Monday, May 28, 2012

हम जहां पहुंचे कामयाब आये - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की आपबीती – ५




(पिछली कड़ी से आगे)

कैंप डेविड समझौते के बाद अरब के लोगों का यह अनुरोध था कि उसका दफ़्तर काहिरा से कहीं और स्थानांतरित कर दिया जाये. लोटस का मुख्य संपादक जो संगठन का सचिव भी था, उसकी साइप्रस में गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी. अब लोटस का संपादन करने वाला कोई नहीं था. इस समय एफ्ऱो-एशियाई साहित्यकार संगठन का दफ़्तर कहीं नहीं था. इस पत्रिका के संपादन के लिए मुझे आमंत्रित किया गया और यह भी फैसला हुआ कि संगठन का दफ़्तर बैरूत में स्थानांतरित कर दिया जाये. मैं अफ्ऱीकी एशियाई साहित्यकारों के संगठन और उसकी पत्रिका लोटस से चार साल तक जुड़ा रहा और फिर हमें इससे फ़ुर्सत मिल गयी.

बैरूत पर आक्रमण के एक महीने बाद मैं किसी-न-किसी तरह वहां से निकलने में सफल हो गया और पाकिस्तान पहुंच गया. यहां आते ही मैं एक बार फिर बीमार हो गया. अब जो यह एलिस के बारे में आप लोग पूछ रहे हैं तो मैं बताऊं. जब मैं कॉलेज में पढ़ाने लगा था तो जैसा मैंने बताया, मेरे कुछ साथी आक्सफ़ोर्ड से वापस लौटे तो वे मार्क्सवादी विचारधारा के समर्थक थे. उसी में एक साथी जो मार्क्सिस्ट था उसकी पत्नी जो अंग्रेज़ थी वह भी मार्क्सिस्ट थी. एक दिन उसने मुझसे पूछा, तुम उदास और निराश क्यों रहते हो, फिर स्वयं ही बोली, तुम्हें इश्क़ हो गया है क्या? तुम बीमार लगते हो. उसने कुछ किताबें मुझे दीं और कहा कि उन्हें पढ़ूं उसने स्पष्ट किया, तुम्हारा दुख बहुत कुछ व्यक्तिगत ढंग का है. ज़रा पूरे हिंदुस्तान पर नज़र डालो, अनगिनत लोग भूख और बीमारी के शिकार हैं. तुम्हारा दुख तो उनकी तुलना में कुछ भी नहीं है.

और तब प्रेम के विषय से मेरा ध्यान हट गया और मैंने व्यापक संदर्भों में सोचना आरंभ कर दिया. मेरी नज़्म ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न मांग’ इसी बदलते हुए सोच का परिणाम थी. मेरे मित्र जिनकी पत्नी का उल्लेख मैंने किया वह एक अच्छे साहित्यकार थे और एक कॉलेज के प्रिंसिपल भी थे. उनके साथ शिक्षण के कार्य में व्यस्त हो गया. कोई तीन चार साल बाद मेरे मित्रा की अंग्रेज़ पत्नी की एक बहन उन लोगों से मिलने अमृतसर आयी, जहां मैं पढ़ा रहा था. मेरी उस महिला से जब मुलाक़ात हुई तो हम मित्र बन गये लेकिन उन्हीं दिनों युद्ध छिड़ गया और वह महिला अपने देश वापस न लौट सकी. मैं भी कैंब्रिज जाने वाला था मगर न जा सका और इस तरह हमारी मित्राता गहरी होती गयी और एक दिन हमने शादी कर ली. वह महिला एलिस थी.

जहां तक बैरूत में मेरे प्रवास का संबंध है तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं फ़िलिस्तीनियों का समर्थक था जिन्हें एक षड्यंत्र द्वारा अपने देश से निकाल दिया गया था. यह अजीब बात थी कि इज़राइली जिन्हें नाज़ियों के हाथों कठोर यातना झेलनी पड़ी थी, वे भी अब फ़िलिस्तीनियों को इसी प्रकार कष्ट देने के लिए उतारू थे, जबकि फ़िलिस्तीनियों ने इज़राइलियों का कुछ नहीं बिगाड़ा था. लेकिन शायद इज़राइलियों के अत्याचारी व्यवहार के पीछे हिंसक मनोग्रंथि काम कर रही थी. शक्तिशाली का साथ तो सब देते ही हैं क्योंकि उसमें कोई हानि नहीं होती. कमज़ोर का साथ देने वाले कम होते हैं और उसमें केवल हानि ही हिस्से में आती है. मैंने बैरूत प्रवास के दिनों में कमज़ोर का साथ देने को अपना रचनात्मक धर्म स्वीकार किया था.

-----


मुझसे पहली मुहब्बत मेरी महबूब न मांग 
मैनें समझा कि तू तो दरख्शां है हयात  
तेरा गम है तो गमे - दहर का झगडा क्या है 
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात 
तेरी आँखों के सिवा दुनियां में रखा क्या हैं ?

       तू जो मिल जाये तो तकदीर निगूं  हो जाये 
        यूँ न था , मैने फकत चाहा था यूँ हो जाये 

और भी दुःख है जमाने में मुहब्बत के सिवा 
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा 
अनगिनत सदियों के तारीक  बहीमाना  तिलिस्म 
रेशमो - अतलसो - कम ख्वाब में बुनवाये हुए 
जा - ब - जा बिकते कूचा - ओ - बाज़ार में जिस्म 
खाक  में लिथड़े हुए खून में नहलाये हुए 
        
       लौट  जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे 
       अब भी दिलकश है तेरा हुस्न , मगर क्या कीजे 

और भी दुख है जमाने में मुहोब्बत के सिवा 
राहतें और भी है वस्ल कि राहत के सिवा 
मुझसे पहली से मुहब्बत मेरे महबूब न मांग 

             
(दरख्शां - रौशन, हयात - जीवन, गमे दहर - जमाने का दुःख, आलम - दुनियां, सबात - ठहराव, निगूं होना- बदल जाना,  वस्ल की राहत - मिलन का आनंद, तारीक - अँधेरा, बहीमाना - पशुवत,  रेशमो - अतलसो - कमख्वाब - रेशम, अलतस और मलमल, जा - ब - जा  - जगह - जगह.)

1 comment:

Alok Mohan said...

इस कबाड़ खाने में तो अद्भुद रचनाये है