Thursday, October 25, 2012

आदमियों की भीड़ का अपशकुनभरा गुस्सा जाड़ों के तूफ़ान के जंगली ऑर्गन जैसा है



गियोर्ग ट्राकल की ख़ामोशी

गियोर्ग ट्राकल की कविताओं में एक शानदार ख़ामोशी है. ऐसा बहुत कम होता है जब वह ख़ुद कुछ बोलता है – ज़्यादातर वह कविता के विम्ब को अपने बदले बोलने देता है. यह बात दीगर है कि उसके ज़्यादातर विम्ब ख़ामोश चीज़ों के विम्ब हैं.

ट्राकल की कविताओं में एक दूसरे का पीछा करती छवियाँ एक बेहतरीन संरचना का निर्माण करती हैं. सारी छवियों का एक दूसरी के साथ बड़ा रहस्यपूर्ण क़िस्म का सम्बन्ध होता है; कविताओं की ले धीमी और भारी होती है, जैसा सपनों में हुआ करता है. ड्रेगनफ्लाई के पंख, मेंढक, कब्रों के पत्थर,पत्तियाँ, सैनिकों के हेलमेट – इन सब से धीर गंभीर रंग फूटा करते हैं – सारे के सारे एक गहन आनंद में. वहीं ये छवियाँ एक दिशाहीन, मार्गहीन अन्धकार में भी रहती हैं. ट्राकल की कविताओं में यहाँ-वहां यह अंधेरी ख़ामोशी नज़र आ जाती है –

पीले फूल
बिना कुछ कहे
झुकते हैं नीले तालाब पर

यह ऐसी चीज़ों की ख़ामोशी है जो बोल तो सकती हैं पर उन्हें चुप रहना पसंद है. जान बूझ कर चुप रहना पसंद करने के लिए जर्मन भाषा में एक शब्द है – schweigen. ट्राकल बहुधा इसका इस्तेमाल करता है. जब वह कहता है कि पीले फूल / बिना कुछ कहे / झुकते हैं नीले तालाब पर, तो हमें अहसास होता है कि फूलों की एक भाषा होती है और ट्राकल उसे सुन सकता है. वे कविताओं में अपनी ख़ामोशी बनाए रखते हैं. चूंकि वह पौधों की वाणी में झूठे शब्द नहीं भरता, प्रकृति उस पर और भी ज्यादा विश्वास करती है. कविता जैसे-जैसे विकसित होती जाती है, उसके भीतर और और अधिक प्राणियों-जंतुओं का आगमन होता जाता है – पहले केवल जंगली बत्तखें और चूहे होते हैं, फिर बांज के पेड़, हिरन, सड़ता वॉलपेपर, तालाब, भेड़ों के रेवड़, बांसुरियां और आखिर में इस्पात के हेलमेट, सेनाएं, घयाल्लोग, युद्ध के मैदान में परिचारिकाएँ और रक्त जो उस दिन घावों से बहा था.

तो भी एक लाल बादल, जिसके अन्दर
घर है एक क्रुद्ध देवता का – जो स्वयं बिखरा हुआ रक्त है
ख़ामोशी से इकठ्ठा होता है
बेंत के पेड़ों तले
चंद्रमा जैसा ठंडापन.

आख़िरी सांस लेने से पहले ट्राकल ने अपनी आसन्न मृत्यु को भी अपनी कविता में आने दिया, जैसा उसकी बाद के दिनों में लिखी गयी कविता ‘शोक’ में नज़र आता है.

ट्राकल कुल सत्ताईस साल जिया. हार्डवेयर के एक दुकानदार के घर १८८७ में साल्सबुर्ग (ऑस्ट्रिया) में उसका जन्म हुआ. उसका परिवार आधा चेक था पर घर पर जर्मन बोली जाती थी. उसने विएना में फार्मेसी की डिग्री ली और सेना में भरती हो गया -  उसे इन्सब्रूख़ में पहली पोस्टिंग मिली. जल्द ही उसने नौकरी छोड़ दी और एक साल दोस्तों से मिलने और लिखने में बिताया.  अगस्त १९१४ में युद्ध छिड़ने के बाद वह वापस सेना में लौटा और गैलीसिया के नज़दीक युद्धरत रहा. किसी भी और सैनिक से ज्यादा उसे घायल आदमी की वेदना महसूस होती थी – और उसके काम की वजह से उसे गहरा अवसाद हुआ. ग्रोदेक की लड़ाई के बाद उसे एक खलिहान में नब्बे गंभीर घायलों की देखरेख का ज़िम्मा मिला. पहली ही रात उसने आत्महत्या का प्रयास किया पर उसके दोस्तों ने उसे बचा लिया. इस दरम्यान उसने आश्चर्यजनक साहस के साथ अपनी आसन्न मृत्यु और हताशा को अपनी कविताओं का विषय बनाया. उसकी कविता ‘ग्रोदेक’ जो संभवतः उसकी आख़िरी है, एक भीषण रचना है. बहुत सावधानी से ट्राकल ने उसकी संरचना पर काम किया है. पहले १९वीं सदी की समूची जर्मन रोमांटिक कविता की तरफ इंगित करता एक छोटा अनुच्छेद आता है और उसके ठीक बाद बीसवीं सदी के जर्मनी की मिकानीकी हिंसा. यह विरोधाभास कविता में ताकत और तनाव दोनों पैदा करता है.

ग्रोदेक संकट ख़त्म हो चुकने के कुछ महीनों तक वह फ़ौज की नौकरी करता रहा – फार्मेसी की सप्लाई में आने वाली दवाएं उसकी नियमित खुराक का हिस्सा बन चुकी थीं. उसे क्राकाव में बतौर रोगी स्थानांतरित कर दिया गया जहां नवम्बर १९१४ में दवाइयों की ओवरडोज़ लेकर उसने अपना जीवन समाप्त कर लिया.

उसकी मृत्यु के बाद उसकी रचनाएं तीन खण्डों में छपीं. आस्ट्रिया के सबसे महत्वपूर्ण एक्सप्रेशनिस्ट कवियों में शुमार गियोर्ग ट्राकल की कुछ कवितायेँ प्रस्तुत हैं -



गर्मियां

शाम के समय कोयल की शिकायत
ठहर जाती है जंगल में
अन्न का दाना अपना सिर झुकाता है और गहरे,
पोस्ते का लाल फूल.

पहाडी के ऊपर
गहराता तूफ़ान.
झींगुर का पुराना गीत
ख़त्म होता है खेतों में.

पांगर की पत्तियाँ
और नहीं हिलतीं.
तुम्हारे कपड़े सरसराते हैं
घुमावदार सीढ़ियों पर.

मोमबत्ती जगती है चुपचाप
अँधेरे कमरे में;
चांदी का एक हाथ
बुझाता है रोशनी;

बिना हवा बिना तारों की रात.


हैल्ब्रून से

एक दफा और पीछा करना शाम के नीले दुःख का
पहाडी की ढाल पर से वसंत के मछलियों वाले तालाब तक –
जैसे कि लम्बे समय पहले मर चुकों की छायाएं मंडरा रही हों,
गिरजाघर के संभ्रांत लोगों की, कुलीन स्त्रियों की छायाएं –
उनके फूल इतनी जल्दी खिल जाते हैं, वे ईमानदार फूल वॉयलेट के
शाम के समय धरती पर, और नीले सोते से बहता
साफ़ पानी, मृतकों की विस्मृति पदचापों से ऊपर
इतनी भयावह तरीके से हरे होते हैं बाज के पेड़
-मछलियों वाले तालबों के ऊपर सुनहरे बादल.  

ग्रोदेक

शाम के समय, शरद का जंगल भरपूर है
मृत्यु के हथियारों की आवाज़ से, सुनहरे मैदान
और नीली झीलें, जिनके ऊपर रपटता जाता है
गहराता सूरज; रात इकठ्ठा होती है
मरते हुए रंगरूट, उनके फटे हुए मुंहों से जानवरों जैसी कराहें.

तो भी एक लाल बादल, जिसके अन्दर
घर है एक क्रुद्ध देवता का – जो स्वयं बिखरा हुआ रक्त है
ख़ामोशी से इकठ्ठा होता है
बेंत के पेड़ों तले
चंद्रमा जैसा ठंडापन.
सारी सड़कें फैलती जाती हैं एक काली फफूंद में.
रात और सितारों की सुनहरी टहनियों के नीचे
सिस्टर की परछाईं टकराती चलती है धुंधले बगीचे में
नायकों के प्रेतों का अभिवादन करते खून से सने सिर;
और शरद की काली बांसुरी की आवाज़ निकलती है छिद्रों से
अरे अभिमानी दुःख! तुम तांबे की वेदी,
आज आत्मा की गर्म लपट का भोजन है
एक और दानवी दर्द,
अजन्मे वे पोते-पोतियाँ.



पूर्वी सीमा पर

आदमियों की भीड़ का अपशकुभरा गुस्सा
जाड़ों के तूफ़ान के जंगली ऑर्गन जैसा है
युद्ध की हल्की कत्थई उठान
बिना पत्तों का एक ग्रह.

टूटी भंवों और चांदी बांहों से
रात हाथ हिलाती है मरते सैनिकों को
शरद के राख-वृक्ष की छाया में
क़त्ल कर दिए गायों की आत्माएं कराह रही हैं.

काँटोंभरा एक रेगिस्तान शहर को घेरे हुए है
बहते खून की सीटियों से
चंद्रमा पीछा करता है हैरतज़दा औरतों का
जंगली भेदिये घुस चुके दरवाजों से भीतर.






    

2 comments:

Manu Tyagi said...

good one

नीरज बसलियाल said...

Achchhe logo ko duniya pasand aati nahin shaayad.