Sunday, June 23, 2013

उत्तराखंड - आपदा या अपराध?


उत्तराखंड और हिमाचल की विध्वंसक बाढ़ और भू-स्खलन को प्राकृतिक आपदा ठहराना एक आपराधिक कर्म है. इसे राज्य-समर्थित नरसंहार की श्रेणी में उसी तरह गिना जाना चाहिए जिस तरह एकमत से आज अर्थशास्त्री और इतिहासकार बंगाल के अकाल और उन्नीसवीं सदी के दुर्भिक्षों को गिनते हैं, क्योंकि ये उस समय की औपनिवेशिक नीति, वितरण प्रणाली और खेती के विनाश का परिणाम थे. पहाड़ की ताज़ा विभीषिका भी इसी तरह नव-उदारवादी शासक वर्ग की 'विकास-नीति' की देन है -- पहाड़वासियों को और आकस्मिक रूप से वहाँ फँस गए बाक़ी भारतवासियों को.

ऐतिहासिक रूप से पहाड़ों के धार्मिक अर्थतंत्र और तीर्थाटन-व्यवस्था की परिकल्पना और स्थापना पहाड़ के लोगों ने नहीं, बल्कि दक्षिण भारत और उत्तर भारत के मैदानी इलाक़ों से आये पुरोहित वर्ग ने की थी. तमाम पीठ और स्थान उन्हीं के बनाए और बताए गए हैं. आज भी इस तंत्र और इससे जुड़े व्यवसायों पर पहाड़वासियों का कोई नियंत्रण नहीं है. वहाँ की जनता का छोटा सा हिस्सा ज़रूर इसमें अधीनस्थ भूमिका निभाता है और निचले चरण पर ही खड़ा पाया जाता है. इस सब से पहाड़ी अवाम के लौकिक और सेकुलर जीवन और आकांक्षाओं पर परदा पड़ जाता है, और उन्हें यह कहकर भरमाया जाता है कि वे 'देव-भूमि' के सौभाग्यशाली नागरिक हैं.


(असद ज़ैदी की फेसबुक वॉल से साभार)

9 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

हिमालय सदा से ही हिन्दू धर्म की आस्था का केन्द्र रहा है, उत्तर दक्षिण का भेद कम से कम यहाँ तो न किया जाये।

arvind mishra said...

धार्मिक पर्यटन का जिस तरह से व्यवसायीकरण हो रहा है वह चिंताजनक है -इसे हतोत्साहित करना होगा! धाम्रिक पर्यटन के नाम पर ट्रांसपोर्ट कम्पनियां, होटल व्यवसाय और इस श्रृखला से जुड़े हर छोटे बड़े व्यवसायी,पण्डे -पुरोहित सब ने मिलकर खूब धंधा चला रखा है! सरकारें भी टैक्स वसूल रही हैं . मगर यात्रियों की सुरक्षा सबके लिए सबसे नीचे की प्राथमिकता है या इसकी तरफ कोई ध्यान ही नहीं है -उत्तरांचल त्रासदी से क्या सबक मिला ? यही न कि बंद करिए ऐसी यात्राओं पर जाना और खुद अपनी और परिजनों की जान गवाना

सरिता भाटिया said...

नमस्कार
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (24-06-2013) के :चर्चा मंच 1285 पर ,अपनी प्रतिक्रिया के लिए पधारें

कालीपद प्रसाद said...

पूरी धरती ही देव की है ,लेकिन उसको देवभूमि कहकर पुरोहित भक्तो को भ्रमित कर रहे हैं जिससे उनका धंधा चल सके .मै अरविन्द मिश्र जी के कथन का समर्थन करता हूँ
latest post जिज्ञासा ! जिज्ञासा !! जिज्ञासा !!!

सुशील said...

आज इस तरह के किसी भी तंत्र और इससे जुड़े व्यवसायों पर पहाड़वासियों (पहाड़वासी उत्तर का भी है और दक्षिण का भी कोई भेदभाव नहीं किया गया है लगता है) का कोई नियंत्रण नहीं है. व्यवसाय रह गया है और धर्म लगता बह गया है !

Madan Mohan Saxena said...

बहुत सुंदर कमाल की भावाव्यक्ति

shyam gupta said...

धर्म बह गया है
मानव के सुख भोग की लिप्सा में ...
इसीलिये तो बह गया,
शिवधाम पर किया हुआ-
अनियंत्रित विकास रूपी अत्याचार
वर्षा में...

रश्मि शर्मा said...

मैं समर्थन करती हूं..

आशा जोगळेकर said...

आप सही कह रही हैं पहाड के रहिवासी इस धर्म-व्यवसाय की सबसे निचली कडी है । पर्यटक तो प्रदूषण फैलाते हैं पर उद्योग बेहिसाब दोहन कर रहे हैं जिसका परिणाम है ये त्रासदी ।