Monday, September 17, 2012

दीवारें बैठती हैं छल्लों का गुल मचा - नज़ीर अकबराबादी की बरसातें - १


इस फानी दुनिया की कोई भी शै नज़ीर अकबराबादी साहब की नज़रों से बची नहीं रही. आजकल जबकि बरसातों के सिलसिले ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहे,क्यों न आपको नज़ीर साहब की बारिशों पर लिखी रचनाओं से परिचित कराया जाय -

बरसात और फिसलन

बरसात का जहाँ में लश्कर फिसल पड़ा
बादल भी हर तरफ से हवा पार फिसल पड़ा
झड़ियों का मह भी आके सरासर फिसल पड़ा
छज्जा किसी का शोर मच कर फिसल पड़ा

कोठा झुका अटारी गिरी दर फिसल पड़ा.

जिनके नए-नए थे मकाँ और महल सरा
उनकी छतें टपकती हैं छलनी हो जा-ब-जा
दीवारें बैठती हैं छल्लों का गुल मचा
लाठी को टेक कर जो सुतूँ है खड़ा किया

छज्जा गिरा मुंडेरी का पत्थर फिसल पड़ा

झाड़ियों ने इस तरह का दिया आके झड़ लगा
सुनिए जिधर उधर है धडाके की ही सदा
कोई पुकारे है मेरा दरवाज़ा गिर चला
कोई कहे है “हाय” कहूं तुम से अब मैं क्या

“तुम दर को झींकते हो मेरा घर फिसल पड़ा

बारां जब आके पुख्ता मकाँ के तईं हिलाय
कच्चा मकाँ फिर उसकी भला क्योंकि ताब लाय
हर झोपड़े में शोर है हर घर में हाय हाय
कहते है “यारो, दौड़ियो, जल्दी से. वाय वाय”

पाखे पछीत सो गए छप्पर फिसल पड़ा

आकर गिरा है आय किसी रंडी का जो मकाँ
और उसके आशना की भी छत गिरती है जहाँ
कहता है ठठ्ठे बाज़ हर एक उनसे आके वाँ
क्या बैठे छत को रोते हो तुम ऐ मियाँ यहाँ

वाँ चित्त लगन का आपके सब घर फिसल पड़ा

याँ तक हर एक मकाँ के फिसलने की है ज़मीं
निकले जो घर से उसके फिसलने का है यकीं
मुफ़लिस-ग़रीब पर ही ये मौक़ूफ़ कुछ कुछ नहीं
क्या फ़ील का सवार है क्या पालकी नशीं

आया जी इस ज़मीं के ऊपर फिसल पड़ा

देखो जिधर तिधर को यही गुल पुकार है
कोई फंसा है और कोई कीचड़ में ख्वार है
प्यादा उठा जो मर के, तो पिछड़ा सवार है
गिरने की धूमधाम ये, कुछ बेशुमार है

जो हाथी रपटा ऊँट गिरा खर फिसल पड़ा

चिकनी ज़मीं पै याँ कहीं कीचड़ है बेशुमार
कैसा हो होशियार पै फिसले है एक बार
नौकर का बस कुछ उसमें न आक़ा का इख्तियार
कूचे गली में हमने तो देखा है कितनी बार

आक़ा जो डगमगाए तो नौकर फिसल पड़ा

कूचे में कोई उअर कोई बाज़ार में गिरा
कोई गली में गिर के है कीचड़ में लोटता
रस्ते के बीच पाँव किसी का रपट गया
उस सब जगह के गिरने से आया जो बच बचा

वह अपने घर के सहन में आकर फिसल पड़ा

दलदल जो हो रही है हर एक जा पै रसमसी
मर मर उठा है मर्द तो औरत रही फंसी
क्या सख्त मुश्किलात हैं क्या सख्त बेकसी
उसको बड़ी खराबी हुई और बड़ी हंसी

जो अपने जा ज़रूर के अन्दर फिसल पड़ा

करती है गरचे सबको फिसलनी ज़मीन ख्वार
आशिक़ को पर दिखाती है कुछ और ही बहार
आया जो सामने कोई महबूब गुल इज़ार
गिरने का मक्र करके उछल कूद एक बार

उस शोख़ गुलबदन से लिपट कर फिसल पड़ा

कीचड़ से हर मकान की तो बचता बहुत फिरा
पर जब दिखाई दी खुले बालों की एक घटा
बिजली भी चमकी हुस्न की मह बरसा नाज़ का
फिसलन जब ऐसी आयी तो फिर कुछ न बस चला

आखिर को वाँ ‘नज़ीर’ भी जाकर फिसल पड़ा

1 comment:

घनश्याम मौर्य said...

बेहतरीन। यहां जिक्र करना चाहूँगा कि मेरी श्रीमती डॉ0 मानवी मौर्य ने हिन्‍दी कवि शमशेर बहादुर सिंह पर पी0एच0डी0 की है। शमशेर की काव्‍यभाषा इकबाल, गालिब और नजीर से बहुत प्रभावित रही है। इस कारण नजीर की रचनायें पहले भी पढ चुका हूँ। पर यह रचना पहली बार पढी। ऐसा लगा मानों पढते ही बारिश से भीग गया हूँ।