Friday, November 27, 2009

एक हिमालयी यात्रा: तीसरा हिस्सा



(पिछली किस्त से जारी)

... हर जगह लोग हमसे इतने प्यार से मिलते रहे हैं. गुमानसिंह तितियाल की पानीदार आंखें मेरी नींद में उभरती हैं. इस समय वे कोई तीख़ी चढ़ाई चढ़ रहे होंगे. नाच-गाने के बीच किसी पल वे अपने एक सहयोगी के साथ उठकर चले गए थे. वे भुवन के पास हमारे वास्ते कुछ स्मृतिचिन्ह छोड़ गए हैं - भोजपत्र की कुछ छालें और जड़ी-बूटियां.

मौसम अब भी ख़राब है. लगता नहीं हम सिन-ला की तरफ़ जा पाएंगे. अगले दिन हम बेहद हताश मनःस्थिति में वापस दांतू की तरफ़ चलना शुरू करते हैं.

करीब दर्ज़न भर लोग हमें ढाकर तक विदा करने आते हैं. भावभीनी विदाई दी जाती है.

दांतू गांव के प्रवेश पर लगी जसुली दताल की आदमकद मूर्ति के चेहरे पर धीर-गंभीर मातृभाव है.

जसुली दताल जिसे आमतौर पर जसुली बुड़ी के नाम से जाना जाता है, करीब पिचहत्तर साल पहले दांतू में रहने वाली एक धनवान स्त्री थी. उसकी सम्पत्ति और दानशीलता को लेकर ढेरों किस्से प्रचलन में हैं. उसकी कोई सन्तान नहीं थी - इस कारण वह दुखी रहा करती थी. जसुली के बारे में प्रचलित किस्सों में से सर्वाधिक लोकप्रिय संस्करण के अनुसार अपने जीवन के अन्तिम दिनों में वह इस कदर निराश हो गई थी कि उसने अपना सारा पैसा और ज़ेवर-जवाहरात धौलीगंगा में बहा देने का फ़ैसला किया. जब वह ऐसा करने ही जा रही थी, एक अंग्रेज़ अफ़सर का कारवां वहां से गुज़रा. बुढ़िया की कहानी सुनकर अफ़सर ने उससे निवेदन किया कि उसे अपने पैसे का बेहतर उपयोग करना चाहिए. ऐसा भी कहा जाता है कि कई खच्चरों पर लदी हुई बुढ़िया की सम्पत्ति को लेकर अंग्रेज़ अफ़सर जब वापस लौटा, उसने पूरे कुमाऊं-गढ़वाल और नेपाल के कुछ हिस्सों में शौका व्यापारियों और तीर्थयात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनवाईं. मैंने ख़ुद अल्मोड़ा, मजखाली, सुयालबाड़ि इत्यादि जगहों पर इन्हें देखा है. इन धर्मशालाओं के भीतर यात्रियों और उनके खच्चर-घोड़ों के रात बिताने को अलग अलग कमरे हुआ करते थे. इन ऐतिहासिक शौका-इमारतों को जीर्णशीर्ण हालत में देखना अच्छा नहीं लगता.

ख़ैर!



हम फिर से दांतू में हैं. करीब दो बजा है. हम दतमलसिंह जी को अपने तीदांग प्रवास और गुमानसिंह तितियाल के बारे में बताते हैं. वे कहते हैं कि पूरी घाटी में गुमानसिंह जैसा हिम्मती शिकारी और कोई नहीं. वे हमें गुमानसिंह के बारे में कई कहानियां सुनाते हैं. मुझे ख़ुशी होती है कि सबीने ने दारमा घाटी के जिम कॉर्बेट के साथ मेरी फ़ोटो खींची है.

उदयसिंह की दीदी के घर हमारा स्वागत होता है. वे पैंसठ साल के आसपास हैं और उनके चेहरे पर जीवनभर की मशक्कत की दमक है. वे पाब्लो नेरूदा की ’बड़ी मां’ जैसी हैं -

"... जीवन ने तुम्हें रोटी बना दिया था
और हम तुम पर जीवित रहते थे
- लम्बे जाड़ों से उदास जाड़ों तलक.
घर के भीतर तक रिस आया करती थी
बरसात की बूंदें
और तुम सदा मौजूद रहती थीं
- उदारता समेत -
गरीबी का तिक्त आटा छानती हुईं
मानो लगी हुई थीं तुम
हीरे-जवाहरातों से भरी एक नदी को
बांटने के काम में ..."


ऐसा लगता है वे जानती थीं हम लौट आएंगे. वे खुली बांहों से हमारा स्वागत करती हैं. जयसिंह सौन गांव तक जाना चाहता है ताकि हमारे किए रात को गेस्टहाउस में रुकने का प्रबन्ध कर सके. हमें बताया जाता है कि उदयसिंह वापस अपने गांव नागलिंग चला गया है और गेस्टहाउस बन्द पड़ा है. उदयसिंह की दीदी हमसे कहती हैं कि हम चिन्ता न करें और जबरन जयसिंह से कहकर हमारा सामान अपने दुमंजिले कमरे में रखवा देती हैं. मैं उन्हें शौका भाषा में ’पूनी’ (ताई) कहता हूं. वे हमें अपने ही बच्चों जैसा प्यार देती हैं और बार-बार पूछती हैं कि हमें कुछ चाहिए तो नहीं. वे हमें ’मरती’ पीने को देती हैं. ’मरती’ का स्वाद रैड वाइन और बीयर का मिलाजुला जायका देता है - और बहुत चैतन्यकारी होता है. सबीने को ’मरती’ पसन्द आती है और वह उसे बनाने की विधि के बारे में कई सवाल पूछती है.

पूनी के पति अपनी बहू और नन्हे से पोते के साथ, खेतों से लौट आए हैं. वे थके दीखते हैं और हमें वापस आया देख कर उन्हें तनिक भी अचरज नहीं होता. उनकी बहू भीतर चली जाती है. आज हम दोनों मेहमानों के कारण पूरे परिवार को रसोई में सोना होगा. मुझे लगता है कि यह ज़्यादती होगी. मैं संकोचवश कहता हूं कि हमें नीचे की मंज़िल में सोने में कोई दिक्कत नहीं है. वे ज़ोर से हंसते हैं - जब उनकी बहू आती है वे उसे बताते हैं कि मैंने क्या कहा. इस पर बहू भी हंसने लगती है. थोड़ी देर बाद पूनी भी हंसती है. हम दोनों असहाय मुस्कराते हैं - हंसी रोक कर बहू कहती है कि अगर नीचे की मंज़िल में हम सोएंगे तो उन लोगों को बकरियों के सोने का प्रबन्ध ऊपर की मंज़िल में करना पड़ेगा. सबको हंसता देखकर बच्चा भी ख़ुश होकर आंगन में दौड़ना शुरू कर देता है. आसपास की खिड़कियों से कुछ लोग इस मनोरंजक दृश्य को देखकर प्रसन्न हो रहे हैं - आप असीम कृतज्ञ होने के अलावा क्या कर सकते हैं!

दौड़ने के बाद बच्चा थक कर दादाजी की गोदी में बैठ जाता है. इस बीच हमें चाय दे दी गई है. बच्चा चाय मांगता है तो दादाजी उंगली चाय में डुबाकर उसे चटाते हैं. वह और मांगता है. चाय के बाद बच्चा अपने पिचहत्तर साल के दादाजी को घोड़ा बनाता है. फिर कहानी की मांग करता है. बाहर ठण्ड हो रही है सो हम सब भीतर चले जाते हैं, जहां दादाजी बच्चे को कहानियां सुनाते हैं. बच्चा सो जाता है. मिट्टी के तेल के लैम्प की रोशनी में बूढ़े झुर्रीदार चेहरे पर थकान चमक रही है. सोते हुए बच्चे ने अपनी बांई हथेली में दादाजी का काना थामा हुआ है. वे बच्चे को लाड़ से देख रहे हैं. सबीने फुसफुसाकर कहती है कि ऐसे दादाजी का होना कितना दुर्लभ है जिनके साथ आप कुछ भी कर सकते हों.



च्यक्ती और खाने के बाद हम उनकी गर्म रसोई में आधी रात तक बैठे गप्पें मारते रहते हैं और अपने बारे में कई बातें साझा करते हैं. दोनों स्त्रियां बात करती जाती हैं और दक्ष हाथों से गलीचा भी बुनती जाती हैं.

हमारे पास अपनी ब्रान्ड की सिगरेटें बहुत कम बची हुई हैं इसलिए हमने इन दिनों यहां चलने वाली नेपाली सिगरेट ’खुकरी’ पीना शुरू किया हुआ है. हम अपने कोटे में से बस एक-एक सिगरेट पीते हैं. सबीने अपने कोटे की सिगरेट अपनी बगल में बैठी पूनी को प्रस्तुत करती है. हम लोग आग के गिर्द बैठे हैं. पूनी दो-तीन कश लेकर सिगरेट अपने पति को बढ़ा देती हैं. दादाजी भी एक दो कश लेकर सिगरेट जयसिंह को दे देते हैं. जयसिंह हमेशा की तरह सिगरेट को दो हाथों से ग्रहण करता है. इस चक्कर में सिगरेट नीचे गिर जाती है. मैं इस पूरी प्रक्रिया को डूब कर देख रहा हूं. क्षमायाचना की मुद्रा में जयसिंह सिगरेट उठाकर एक कश लगाता है - फिर जैसे उसे याद आती है कि मैं भी हूं. सिगरेट अब मेरे हाथ में है - अभी करीब तीन-चार कश बचे हुए हैं. मैं एक गहरी सांस खींचता हूं और सबीने की कोहनी अपनी पसलियों में गड़ता महसूस करता हूं. "ओके ओके" कहकर मैं आखिरी हिस्सा उसे देता हूं. मुझे मालूम है कि हमारे तथाकथित सभ्य संसार इस तरह के दृश्य देखे जा सकने की कल्पना भी नहीं की सकती. अभी मेरे कोटे की सिगरेट बची हुई है. उसे भी सारे लोग इसी तरह समाप्त करते हैं.




बातचीत के दौरान यह तय पाया जाता है कि अगर हम सिन-ला जाने पर उतारू ही हैं तो दताल दम्पत्ति कल हमारे वास्ते किसी गाइड की व्यवस्था करेंगे जो हमें सिन-ला की चोटी तक पहुंचाएगा. जयसिंह भी रसोई में ही सोने वाला है.

...

सुबह नींद खुलती है तो पाता हूं कि पूनी मेरे सिरहाने बैठी हुई है.

"जाग गए?"

"हां पूनी"

"लो, पी लो! मैं तुम्हारे उठने का इन्तज़ार कर रही थी." उनकी आवाज़ में मातृसुलभ प्रेम है. वे जग से स्टील के गिलास में चाय डालना शुरू करती हैं. खिड़कियां बन्द होने के कारण कमरे में अब भी काफ़ी अन्धेरा है. मैं गिलास थामता हूं. गिलास कतई ठण्डा है. बेचारी पूनी बहुत देर से मेरे उठने की प्रतीक्षा कर रही होंगी - चाय बिल्कुल बर्फ़ हो चुकी है. मैं उन्हें और तकलीफ़ नही देना चाहता कि वे चाय दोबारा से गर्म करें. मैं एक घूंट सुड़कता हूं और तुरन्त उठकर बैठ जाता हूं. मैं चाय नहीं मरती पी रहा हूं.

"पी लो, पी लो. आज तुम्हें बहुत चढ़ना है मेरे बेटे. लाटू काकू भी आ गया है तुम्हारे साथ चलने को."

मेरे पास और कोई रास्ता नहीं है. वे बताती जाती हैं कि लाटू काकू उनका रिश्ते का भतीजा है और पांचेक बार सिन-ला चढ़ चुका है. वे बहुत धीमी आवाज़ में बोल र्ही हैं ताकि सबीने की नींद में बाधा न पड़े. मैं मरती निबटा लेता हूं. मेरे बगल के स्लीपिंग बैग में कुछ हरकत होती है और एक उनींदी आवाज़ आती है - "चोको! क्या बजा? बाहर बारिश तो नहीं हो रही?"

मैं अभी से अपने भीतर मरती की ऊष्माभरी ताज़गी महसूस कर रहा हूं.

"बहुत देर हो गई है - तुम चाहो तो सोती रह सकती हो. शायद हम आज नीचे तवाघाट की तरफ़ उतरना शुरू करेंगे." मुझे बच्चों जैसी एक शरारत सूझती है. "तुम अपनी चाय क्यों नहीं ख़त्म कर लेती वरना यह कतई बर्फ़ बन जाएगी. वैसे ही इतनी ठण्डी हो चुकी है." पूनी दूसरे गिलास में मरती भर चुकी हैं और उत्सुकता से हमारी तरफ़ देख रही हैं.

"ओके ओके" स्लीपिंग बैग से सबीने का अधसोया मुंह बाहर निकलता है. मैं उसे गिलास थमाता हूं. गिलास छूते ही वह उसे पीने से इन्कार कर देती है. अंधेरे के कारण अभी उसने पूनी को नहीं देखा है.

"मैं सुबह-सुबह ठण्डी चाय नहीं पी सकती. इसे गर्म कर दो प्लीज़!"

मैं उसे हल्की सी डांट लगाता हुआ कहता हूं कि सारे लोग खेतों की तरफ़ जा चुके हैं और दोबारा चाय गर्म करने का मतलब होगा बेशकीमती ईंधन की बरबादी. वह मान जाती है.

अधसोए में, वह अनमनी होकर गिलास को एक घूंट में आधा कर देती है. मैं उसकी प्रतिक्रिया से पहले से ही वाकिफ़ हूं सो चौकन्ना हूं और स्लीपिंग बैग से बाहर आ चुका हूं. सबीने को यह जानने में एक सेकेन्ड लगता है कि उसने क्या पिया है. वह चीखना शुरू ही करती है कि मैं भागकर नंगे ही पैर आंगन में भाग जाता हूं. वह भी स्लीपिंग बैग से बाहर आकर चीखना शुरू कर चुकी है. भाग्यवश पूनी को अंग्रेज़ी ज़रा भी नहीं आती. मुझे अचानक उनके ज़ोर-ज़ोर से हंसने की आवाज़ सुनाई देती है. अचानक ही सबीने भी चुप हो गई है. उसे मेरा मज़ाक अटपटा ज़रूर लगा होगा पर अच्छा ही है - हम जल्दी तैयार होकर चलना शुरू कर सकते हैं. जब मैं हिम्मत कर के भीतर जाता हूं वह दोनों स्लीपिंग बैग पैक कर चुकी है और प्रसन्न नज़र आ रही है. वह बताती है कि उसने मरती के दो गिलास पी लिए हैं और यह कि इस ठण्ड में मरती चाय का बेहतर विकल्प लगा उसे. पूनी इस दौरान एक इंच भी नहीं हिली है. शायद वे जानना चाहती होंगी कि सबीने मेरे साथ क्या सुलूक करने वाली है. लेकिन जब कुछ भी दिलचस्प नहीं घटता तो वे बची हुई मरती मेरे लिए उड़ेलकर रसोई में चली जाती हैं यह बता कर कि आधे घन्टे में नाश्ता तैयार हो जाएगा और हमने हद से हद बारह बजे तक दांतू गांव छोड़ देने की कोशिश करनी चाहिए.

ग्यारह बजे हम दांतू से रवाना हो जाते हैं. इस बार हम चार हैं. लाटू काकू हमारे साथ सिन-ला की चोटी तक जाएंगे. आज रात हम सोलह हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर बीदांग में रुकेंगे. वहां कोई गांव तो नहीं अलबत्ता आई.टी.बी.पी. की चौकी है. बीदांग पहुंचने के लिए पहले हमें नदी के उस तरफ़ जाना होगा और गो गांव के बांई तरफ़ से बेहद मुश्किल यात्रा शुरू होनी है.

पूनी ने हमारे रास्ते के लिए कुछ रोटियां बांध दी हैं और एक बोतल मरती की भी. शुरू शुरु में रास्ता बहुत चटियल और बेहद तीखी चढ़ाई वाला है. हम धीरे-धीरे चढ़ते रहते हैं. पिछले कई दिनों से हम नौ-दस हज़ार फ़ीट की सतहों पर ही चलते रहे हैं. चढ़ाई का अभ्यास छूटा हुआ है और हम दोनों को पैरों में हल्का दर्द महसूस हो रहा है.

रास्ते भर तमाम स्मृतिशिलाएं और पत्थरों की ढेरियां बनी हुई हैं. लोग इतनी ऊंचाई पर आ कर अपने प्रियजनों की स्मृति में इन स्मारकों का निर्माण करते हैं. किसी किसी के भीतर तस्वीरें भी रखी हुई हैं. ज़्यादातर तस्वीरें लगातार धूप और बारिश के कारण धुंधला चुकी हैं. एक तस्वीर बिल्कुल नई है. आसपास पूजा की सामग्री बिखरी पड़ी है. यह एक चौदह साल के लड़के का स्मारक है जो गए बरस अपने पैतृक गांव आते हुए रास्ते में भूस्खलन के कारण अकाल मृत्यु का शिकार हो गया था. यह उसकी तस्वीर के नीचे लिखा हुआ है - हिन्दी और अंग्रेज़ी में. तेज़ हवाएं भाग रही हैं - पहाड़ विशाल हैं और तकरीबन नंगे. कभी दूर बकरियों के मिमियाने की आवाज़ सुनाई दे जाती है. थोड़े विषाद से मैं बच्चे की तस्वीर को और करीब से देखने की कोशिश करता हूं. बच्चा अपने घर के आंगन में खड़ा है - उसके चौड़े चेहरे पर उतनी ही चौड़ी मुस्कान है. मैं कुछ दार्शनिक मुद्रा धारण करता हुआ जीवन के बारे में विचार करने को होता ही हूं कि सबीने मुझे जल्दी जल्दी आगे चलने को कहती है ताकि समय पर बीदांग पहुंचा जा सके.



रास्ते में कई जगहों पर भूस्खलन हुआ है - खूब सारे ग्लेशियर भी हैं. चढ़ाई अब खासी मुश्किल है. हम करीब पन्द्रह हज़ार फ़ीट पर हैं. सबीने घड़ी देखती है तो लाटू काकू कहता है कि हम पहुंचने ही वाले हैं. शाम का पांच बजा है. हालांकि दिन भर बादलों की लुकाछिपी चलती रही है पर भाग्यवश बारिश ज़रा भी नहीं हुई. दूर किसी पहाड़ पर सबीने ऊंचाई पर चर रहे एक रेवड़ की तरफ़ इशारा करती है. बकरियां एक गोल चक्कर में चर रही हैं और दूर से उनका रेवड़ किसी घड़ी के डायल जैसा दीख रहा है. वह मेरा ध्यान इस तरफ़ दिलाती है.

"हां करीब पांच पैंतीस बज रहा है वहां"

"नहीं - गौर से देखो - पांच पैंतालीस है" वह कहती है.

हम थक कर चूर हैं. मैं आसानी से पांच पैंतालीस पर सहमत हो जाता हूं. हम सुस्ताने को एक चट्टान पर बैठने को ही हैं कि लाटू बताता है कि पांच मिनट में हम आई.टी.बी.पी. कैम्प में होंगे.

ठीक साढ़े पांच बजे हम कैम्प पहुंच जाते हैं. हिमालय की उत्तुंग चोटियां कैम्प की पृष्ठभूमि में हैं.

(जारी)

6 comments:

नीरज गोस्वामी said...

एक सांस में पढ़ गया पूरा वृतांत...सच बरसों बाद कोई यात्रा वृतांत इतना जीवंत लगा है...आप की लेखन कला का जवाब नहीं...लाजवाब...
नीरज

अजीत चिश्ती said...

wah pandey ji maja aa gaya , zari rakhiye , antarjaal par himalay

bhupen said...

पढ़ते-पढ़ते एक यात्रा अपने भीतर भी चलती रही. इस सफ़र में आपके साथ और आगे जाना चाहते हैं.

ANIL YADAV said...

जुलुम चंचल प्रेम यात्रा। लल्लनटाप कैरीकाट।

आजकल शादियों मे बैन्ड वालों से अपना अफेयर चल रहा है। उनसे फुर्सत पाते ही पलटता हूं मैं भी अपने सफरनामे के साथ।

मुनीश ( munish ) said...

Shaandaar, Jaandaar!

मुनीश ( munish ) said...

Imaandaar ! shukria .

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