Friday, July 30, 2010

न रहना रवि बासवानी का



कल रात ज़रा देर से घर लौटना हुआ. मेल देखने लगा तो पाया भाई विमल वर्मा ने फ़ेसबुक पर कुछ कमेन्ट किया है. फ़ेसबुक में उनकी प्रोफ़ाइल खुली तो वहां उनके किसी मित्र ने रवि बासवानी की मृत्यु पर अफ़सोस ज़ाहिर किया था. हैरत की बात यह थी कि इस कमेन्ट में रवि बासवानी की मृत्यु मेरे नगर हल्द्वानी में होने का ज़िक्र था. ऐसी कोई ख़बर मेरे सामने से किसी भी स्थानीय अख़बार में नहीं छपी थी. बड़े असमंजस की हालत थी सो देर हो चुकने के बावजूद मैंने ख़बर की पुष्टि के लिए विमल भाई को फ़ोन लगाने की हिमाकत कर डाली. ख़बर सही थी. हल्द्वानी को लेकर ख़ासा संशय था. विकीपिडिया पर भी नैनीताल में लोकेशन हंटिंग से लौटते हुए हल्द्वानी में दिल के दौरे से हुई उनकी मृत्यु की जानकारी थी. पत्रकार मित्रों योगेश्वर सुयाल और मदन गौड़ को भी तंग किया गया.

आज अभी अभी भाई मदन गौड़ ने फ़ोन पर बताया कि इस बाबत अमर उजाला के शिमला संस्करण में २८ जुलाई को ख़बर लगी थी. उन्होंने यह जानकारी भी दी कि यह हादसा शिमला में पेश आया था.

२९ सितम्बर १९४६ को जन्मे रवि बासवानी दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज के छात्र रहे थे. चश्म-ए-बद्दूर और जाने भी दो यारो जैसी कल्ट फ़िल्मों से साक्षात्कार था इस बड़े कलाकार से. सई परांजपे की चश्म-ए-बद्दूर (१९८१) उनकी पहली फ़िल्म थी. यह वही फ़िल्म है जिसमें दीप्ति नवल घर घर जाकर चमको वॉशिंग पाउडर बेचने वाली सेल्सगर्ल बनी हैं. रवि ने इसमें फ़ारुख़ शेख़ के रूममेट का किरदार निभाया था. क्या फ़िल्म थी वह और कैसी ज़बरदस्त एक्टिंग की थी सारे कलाकरों ने.

ग़ौर फ़रमाएं यह वो ज़माना था जब गऊपट्टी में जितेन्द्र, श्रीदेवी (कभी कभी जयाप्रदा भी), कादर ख़ान और शक्ति कपूर को लेकर बनी सड़ी हुई फ़िल्में तमाम रिकॉर्ड बना रही थीं. जो गम्भीर फ़िल्मकार थे उनकी फ़िल्मों को आर्ट फ़िल्म कहा जाता था और उन्हें देखने वाला कोई न था.

चश्म-ए-बद्दूर के बाद रवि दिखाई दिये कुन्दन शाह की जाने भी दो यारो में एक असफल फ़ोटोग्राफ़र के रोल में. यह उस समय तक भारतीय फ़िल्म इतिहास में बनाइ गई अपने तरह की इकलौती फ़िल्म थी. रवि के साथ इस फ़िल्म में नसिरुद्दीन शाह, पंकज कपूर, सतीश शाह, ओम पुरी और भक्ति बर्वे थे. इन दो फ़िल्मों को जिसने भी देखा होगा, उसके लिए इन्हें भुला पाना किसी भी कीमत पर सम्भव नहीं है.

अफ़सोस है फ़क़त ६४ साल की आयु में रवि बासवानी के गुज़र जाने को मीडिया ने यथेष्ट कवरेज नहीं दी.

इधर वे अपनी पहली फ़िल्म निर्देशित करने की योजना बना रहे थे. ख़ुद भाई विमल वर्मा और नैनीताल के मेरे पुराने दोस्त सुदर्शन जुयाल को कुछ ही दिन पहले बम्बई में अपने घर पर अपने हाथों बनाया खाना खिलाते हुए रवि बासवानी ने उन्हें यह बात बताई थी.

रवि बासवानी ने हालांकि कॉमेडियन के ही क़िरदार निभाए पर उन्हें याद करना एक मंजे हुए अभिनेता को याद करना होता था और होता रहेगा.

कबाड़ख़ाने की श्रद्धांजलि.

जाने भी दो यारो और चश्म-ए-बद्दूर से कुछ अविस्मरणीय वीडियो देखिये (साभार यूट्यूब)











6 comments:

vimal verma said...

अशोक भाई,जब जब रवि भाई का ख्याल आता है वाकई मन उदास हो जाता है....वाकई "चश्में बद्दूर" का वो चेहरा फ्लैश बैक की तरह घूम जाता है...जब मेरी मुलाक़ात हुई थी रवि भाई से तो उनसे ही पता चला था कि सोनी चैनल के लिये जस्सी जैसी कोई नहीं के शुरुआती २० एपीसोड का निर्देशन भी किया था...नेट पर उनके बारे में बहुत जानकारी उपलब्ध भी नहीं है....रवि भाई को हमारी श्रद्धंजलि हम कभी उन्हें भूल न पायेंगे। अशोक भाई,ये हलद्वानी और शिमला का क्या चक्कर है? ये गुत्थी अभी भी समझ में आयी नहीं।

प्रवीण पाण्डेय said...

बेहतरीन व जीवन्त कलाकार को श्रद्धान्जलि।

राजेश उत्‍साही said...

आपने सही कहा। जिन्‍होंने भी जाने भी दो यारो फिल्‍म देखी होगी वे रवि वासवानी को कभी भूल नहीं सकते। यह फिल्‍म हमारे समाज का एक चेहरा सामने रखती है। इस फिल्‍म को याद करना ही सच्‍ची श्रद्धांजलि है।

मुनीश ( munish ) said...

My heartfelt 'SHRADHANJALI'. you have done a wonderful job by compiling his memorable moments here. shukria !

बाबुषा said...

दोनों ही films गज़ब की थीं !

ये मेरे बचपन के दिनों की फिल्में हैं..और कई कई बार देख चुकी हूँ . 'जाने भी दो यारों ' के बाद ही मैंने मुर्दा किस्म के लोगों के लिए एक नया metaphor ईज़ाद किया था - डिमैलो ! ( सतीश शाह- वो मुर्दा डिमैलो ! :-) )

बाबुषा said...

महाभारत और मुग़ल ए आज़म वाला scene तो गज्ज्ज्ज़ब ही था ! :-)