Friday, July 15, 2011

क्यूंकि मैं मौत के लिए नहीं रुक सकी

जनाब सैयद अली हामिद एम. ए. में मेरे गुरुजी रहे थे. इधर दोएक सालों से वे ब्लॉग की दुनिया में ख़ासे सक्रिय रहे हैं और Hamid's Cauldron नाम से एक ब्लॉग पर विशिष्ट पहचान वाली अपनी वैविध्यतापूर्ण पोस्ट्स लगाते रहे हैं. उन के द्वारा किया गया मज़ाज़ की मशहूर नज़्म "ए ग़म-ए-दिल क्या करूं" का तर्ज़ुमा में कबाड़ख़ाने पर पोस्ट कर चुका हूं.

हमारे एम. ए. के दूसरे साल के कोर्स में महान अमरीकी कवयित्री एमिली डिकिन्सन भी थीं. यह हामिद सर की कक्षाओं का जादू रहा होगा कि मैंने एमिली डिकिन्सन के बारे में ख़ूब पढ़ा और उसकी सम्पूर्ण कविताओं को बारम्बार गुना.

अपनी एक कविता में एमिली डिकिन्सन लिखती हैं -

My Life had stood - a Loaded Gun -
In Corners - till a Day
The Owner passed - identified -
And carried Me away -

ख़ैर!

हाल ही में एमिली की एक नायाब कविता "Because I could not stop for Death" का शानदार अनुवाद पोस्ट किया है. उन्हीं से इजाज़त लेकर इस अनुवाद को आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूं.


Translation of Emily Dickinson's Poem


Because I could not stop for Death,
He kindly stopped for me;
The carriage held but just ourselves
And Immortality.

We slowly drove, he knew no haste,
And I had put away
My labor, and my leisure too,
For his civility.

We passed the school where children played
At wrestling in a ring;
We passed the field of gazing grain,
We passed the setting sun.

We paused before a house that seemed
A swelling of the ground;
The roof was scarcely visible
The cornice but a mound.

Since then 't is centuries; but each
Feels shorter than the day,
I first surmised the horses' heads
Were toward eternity.

क्यूंकि मैं मौत के लिए नहीं रुक सकी,
वो महेरबानी कर मेरे लिए रुका ;
उस घोड़े गाड़ी मैं बस हम दो थे
और हकीकत-ए-अब्दी.

हम बिना जल्दबाज़ी के, आराम से बग्घी चलाते रहे,
और उसके शिष्टाचार को देखते
मैंने किनारे रख दिया अपना काम,
अपने फुरसत के लम्हे .

हम गुज़रे एक स्कूल से जहाँ बच्चे
खेल रहे थे कुश्ती के अखाड़े में,
फिर पके हुए अनाज के खेत से होते हुए
निकले डूबते हुए सूरज से आगे.

हम कुछ देर रुके एक मकान के सामने
जो था जैसे ज़मीन का उभार,
थोड़ी सी नज़र आती हुई छत
और एक टीला-नुमा कार्नस.

तब से सदियाँ बीत गईं, पर हर सदी,
उस दिन से छोटी लगती है जब
मैंने क़यास लगाया था कि घोड़ों का रूख़
था शाश्वतता की ओर.

(एमिली पर एक बड़ी पोस्ट जल्दी ही)

3 comments:

वन्दना said...

ati sundar

Syed Ali Hamid said...

What a coincidence, Ashok! Your words of appreciation for me as a teacher and posting this translation on your blog on Guru Purnima.

Jeetey raho, khush raho.

मुनीश ( munish ) said...

I bloody forgot the Gurupoornima day here . A real rascal i have become nowadays, but the life is bloody strangely fast here. My Konnichiva to your Guru as well as my Gurus. May all of them forgive me for my utter negligence .Emily Bronte se ziyaada va-basta raha lekin ye bhi khoob mashoor khatoon hain aur mausiki me bada naam bhi.