Sunday, January 6, 2013

क़दमों पर फ़रिश्ते के निशान बनाती हुई रोशनी - अदूनिस की कविताएँ - ४



दिन की रोशनी

- अदूनिस 

दिन की रोशनी
हमें पहनाती है अपने पुरातन चोगे,
हमारा शोक मनाती हुई यहाँ,
हमारा शोक मनाती हुई वहाँ,
पराजय के लिए खोलती अपना सीना
हमारे काट डाले गए हाथ-पैरों
और क़दमों पर
फ़रिश्ते के निशान बनाती हुई.

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