Friday, March 2, 2012

मैं हक़दार हूँ जिंदगी का


वो है हमारे पास इस धरती पर जो बनाता है जीवन को जीने लायक

- महमूद दरवेश (१९८६)

वो है हमारे पास इस धरती पर जो बनाता है जीवन को जीने लायक :
अप्रैल की हिचक
भोर के वक़्त डबलरोटी की महक
पुरुषों के बारे में एक महिला के विचार
एस्किलस की रचनाएँ
प्रेम की शुरुआत एक पत्थर पर घास
एक बांसुरी की आह पर जीवित मांएं
और
आक्रांताओं के भीतर स्मृतियों का खौफ

वो है हमारे पास इस धरती पर जो बनाता है जीवन को जीने लायक :
सितम्बर के आख़िरी दिन
चालीस के पार जाती एक भरपूर औरत
जेल में धूप का वक़्त
जानवरों के झुण्ड प्रतिविम्बित करता एक बादल
हंस कर मौत का सामना करने वालों के लिए लोगों की वाहवाही
और
अत्याचारियों के भीतर गीतों का खौफ.

वो है हमारे पास इस धरती पर जो बनाता है जीवन को जीने लायक :
इस धरती पर, इस धरती नाम की स्त्री पर,
माँ है हरेक शुरुआत की
माँ हरेक अंत की.
उसे फिलिस्तीन कह कर पुकारा जाता था
बाद में उसका नाम हो गया – फिलिस्तीन

मेरी स्वामिनी, क्योंकि तुम हो मेरी स्वामिनी, मैं हक़दार हूँ जिंदगी का.

(सोफोक्लीज और युरीपिडीज़ के साथ एस्किलस की गणना पुरातन यूनान के महानतम नाटककारों में की जाती है)

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