृदय को देह से अलग निकाल कर रख दिया गया था.

ज़रा देखिये सतत आशावान अनीता जी उस विकट अनुभव से भी जीवन निकाल कर कैसे खींच लाती हैं. शायद इसी वजह से वे मुझे आज लिख रहे कवियों की जमात में बहुत बहुत ज़रूरी लगती हैं अपने लिए.

पढ़िये उनके दूसरे संग्रह 'रोशनी के रास्ते पर' से एक और कविता:


हृदय

इसकी भाषा सपनों की है
चला जाता है दूर
दूसरे हृदयों की खोज में
अदृश्य खिड़कियां खोलता हुआ
दुख की छाया में बैठकर सुस्ताता
हवा में पिरोता रोशनी के फूल

अभी यह मेरे भीतर था
ब्रह्मांड से एकाकार बजता हुआ
टिक-टिक टक-टक मेरा समय

अब यह टेबल पर रखा है
मुझसे बाहर और अलग
कुछ अनजान हाथों में
दिल के माहिर रफ़ूगरों के बीच
जीवन की आभा दमकती है
इसके रक्तहीन मुख पर
इस तरह वह जीता है मेरे बग़ैर
खुली हवा में सांस लेता हुआ
देखता हुआ रंग, स्पर्श और चेहरे

किसी टेबल पर रखा है मेरा अकेलापन
मैं एक कोने में वह दूसरे कोने में
बेसुध होते हुए भी मैं इन्तज़ार करती हूं
उसके लौटने का
अंधेरे में टटोलती हूं अपना आसपास
वह भेजता है अपनी धड़कन
दूर कहीं ब्रह्मांड से.

Friday, February 20, 2009

हमें वहीं जाना होता है बार बार उन चेहरों का हिस्सा बनने

अनीता वर्मा की कविताओं से आप परिचित हैं ही. उनका पहला संग्रह 'एक जन्म में सब' बहुत चर्चित हुआ और सम्मानित भी. अभी दिल्ली में उनका नवीनतम संग्रह 'रोशनी के रास्ते पर' (२००८ में प्रकाशित) मिल गया. उनसे मेरी सिर्फ़ एक मुलाकात है. दो-तीन वर्ष पहले उनका एक बेहद जटिल ऑपरेशन हुआ था दिल्ली में - बहुत ही ख़तरनाक. मैं शाम को दिल्ली पहुंचा था. मुझे उसी रात यूरोप यात्रा पर निकल जाने की जल्दी थी. अनीता जी अस्पताल से वापस आकर मेरे होटल से नज़दीक मौजूद झारखण्ड भवन में स्वास्थ्यलाभ कर रही थीं.

एक संक्षिप्त मुलाकात के दौरान मुझे उनकी निश्छल पारदर्शिता और मजबूत ऑप्टिमिज़्म ने बांध कर रख लिया था. आज तक उनसे सम्पर्क बना हुआ है और यही दो उनकी ख़ूबियां आज भी मुझे सबसे ज़्यादा आकर्षित करती हैं. हां, बेहतरीन इन्सान तो ख़ैर वे हैं ही.

इस नए संग्रह में वे और अधिक आशाभरी मानवीय कविताओं के साथ आई हैं.

मेरा प्रयास रहेगा आप को इस संग्रह से चुनिन्दा रचनाएं पढ़वा सकूं. इस क्रम में आज प्रस्तुत है उनकी 'अस्पताल डायरी':




अस्पताल डायरी



शीशे के बाहर बैठा है
एक कबूतर और उसका बच्चा
यह अस्पताल बीमारों को जीवन देता है
कबूतर को भी देता है जगह



मृत्यु चली गई पुरानी चप्पलें पहनकर
मैं एक बार फिर लौट आई
अपने आप से कोई समझौता करने



दूर सड़क पर गाड़ियों की रोशनी
वहां गति है जीवन है
यहां दर्द की आंखें उन्हें देखती हुईं



वह मुझे उठाती है ज़मीन पर गिरे हुए
एक फूल की तरह
हमारे बीच दर्द की आवाज़ है.



मिज़ोरम की वह नर्स नीलांचली
मेरी हर बात दोहराती है
मैं कहती हूं बत्ती बन्द कर दीजिए
वह कहती है बत्ती बन्द कर दीजिए
और बुझा देती है बत्ती
मैं कहती हूं दूसरे बिस्तर की मरीज़ को
लगती है ठण्ड ए.सी. बन्द कर दीजिए
और वह बन्द कर देती है ए.सी.
मैं कहती हूं मुझे दर्द है
वह कहती है दर्द है और ला देती है दवा



बारिश भीतर उतरती रही
ज्यों ही उसे सुना
वह गुम हो गई.



रात की तरह मृत्यु की परछाईं नहीं होती
वह सिर्फ़ हमें आग़ोश में ले लेती है
हम छटपटाते हैं सिर धुनते हुए
वापस लौटने को तत्पर
सुरंग के दूसरे छोर पर
दिखता है एक हल्का प्रकाश
कुछ प्रिय चेहरे गड्डमड्ड
हमें वहीं जाना होता है बार बार
उन चेहरों का हिस्सा बनने.



वह रात भर रोता रहा
लौट आए उसकी प्रिय
लौट आए फिर एक बार.



मैं हर समय उसे याद करती हूं
जो इस नए संसार में बेहद शामिल है
जो कभी मुड़कर नहीं आएगा मेरी तरफ़

१०

मैं अपने ही विरुद्ध खड़ी थी
अपने विश्वासों के साथ
उनसे बचने को आतुर.

('रोशनी के रास्ते पर' - राजकमल प्रकाशन द्वारा २००८ में प्रकाशित. मूल्य रु. १५०)

कबाड़ख़ाने में अनीता जी की कविताएं यहां भी:

प्रभु मेरी दिव्यता में सुबह-सबेरे ठंड में कांपते रिक्शेवाले की फटी कमीज़ ख़लल डालती है
प्रार्थना
वान गॉग के अन्तिम आत्मचित्र से बातचीत
सभ्यता के साथ अजीब नाता है बर्बरता का

Friday, August 22, 2008

सभ्यता के साथ अजीब नाता है बर्बरता का

तर्पण

अनीता वर्मा

जब नहीं थे राम बुद्ध ईसा मोहम्मद
तब भी थे धरती पर मनुष्य
जंगलों में विचरते आग पानी हवा के आगे झुकते
किसी विश्वास पर ही टिका होता था उनका जीवन

फिर आए अनुयायी
आया एक नया अधिकार युद्ध
घृणा और पाखण्ड के नए रिवाज़ आए
धरती धर्म से बोझिल थी
उसके अगंभीर भार से दबती हुई

सभ्यता के साथ अजीब नाता है बर्बरता का
जैसे फूलों को घूरती हिंसक आंख
हमने रंग से नफ़रत पैदा की
सिर्फ़ उन दो रंगों से जो हमारे पास थे
उन्हें पूरक नहीं बना सके दिन और रात की तरह
सभ्यता की बढ़ती रोशनी में
प्रवेश करती रही अंधेरे की लहर
विज्ञान की चमकती सीढ़ियां
आदमी के रक्त की बनावट
हम मस्तिष्क के बारे में पढ़ते रहे
सोच और विचार को अलग करते रहे

मनुष्य ने संदेह किया मनुष्य पर
उसे बदल डाला एक जंतु में
विश्वास की एक नदी जाती थी मनुष्यता के समुद्र तक
उसी में घोलते रहे अपना अविश्वास
अब गंगा की तरह इसे भी साफ़ करना मुश्किल
कब तक बचे रहेंगे हम इस जल से करते हुए तर्पण.

---------------------------------
कबाड़ख़ाने पर अनीता जी की कविताएं यहां भी हैं:

प्रभु मेरी दिव्यता में सुबह-सबेरे ठंड में कांपते रिक्शेवाले की फटी कमीज़ ख़लल डालती है
प्रार्थना
वान गॉग के अन्तिम आत्मचित्र से बातचीत

Wednesday, April 16, 2008

प्रभु मेरी दिव्यता में सुबह-सबेरे ठंड में कांपते रिक्शेवाले की फटी कमीज़ ख़लल डालती है

प्रभु मेरी दिव्यता में
सुबह-सबेरे ठंड में कांपते
रिक्शेवाले की फटी कमीज़ ख़लल डालती है

मुझे दुख होता है यह लिखते हुए
क्योंकि यह कहीं से नहीं हो सकती कविता
उसकी कमीज़ मेरी नींद में सिहरती है
बन जाती है टेबल साफ़ करने का कपड़ा
या घर का पोछा
मैं तब उस महंगी शॉल के बारे में सोचती हूं
जो मैं उसे नहीं दे पाई

प्रभु मुझे मुक्त करो
एक प्रसन्न संसार के लिए
उस ग्लानि से कि मैं महंगी शॉल ओढ़ सकूं
और मेरी नींद रिक्शे पर पड़ी रहे.

'एक और प्रार्थना' शीर्षक यह कविता अनीता वर्मा की है. अनीता वर्मा जी को आप कबाड़ख़ाने में पहले भी पढ़ चुके हैं. विन्सेन्ट वान गॉग पर उनकी कविता भी यहां लगाई जा चुकी है. बहुत हर्ष का विषय है कि सन २००६ का प्रतिष्ठित बनारसीदास भोजपुरी सम्मान उन्हें उनके कविता संग्रह 'एक जन्म में सब' के लिये दिया गया है. ६ अप्रैल को उनके नगर रांची में उन्हें यह सम्मान हिन्दी के वरिष्ठ कवि श्री लीलाधर जगूड़ी़ द्वारा प्रदान किया गया. समारोह में हिन्दी के अनेक नामचीन्ह समकालीन कवि-आलोचक उपस्थित थे. उस अवसर का एक फ़ोटो मुझे कल अनीता जी के सौजन्य से मेल द्वारा प्राप्त हुआ.


इस अवसर पर कबाड़ख़ाना अनीता जी को बधाई प्रेषित करता है. वे दर असल आज की फ़तवेबाज़ और बगूलाभगत दार्शनिकता का पर्याय बन चुकी अधिकतर हिन्दी कविता से इतर बहुत संवेदनशील और सार्थक रचना करने वाले विरल कवियों में हैं. अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा भी कि कविता उनके लिए जीवन की तरह ही पवित्र, सुंदर और निष्कलुष है.

प्रस्तुत है उनकी एक कविता:

यथास्थिति

आप पहाड़ पर रहते हैं तो आ जाएं नीचे
आप ज़मीन पर हैं तो आइए ऊंचाई पर
पहाड़ की सुगंध क्या साथ आई है आपके
या आप उठा लाए हैं पहाड़
ज़मीन की घास पर न रखें पहाड़
उसे रहने दें यूं ही
घास मिट्टी की उजास है
और पहाड़ नदियों का पिता.

(भूलसुधार: ब्लॉगवाणी में प्रदर्शित किया जा रहा पोस्ट का शीर्षक भूल से ग़लत लग गया. कविता में "रिक्शेवाले की फटी कमीज़ " है, "रिक्शेवाले की नींद" नहीं. क्षमा करें. )

Saturday, January 26, 2008

प्रार्थना

मेरे सबसे प्रिय समकालीन लेखक-कवियों में एक हैं अनीता वर्मा। अनीता जी रांची में रहती हैं। बेहद संवेदनशील और सचेत यह लेखिका मुझे अपनी अथक जिजीविषा से बहुत प्रभावित और आकर्षित करती रही हैं। पिछले कई सालों से दुर्भाग्यवश उनका स्वास्थ्य बहुत ज़्यादा खराब रहा है और पता नहीं कितने आपरेशन उनके हुए हैं। उसके बावजूद समय निकाल कर वे लिखती रहती हैं और चुनिन्दा पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं देखने को मिलती रहती हैं।

इस शानदार कवयित्री और उस से भी शानदार व्यक्ति की दो कविताएं पढ़िए:

पुरानी हंसी

मुझे अच्छी लगती है पुरानी कलम
पुरानी कापी पर उल्टी तरफ़ से लिखना
शायद मेरा दिमाग पुराना है या मैं हूं आदिम
मैं खोजती हूं पुरानापन
तुरत आयी एक पुरानी हंसी मुझे हल्का कर देती है
मुझे अच्छे लगते हैं नए बने हुए पुराने संबंध
पुरानी हंसी और दुख और चप्पलों के फ़ीते
नयी परिभाषाओं की भीड़ में
संभाले जाने चाहिए पुराने संबंध
नदी और जंगल के
रेत और आकाश के
प्यार और प्रकाश के।


प्रार्थना

भेद मैं तुम्हारे भीतर जाना चाहती हूं
रहस्य घुंघराले केश हटा कर
मैं तुम्हारा मुंह देखना चाहती हूं
ज्ञान मैं तुमसे दूर जाना चाहती हूं
निर्बोध निस्पंदता तक
अनुभूति मुझे मुक्त करो
आकर्षण मैं तुम्हारा विरोध करती हूं
जीवन मैं तुम्हारे भीतर से चलकर आती हूं।


(दोनों कविताएं राजकमल प्रकाशन से २००३ में छपे अनीता जी के संग्रह 'एक जन्म में सब' से साभार।)

Wednesday, October 17, 2007

अनीता वर्मा की कविता ' वान गॉग के अन्तिम आत्मचित्र से बातचीत'

एक पुराने परिचित चेहरे पर
न टूटने की पुरानी चाह थी
आंखें बेधक तनी हुई नाक
छिपने की कोशिश करता था कटा हुआ कान
दूसरा कान सुनता था दुनिया की बेरहमी को
व्यापार की दुनिया में वह आदमी प्यार का इन्तज़ार करता था

मैंने जंगल की आग जैसी उसकी दाढ़ी को छुआ
उसे थोड़ा सा क्या नहीं किया जा सकता था काला
आंखें कुछ कोमल कुछ तरल
तनी हुई एक हरी नस ज़रा सा हिली जैसे कहती हो
जीवन के जलते अनुभवों के बारे में क्या जानती हो तुम
हम वहां चल कर नहीं जा सकते
वहां आंखों को चौंधियाता हुआ यथार्थ है और अन्धेरी हवा है
जन्म लेते हैं सच आत्मा अपने कपड़े उतारती है
और हम गिरते हैं वहीं बेदम

ये आंखें कितनी अलग हैं
इनकी चमक भीतर तक उतरती हुई कहती है
प्यार मांगना मूर्खता है
वह सिर्फ किया जा सकता है
भूख और दुख सिर्फ सहने के लिए हैं
मुझे याद आईं विन्सेन्ट वान गॉग की तस्वीरें
विन्सेन्ट नीले या लाल रंग में विन्सेन्ट बुखार में
विन्सेन्ट बिना सिगार या सिगार के साथ
विन्सेन्ट दुखों के बीच या हरी लपटों वाली आंखों के साथ
या उसका समुद्र का चेहरा

मैंने देखा उसके सोने का कमरा
वहां दो दरवाज़े थे
एक से आता था जीवन
दूसरे से गुज़रता निकल जाता था
वे दोनों कुर्सियां अन्तत: खाली रहीं
एक काली मुस्कान उसकी तितलियों गेहूं के खेतों
तारों भरे आकाश फूलों और चिमनियों पर मंडराती थी
और एक भ्रम जैसी बेचैनी
जो पूरी हो जाती थी और बनी रहती थी
जिसमें कुछ जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता था

एक शान्त पागलपन तारों की तरह चमकता रहा कुछ देर
विन्सेन्ट बोला मेरा रास्ता आसान नहीं था
मैं चाहता था उसे जो गहराई और कठिनाई है
जो सचमुच प्यार है अपनी पवित्रता में
इसलिए मैंने खुद को अकेला किया
मुझे यातना देते रहे मेरे अपने रंग
इन लकीरों में अन्याय छिपे हैं
यह सब एक कठिन शान्ति तक पहुंचना था
पनचक्कियां मेरी कमजोरी रहीं
ज़रूरी है कि हवा उन्हें चलाती रहे
मैं गिड़गिड़ाना नहीं चाहता
आलू खाने वालों और शराव पीने वालों के लिए भी नहीं
मैंने उन्हें जीवन की तरह चाहा है

अलविदा मैंने हाथ मिलाया उससे
कहो कुछ कुछ हमारे लिए करो
कटे होंठों में भी मुस्कराते विन्सेन्ट बोला
समय तब भी तारों की तरह बिखरा हुआ था
इस नरक में भी नृत्य करती रही मेरी आत्मा
फ़सल काटने वाली मशीन की तरह
मैं काटता रहा दुख की फ़सल
आत्मा भी एक रंग है
एक प्रकाश भूरा नीला
और दुख उसे फैलाता जाता है।