Wednesday, August 11, 2010

क्योंकि मेरे अन्दर भी कभी आग थी

मैं भावुक होना नहीं चाहता
मैं अपना दर्द बाँटना नहीं चाहता
मैं नहीं चाहता कि मेरे तकलीफ पर कोई हमदर्दी जताए
मैं नहीं चाहता कि मेरे टेसू पर कोई अपनी टेसू बहाए
मैं नहीं चाहता कि मेरे जज्बात किसी को ठेस पहुचाये
मैं नहीं चाहता कि मेरे कराहने से किसी की नींद खुल जाये
मैं नहीं चाहता कि सदियों से सोने वाले मेरे क्रन्दन से जग जाये
मैं नहीं चाहता कि मेरी आहट से दुनिया में उथल-पुथल मच जाये

क्योंकि मैं जानता हूँ कि उनका दर्द मुझसे कहीं ज्यादा है
क्योंकि मैं जानता हूँ कि किसी की मुंह से रोटी छीनकर खा सकते हैं वे लेकिन अपना हाथ नहीं जला सकते
क्योंकि मैं जानता हूँ कि उनके लिए औरत का अस्तित्व सिर्फ बिस्तर तक ही है
क्योंकि मैं जानता हूँ कि कुल-गोत्र-जाति-धर्मं का अर्थ संकीर्णता के दायरे में फंसा हुआ है
क्योंकि मैं जानता हूँ कि मनुष्य मनुष्य का नहीं है
क्योंकि मैं जनता हूँ कि खाप-पंचायतों का जोर हर ओर है
क्योंकि मैं जानता हूँ कि सभी कुम्भकरणी नींद में सदियों से सो रहे हैं
क्योंकि मैं जानता हूँ कि सभी मुर्दा लाश हैं

पूरी पृथ्वी श्मसान में तब्दील हो चुकी है
पूरा आसमान गिद्धों से भरा है
हर तरफ कुत्ते भौंक रहे हैं
हर तरफ नोची गई हड्डियाँ और मांस के लोथड़े पड़े हैं
मेरे आसपास सभी नपुंसक भरे-पड़े हैं
किसी को किसी का गम नहीं है
किसी को किसी से ख़ुशी नहीं है
सभी दंभ से भरे-पड़े हैं,'हम'का दम जोरों पर है

नहीं तो मेरा यह हश्र नहीं होता
और मैं यूँ ही नहीं भटक रहा होता
यूँ ही मैं इंसाफ,इंसानियत और भाई-चारे की बात नहीं कर रहा होता
सदियों से हाशिए से बाहर रह रहे लोगों के लिए लड़ नहीं रहा होता
क्योंकि मेरे अन्दर भी कभी आग थी
जो सालों-दर-साल धधक रही थी
जो अभी भी सुलग रही है
दुनिया बदलने को, नई राह चलने को.

5 comments:

मनोज कुमार said...

बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति।

वन्दना said...

इस आग को जलाये रखिये।

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA said...

विचारों को नोचती हुई रचना है ,इन पेने शब्दों से कोई न कोई तो जग जाएगा , सदियों के लिए नहीं पर इस एक दिन के लिए !
उम्दा बहुत उम्दा !!

DEEPAK BABA said...

आपकी कविता पड़ कर इतना ही कह सकते हैं

आग को सुलगने दो.....
वक्क्त आने दो...

अच्छी कविता..

दीपा पाठक said...

बंधु आह की तरह आग को भी चाहिए एक उम्र असर होने तक...इतनी जल्दी बुझने लगेगी तो क्या होगा?