Sunday, May 17, 2009

चुनाव के नतीज़ों ने जी खट्टा कर दिया




एक महीने से ज़्यादा हुआ. १६ मई की प्रतीक्षा थी. पांच साल तक मुझ जैसे निठल्ले दर्शक उस शानदार नाटक का इन्तज़ार कर रहे थे जिसे देख कर ही हमें यकीन करने की आदत पड़ गई थी कि हमारा लोकतन्त्र ही दुनिया का सबसे शानदार लोकतन्त्र है.

सारी तैयारियां हो चुकी थीं.

न्यूज़ चैनल्स अपने अपने एक्ज़िट पोल दिखा रहे थे और प्रधानमन्त्री पद के कम - अज़- कम दस प्रत्याशी अपने अपने कॉस्ट्यूम प्रापर्टी वगैरह की जुगत में लग चुके थे. ज्योतिषियों का बाज़ार गर्म हो गया था और दूरबीनों में आंखें घुसाए कर सारे नेतागण अपनी हथेलियों पर राजयोग की रेखा खोज रहे थे.

बड़ी पार्टियों ने पांच साल से इकठ्ठा किये नोटों की बोरियां धूप दिखाने रख दी थीं. सारे पटनीय सांसदों को दस-दस एक्सक्लूसिव मोबाइल नम्बर दिये जाने का जुगाड़ बना लिया गया था. जिसे मर्सिडीज़ में गर्मी लग रही थी, उसके लिए मर्सिडीज़-बेन्ज़ कम्पनी के आला अधिकारियों से सम्पर्क साधा जा चुका था. लेकिन ज़्यादातर उद्योगपतियों और बड़े बिज़नेसमैनों के सामने गिफ़्ट छांटने की समस्या आन खड़ी हो गई थी.

सोलह मई दोपहर दो बजे से सारे न्यूज़ चैनल बेरोजगार हो चुके थे. 'ये कैसा परिणाम दे रहे हो यार भाईलोगो?' - एंकरगण भारतवासियों से पूछते नज़र आ रहे थे. 'कुछ हमारे बाल-बच्चों का ख्याल तो कर लेते प्रभु!'

धोखा हुआ है!

सरासर धोखा!

बालकनी का टिकट लिया, बड़ी स्क्रीन वाला नया टीवी खरीदा.

पहला एक्ट और नाटक फ़िनिश! बस! हो गया!

क्या है यार!

हमारे पैसे वापस दो!

मुर्दाबाद! मुर्दाबाद!

17 comments:

Ek ziddi dhun said...

sahi likha aur sahi tasveer di

Ek ziddi dhun said...

shayad Anil Yadav bhi charge ho jayen aur is babat kuchh post den. Apki pichhli post bhi shandaar thi.

संगीता पुरी said...

बिल्‍कुल सही लिखा .. ऐसे परिणाम की उम्‍मीद किसी को कतई नहीं थी।

sidheshwer said...

लेकिन बाबू जी, आपकी पोस्ट ने मीठा -२ कर दिया.

संदीप शर्मा said...

:)

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

पैसा वसून न हुआ।

Syed Ali Hamid said...

Well said. A five-act play was reduced to a one-act play and many actors lost their jobs. The only thing that can provide them relief, at the moment, is to take some huge swigs of the 'giant killer.'

ANIL YADAV said...

एक डंडी के सहारे तिरछी झुकी डलिया थी। नीचे चावल के दाने थे। एक रस्सी थी जिसका एक सिरा पकड़े बरामदे में सिर्फ चड्ढी पहने राहुल बाबा गौरेया के फंसने का इंतजार कर रहे थे। दरवाजे के पीछे सोनिया, दीदी प्रियंका, जीजा राबर्ट वगैरा अपनी सोच रहे थे हाय अब क्या होगा। मनमोहन जी के हाथ में पिंजरा था। तभी हवा के झोंके से धप्प। डलिया अपने आप गिर गई। उठाकर देखा तो हायराम, उसमें बटेर था।

अविनाश वाचस्पति said...

आपका जी मीठा ही कब था
पप्‍पू ने खूब पप्‍पू बनाया
बेटा बबलू।

woyaadein said...

अब सांप तो निकल गया, सो लकीर पीटने से कोई फायदा नहीं है. चलिए देखते हैं आगे क्या होता है??

साभार
हमसफ़र यादों का.......

रवीन्द्र रंजन said...

हा हा हा
इशारों इशारों में अच्छी क्लास ली आपने न्यूज चैनल वालों की। बेचारे..

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

अन्धा पीसे कुत्ता खाय।

अनिल कान्त : said...

tasveer badi majedar hai

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

... सरासर धोखा तो मेरे साथ हुआ है. इस पोस्ट में मेरी अवस्था वाली पेंटिंग लगाने की क्या आवश्यकता थी. किसी ने धोखे से मेरी यह पेंटिंग तैयार की है और आपने कबाड़खाना में छापकर मेरी पर्याप्त बदनामी कर दी. मैं सुप्रीम कोर्ट तक जाऊंगा!

रंजन said...

हा हा..

नीरज गोस्वामी said...

ये तो वोही बात हुई की आप का सी टी स्केन हुआ ढेर सा रुपया लग गया और डाक्टर ने देख कर बोला की आपको कुछ नहीं है याने के स्केन करवाने के रूपये बर्बाद हो गए...
बहुत ही आनंद दाई पोस्ट लिखी है आपने...बिचारे चेनल वाले...और वो बहनजी जो हाथी की सवारी कर रहीं थीं...उनका सोचिये उसी तले कुचली गयीं...अनर्थ हो गया भाई अनर्थ,,,,इसे कहते हैं घोर कलयुग...
नीरज

Dipti said...

बहुत ही सही कटाक्ष किया है...

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