Tuesday, September 25, 2012

चार दिन फुटपाथ के साये में रहकर देखिए, डूबना आसान है आंखों के सागर में जनाब



अदम गोंडवी एक बड़े और प्रतिबद्ध जनकवि थे. उनकी सबसे विख्यात रचना "  मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको"   काफी समय पहले कबाड़खाने में लगाई गयी थी. आज उनकी एक छोटी किन्तु बेहद प्रासंगिक ग़ज़ल -

जुल्फ , अंगडाई , तबस्सुम , चाँद , आईना ,गुलाब
भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इनका शबाब

पेट के भूगोल में उलझा हुआ है आदमी
इस अहद में किसको फुर्सत है पढ़े दिल की किताब

इस सदी की तिश्नगी का ज़ख्म होंठों पर लिए
बेयक़ीनी के सफ़र में ज़िंदगी है इक अजाब

डाल पर मजहब की पैहम खिल रहे दंगों के फूल
सभ्यता रजनीश के हम्माम में है बेनक़ाब

चार दिन फुटपाथ के साये में रहकर देखिए
डूबना आसान है आंखों के सागर में जनाब

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही दमदार रचना..कई बार पढ़ने का मन करता है..

घनश्याम मौर्य said...

अदम गोंडवी की कई रचनायें मैं पढ चुका हूँ और उनका प्रशंसक हूँ। उनकी रचनायें समाज के निर्बल वर्ग का प्रतिनिधित्‍व करती हैं और उनकी पीडा को उकेरती हैं साथ ही सामाजिक व आर्थिक असमानता एवं उससे संबंधित समस्‍याओं को बखूबी बयां करती हैं। उनकी एक गजल की पंक्तियां याद आ रही हैं-
तुम्‍हारी फाइलों में गॉंव का मौसम गुलाबी है।
मगर ये आंकडे झूठे हैं यह दावा किताबी है।