Friday, September 21, 2012

फिर संसदें जुड़ेंगी फिर से करोगे वादे


बाबा नागार्जुन की एक कविता बहुत दिनों से याद आ रही है -

कच्ची हजम करोग
पक्की हजम करोगे
चूल्हा हजम करोगे
चक्की हजम करोग

बोफ़ोर्स की दलाली
गुपचुप हजम करोगे
नित राजघाट जाकर
बापू-भजन करोगे

वरदान भी मिलेगा
जयगान भी मिलेगा
चाटोगे फैक्स फेयर
दिल के कमल खिलेंगे

फोटे के हित उधारी
मुस्कान रोज दोगे
सौ गालियाँ सुनोगे
तब एक भोज दोगे

फिर संसदें जुड़ेंगी
फिर से करोगे वादे
दीखोगे नित नए तुम
उजली हँसी में सादे

बोफ़ोर्स की दलाली
गुपचुप हजम करोगे
नित राजघाट जाकर
बापू-भजन करोगे

1 comment:

घनश्याम मौर्य said...

नागार्जुन को आधुनिक युग का कबीर यूँ ही नहीं कहा जाता। उनके व्‍यंग्‍य में वही धार है, जो कबीर की काव्‍यानुभूति में अन्‍तर्निहित थी।