Wednesday, September 26, 2012

काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'


आबिदा परवीन की आवाज़ में मिर्ज़ा ग़ालिब की एक ग़ज़ल –



कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती

मौत का एक दिन मु'अय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती

जानता हूँ सवाब-ए-ता'अत-ओ-ज़हद
पर तबीयत इधर नहीं आती

है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात कर नहीं आती

क्यों न चीख़ूँ कि याद करते हैं
मेरी आवाज़ गर नहीं आती

दाग़-ए-दिल नज़र नहीं आता
बू-ए-चारागर नहीं आती

हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती

काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुमको मगर नहीं आती

2 comments:

Arvind Mishra said...

क्या खूब ग़ालिब की ग़ज़ल और आबिदा की आवाज -खूब सिनर्जी!

Ashok Khurana said...

बेहतरीन पेसकश,बेहतर कलाम