Monday, November 19, 2012

यहाँ खाना पहले बना लिया जाता है, असली शोकगीत पहले लिख लिए जाते हैं

आज पढ़िए असद ज़ैदी की एक कम पढी गयी रचना -


पहाड़ी गाँव, पर्यटक, कवि

-असद ज़ैदी


ऐसे लोग जिनके पास तकलीफ़ उठाने की क्षमता भी हो
और कामना भी
जिनकी आदत में शुमार हो उमड़ पड़ना और सोख लेना
उन्हें ही तैनात किया जाए इस समाज का पहरेदार
कह देते हैं हम यह पर उस जगह
लगा है जहाँ शराब का पहरा

शाम होते ही ऐसी एकाग्रता से जुटते हैं पाँच छः
आठ दस लोग अहिंसक और शांत
जैसे धर्म और दाम्पत्य का विकल्प यहीं मौजूद हो
जैसे उनका पीते जाना और हँसते जाना रोते रहने का बदल हो
जो आवाज़ दें तो उनकी पुकार में
भरी हो एक सीली हुई ख़ामोशी और आश्वस्ति कि
खलनायकी भले ही अट्टहास करती रहे
मासूमियत गूँजती रहेगी अपने नशे में सदा स्वायत्त

वह खुशमिज़ाज आदमी थोड़ी सी पिए हुए था
2010 से फिसलकर 1962 तक गया
और बड़ी लड़ाई तक जा पहुँचा जिसमें
उसका पूर्वज लड़ा था मेसोपोटेमिया जाकर
और फिर गिनाने लगा
गोरखा राज के नुक़सान और अंग्रेज़ी राज के नफ़े
जाते जाते बोला डोंट माइंड सर गुड नाइट सर

वहीं वार्तालाप का एक टुकड़ा सुनाई देता है -
दीदी अभी शाम को ही बत्ती जलाने की क्या ज़रूरत है
मुझे तो घनी शाम तक रसोई के बर्तन
अपनी चमक के उजाले में दिखते रहते हैं
इस किफ़ायतशुआरी में -- कि चीज़ों की
अपनी रोशनी ही काफ़ी है -- भरी थी कैसी ख़ुशी
कैसा इत्मीनान

बस की सीट के ऊपर लिखा था केबल हिलाएँ
पहाड़ी रास्ते पर जगह जगह तख़्तियाँ लगी थीं
ध्वनि करें ध्वनि करें
स्कूली बच्चों से भरी उस छोटी बस में
तीस या पैंतीस बच्चे थे पर ध्वनियाँ साठ-पैंसठ होंगी
बस लहराती चली जाती थी
पीछे पीछे जाती थी पुरानी हवा

एक और बस
मील के पत्थर -- मंसूरी 13 मिलीमीटर... नैनबाग़ 26 लीटर...
चकराता 65 किलोग्राम... तीव्र मोड़...
आगे तीव्र गाड़ है
सावघान अत्यंत तीव्र गाड़ ...
गाड़ क्या होता है पूछता है कोई उत्सुक मैदानी भाई
दो अधेड़ पहाड़ी यात्री हँसते हैं
उनमें एक अध्यापक है कहता है जी ऊधमी लड़कों की शरारत है
नालायक़ चंद्रबिन्दु लगाना भूल गए

यह मार्मिकता भी क्या इसलिए अनदेखी रह जाएगी
कि कैमरे की बैटरी हो गयी है ख़त्म

बूढ़े लोग बच्चों को हमेशा जेब से
खाने की चीज़ निकालकर देते हैं
और बुदबुदाते हुए आगे बढ़ जाते हैं

स्कूल से लौटते छोटे छोटे लड़के और लड़कियाँ
अलग अलग चलते हैं अपनी धुन में मग्न
एक दूसरे से वाजिब और लगभग जैविक दूरी बनाते हुए
ऊपर से देखने पर वे दिखाई देते हैं छोटे छोटे कीड़ों से
उनके ऊपर मंडरा रहा है काला बादल
जो जल्द ही उन्हें तरबतर कर देगा

यह दुनिया ग़लतफ़हमियों का रंगमंच है लिपियाँ
बदल जाती हैं संकेत भी बदलते हैं
पर एक भाषा बची रहती है
जगमगाते बाज़ार के बग़ल ही तो बहता है
मृत्यु का नाला

यहाँ खाना पहले बना लिया जाता है
असली शोकगीत पहले लिख लिए जाते हैं
बाद का लिखा या तो लेटलतीफ़ी है या
अगले दुःख की तैयारी.

2 comments:

जोशी.मनीष said...

"..यह दुनिया ग़लतफ़हमियों का रंगमंच है लिपियाँ
बदल जाती हैं संकेत भी बदलते हैं
पर एक भाषा बची रहती है
जगमगाते बाज़ार के बग़ल ही तो बहता है
मृत्यु का नाला.."

Ek ziddi dhun said...

ये उनका कहने का अंदाज है या अद्भुत भाषा जो हमेशा बची रहती है या नज़र जो इस दुनिया को इतने अपनेपन से देखती है या दिल जो कविता में भी उतर आता है...