Monday, July 5, 2010

जितने हैं अब जहाँ में, सब ऐ 'नज़ीर' खुश हैं

 * आज दिन भर ठीकठाक बारिश हुई। बारिश हुई तो बाबा नज़ीर अकबराबादी याद आ गए। उनकी ग्रंथावली की धूल झाड़ी और लेकर बैठ गए। कुछ खाया - पिया और कविता के साथ बरसात की मौज हुई; यह जानते हुए कि कविता - शायरी और साहित्य - संगीत की दुनिया में बारिश के जो नज्जारे  हैं वे असल जिन्दगी में उतने सच नहीं हैं।'सावन झरी लागेला धिरे - धीरे' और 'तू बर- बरस रसधार' के मुकाबले होता अक्सर यह है कि 'आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया'। फिर भी दुनिया की अपनी रफ़्तार है , अपनी चाल है। इसी दुनिया में जीना है गोकि जीना मुहाल है।

** नज़ीर अकबराबादी की शायरी जनता की , साधारण इंसान की , साधारण इंसान के नजरिये से देखी - लिखी गई शायरी है । इसीलिए इतने बरस बाद भी वह कालजयी है। तो आइए देखते - पढ़ते हैं उनकी नज़्म 'बरसात की बहारें' के कुछ चुनिन्दा अंश और अपने हिस्से की बारिश को अपनी निगाह से देखें....




बरसात की बहारें / नजीर अकबराबादी

हैं इस हवा में क्या-क्या बरसात की बहारें।
सब्जों की लहलहाहट ,बाग़ात की बहारें।
बूँदों की झमझमाहट, क़तरात की बहारें।
हर बात के तमाशे, हर घात की बहारे।
क्या - क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

बादल लगा टकोरें , नौबत की गत लगावें।
झींगर झंगार अपनी ,  सुरनाइयाँ बजावें।
कर शोर मोर बगले , झड़ियों का मुँह बुलावें।
पी -पी करें पपीहे , मेंढक मल्हारें गावें।
क्या - क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

क्या - क्या रखे हए है या रब सामान तेरी कुदरत।
बदले है रंग क्या- क्या हर आन तेरी कुदरत।
सब मस्त हो रहे हैं ,  पहचान तेरी कुदरत।
तीतर पुकारते है , 'सुबहान तेरी कुदरत'।
क्या - क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

जो मस्त हों उधर के , कर शोर नाचते हैं।
प्यारे का नाम लेकर ,क्या जोर नाचते हैं।
बादल हवा से गिर - गिर, घनघोर नाचते हैं।
मेंढक उछल रहे हैं ,और मोर नाचते हैं।
क्या - क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

कितनों तो कीचड़ों की,  दलदल में फँस रहे हैं।
कपड़े तमाम गंदे  , दलदल में बस रहे हैं।
इतने उठे हैं मर - मर,  कितने उकस रहे हैं।
वह दुख में फँस रहे हैं,  और लोग हँस रहे हैं।
क्या - क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

यह रुत वह है जिसमें , खुर्दो कबीर खुश हैं।
अदना गरीब मुफ्लिस,  शाहो वजीर खुश हैं।
माशूक शादो खुर्रम , आशिक असीर खुश हैं।
जितने हैं अब जहाँ में,  सब ऐ 'नज़ीर' खुश हैं।
क्या - क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।
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कबीर - बड़ा / श्रेष्ठ
शादो -  खुश / प्रसन्न
खुर्रम-खुश / प्रसन्न
असीर- कैदी / बंदी 

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( चित्र : गूगल जी महाराज की कृपा की बारिश से।)

4 comments:

Dr.Ajmal Khan said...

नज़ीर साह्ब ने तो बरसात के सभी रंग उकेर दिये.
बहुत ही खूब्सूरत .........
आप का शुक़्रिया ऐसी पोस्ट लगाने के लिये.

Voice Of The People said...

आपकी पोस्ट ने बारिश का मज़ा दोहरा कर दिया..

मुनीश ( munish ) said...

नज़ीर ला-जवाब हैं गो कि आप भी कम नहीं/
आपसे लूं मैं पंगा ये मुझमें दम नहीं !

प्रवीण पाण्डेय said...

बरसात की बहारों में क्या क्या नहीं हो रहा है? वाह।