Sunday, October 7, 2012

मंटो के मीराजी – ४



(पिछली किस्त से आगे)

मैंने मीराजी से उसके कलाम के मुताल्लिक दो-तीन जुमलों से ज्यादा कभी गुफ्तगू नहीं की. मैं उसे बकवास कहा करता था और वह उसे तस्लीम करता था. उन तीन गोलों और मोटे-मोटे दानों की माला को मैं उसका फ्रॉड कहता था. इसे भी वह तस्लीम करता था हालांकि हम दोनों जानते थे कि ये चीज़ें फ्रॉड नहीं हैं.

एक दफा उसके हाथ में तीन के बजाय दो गोले देख कर मुझे बहुत ताज्जुब हुआ. जब इसका इज़हार किया तो मीराजी ने कहा : बरखुरदार का इंतकाल हो गया है ... मगर अपने वक़्त पर एक और पैदा हो जाएगा.

मैं जब तक बम्बई में रहा यह दूसरा बरखुरदार पैदा न हुआ. या तो अम्मा हव्वा अक़ीम हो गयी थीं या बाबा आदम मर्दनखेज़ नहीं रहे थे. यह रही-सही खारिजी तस्लीम भी टूट गयी थी. और यह बुरी फ़ाल थी. बाद में मुझे मालूम हुआ कि मीराजी को इसका अहसास था. चुनांचे जैसा कि सुनाने में आया है उसने उसके बाकी के दो अक़नूम भी अपने हाथ से अलहदा कर दिए थे.

मुझे मालूम नहीं मीराजी घूमता-घामता कब बंबई पहुंचा मैं उन दिनों फिल्मिस्तानमें था. जब वह मुझसे मिलने के लिए आया, बहुत खस्ता हालत में था. हाथ में तीन गोले बदस्तूर मौजूद थे. बेसीदा-सी कापी भी थी जिसमें गालिबन मीरा का कलाम उसने अपने हाथ से लिखा हुआ था. साथ ही एक अजीब शक्ल की बोतल थी जिसकी गर्दन मुडी हुई थी. इसमें मीराजी ने शराब दाल रखी थी. बवक्त-ए-तलब वह उसका काग खोलता और एक घूँट चढ़ा लेता था.

दाढ़ी गायब थी. सर के बाल बहुत हलके थे मगर बदन की गिलाज़त बदस्तूर मौजूद थी. एक पैर का चप्पल दुरुस्त हालत में मौजूद था दूसरा मरम्मत तलब था. यह कमी उसने पाँव पर रस्सी बांधकर दूर कर रखी थी. थोड़ी देर इधर-उधर की बातें हुईं. उन दिनों गालिबन आठ दिनकी शूटिंग हो रही थी. उसकी कहानी मेरी थी जिसके लिए दो-एक गानों की ज़रुरत थी. इस ख़याल से कि मीराजी को कुछ रूपये मिल जाएं, उस से यह गाने लिखने को कहा जो उसने वहीं बैठे बैठे लिख दिए, मगर खड़े-खड़े किस्म के, निहायत वाहियात जो यक्सर गैरफ़िल्मी थे. मैंने जब उसको अपना फ़ैसला सुनाया तो वह खामोश रहा. वापस जाते हुए उसने मुझ से साढ़े सात रूपये तलब किये कि उसे एक अद्धा लेना था.

इसके बाद बहुत देर तक उसको साढ़े सात रूपये देना मेरा फ़र्ज़ हो गया. मैं ख़ुद बोतल का रसिया था. यह मुंह न लगे तो ली पर क्या गुज़रती है इसका मुझे बखूबी इल्म था. इसी लिए मैं उस रकम का इंतजाम किये रखता. सात रुपये में राम का अद्धा आता था बाकी आठ आने उसके आने-जाने के लिए होते थे.

बारिशों का मौसम आया तो उसे बड़ी दिक्कत महसूस हुई. बंबई में इतनी शदीद बारिश होती है कि आदमी की हड्डियां तक भीग जाती हैं. उसके पास फालतू कपडे नहीं थे इसलिए यह मौसम उसके लिए और भी ज्यादा तकलीफदेह था. इत्तेफाक से मेरे पास एक बरसाती थी जो मेरा एक हट्टा-कट्टा फ़ौजी दोस्त सिर्फ इसलिए मेरे घर भूल गया था कि वह बहुत वजनी थी और उसके कंधे शल कर देती थी. मैंने उसका ज़िक्र मीराजी से किया और उसके वज़न से भी उसे आगाह कर दिया. मीराजी ने कहा : कोई परवा नहीं ... मेरे कंधे उसका बोझ बर्दाश्त कर लेंगे.चुनांचे मैंने वह बरसाती उसके हवाले कर दी जो सारी बरसातों उसके कन्धों पर रही.

मरहूम को समंदर से बहुत दिलचस्पी थी. मेरा एक दूर का रिश्तेदार अशरफ है. वह उन दिनों पायलट था. जुहू में समंदर के किनारे रहता था. वह मीराजी का दोस्त था. मालूम नहीं उनकी दोस्ती की नीना क्या थी क्योंकि अशरफ को शेर-ओ-शायरी से दूर का भी वास्ता नहीं है. बहरहाल मीराजी उसके हाँ रहता था और दिन को उसके हिसाब से पीता था.

अशरफ जब अपने झोंपड़े में नहीं होता था तो मीराजी साहिल की नर्म-नर्म और गीली-गीली रेत पर वह बरसाती बिछाकर लेट जाता और मुब्हम शेर-ए-फिक्र किया करता था.

उन दिनों हर इतवार को जुहू जाना और दिन भर पीना मेरा मामूल-सा हो गया था. दो तीन दोस्त इकट्ठे होकर सुबह निकल जाते और सारा दिन साहिल पर गुजारते. मीराजी वहीं मिल जाता. ऊटपटांग किस्म के मशागिल रहते. हमने इस दौरान में शायद ही कभी अदब के बारे में गुफ्तगू की हो. हम मर्दों और औरतों के तीन चौथाई नंगे जिस्म देखते थे, दही-बड़े और चाट खाते थे, नारियल के पानी के साथ शराब मिलाकर पीते थे और मीराजी को वहीं छोड़कर वापस घर चले आते थे.

अशरफ कुछ अरसे बाद मीराजी का बोझ महसूस करने लगा था. वह ख़ुद पीता था पर अपनी मुक़र्ररी हद से आगे नहीं बढ़ता था, लेकिन मीराजी के मुताल्लिक उसे शिकायत थी कि वह अपनी हद से गुज़रकर एक और हद कायम कर लेता है. जिसकी कोई हद नहीं होती बेहोश पड़ा है मगर और मांगे जा रहा है. अपनी इस तलब का दायरा बना लेता है और भूल जाता है कि यह कहाँ से शुरू हुई थी और इसे कहाँ ख़त्म होना था.

मुझे उसकी शराबनोशी के इस पहलू का इल्म न था लेकिन एक दिन इसका तजरिबा भी हो गया जिसको याद कर के मेरा दिल आज भी अफसुर्दा हो जाता है.    
  
(जारी. अगली किस्त में समाप्त.)    

3 comments:

naveen kumar naithani said...

बहुत आनान्द आ रहा है...
लेकिन अशोक भाई!इतनी बढिया चीजें इतनी जल्दी गायब हो जाती हैं...इस तरह की उम्दा पोस्ट को कम-अज-कम एक दिन तो टिके रहने दें...
ब्लाग की इतनी भागम-भाग में भी कुछ सुकून से पढना चाहिये कि नहीं? या यार लोग कहें कि यह सिर्फ देखने की चीज है...

Piyushkumar Jain said...

Hello sir,
Sorry to post this on your personal blog, but I had no other choice.
I wanted help from you.
I am Organizing WordCamp Mumbai 2012 on 20-21 October. This is a first time non-Profit event happening in Mumbai related to WordPress and Web-development. The event has a shining list of Speakers like Philip Moore from US, Prasad Shejale(CEO) of one of Fortune 500 companies,etc . I am a student and unable to connect to any newspapers or Media. this event has taken place in Delhi and Jabalpur before and have received good coverage from Media. I am hoping you would help us to get the same in mumbai as well.
hoping to get a positive response.

Ashok Pande said...

नवीन भाई

कबाड़खाने पर आमतौर पर दिन में एक से ज्यादा पोस्ट लगती हैं. पिछली पोस्ट्स देखने के लिए आप ने सिर्फ थोड़ी सी मशक्कत करनी होती है और वैसे भी मुखपन्ने पे पांच पोस्ट लगी रहती हैं. बाकी जैसी मालिक की राय!

जय हो.