Monday, April 30, 2012

बाबू - ३


(पिछली किस्त से आगे)

दोनों ही के प्रताड़ित प्रेतों के-से चेहरे! दोनों ही अब नहीं रह गए, कल को मैं भी चला जाऊँगा. इस लिए इन पर अब दया करने से भी इन्हें भला क्या मिलेगा! लेकिन मन में करुणा उपजती है, ओस कण पर पहले-पहले उजास की मानिंद मौन, उदास और कोमल काँपती हुई, करुणा. माँ अगर धरती से भी अधिक भारी थीं तो पिता मेरे लिए आकाश से अधिक ऊँचे. 'माता गुरुतरा भूमेः खात् पितोच्चतरस्तथा' (महाभारत.) मैंने कभी एक बार भी उनसे या कि अपने मन में भी बचपन ही से उनसे अलग होने की शिकायत न की. हाँ, उन पर गर्व, पिता के नाते, कभी न कर पाया - क्योंकि वह सदा बेचारे ही लगे - मगर प्यार उन्हें सब से अधिक करता आया, मैंने अपने बच्चों को जितना प्यार किया, उससे भी अधिक! माँ सपने में एक बार भी न दिखलाई दीं मगर बाबू साल में तीन-चार बार दिखलाई देते हैं - और हर बार का सपना वर्षों तक भूलता नहीं! सुमियोशिकु वाले घर में एक बार सुनाई दिया कि उन्होंने मुझे पुकारा है. मैं चौंक पड़ा - कमरे से निकलकर देखता हूँ, वह सीढ़ी के नीचे खड़े हैं, "प्यास लगी है, पानी होए तो दै देओ." उन्होंने कहा. उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे कि कहीं बड़ी दूर से चलकर आए हों. एक बार किसी मेले की भीड़ में वह आगे जाते हुए दिखलाई दिए, मैं पैर बढ़ाता हुआ उन तक पहुँचूँ, कि वह भीड़ में खो गए! इधर वह सपने में दिखलाई देते हैं तो उनका चेहरा साफ़ नहीं दिखलाई पड़ता - मेरी आँख और ज़्यादा ख़राब हो जाने से यों भी चेहरे धुँधले दिखलाई देते हैं! अभी हफ़्ता भर हुआ, एक संस्मरण पुस्तक में लेखक के बचपन की यादों के बीच, 'घुंघू मनैया, खंता खनैया' - यह लोरी पढ़ने के बाद सारी रात मुझे नींद न आई! मैं चार-पाँच बरस का था, तब बाबू स्वंय पीठ के बल लेटकर और अपने दोनों पैरों पर मुझे चढ़ाकर यही लोरी गाते हुए 'घोड़ा' चढ़ाया करते थे. उनसे कैसे कहूँ कि अब तुम सपने में न दिखलाई दिया करो!

उनका सारा जीवन - उनकी किशोरावस्था से लेकर शिमला धर्मशाला के कमरे में आत्महत्या करने की रात तक - मुझे अपनी आँखों के आगे घटित होता दिखलाई देता है. और मेरे गले में चीख़ घुटकर रह जाती है, बाबू, क्यों! तुम ऐसा जीवन! क्यों? क्यों? क्यों? क्यों?




ये बाबू की जवानी के फ़ोटो हैं, एक जब वह म्योर सेंट्रल कालेज, बी ए के पहले साल में थे. (दूसरा, शायद, बंबई का कारोबार त्यागने के बाद का.) इतने सारे तमगे़ और कप उन्होंने डिबेट में जीते थे. बी ए पहले साल मैं इससे कह रहा हूँ कि बी ए वह कभी पास न हो पाए! एक बार फ़ेल हुए, तो बहुआ ने उनके आँसू पोंछने के लिए उन्हें दूध पीने का चाँदी का बड़ा कटोरा दिया था दूसरी या तीसरी बार फ़ेल होने पर उन्हें पोखराज की अँगूठी बनवा दी. हाँ, वह अमरीका में पैदा न हुए थे, जहाँ पिता अपने बेटे के कमरे की दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिख देते हैं , CHECKOUT TIME IS EIGHTEEN YEARS!  बाबू के पिता एक विश्वविद्यालय के संस्थापक लेकिन उन्होंने अपने ही बेटे से यह कभी न पूछा होगा, "तुम्हारे पैर किस जगह पर टिके हैं!"'

बाबूजी ने अपने चार बेटों में से किसी के साथ पक्षपात न किया - सच पूछें तो चारों की ओर वह वीतराग ही थे. परिवार तक के लिए उनके मन में यही भावना रही होगी. मैं यह शिकायत थोड़े ही कर रहा हूँ, उनके सामने मैं 12-13 वर्ष का हो गया था मगर उन्होंने मुझसे यह न पूछा कि बच्चा, अब तुम स्कूल की किस कक्षा में हो - एक बार भी नहीं!

फिर एक पुत्र को अपने से परे हटकते हुए उन्हें कष्ट भला क्यों न हुआ होगा! 'तुम निष्कलंक नहीं हो, अन्यथा मैं तुम्हें अंगीकार करता.' बाबू के नाम उनके एक पत्र के ये शब्द, "यदि तुम ऋण से ग्रस्त न होते तो हम तुमको अपने पास रखते. उसमें हमको सुख होता है, किंतु ..."

बाबूजी के साथ राउंड टेबुल कान्फ्ऱेंस में, उनके सहायक के रूप में, बाबू लंडन जाने को थे. वहाँ की ठंड के लिहाज़ से बाबू के गर्म कपड़े तक बन गए थे. मगर बाबूजी साथ ले गए छोटचा को. बाबूजी की परख, मनुष्य की, अचूक हुआ करती थी. उन्हें अपना तीसरा पुत्र भरोसे का न लगा - क्या जाने यह लंडन में किसी अँग्रेज़ पुरुष या महिला को 'कृष्णाय वासुदेवाय' श्लोक सिखाने लग जाएँ!

याद है मुझे, बाबूजी के देहांत पर हज़ारों की संख्या में शोक संवेदना प्रकट करने को तार और चिट्ठियाँ आए थे. छोटचा ने उसके उत्तर में पत्र छपवाया था - ऊपर संबोधन स्थान पर भेजने वाले का नाम ख़ुद अपने हाथ से लिखने को ख़ाली, नीचे उत्तरदाता का नाम छपा हुआ था, 'गोविंद मालवीय'.

मेरे सामने की बात है, बाबू ने उनसे कहा, "मुनुआ, थोड़े से छपे हुए पत्र मुझे दे दो." छोटचा ने बिना कोई उत्तर दिए 10-12 पन्ने बड़े भाई की ओर बढ़ा दिए थे. क्यों, बाबूजी के अंतिम समय में उनकी सेवा, मूड़ी बलिहारी नौकरों के समान, बाबू ने की थी! क्या किया होगा बाबू ने? छपा हुआ 'गोविंद' काटकर क्या 'मुकुंद' लिखा होगा? नहीं, छोटे भाई ने चुप रहकर ख़ारिज किया, बड़े भाई को! उनकी चुप्पी बोलती थी कि तुम्हारे होने का, कि न होने का, कोई महत्व नहीं! तुम काफ़्का की 'मेटामर्फ़ासिस' शीर्षक कहानी के लाड़ले बेटे हो जो धीरे-धीरे कर कीड़ा बन गया था.

बाबू से उनके माँ-बाप, भाई बहिन, नाते-रिश्ते के किसी व्यक्ति ने न कहा, "पैर ज़मीन पर रख!"

मामूली से मामूली जीव-जंतु तक तो अपने जाए हुए को अपने आप जी सकने का हुनर सिखलाते हैं! मादा गिद्ध अपने चिरौटे को जब वह कुछ-कुछ उड़ने क़ाबिल हो जाता है मगर डर के मारे ऊँचे घोंसले से बाहर नहीं निकलना चाहता, मादा गिद्ध उसे बाहर धकेल देती है. बाघिन शिकार लाकर पहले अपने छौनों को खाने देती हैं, मगर बच्चा बड़ा हो जाने पर भी माँस में हिस्सा बँटाना चाहे तो बाघिन उसे लात से बार-बार मार कर दूर कर देती है.

मेरे एक कटु व्यंग्य करने पर मेरे आगे से भोजन की अध-खाई थाली खींच ली थी, मेरी माँ ने! "ये अगर कल जेल जाने को हों तो आज ही चले जाएँ!" यह मेरी माता के नहीं, नानी के शब्द हैं, अपने किशोर वय सबसे बड़े बेटे के लिए.

पैदा होते ही अपने पैरों पर कोई भी जीव खड़ा नहीं हो जाता - वह अपनी मरज़ी से खड़ा होता है, नहीं तो बेमरज़ी उसे खड़ा किया जाता है. ठीक से खड़ा हुआ जीव अपने आप चलता है, उड़ता है, धावे मारता है, आहार जुटाता है, अपना जोड़ा ढूँढ़कर लाता है, रुपया-पैसा और नाम कमाता है.

नहीं तो जैसे डैंडेलियन या कुकरौंधे का भुआ हवा में इधर से उधर उड़ता फिरता, वह मनुष्य भी, केवल 'आज' जीता है, जीवन के अंत तक. भुआ तो खै़र, हवा के पंखों पर सवार होकर दूर-दूर तक बीज बोता है, ऐसा मनुष्य अपने पीछे कुछ भी नहीं छोड़ जाता.

(जारी)

2 comments:

alka sarwat said...

काफी रोचक संस्मरण है ,अगले अंक की प्रतीक्षा है

मुनीश ( munish ) said...

ब्राह्ण परिवारों के क़िस्से ऐसी ही रहे हैं । क्या डर्टी लिनन धोना बाज़ार में । ये सब भले लोग थे , बड़े लोग थे ।