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Thursday, May 1, 2014

चौथी पीढ़ी का हमारा वो प्रतिनिधि बचेंद्रीपाल का भतीजा है! - ‘पहल’ के गलियारों से – २


(‘पहल’ - २९, जनवरी १९८६ से साभार)
अफ्रीका के कवि-क्रांतिकारी बेंजामिन मोलाइस को समर्पित ‘पहल’ २९ में कई ज़रूरी चीज़ें छपी हैं. सम्पादकीय में मथुरा के क्रांतिकारी विचारक सत्यभक्त जी को श्रद्धांजलि दी गयी है और रामविलास शर्मा के हवाले से एकाध उद्धरण दिए गए हैं. मारकेज़ के साक्षात्कारों की पुस्तक ‘अमरुद की ख़ुशबू’, जिसके कुछेक अध्याय कबाड़खाने पर नाचीज़ ने जब-तब अनूदित कर लगाए हैं, से एक अंश का विजय कुमार द्वारा किया गया अनुवाद इस अंक की शान है. निकारागुआ पर मदन कश्यप की कविता है. हरेकृष्ण झा, प्रमोद कौंसवाल, परमानंद श्रीवास्तव, आग्नेय, बंसी कॉल, रमन मिश्र, पूर्ण चन्द्र रथ, तेजिंदर, गिविंद माथुर, निशान्त, लालसा लाल तरंग, महावीर अग्रवाल की कविताओं के अलावा अशोक वाजपेयी के काव्यकर्म पर भृगुनंदन त्रिपाठी का लम्बा आलेख है. विजयदान देथा का तीसेक पन्ने का प्रेरक आलेख ‘कविता की कहानी’ अंक को उल्लेखनीय और संग्रहणीय बनाता है. पुस्तक समीक्षा में चन्द्रकान्ता के उपन्यास ‘ऐलान गली ज़िंदा है’, ‘अजरबैजानी गद्य चयनिका’ और अ. कीरोत्स्काया की पुस्तक ‘भारत के नगर-एक ऐतिहासिक सिहावलोकन’ को शामिल किया गया है.
कबाड़खाने के पाठकों के लिए इसी अंक से बाबा नागार्जुन की दो कम प्रसिद्ध कविताएँ-

चौथी पीढ़ी का प्रतिनिधि

यहाँ, गढ़वाल में
कोटद्वार-पौड़ी वाली सड़क पर
ऊपर चक्करदार मोड़ के निकट

मकई के मोटे टिक्कड़ को
सतृष्ण नज़रों से देखता रहेगा अभी
इस चालू मार्ग पर
गिट्टियां बिछाने वाली मजदूरिन माँ
अभी एक बजे आयेगी
पसीने से लथपथ
निकटवर्ती झरने में
हाथ-मुंह धोएगी
जूड़ा बांधेगी फिर से

और तब
शिशु को चूम कर
पास बैठा लगी
मकई के टिक्कड़ से तनिक-सा
तोड़ कर
बच्चे के मुंह में डालेगी

उसे गोद में भरकर
उसकी आँखों में झाँकेगी
पुतलियों के अन्दर
अपनी परछाईं देखेगी
पूछेगी मुन्ना से:
मेरी पुतलियों में देख तो, क्या है.

वो हंसने लगेगा ...
माँ की गर्दन को बांहों में लेगा

तब, उन क्षणों में
शिशु की स्वच्छंद पुतलियों में
बस माँ ही प्रतिविम्बित रहेगी ...

दो-चार पलों के लिए
सामने वाला टिक्कड़
यों ही धरा रहेगा ...
हरी मिर्च और नमक वाली चटनी
अलग ही धरी होगी
चौथी पीढ़ी का हमारा वो प्रतिनिधि
बचेंद्रीपाल का भतीजा है!

मैंने देखा

मैंने देखा:
दो शिखरों के अंतराल वाले जंगल में
आग लगी है ...

बस हब ऊपर की मोड़ों से
आगे बढ़ने लगी सड़क पर
मैंने देखा:
धुआं उठ रहा
घाटी वाले
खंडित-मंडित अन्तरिक्ष में
मैंने देखा: आग लगी है
दो शिखरों के अंतराल वाले जंगल में

मैंने देखा: शिखरों पर
दस-दस त्रिकूट हैं
यहाँ-वहाँ पर चित्र-कूट हैं
दाएं-बाएँ तलहटियों तक
फैले इनके जटा-जूट हैं
सूखे झरनों के निशान हैं
तीन पथों में बहने वाली
गंगा के महिमा-बखान हैं
दस झोपड़ियां, दो मकान हैं

इनकी आभा दमक रही है
इनका चूना चमक रहा है
इनके मालिक वे किसान हैं
जिनके लड़के मैदानों में
युग की डांट-डपट सहते हैं
दफ़्तर में भी चुप रहते हैं

[५-५-१९८५]

अखरती तो नहीं इनकी सोहबत? जी तो नहीं कुढ़ता है? – मई दिवस पर बाबा नागार्जुन की कविता


घिन तो नहीं आती है

-बाबा नागार्जुन

पूरी स्पीड में है ट्राम
खाती है दचके पै दचके
सटता है बदन से बदन
पसीने से लथपथ.
छूती है निगाहों को
कत्थई दांतों की मोटी मुस्कान
बेतरतीब मूँछों की थिरकन
सच-सच बतलाओ
घिन तो नहीं आती है?
जी तो नहीं कुढ़ता है?

कुली मज़दूर हैं
बोझा ढोते हैं , खींचते हैं ठेला
धूल धुआँ भाप से पड़ता है साबका
थके-मांदे जहाँ तहाँ हो जाते हैं ढेर
सपने में भी सुनते हैं धरती की धड़कन
आकर ट्राम के अन्दर पिछले डब्बे मैं
बैठ गए हैं इधर उधर तुमसे सट कर
आपस मैं उनकी बतकही
सच-सच बतलाओ
जी तो नहीं कुढ़ता है?
घिन तो नहीं आती है?

दूध-सा धुला सादा लिबास है तुम्हारा
निकले हो शायद चौरंगी की हवा खाने
बैठना है पंखे के नीचेअगले डिब्बे मैं
ये तो बस इसी तरह
लगाएंगे ठहाकेसुरती फाँकेंगे
भरे मुँह बातें करेंगे अपने देस कोस की
सच सच बतलाओ
अखरती तो नहीं इनकी सोहबत?
जी तो नहीं कुढ़ता है?
घिन तो नहीं आती है? 

(फ़ोटो: साभार www.rediff.com)

चंदू, मैंने सपना देखा

आज चुनावी माहौल में  कुछ चंदुओं से मुलाक़ात हुई इत्तफाक़न. बाबा ने याद आना ही था -


चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा 
चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा 
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू 
चंदू,मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेकाबू 

मैंने सपना देखा देखा, कल परसों ही छूट रहे हो
चंदू, मैंने सपना देखा, खूब पतंगें लूट रहे हो 
चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कैलंडर 
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर मैं हूँ अंदर
चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो 
चंदू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो 

चंदू मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा 
चंदू मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा 
चंदू मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डाक्टर हो 
चंदू मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो 

चंदू, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम 
चंदू, मैंने सपना देखा, पुलिस-यान में बैठे हो तुम 
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ अंदर
चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कैलेंडर 


-बाबा नागार्जुन 

(१९७६) 

Monday, July 1, 2013

बिंद्रावन में सांड घुस आया है

बाबा नागार्जुन का यह फ़ोटो लक्ष्मीधर मालवीय द्वारा १९७६ में खींचा गया था

बाबा नागार्जुन का फ़ोटो और एक संस्मरण

(पुरुषोत्तम शर्मा और अनिल जनविजय की फेसबुक वॉल्स से साभार)

बाबा के साथ सादतपुर दिल्ली में गुजारे कई वर्षों की यादें अब भी ताजा हैं , उन्हें पहला पुरूस्कार मिलते ही हमारे सादतपुर स्थित पार्टी कार्यालय में आकर उन्होंने मेरे गालों पर हाथ फेरते कहा " तुम होल टाईमर हो ना , अच्छा खाना नहीं मिलता होगा आज मेरी ओर से मुर्गा खाना " कहकर उन्होंने सौ रुपये का नोट मेरे हाथ थमाया और कामरेड राजारामसिंह से कहा " आज से हिन्दू और एक अन्य पत्रिका कार्यालय में और लगा दो मुझे काफी राशि मिली है इसका बिल मैं दिया करूँगा ". उन दिनों बाबा रोज सुबह टहलते हुए हमारे कार्यालय में अखाबार पढ़ने आते थे . १९८९ में जब बिहार के आरा से हमारे पहले सांसद रामेश्वर प्रसाद के जीतने की खबर मिली तो हम बाबा को खबर सुनाने उनके घर गए और बाबा से समाचार पत्रों के लिए प्रतिक्रिया लिखने को कहा ,बाबा ने एक कागज़ पर लिख दिया " बिंद्रावन में सांड घुस आया है " नागार्जुन . 

Monday, December 31, 2012

नया साल - अब तो बाँटिए मित्रों में कलाकंद !


मुबारक हो नया साल 

- बाबा नागार्जुन

फलाँ-फलाँ इलाके में पड़ा है अकाल
खुसुर-पुसुर करते हैं, ख़ुश हैं बनिया-बकाल
छ्लकती ही रहेगी हमदर्दी साँझ-सकाल
--अनाज रहेगा खत्तियों में बन्द !

हड्डियों के ढेर पर है सफ़ेद ऊन की शाल...
अब के भी बैलों की ही गलेगी दाल !
पाटिल-रेड्डी-घोष बजाएँगे गाल...
--थामेंगे डालरी कमंद !

बत्तख हों, बगले हों, मेंढक हों, मराल
पूछिए चलकर वोटरों से मिजाज का हाल
मिला टिकट ? आपको मुबारक हो नया साल
--अब तो बाँटिए मित्रों में कलाकंद !

Friday, September 21, 2012

एक बंदरिया उछल रही है देखो अपने आप


बाबा की एक और कविता-

छतरी वाला जाल छोड़कर
अरे, हवाई डाल छोड़कर
एक बंदरिया कूदी धम से
बोली तुम से, बोली हम से,
बचपन में ही बापू जी का प्यार मिला था
सात समन्दर पार पिता के धनी दोस्त थे
देखो, मुझको यही, नौलखा हार मिला था
पिता मरे तो हमदर्दी का तार मिला था
आज बनी मैं किष्किन्धा की रानी
सारे बन्दर, सारे भालू भरा करें अब पानी
मुझे नहीं कुछ और चाहिए तरुणों से मनुहार
जंगल में मंगल रचने का मुझ पर दारमदार
जी, चन्दन का चरखा लाओ, कातूँगी मैं सूत
बोलो तो, किस-किस के सिर से मैं उतार दूँ भूत
तीन रंग का घाघरा, ब्लाउज गांधी-छाप
एक बंदरिया उछल रही है देखो अपने आप

फिर संसदें जुड़ेंगी फिर से करोगे वादे


बाबा नागार्जुन की एक कविता बहुत दिनों से याद आ रही है -

कच्ची हजम करोग
पक्की हजम करोगे
चूल्हा हजम करोगे
चक्की हजम करोग

बोफ़ोर्स की दलाली
गुपचुप हजम करोगे
नित राजघाट जाकर
बापू-भजन करोगे

वरदान भी मिलेगा
जयगान भी मिलेगा
चाटोगे फैक्स फेयर
दिल के कमल खिलेंगे

फोटे के हित उधारी
मुस्कान रोज दोगे
सौ गालियाँ सुनोगे
तब एक भोज दोगे

फिर संसदें जुड़ेंगी
फिर से करोगे वादे
दीखोगे नित नए तुम
उजली हँसी में सादे

बोफ़ोर्स की दलाली
गुपचुप हजम करोगे
नित राजघाट जाकर
बापू-भजन करोगे

Friday, May 18, 2012

बाबा के साथ जुड़ा रहा., आज भी जुड़ा हूं




बाबा नागार्जुन का एक और संस्मरण देहरादून में रहने वाले मेरे प्रिय मित्र और कवि-उपन्यासकार अतुल शर्मा के हवाले से –

प्रतिष्ठित जनकवि बाबा नागार्जुन उम्र की जिस दहलीज पर मिले, उस समय स्वाभाविक थकान घेरे रहती है. लेकिन बाबा नागार्जुन इसके अपवाद रहे. मैंने पहली मुलाकात में ही मस्ती, घुमक्कड़ी फक्कड़पन और ठहाकों से घुली मिली अद्भुत गहरी जि‍जि‍वि‍षा अनुभव की.

डी.ए.वी. कॉलेज देहरादून का यूनियन वीक. एक तरफ चुटकुलेबाजों का तथाकथित कवि सम्मेलनीय मंच और दूसरी तरफ युवाओं से भरे हॉल में बाबा नागार्जुन का इंतजार. यह जनपक्षीय संदेश देने के लिए किया गया कार्यक्रम था. साहित्य का जनसंघर्षों के साथ भीतरी रिश्ता नागार्जुन जैसे प्रतीक को लेकर किया गया आयोजन था.

बाबा देहरादून पहुंचे. कुछ समय बाद उन्हें एक बड़े होटल में ठहरा दिया गया. मोटा खादी का कुर्ता, ऊंचा पजामा, खि‍चड़ी दाढ़ी, सिर से गले तक मफलर और मफलर के ऊपर टोपी. मोटा खादी का कोट, हाथ में छड़ी. एक दरी में छोटा सा बिस्तर रस्सी से बंधा था. एक झोला था जिसमें किताबें व दवाई की बोतलें थीं. सहज देहाती युगपुरुष बाबा नागार्जुन भव्य होटल के रंगीन पर्दों, दीवारों, खिड़कियों और फर्नीचरों के बीच चल रहे थे. पीछे युवाओं की उत्साही भीड़ थी. एक सुविधाजनक सोफे में बैठकर उन्होंने अपनी सांसों को संयत करने के लिए पानी मांगा. एक नजर युवाओं की तरफ डाली और मुस्कुफराये. फिर पैर सोफे पर चढ़ा कर बैठ गए. छात्र संघ अध्यक्ष जो उन्हें सादतपुर से गाड़ी में लाए थे, उन्हें इशारे से बुलाया और कहा, ‘‘अतुल को बुला सकते हो?’’

मेरे पास फोन आया- ‘बाबा देहरादून पहुंच गए हैं. आपको याद कर रहे हैं.’ कुछ ही देर बाद मैं बाबा के सामने था. वह मेरा हाथ पकड़कर बैठ गए. हंसे और कुछ बातें कीं. फिर धीरे-धीरे उठे, अपना छोटा सा रस्सी बंधा बि‍स्तर सामने रखवाया, झोला कंधे पर टांगा और छड़ी ढूंढने लगे. न मैं कुछ समझ पाया और न कोई और.

‘‘अतुल के घर जाऊंगा.’’ विनम्रता और दृढ़ता के साथ बाबा ने कहा. सब चौंके. उन्होंनें मेरा हाथ पकड़ा. सब बाहर की तरफ चलने लगे. न कोई विवाद न कोई संवाद. मेरी क्या हिम्मत मैं कुछ कहूँ.मेरे लिए तो यह अप्रत्याशित सौभाग्य था.

‘‘वहीं रहूंगा.’’ बाबा ने निर्णायात्मक स्वर में कहा. बाहर निकल छात्रसंघ अध्यक्ष ने मुझे अलग बुलकर कहा, ‘‘एक- डेढ़ घंटे बाद कार्यक्रम है. बाबा को वहां भी पहुंचना है.’’

‘‘मुझे बताओ मैं क्या कर सकता हूं ?’’ मैंने कहा.

‘‘मैं आपके साथ चलता हूं और साथ ही कॉलेज ले आयेंगे.’’ छात्रसंघ अध्यक्ष ने कहा. गाड़ी में बाबा बहुत खुश थे.

हम जहां पहले रहते थे, उसके सामने बजरी बिछा एक लॉन था. और उसके आसपास पिताजी के लगाए बावन तरह के गुलाब, कैक्टस, बोगेनवैलिया, कुछ सब्जियां और अन्य पौधे लगे थे. जाफरी वाला मकान, टीन की छत, नींबू के पेड़ से सटा हुआ एक कमरा. वहां रखी चारपाई और दो कुर्सियां. बाबा वहीं बैठे, फिर लेट गए. मैंने परिवार में अम्मा जी, रीता, रेखा और रंजना को मिलवाया. वह उठकर बैठ गए. एकदम बोले, ‘‘अतुल, मुझे तो मेरा परि‍वार मि‍ल गया.’’ अम्मा जी से कहा, ‘‘थोड़ी सी खिचड़ी खाऊंगा.’’ हमें बहुत अच्छा लग रहा था, पर छात्रसंघ पदाधिकारियों की धड़कनें बहुत बढ़ रही थीं.

बाबा मेरा हाथ पकड़कर बाहर आये. और क्यारियों में घूमने लगे. अपनी छड़ी से इशारा करते हुए बोले, ‘‘यह तो सर्पगंधा है. रक्तचाप की अचूक औषधि. यह कैलनडूला एन्टीबायटिक.’’ ऐसे कई पौधे उन्होंने गिना दिये. वह कहने लगे, ‘‘लगता है बहुत जानकार आदमी थे शर्मा जी.’’ (शर्मा जी यानी स्वतंत्रता सेनानी कवि श्रीराम शर्मा प्रेम). काफी देर गुलाब को देखते रहे. और फिर कमरे की ओर जाने लगे. इतनी देर में खिचड़ी बन चुकी थी. उन्होंने बहुत थोड़ी-सी खिचड़ी और सब्जी खाई. और फिर मुझसे पूछा, ‘‘कितनी देर में है आयोजन?’’ मैंने कहा, ‘‘शुरू ही होने वाला होगा.’’ ‘‘तो फिर चलते हैं वहीं पर, सामान यहीं रहेगा. मैं भी यहीं रहूंगा.’’ मैंने न जाने क्यों पूछ लिया, ‘‘यहां कोई असुविधा तो नहीं होगी?’’ इस पर वह नाराज हो गए. उन्होंने कहा, ‘‘खबरदार जो मेरे घर को असुविधाजनक कहा.’’

डी.ए.वी. कॉलेज हॉल- बाबा के आने से खलबली मच गई. राहुल सांकृत्यायन के साथ तिब्बत यात्रा और निराला के समकालीन आपातकाल में सक्रिय काव्यमय विद्रोह करने वाले मैथिली साहित्य में साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त हिंदी के वरिष्ठतम कवि, गद्यकार व आन्दोलनकारी बाबा नागार्जुन बार-बार मंच से यही कहते रहे कि- जन से होते हुए जन तक पहुंचना ही लक्ष्य है. दिल्ली से उनके साथ आये महेश दर्पण और देहरादून के कवियों के साथ उन्होंने काव्यपाठ किया. ‘मंत्र’ कविता सुनाई. छात्र-छात्राओं के साथ घंटों बैठे रहे. रिश्ते जोड़ लिये. सबको हमारे घर का पता देते रहे. और अद्भुत निरन्तरता के संवाद बाबा नागार्जुन से मिलने दो दिन तक हमारे यहां मेला लगा रहा. चाय का बड़ा भगोना रेखा ने चढ़ा दिया था. युवा और वृद्ध, साहित्यकार और रंगकर्मी अलग-अलग सोच के राजनीतिक लोगों से हमारा घर भरा रहा. बाबा क्या आये जश्न हो गया. तभी तो वे जनकवि हुए.

अगले दिन मेरे आग्रह पर महादेवी पीजी कॉलेज के हिन्दी विभाग में भी उन्होंने शिरकत की. रात को सोते समय कहने लगे, ‘‘आज मेरी पांच हजार से ऊपर फोटो खिंची होंगी. ये सोच रहे हैं कि मैं इतनी जल्दी चला जाऊंगा. इन्हें पता नहीं कि अभी बहुत दिन जियूंगा.’’ वह ठहाका मार कर हंसे. मैंने मन ही मन सोचा, बाबा नागार्जुन कभी समाप्त हो ही नहीं सकते. वह हमारे यहां कई दिन तक रहे.

जयहरि‍खाल, पौड़ी गढ़वाल- बाबा का पिचतरवां जन्मदिवस. वाचस्पति के यहां आकर वह हर साल रहते थे. उसका फोन आया कि ‘‘बाबा का पिचतरवां जन्मदिवस है. तुम्हें आना है.’’ मैं यह अवसर कैसे चूकता. लैंसडाउन के पास छोटी-सी बस्ती जयहरिखाल पहुंच गया. वहां वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित बाबा नागार्जुन की काव्यपुस्तक ‘ऐसा क्या कह दिया मैंने’ का विमोचन हुआ. शेखर पाठक, गिर्दा आदि मौजूद थे.काव्यगोष्ठी हुई. बाबा ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘अकाल’ सुनाई. और लोगों ने भी काव्य पाठ किया. मैंने दो जनगीत सुनाए.  उसकी एक पंक्ति पर बाबा काफी देर तक बोले. यह मेरे लिये उत्साहजनक था. पहली पंक्ति थी-

‘ये जो अपनी  रक्त शिरायें हैं सारी पगडंडियां गांव की हैं’

और दूसरी कविता की पंक्ति थी- ‘जिस घर में चूल्हा नहीं जलता, उसके यहां मशाल जलती है.' मेरी इन दोनों पंक्तियों पर काफी देर तक चर्चा की. जयहरिखाल को केन्द्र मान कर कई कविताएं लिखी थीं जो गढ़वाल विश्वविद्यालय के कोर्स में पढ़ाई जाती हैं.

नैनीताल- नागार्जुन, गिर्दा और मैं नुक्कड़ कवि सम्मेलन में काव्यपाठ कर रहे थे. बाबा ने एक पंक्ति सुनाई- ‘एक पूत भारत माता का. कंधे पर है झंडा. पुलिस पकड़ कर जेल ले गई. बाकी रह गया अंडा.’ यह सबको बहुत पसंद आई. साहित्य समझ भी आये और परिवर्तन की दिशा में कार्य भी करे. यह मकसद ठीक लगा. उन्होंने चलते समय अपनी घड़ी देते हुए कहा, ‘‘अतुल, यह लो मैं तुम्हें समय देता हूं.’’ यह कहकर वह खुद ही ताली बजाकर बच्चों की तरह खिलखिलाये और बाबाओं की तरह चले गये मुड़कर नहीं देखा.

ये दृश्य कभी भूलता नहीं. ऐसे बहुत से संस्मरण मेरे पास हैं जो नैनीताल, हल्द्वानी, कौसानी, पौड़ी, अल्मोड़ा, देहरादून ही नहीं, बल्कि दिल्ली तक फैले हुए हैं. बहुत लोगों में बाबा इस तरह से जीवित हैं.

दिल्ली विश्वपुस्तक मेला. एक स्टॉल पर बाबा बैठे हैं. वह किसी पुस्तक का विमोचन करने को तैयार हैं. उनसे मिले बहुत वर्ष हो गये थे. सोचा कि पहचान भी पायेंगे कि नहीं. उनके पास गया और प्रणाम किया. वह किसी और से बात करने लगे. मैं चलने लगा. उन्होंने लपक कर मेरा हाथ पकड़ा, ‘‘अरे, इतनी जल्दी क्या है? देहरादून जाना है क्या?’’ वह फिर चिरपचित हंसी के साथ मिले. अच्छा लगा कि भीड़ भरी दुनिया में अभी कुछ लोग ऐसे हैं जो मन से जुड़ते हैं. उन्होंने गढ़वाल की कई बातें पूछीं. एकएक दिल्ली के नामवर लोगों ने उन्हें घेर लिया. भीड़ के पीछे खड़ा मैं भी बाबा के साथ जुड़ा रहा. आज भी जुड़ा हूं.

Thursday, May 17, 2012

बाबा नागार्जुन का एक संस्मरण – ६


(पिछली किस्त से आगे)

तंबाकू का पत्ता खोंट-खोंटकर बालचंद ने फिर उसमें चूना मिलाया. पलंग के नीचे से स्टूल खींचकर बैठ गया और सुरती मसलने लगा .

मैं अपने इस खेतिहर हीरो से इन दिनों बहुत घबराता हूँ . वह चालीस से ऊपर का हो चुका है . एक बार गाँव का सरपंच भी चुना गया था . सात-सात बेटों का बाप है अब हमारा बलचनमा . बेचारी सुगनी जाने कब से तरस रही है कि घर-आँगन में एक बिटिया भी डोलती नज़र आए !

काका, कहाँ-कहाँ भागते फिरोगे ? मैं छोडूँगा नहीं तुमको, हाँ ! मुझको पिटवाकर कहाँ डाल रखा है ?

बेदर्द निर्मोही कहीं के ! शरम नहीं आती है, एक पोथी अधूरी छोड़ के अंट-शंट लिखे जा रहे हो ! जब तक मेरीवाली पोथी ख़त्म नहीं करोगे लिखकर, तब तक इसी तरह बिलल्ला बने भटकते रहोगे मिसिर जी महाराज!

मैं आपको पकड़ के वापस ले जाऊँगा. क़ैद करके अक्कड़-लक्कड़वाली पिछवाड़े की अपनी उसी कुठरिया में बंद कर दूँगा...

मैं आपकी मिट्टी पलीत करूँगा...

मैं आपको कहीं का न रखूँगा...

आप मेरी कहानी कब तक पूरी कर रहे हो ? चलो, साल-भर की मुहलत देता हूँ. इस अरसे में अगर मेरी कहानी को लेकर आपने चार-पाँच सौ पन्नों की एक और पाथी नहीं लिख डाली तो बस...

क्या कर लेगा?

जान से मार डालेगा क्या ?

नहीं, शायद हाथ काट डालेगा !

अरे, बड़ा गुस्सैल है बलचनमा...पीछे पड़ जाता है, तो फिर तबाह कर देता है...

मैं उसे मना लूँगा...

हाँ, वह मान जाएगा...

वह मेरा मानस पुत्र ठहरा न ?

जी हाँ, पिताजी !

यह तो दूसरा स्वर है... किसका स्वर है ?

इतनी जल्दी भूल गए मुझे ? ओ वंचक पिता ! लो, तुम्हारा एक मानस पुत्र तुम्हें प्रणाम करता है, दुखमोचन की कैसी रेड़ मारी तुमने ? आपके लाभ लोभ का शिकार वही दुखमोचन आपको अपनी प्रणतियाँ निवेदित कर रहा है, आर्य !

वत्स, घबरा क्यों गए ? मैं तुम्हें भूला नहीं हूँ . शीघ्र ही तुम्हारा यथार्थ रूप पाठकों के समक्ष उपस्थित करूँगा. पिछली भूल अब और नहीं दुहराई जाएगी. आकाशवाणी-केंद्रों की दुहरी-तिहरी बोरियत का तुम्हें शिकार होना पड़ा, तुम्हारी लपसी बन गई, इसके लिए मैं तुमसे माफी चाहता हूँ बेटा !

आईनेवाला मुखड़ा मुसकरा रहा है . मैं सब समझता हूँ.... वह कहेगा, देखो नागा बाबा, तुम न तो अपनी औरत, अपनी संतानों के प्रति ईमानदार हो, न मानस संतानों के प्रति ही !

बिलकुल ठीक कहेगा, मैं अपना यह पाप कबूल कर लूँगा. बिना अगर-मगर के, बिना न-नु-न-च के स्वीकार कर लूँगा अपना अपराध...

ज़िंदगी में पहली बार ऐसा हुआ है कि मुझे किसी आईने के सामने इतनी अधिक देर तक अपने को हाज़िर रखना पड़ा .

मुझे बार-बार राकेश की खाम-ख़याली पर हँसी आई है, खीजा हूँ बार-बार राकेश के इस दुराग्रह पर. मेरे मालिक (पाठक-पाठिका वृंद), आपको मैं अब क्या बताऊँ कि आईने में अपना मुखड़ा देखना कितना आवश्यक है! इस झमेले से छुटकारा पाने का आसान तरीक़ा मुझे बचपन में ही मालूम हो गया था.... महीने-महीने साबित माथा छिलवा लेना! अपराजिता को मेरी इस सनक से सख़्त नफ़रत रही है .

वह जाने कितनी दफ़े मुझ पर रंज हुई होगी, महज़ बालों के सवाल पर ! पिता के इस हठ का बच्चे भी मखौल उड़ाते हैं...

पिछले जीवन पर गौर करता हूँ, तो याद आता है, अठारह वर्ष की आयु तक शायद अठारह बार भी मैंने शीशे में अपना मुँह नहीं देखा होगा . पीछे शादी हुई, तो ससुराल के उस केलि-कुंज में अपराजिता की सहेलियों ने मुझे फैशन का क-ख-ग सिखलाया ! सुगंधित तेल की शीशी, कंघी और आईना मेरे बनारसवाले छात्र-जीवन में तब तक साथ रहे, जब तक कि गांधीजी की आत्मकथा का पारायण नहीं किया .

अब महसूस करता हूं कि आईना मुझे नित्य देखना चाहिए . अपने आलोचकों को यों हम दस-बीस गालियाँ दे ही लेते हैं, किंतु प्रतिरूप देखते वक़्त हमारा निज का ही विवेक अपनी मीमांसा कर डालता है-- निश्छल और संतुलित ! उसके सामने हमारे बाज़ारू हथियार धरे ही रह जाते हैं .

आईने, तेरी जय हो ?

आईने, अब आज से तू मेरा साथी हुआ !

अब मैं रोज़ तुझसे दस-पंद्रह मिनट बातें किया करूँगा. लेकिन नहीं, यह तो अपना आईना नहीं .

राकेश, ले जाओ अपना जादुई शीशा...! इसने तो मेरा माथा ही ख़राब कर दिया ! जाने क्या-क्या बकवा लिया है !...

नहीं भाई, मुझे नहीं चाहिए आईना-फाईना !

किसी को अपना बेड़ा गर्क़ करना हो, तो राकेश की ओर रुख़ करे.... श्रीयुत मोहन राकेश, हाल मुक़ाम चर्चगेट, बंबई, पोस्ट जोन नंबर 1; क्यों भैयाजी, आपके निवास-स्थान का पूरा पता बतला दूँ संसार को ?

संसार यानी विश्व . विश्व यानी दुनिया-भर के सभी राष्ट्र . सभी राष्ट्र यानी सभी राष्ट्रों के झंडे...

क्यों साहब, झंडे क्या राष्ट्र के ही हुआ करते हैं ?

काशी-प्रयाग के हर पंडे का अपना अलग-अलग झंडा होता है . आपका भी अपना अलग झंडा हो सकता था .

था नहीं, है ! है, साहब है ! मेरा भी अपना झंडा...!

अच्छा ! वही झंडा ! पार्टीवाला ? हँसिया और हथौड़ा ?

राम कहिए. फिलहाल लगी है मुझे कसके भूख, इसी से और कोई झंडा सूझ नहीं रहा है. बस, अपना तो वही एक प्यारा झंडा है... मैथिल ब्राह्मणशाही का पीला झंडा ! देखिये भाई, हँसिये नहीं . मेरे झंडे पर बड़ी मछली का निशान है . कितना प्यारा निशान है, मछली....मछली...!

सिर चकरा रहा है ?

भूख बहुत लगी है ?

जाओ न, चेंबूर जाकर मछली-भात डटा आओ . अपना मैथिल मित्र है न तुम्हारा वहाँ ?

नहीं, अभी यहीं बिजली के चूल्हे पर खिचड़ी तैयार करता हूँ-- सुरेश भाई चौपाटी वाले अपने रूम में इतना तो इंतजाम कर ही गए हैं .

मगर यह आईना भी तो अपना पिंड छोड़े न !

अब आख़िरी झाँकी है...

सामने अपनी परछाईं के इर्द-गिर्द एक-एक दो-दो करके कई चेहरे आगे-पीछे दिखाई दे रहे हैं--

क : तुमने मुझे पिटवाया था, मैंने तुम्हें दो वर्ष की जेल की सजा कटवायी थी. तुम्हारी जटा तीस हाथ लंबी थी, गोरखपुर के उस पारसी मजिस्ट्रेट ने तुम्हारी गिरफ़्तारी के बाद पहला काम यही किया था कि जटा मुंड़वा दी... इलाक़े में तुम्हारे ढोंग की तूती बोलती थी... नागा बाबा ने बुलहवा के बाबा की माया को पंक्चर कर दिया ! गवाहों ने अदालत में कहा था-- यह व्यक्ति मूलतः तमकुही का रहनेवाला मुसलमान है और भागकर नेपाल चला गया . वहाँ से साधु बनकर लौटा-- काले चेहरे की लाल आँखें बार-बार मुझे घूर रही हैं !

ख : एक अधेड़ औरत . रात को सोते समय कंबल के अंदर घुस आई थी. तिब्बत की घटना है, अपरिचित जगह, अनजाने लोग . शंका और आतंक से मेरी नींद उड़ गई . अगले रोज़ मालूम हुआ, वह इसलिए साथ सोने आऊई थी कि मैं ठंड के मारे सिकुड़कर कहीं दम न तोड़ दूँ !

ग : अमृतसर का एक लाल ! हम पति-पत्नी (1941 में) को यह निरा भोंदू मान बैठा था . अपराजिता को रिझाने की बेचारे ने कोशिश की, सैकड़ों रुपए खर्च कर डाले . उसे आशा थी कि अपने गँवार पति को छोड़कर यह युवती उसकी जीवन-संगिनी बनना स्वीकार कर लेगी . बरेली, मुरादाबाद, हरिद्वार, सहारनपुर जाने कितने दिनों तक यह पंजाबी युवक हमारे साथ चिपका रहा !

घ : उत्तर प्रदेश का एक प्रकाशक . कई हज़ार रुपए बरबाद हुए उसके . इसमें 40 प्रतिशत कसूर उसका अपना भी था .

च : वयोवृद्ध पत्रकार . आपको मैंने अपनी पैनी क़लम चुभो दी थी . बड़ा दर्द हुआ बेचारे को...

छ : काठमांडू का एक सैनिक अधिकारी . उन्होंने तीन राष्ट्रों की महंगी शराब को आचमन करने का सुअवसर प्रदान किया .

बस, बंद करो अपनी बकवास...!

हाँ, सचमुच बड़ी कतार है उन चेहरों की जिनकी निगाहों में मेरे लिए उलाहना भरा है.... बाक़ी चेहरे कुछ ऐसे भी मित्रों के हैं, जिनकी प्रशस्ति में मैंने निर्लिप्तता का परिचय दिया .

भाई, यह तोड़-जोड़ की दुनिया है . इस हाथ दो, उस हाथ लो ! वरना जहन्नुम में जाओ...!

अलविदा, प्यारे आईने ! अलविदा !

(समाप्त)

Wednesday, May 16, 2012

बाबा नागार्जुन का एक संस्मरण – ५



(पिछली किस्त से आगे)

आदमी हो तो आदमी की तरह रहो न ! यह क्या धज बना रखी है तुमने अपनी ! छोटे-छोटे बाल उगाए रखते तो चंचल माथे पे. नुची मूँछों का ठूँठ आलम तुम्हारे मुखमंडल को प्राकृत और अपभ्रंश के संयुक्त व्याकरण-जैसा सजा रहा है ! कपड़ों का यह हाल कि भदेसपन और कंजूसी का सनातन इश्तिहार बने घूमते हो ! चर्चगेट हो या चौरंगी, कनॉट प्लेस हो या हजरतगंज, सर्वत्र तुम्हारी यही भूमिका रहती है . आधुनिकता या माडर्निटी को अँगूठा दिखाने में तुम्हारी आत्मा को जाने कौन-सी परितृप्ति मिलती है ! ओ आंचलिक कथाकार, तुम्हारी आँखें सचमुच फूटी हुई हैं क्या ? अपने अन्य आंचलिक अनुजों से इतना तो तुम्हें सीख ही लेना था कि रहन सहन का अल्ट्रामॉडर्न सलीका भला क्या होता है . ओह, तुम मास्को-पीकिङ नहीं पहुँच सके हो अब तक ?... ओफ्फोह माई डियर नागा बाबा! व्हाट ए पिक्यूलियर टाइप ऑफ पुअर फेलो यू आर!... प्राग ही देख आए होते! प्राइम मिनिस्टर की कोठी के सामने, तीन मूर्ति के क़रीब एकाध बार हंगर-स्ट्राइक मार दी होती, तो फिर बुडापेस्ट देखने का तुम्हारा भी चांस श्योर था...और अब तो ससुर तुमने अपने आपको डुबो ही लिया है. पीकिङवालों को इस क़दर गालियाँ देने की क्या ज़रूरत आ पड़ी थी! देख लेना, कल या परसों फिर से ‘भाई-भाई’ के वही नारे मुखरित होंगे और चुगद की तरह फीकी-डूबी निगाहों से चीनी-गणतंत्र के दूतावास की बाहरी प्रकाश-मालाओं को तुम देखा करोगे ! ओ अछूत-औघड़ अदूरदर्शी साहित्यकार, तुम सचमुच ही भारी बेवकूफ हो ! तुमने माओ-त्से-तुङ्, लिउ-शाओ-चि और चाऊ-एन-लाई को बुर्जुआज़ी से उधार ली हुई गालियाँ दी हैं; कोई ‘सच्चा’ कम्युनिस्ट तुम्हें माफ़ नहीं करेगा. बंगाल के तरुण कम्युनिस्टों को यदि तुम्हारी ये कविताएँ अनूदित करके कोई सुना दे, तो वे निश्चय ही तुम्हारे लिए नफ़रत में डूबे हुए दो शब्द कहेंगे. बस दो ही शब्द...
जी हाँ, दो ही शब्द कहेंगे !

बतलाओ तो भला क्या कहेंगे?

--प्रतिक्रियावादी कुत्ता !

आईना घूम गया है यह सुनकर... वह चक्कर खा रहा है... चक्कर-पर-चक्कर... और एक चक्कर .. और एक चक्कर !

अरे, कब तक चक्कर काटेगा आईना ?

ओ भाई आईने, यह तुझे क्या हो गया !

इत्ते-से काम नहीं चलेगा. अभी और कुछ देर तक अपन आमने-सामने बैठेंगे. भई, तू घबरा क्यों उठा? किसी ने तुझे कुत्ता कह दिया? प्रतिक्रियावादी कह दिया किसी ने?...तो, क्या हुआ? आखिर मैंने भी तो उनके इष्टदेव को गालियाँ दी हैं न? तू घूँसे लगायेगा, तो दूसरा चुप बैठा रहेगा क्या?

वाह रे घूंसेबाज!

आईना एक बार और घूम गया है. अबकी, शायद परिहास की भंगिमा में...

-- अपनी शक्ल तो देखो !

-- क्यों, क्या हुआ है मेरी शक्ल को ?

-- पास-पड़ोस में किसी के यहाँ अगर आदमकद बड़ा आईना हो, तो कभी-कभी वहाँ पहुँचकर अपने शरीर की पूरी परछाईं देख आया करो न !

-- हट, भाग यहाँ से ! बदतमीज़ कहीं का !

-- भारी पहलवान हो न, घूँसे का ख़याल तभी तो आया है...!

मन-ही-मन गोरेगांव पहुँच गया हूँ क्षण-भर के लिए . डॉ. शुक्ला के क्वार्टर में आदमक़द आईना है .

अभी उतना भुलक्कड़ नहीं हुआ हूँ...

अरे, मैं तो धनुष की तरह बिलकुल ही झुक जाऊँगा कुछ वर्षों में ! हाय, मैं तो बुढ़ापे का गेट-पास पाने का हक़दार हो चुका हूँ... सिर के बाल खिचड़ी दिखते हैं . मूँछों का भी यही हाल है . हथेलियाँ उलटाओ, तो पतली नीली नसों के जाल स्पंदित नज़र आते हैं . सीने के ऊपर गले के दोनों छोर पर नीचे की तरफ़ गड्ढे किसी की भी हमदर्द निगाहों को अपनी ओर खींच लाएँगे...

केशवदास जी ने अपना ऐसा ही ढांचा देखकर स्वगत कहा होगा--

केसव, केसन अस करी जस अरिहू न कराहिं.
चंद्र बदनि मृगलोचनी ‘बाबा’ कहि-कहि जाहिं..

मगर क़सम ईमान की, शपथ जनता-जनार्दन की, मुझे तो अपना यह ‘बाबा’ संबोधन बेहद प्रिय है . किशोरी हो चाहे युवती, कोई भी चंद्रबदना मृगनयनी अपने राम को ‘बाबा’ कहती है, तो वात्सल्य के मारे इन आंखों के कोर गीले हो जाते हैं. अपनी प्रथम पुत्री जीवित रहती तो सत्रह साल की होती...

शादी करने के बाद घर से भागा न होता, तो हमारी यह चंद्रवदनी-मृगलोचनी तीस-बत्तीस वर्ष की होती .

पके बालोंवाले आचार्य केशवदास का धर्म-संकट कुछ और ही प्रकार का रहा होगा. बुढ़ापे में भी छिछोरपन जिनका पिंड नहीं छोड़ता, हमारे यह बुजुर्ग निःसंदेह उसी कोटि के थे. हाँ, यह भी हो सकता है कि केशवदास को बदनाम करने के लिए किसी अन्य ईर्ष्यालु कवि ने उनके नाम पर यह दोहा लिख मारा हो... फिलहाल आचार्य केशवदास तो महाकाल की अतल गोद में से बाहर आने से रहे, उनकी ओर से शायद कोई अन्य आधुनिक आचार्य मुझे बतलाएँगे, उक्त दोहा क्षेपक है. प्रतीक्षा में रहूगा.
मगर अपनी टेढ़ी कमर का क्या होगा?

आत्मा को सबल बनाओ, नागा बाबा, देह की फ़िक्र क्यों करते हो, प्यारे ! ‘नैनं छिंदंति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः’ गीता का एक भी श्लोक याद न रहा?

तो राकेशवाला आईना ठीक ही कहता है, मैं बूढ़ा हो गया हूं. जवाबी हमला अपनी तरफ़ से अब शब्दों तक ही सीमित रहेगा?

कोई परवाह नहीं! शब्द को अपने पूर्वजों ने वज्र से भी बढ़कर शक्तिशाली माना है...

हूं... खैर, ‘हारे को हरिनाम’ ही सही.

शब्दों की गोलाबारी ज़िंदाबाद! शब्द-ब्रह्म की यह बारूद हमारे राष्ट्र की अपनी वस्तु है... एटम बम या मेगाटन कोई भी अक्षर शक्ति का सामना नहीं कर सकता !

अक्षर शक्ति के द्रष्टा, शब्द ब्रह्म के उद्गाता...हम भारतीय साहित्यकार सप्तर्षियों के वंशधर हैं . सुन ले रे अलादीन के आईने ! जो भी हमारा मखौल उड़ाएगा; उसकी कलेजियाँ टूक-टूक हो जाएँगी !

ख़बरदार ! हमें ताने न मारना, अहमक...

मुझे तूने डरपोक समझ रखा है?

माफ़ कीजिये, बाबा, आप क्या किसी से नहीं डरते हैं ?

वाह, डरता क्यों नहीं ! दरअसल डरना भी उतनी ही स्वाभाविक क्रिया होती है, जितनी कि डींग मारना !

तो आप किससे डरते हैं ?

अपने पाठकों से डरता हूँ . बलचनमा से डरता हूँ, वरुण के बेटों से डरता हूँ, दुखमोचन और रतिनाथ और वाचस्पति और पद्मानंद और मोहन माँझी से डरता हूँ . कंपाउंडर और उस बहादुर बीबी का ख़याल आते ही माथा दर्द करने लगता है कि बेचारी के प्रति मुझसे भारी अन्याय हो गया है . रात को जब लोग सो जाते हैं, तब अक्सर मेरा बालचंद आकर सिरहाने खड़ा हो जाता है . अभी उस रात चौपाटीवाले उस कमरे के अंदर बलचनमा फलाँगकर चला आया, तो पैरों के धमाके से मेरी नींद उचट गई.

सुरती फाँकेंगे, काका ? आपके लिए ख़ास तंबाकू लाया हूँ जटमलपुर के मेले से. वही सरइसावाला बड़ा पत्ता है.  सूंघकर देखिये न ?

आप तो हमें भूल गए हो काका ! नहीं ? मैं झूठ कहता हँ ?

आप चुप क्यों हो, काका ?

नहीं खोलोगे ज़बान अपनी ?

अच्छा, न खोलो...

(जारी)

Tuesday, May 15, 2012

बाबा नागार्जुन का एक संस्मरण – ४


(पिछली किस्त से आगे)

हर साहित्यकार गप्पी होता है.... अहदी भी होता है और दांभिक भी. यह अहदीपन और दंभ उसे ऊँचा उठाते हैं. ढेर-की-ढेर कपास ओटना मोटा काम हुआ. महीन सूतों का लच्छा अगर छटांक-भर की अपनी तकली से आपने निकाल लिया तो ‘पद्मभूषण’ के लिए इतना ही पर्याप्त है, बंधु !

आईने के अंदर जो नागाजी झाँक रहा था, अभी-अभी उसने भभाकर हँस दिया... बाहरवाला नागाजी इस पर डाँट रहा है-- मैं तेरा गला घोंट दूँगा. पाजी कहीं का ! भिलाई या राऊरकेला या दुर्गापुर, कहीं किसी ठेकेदार का मुंशी ही हो जाता भला ! वह धंधा भी बेहतर था, बच्चू !

आईनेवाली आकृति के होंठ हिल रहे हैं . मुद्रा से लगता है, कुछ गुनगुना रहा है...समझे ? कह रहा है... क़लम ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के !

अब आगे मैं तुझे अपने कंधों पर नहीं ढोऊँगा, अदना-सी कोई नौकरी कर लूँगा. बिलकुल असाहित्यिक!

मैं ऊब गया हूँ इस अतिरिक्त यश से. जी करता है कभी-कभी कि कोई ऐसा तगड़ा कुकर्म करूँ जिससे पिछली सारी शोहरत धुल-पुँछ जाए साहित्यकारों की !

अपने ही एक सहृदय बंधु ने एक बार ‘कुकर्म’ का बड़ा अच्छा अवसर प्रदान किया था, तब क्यों तुम भागे थे? वह शायद ही कभी तुम्हें क्षमा करे !

मैंने लेकिन उसको माफ कर दिया है .

अरे पिनकूराम, तुम क्या किसी को यों ही भूलनेवाले हो ?

क्या कहा ? प्रतिशोध की मेरी भट्ठी कभी ठंडी नहीं होगी ?

नहीं, कभी नहीं. बात यह हुई कि तुम्हारा सारा बचपन घुटन और कुंठा में कटा . ग़रीबी, कुसंस्कार और रूढ़िग्रस्त पंडिताऊ परिवेश तुम्हें लील नहीं पाए, यह कितने आश्चर्य की बात है ! पहले तुम भी वही चुटन्ना और जनेऊवाले पंडित जी थे न ? न पुरानी परिधि से बाहर निकलते, न आँखें खुलतीं, न इस तरह युग का साथ दे पाते...

नहीं दे पाते युग का साथ! वाह भई, वाह !

यह किसने ठहाके लगाए ?

मैं ? कौन हूँ मैं ? दंभ हूँ, आरोपित ‘इगो’ हूँ-- तुम्हारा अपना ही स्फीतस्फुरित अहंकार! व्यक्तित्व का आटोप... किस मुग़ालते में पड़े हो, बाबा? क्या अकेले तुम्हीं ने युग का साथ दिया? बाक़ी और किसी ने ज़माने की धड़कन नहीं सुनी ? अलस्सुबह, बु्रश से दाँत माँजते वक़्त ऐस्प्रो की टिकिया का सुकंठ विज्ञापन, मीरा के भजन की लता-वितानवाली लहरियाँ, अपराह्न के अवकाश को गुदगुदानेवाली अंतर्राष्ट्रीय टेस्ट मैच की कमेंट्री, संकट के क्षणोंवाले उदास-अनुतप्त अनाउंसमेंट... यह सारा-का-सारा युगीन स्पंदन क्या तुम्हारे कानों तक पहुँचता रहा है ?

बतलाओ, बतलाओ न! चुप क्यों हो गए ?

गतिशीलता का सारा श्रेय तुम्हीं लूट लोगे ?

गति नहीं, प्रगति ! अरे हाँ, तुम तो प्रगतिशील हो न ! बड़बोला प्रगतिवादी !

ज़रा देर के लिए अपनी ‘प्रगति’ के रंगीन और गुनगुने झागों को अलग हटा दो न ! नागा बाबा, प्लीज...!

आचार्य शिवपूजन सहाय चल बसे!

जी हां, वर्षों से शिवपूजन बाबू का हेल्थ जर्जर चला आ रहा था .

...जी, बिलकुल ठीक फ़रमाया आपने . सहायजी का आविर्भाव न होता, तो बहुतों की कृतियाँ, ‘असूर्यम्पश्या’ चिरकुमारियों की तरह घुटकर रह जातीं. यह सहायजी का ही तप था कि तीन-तीन पीढ़ियों की पांडुलिपियों का उद्धार हुआ.

जी, आपको भी तो यदा-कदा ‘आचार्य नागार्जुन’ के तौर पर याद किया जाता है !

वाह जी, वाह, हद कर दी आपने तो ! अपने कानों को इस फुरती से क्यों छू लिया है आपने ?

ना बाबा, ना! आचार्यत्व का वह लबादा भला मुझसे ढोया जाएगा ? अपन तो सीधे-सादे गऊ-सरीखे प्राणी ठहरे...

माफ कीजिये नागार्जुन जी, आप उतने सीधे-सादे नहीं हैं...

हाँ...हाँ, रुक क्यों गए ? कह जाओ पूरा वाक्य. बीच में ही मेरा रुख़ क्यों नापने लगे ?
लो, अब देखो तमाशा! आईने के अंदरवाला चेहरा तमतमा उठा है, और बाहर वाला चेहरा तो पतझर की फीकी उदासी को भी मात देने जा रहा है ! सचाई की सारी खटास किस तरह कलई खोती है . तथाकथित व्यक्तित्व की!...देखा आपने ?

ठीक तो है, मैं उतना सीधा-सादा नहीं हूँ जितना दिखता हूँ. यह सिधाई-- यह सादगी तो बल्कि दुहरा-तिहरा ढोंग हो सकती है!

(जारी)

Monday, May 14, 2012

बाबा नागार्जुन का एक संस्मरण – ३



(पिछली किस्त से आगे)

अपनी उच्छृंखलता और मस्ती की ढेर-सी बातें बता चुकने के बाद मैंने अपराजिता से पूछा-- तुम तो सुनती ही रही हो, कुछ अपनी भी बतलाओ न ! 

देर तक मुसकराते रहीं देवीजी . कोंचने पर बोलीं-- ले-देकर एक ही तो देवर है अपना, हफ़्ते में एकाधबार मौक़ा मिलता है . बस, बातों का गिल्ली-डंडा खेल लेते हैं. घर बैठकर दो छोटे बच्चों को संभालते, तो तुम्हारा भी विद्यापति टैं बोल जाता !

बचपन के दिनोंवाले कई चेहरे सामने आ रहे हैं. सारे के सारे लड़के हैं-- दो-तीन बड़ी उम्रवाले, बाक़ी हमउम्र और छोटे. एक लड़की भी झाँक रही है.

यह लड़की तेरह वर्ष पार करके चौदहवें में प्रवेश कर चुकी है. मैं संस्कृत की व्याकरण मध्यमा का छात्र हूँ और इंदुकला के पिता शशिनाथ जी मेरे अन्नदाता हैं (उन दिनों मिथिला में ग़रीब छात्रों को परिवार का सदस्य बनाकर अध्ययन में वर्षों तक सहायता करने की प्रथा थी). इंदु मुझसे कहानियाँ सुनती है, विद्यापति के पद सुनती है, कौड़ियों का खेल खेलती है मेरे साथ... इसके पहले मुझे कहाँ मालूम था कि लड़की क्या होती है !

अठारह वर्ष का हुआ, शादी हुई . तब अपराजिता और उसकी दसियों सहेलियों के दर्शन हुए . यह एकदम नई बात थी मेरे लिए . इसके पहले पाँच-सात साल उसी माहौल में गुज़रे थे जहाँ छात्रों और अध्यापकों के दरमियान समलिंगी व्यभिचार के आतंक की अशुभ छाया व्याप्त थी . लोग अपने लड़कों को छात्रावासों में भेजने से हिचकते थे . 1930-32 के महान स्वाधीनता-संग्राम के चलते एक-एक कैंप-जेल में दस-दस हज़ार सत्याग्रही रखे गए थे . उनमें सभी उम्र के लोग थे . वहाँ भी अप्राकृतिक सेक्स-संपर्क ने अपना रंग दिखलाया था .

यह दुर्भाग्य है कि स्त्रियों और पुरुषों को वर्षों अलग-अलग रहना पड़े. हमारा हिंदी-भाषी क्षेत्र सामाजिक सहजीवन की दृष्टि से पड़ोसी प्रदेशों की अपेक्षा अधिक पिछड़ा हुआ है. हमारी यह लालसा तो रहती है कि फ़िल्मों में नए-नए चेहरे दिखाई पड़ें, किंतु अपनी पुत्री या पुत्रवधू को हम ‘मर्यादा’ की तिहरी परिधियों के अंदर छेके रहेंगे! लड़की के लिए इंजीनियरिंग या डाक्टरी की पढ़ाई करनेवाला युवक हासिल करना है तो दस हज़ार से लेकर पचास हज़ार रुपए खर्च करेंगे, मगर उसको उसकी रुचिवाला जीवन-साथी चुनने का अवसर कदापि नहीं देंगे और न उसे काम करने की छूट देना चाहेंगे . बेकारी और सामाजिक घुटन की ज़हरीली भाप बेचारी के तन-मन को पंगु बनाती जाएगी और हम-- ठहरिये, महाशय जी !

कौन हो, भाई?

इस तरह तो काम नहीं चलने का...

आप आईने की तरफ़ नहीं देख रहे हैं न ? किसने कहा था कि जनाब मन की झील के अंदर गोते लगा गए! मैं इस दर्पण की आत्मा हूँ . रूप-कथाओं वाला बैताल मेरे डर से थर-थर काँपता है... तो मैं भी तुम से डरूँ ?

नहीं, नागा बाबा, तुम काहे को मुझसे डरने लगे ! हाँ, इतना ज़रूर है कि लापरवाही करोगे, तो उत्पात मचा दूँगा. बैठने नहीं दूँगा चैन से, समझे ?

लो भई, फिर से एडजस्ट करो इसे... शाबाश! कितना बढ़िया आईना है...!

कंधों के पीछे से दो छोटी-पतली बांहें इधर लटक आईं .

कौन ? उर्मि, तुम हो ?

जी, पिताजी !

पगली, सामने तो आ !

उंहूं, नहीं आऊँगी सामने . आपकी पीठ के पीछे छिपी रहूँगी . क्या होगा सामने आकर ?

तो, रंज है तू ?

अब वे छोटी-पतली बाँहें दिखाई नहीं पड़ रही हैं . उर्मिला थी न अपनी ? दस साल की हो गई . क़ायदे से पढ़ती-लिखती होती, तो छठवीं श्रेणी की छात्रा होती किसी स्कूल की... लेकिन उसकी पढ़ाई का सिलसिला छूट गया है न? उर्मिला अपने बाप पर बेहद रंज है.

उर्मिला चूँकि लड़की है, बहुत कुछ समझने लगी है .

शोभाकांत ने पटना से कई बार लिखा है-- आपने, पिताजी, उर्मिला के बारे में शायद तय कर लिया है कि उसे मूर्ख ही रखेंगे.
नहीं, बेटा तुम ग़लत समझ रहे हो. मैं भला अपनी पुत्री को मैट्रिक भी नहीं करवाना चाहूँगा !

तो यों ही मैट्रिक हो जायेगी उर्मिला?

मैट्रिक में फर्स्ट डिवीजन लाया है. पटना कॉलेज में प्रि-युनिवर्सिटी क्लासेज़ का छात्रा है. बचपन में वर्षो तक बोन टी०बी० से आक्रांत था. एक टाँग शक्ति-शून्य है, इसी से लंगड़ाकर चलता है... उन्नीस साल का यह तरुण अपने बाप की रग-रग पहचानता है. उसे भली-भाँति पता है, पिताजी बातें बहुत करते हैं, काम नहीं करते ! समूचा परिवार पटना या इलाहाबाद कहीं जमकर रहता, तो उर्मिला भी पढ़ जाती और मंजू भी...

हाँ, बेटा! मैं गप्पी हूँ... अहदी भी हूँ और दांभिक भी .

(जारी)

Sunday, May 13, 2012

बाबा नागार्जुन का एक संस्मरण - २


(पिछली किस्त से  आगे)

सच कहता हूं, राकेश, कल बाहर नहीं निकला. आज भी नहीं निकलूंगा. आईने का पिशाच सामने मुस्तैद खड़ा है... बीच-बीच में भौंहें तानकर, होंठ भींचकर वह मुझे धमका भी रहा है-- ख़बरदार ! आत्मकथावाली घिसी-पिटी स्टाइल में कुछ का कुछ लिखकर पन्ने काले करोगे, तो तुम्हारे भी हाथ-पैर सुन्न हो जाएँगे! जीभ अकड़ जाएगी और दिल-दिमाग़ किसी काम के न रहेंगे!

तो फिर?

तो फिर, जय हो आईने के इस बैताल की!

नमस्तेऽस्तु पिशाचाय,
वैतालाय नमो नमः
नमो बुद्धाय मार्क्साय
फ्रायडाय च ते नमः.
अथ नाग-लीला--

बाहर से जैसा कुछ दिखाई देता हूं, वैसा ही नहीं हूँ न?

जीवन के अनेक-अनेक पहलुओं की सम-विषम प्रतिच्छवियाँ इस आईने में उभर रही हैं. स्टूडियो का टेकनीशियन फ़िल्म की बेतरतीब रीलों के टुकड़े क्या यों ही सेंसर बोर्ड के समक्ष पेश कर देता होगा ?

नहीं जी, वह उन्हें कतर-ब्योंत करके एक ख़ास क्रम में सजाता होगा.

मेरा जीवन सपाट मैदान है-- प्रेमचंद अपने बारे में कह गए हैं... मगर मेरा जी नहीं मानता कि किसी भी साहित्यकार का जीवन सचमुच ‘सपाट’ होता होगा. दरअसल, यह भी एक फैशन है व्यक्तित्व की छाप छोड़ने का कि हम अपनी सादगी, सिधाई, भोलापन, विनम्रता आदि का लेखा-जोखा आहिस्ता से औरों तक पहुँचा दिया करें! प्रकृति ख़ुद ही चमत्कारमयी है, वह सपाट नहीं हुआ करती. तो फिर हमारी और आपकी ज़िंदगी ही कैसे सपाट होगी, साहब?

अरे वाह! यह देखिए, सामने नागा जी का शिशु चेहरा...पीछे एक अधेड़ पुरुष की प्रौढ़ मुखाकृति. .. अगले ही क्षण चेहरे पर क्रोध का तनाव...होंठ काँप रहे हैं .

(मैं तेरा हाथ काट लूँगा ! क्यों अंट-संट लिख मारा है तूने ? बाप की बुराई कौन करता है ?)

-- शैतान. मगर मैंने झूठ थोड़े लिखा है. मेरी चाची से आपका क्या रिश्ता था ?

उस रोज, दुपहर की उमस में अंदर लेटी हुई मेरी मां का गला कुल्हाड़ी से किसने काटना चाहा था ?

समाज की दसियों औरतों से आपके लगाव थे . कोई बात नहीं . लेकिन मेरी माँ और मेरे पाँच भाई-बहनों को किसकी उपेक्षा का शिकार होकर दम तोड़ना पड़ा था ?

(चोप्! जीभ खींच लूंगा... जानता नहीं, मैं कितनों की पसलियां तोड़ चुका हूँ ? रौब के मारे गाँव के युवक मुझे ‘गुरू’ कहकर पुकारते हैं !...)

-- और पिताजी, आपकी वह गुरुअई कैसे गल गई थी मामूली काग़ज़ की तरह, जबकि मेरी विधवा चाची के गर्भ रह गया था और भ्रूण की निकासी के लिए पड़ोस वाले गाँव की उस बुढ़िया चमाइन को सौ रुपए देने पड़े थे!

अजी वाह, आप रो रहे हो? मेरा वश चलता तो उस अधेड़ उम्र में भी आप दोनों की नई शादी वैदिक विधि से करवा देता! पर मैं तो उन दिनों दस-ग्यारह साल का छोटा-सा बालक था-- मातृहीन, रोगी और डरपोक !

अब सोचता हूँ, तो आईने के अंदर अपने होंठों को उस बाल-सुलभ खीज पर मुसकराते देखकर तसल्ली होती है . क्या कसूर था बेचारों का ? सहज नेह-छोहवाले सीधे-सादे देहाती लोग थे... मगर पिता को अंत तक खुली क्षमा कहाँ दे पाया ! आज शायद इसीलिए पिता के प्रति विगलित हूं कि स्वयं छः बच्चों का पिता हूँ. पितृ-सुलभ वात्सल्य के आवेग ही शायद अपने पिता-पितामह के प्रति हमें उदार बनाते हैं. 1943 के सितंबर में काशी की गंगा के किनारे मणिकार्णिका घाट पर उनका प्राणांत हुआ. मैं तिब्बत के पश्चिमी प्रदेशों की यात्रा पर निकल गया था. कहते हैं, अंतिम क्षणों में किसी ने मेरी याद दिलाई, तो सूखे होंठों को सिकोड़कर बोले थे-- उस आवारा का नाम ही मत लो .

न लो नाम, अपना क्या बिगड़ेगा ? मैं भी तुम्हारी चर्चा किसी के आगे न करूँगा . मेरी माँ को जिसने इतना अधिक परेशान रखा, उस व्यक्ति को खुले दिल से ‘पिता’ कहने की इच्छा भला कैसे होगी ?...

देखो भई, यह तो हिलने लगा ? ज़रूर कोई गड़बड़ हुई है, वरना आईना हिलता क्यों ?

अपू ? अपराजिता ? आओ, आओ ! अच्छा हुआ कि शीशे में तुम दिखाई पड़ीं. कमज़ोर लग रही हो, बीमार हो क्या ? मैं भी बीमार रहा इधर तो. गनीमत है कि बंबई की समुद्री आबोहवा ने अबके दमा को मेरे गिर्द फटकने तक न दिया. हाँ, सर्दी-खाँसी ने बीस-पचीस दिनों तक बेहद परेशान किया.

सोचती हूँ, पिछले कुछेक वर्षों में तुम मुझसे दूर-दूर सरकते चले गए हो. पहले कितनी चिट्ठियाँ लिखा करते थे! अब शायद मैं तुमको अच्छी नहीं लगती हूँ. है न यही बात ?

क्या बात करती हो, अपू ! तुम तो तेरी सहधर्मिणी हो-- ठेठ सनातन अर्धांगिनी श्रीमती अपराजिता देवी, 45 . हमारी अपनी देहाती जायदाद और घर-आँगन की मालकिन ! तुम तो नाहक उदास हो, रानी ! क्यों सुस्त हो? क्या बात है ?

वह चुड़ैल सपने में मुझसे झगड़ रही थी...

कौन भई, कौन ?

वही, जो उस दफ़े गर्मियों में छत पर तुम्हारे लिए इत्र के फ़ाहे फेंका करती थी...

उसके बारे में तो मैंने ख़ुद ही तुम को बतला दिया था. जो नहीं कहना चाहिए, वह बात भी कह दी थी. नहीं कही थी ?

सो तो सब कुछ बतला दिया था तुमने... मगर वह रांड सपने में मुझसे झगड़ रही थी कि अब इस उम्र में सिंदूर क्यों लगाती हूँ ! कह रही थी, ‘ऐसा कौन-सा शहर है जहाँ मेरी सौत न हो’... सो, देखना, मेरी लाज रखना !

क्या सोच रही हो, इस बुढ़ौती में कहीं दो-एक ब्याह मैं और भी रचा लूँगा ?

क्या ठिकाना है तुम लोगों का! मैं क्या पटना-इलाहाबाद नहीं रही हूँ ? जरा-मरा आन-पहचान बढ़ी, तनी-मनी नेह-छोह बढ़ा कि चट्ट शादी पर ही उतर आते हैं...

अच्छा ऽ ऽ ऽ! ! ! तो यह बात है !

मुझे ज़ोरों की हँसी आ गई और अपराजिता का चेहरा दबी-दबाई हँसी के मारे प्रफुल्ल हो उठा है . .. ओफ्फोह, महिलाएँ कितनी चतुर होती हैं ! पुरुषों को छूट भी देंगी और अपना हक़ भी नहीं छोड़ेंगी .

एक बार ऐसा हुआ कि हम आठ-दस महीने के बाद मिले थे . मैं साठ घंटे बाहर नहीं निकला . उन दिनों बच्चे दो ही थे और छोटे थे. उस प्रसंग की एक बात बतला ही दूँ...

(जारी)