Friday, November 9, 2012

त्योहार की अन्तिम-वेला में जोड़-जोड़ से तड़की हुई स्त्रियाँ


कुमार अम्बुज के संग्रह ‘किवाड़’ से एक और कविता प्रस्तुत है.


त्योहार और स्त्रियाँ

त्योहार लाते हैं
रेशम-गोटे की कढ़ी हुई साड़ियाँ
और बक्से में रखे आभूषण
स्त्रियों की देह पर

त्योहार जगाते हैं रात भर
कथा-कीर्तन के साथ उपवास कराते हैं
दिन भर काम करनेवाली स्त्रियों से

त्योहार कपड़े लाते हैं बच्चों को
मिठाइयाँ भी
और लाते हैं पुरुषों के लिए असीम प्रार्थनाएँ
स्त्रियों के रोम-रोम से

त्योहार की अन्तिम-वेला में
जोड़-जोड़ से तड़की हुई स्त्रियाँ
पोर-पोर में उल्लास लिए
बिस्तर पर जा गिरती हैं-

जैसे गिरती हैं
अगले त्योहार की थकान में

6 comments:

वन्दना said...

आपका इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (10-11-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

वन्दना said...

आपका इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (10-11-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

kase kahun?by kavita verma said...

tyohar stri ke liye...sundar rachna..

Virendra Kumar Sharma said...

त्योहार और स्त्रियाँ

त्योहार लाते हैं
रेशम-गोटे की कढ़ी हुई साड़ियाँ
और बक्से में रखे आभूषण
स्त्रियों की देह पर

त्योहार जगाते हैं रात भर
कथा-कीर्तन के साथ उपवास कराते हैं
दिन भर काम करनेवाली स्त्रियों से

त्योहार कपड़े लाते हैं बच्चों को
मिठाइयाँ भी
और लाते हैं पुरुषों के लिए असीम प्रार्थनाएँ
स्त्रियों के रोम-रोम से

त्योहार की अन्तिम-वेला में
जोड़-जोड़ से तड़की हुई स्त्रियाँ
पोर-पोर में उल्लास लिए
बिस्तर पर जा गिरती हैं-

जैसे गिरती हैं
अगले त्योहार की थकान में

सत्य कथा सा प्रबंध काव्य है यह रचना .एक पूरा बाँध लिए अथाह जल राशि का ,औरत की हदबंदी का ,स्वनिर्मित सुख का ,सीमा का ,परितोष और समर्पण का .बधाई .

Virendra Kumar Sharma said...

त्योहार और स्त्रियाँ

त्योहार लाते हैं
रेशम-गोटे की कढ़ी हुई साड़ियाँ
और बक्से में रखे आभूषण
स्त्रियों की देह पर

त्योहार जगाते हैं रात भर
कथा-कीर्तन के साथ उपवास कराते हैं
दिन भर काम करनेवाली स्त्रियों से

त्योहार कपड़े लाते हैं बच्चों को
मिठाइयाँ भी
और लाते हैं पुरुषों के लिए असीम प्रार्थनाएँ
स्त्रियों के रोम-रोम से

त्योहार की अन्तिम-वेला में
जोड़-जोड़ से तड़की हुई स्त्रियाँ
पोर-पोर में उल्लास लिए
बिस्तर पर जा गिरती हैं-

जैसे गिरती हैं
अगले त्योहार की थकान में

सत्य कथा सा प्रबंध काव्य है यह रचना .एक पूरा बाँध लिए अथाह जल राशि का ,औरत की हदबंदी का ,स्वनिर्मित सुख का ,सीमा का ,परितोष और समर्पण का .बधाई .

प्रतिभा सक्सेना said...

त्यौहार मनाती है स्त्री - पर किसके लिये?