Sunday, July 7, 2013

हमारा स्कूल भी तो बह गया है, अब हम कहाँ पढ़ने को जायेंगे - धारचूला से रपट

(पिछली पोस्ट से आगे)


धारचूला से रिपोर्ट का दूसरा भाग

-जगत मर्तोलिया

दिनांक - 06 जुलार्इ 2013

घर-बार बर्बाद हो गया, आंखों में आँसू है और सामने अंधेरा. रोज कोर्इ नेता आता है, सपने दिखाने के लिए. बारिश से रात को नींद भी नहीं आ रही है. 15 जून के बाद की रातों की याद ने नींद भी छीन ली है. हर बारिश की बूँद की आवाज से खौफनाक अंदेशा इनके चैन को छीन कर ले गया. सोबला, न्यू, कन्च्यौती, खिम के 175 से अधिक परिवारों को जान बच जाने की थोड़ी खुशी तो है. कन्च्यौती में दो लोगों की जान इस आपदा से गयी. उनकी यादें अपने जीवन के बच जाने के बीच इन परिवारों के चेहरों पर यह परेशानी साफ तौर पर देखी जा रही है कि अब कैसे उनका कुनबा बसेगा. 


धारचूला व मुनस्यारी क्षेत्र में आयी आपदा में ये चार गाँव हैं, जो अब इतिहास में दफन हो चुके हैं. इन गाँवों की वो खुशहाली अब बीते दिनों की याद बनकर रह गयी है. राजकीय इण्टर कालेज धारचूला के उन कक्षों में जहाँ कभी बच्चे पढ़ते थे आज इनकी शरण स्थली बन गयी है. इन लोगों को इस बात का डर है कि डीडीहाट के हुड़की, धारचूला के बरम तथा मुनस्यारी के ला, झेकला, सैणराँथी के आपदा पीडि़तों के साथ सरकार ने जो अन्याय किया है, कहीं उनके साथ भी ऐसा न हो. आज उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वह कैसे सितम्बर तक का समय गुजरे. 

भाकपा (माले) की एक टीम इन दिनों धारचूला क्षेत्र में है. टीम धारचूला के सामाजिक कार्यकर्ता केशर सिंह धामी के साथ जैसे ही आज राजकीय इण्टर कालेज में पहुँचे तो वहाँ ठहरे आपदा पीडि़त एक-एक करके बाहर निकलने लगे. उनकी आँखें अब इन्तजार करते-करते थक चुकी हैं. पैरों में अब खड़े होने की ताकत भी नहीं बची है. एक सप्ताह से इस शरण स्थल में रहने वाले इन 175 परिवारों के सैकड़ों आपदा पीडि़त 15 दिनों से कपड़े तक नहीं बदल पाये हैं. इन गाँवों से इन्हें हैली में लाया गया. घर के साथ ही इनके तन के कपड़े भी धौलीगंगा में समा चुके हैं. मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने इन परिवारों को इनके गाँवों से यहां आमन्त्रण देकर बुला तो लिया लेकिन इन्हें किस बात की आवश्यकता होगी, इसका कोर्इ ध्यान नहीं दिया गया. इस टीम के सदस्य किसान महासभा के नेता सुरेन्द्र बृजवाल, पिथौरागढ़ छात्र संघ के अध्यक्ष हेमन्त खाती और भाकपा (माले) के जिला सचिव जगत मर्तोलिया ने इन परिवारों से अलग-अलग वार्तायें की. बात करते-करते इनकी आवाज रूक जा रही है. गला भर आ रहा है. आँखों में आँसुओं की बूँदें और आँसू से चपचपाती पलकें इनके दर्द को स्वयं ही बता दे रही हैं. 


धारचूला क्षेत्र में कीड़ा जड़ी को जमा करना भी एवरेस्ट चढ़ने से अधिक चुनौती भरा है. अपनी जान पर खेल कर इन्होंने धन इकटठा किया और उससे घर बनाया. जो अब धौली का निवाला बन गया है. इनके घर अब दुबारा बिछड़े गाँव में नहीं बन सकते. अब इन्हें एक नया गाँव और नया आशियाना चाहिए. तन में केवल एक कपड़ा लेकर धारचूला पहुँचने के बाद इस शहर में में पहुँच गये हैं. शहर वालों के साथ चलने की हिम्मत इनके पास नहीं है. जिनके पास खाने के लिए अपने बर्तन न हों, चटार्इ में लेटने के लिए इन्हें यहाँ छोड़ दिया गया है. इनके बचे खुचे जानवर अभी गाँव में हैं, जो इन्हें ढूँढ रहे होंगे. यह चिन्ता भी इनके जुबाँ पर है. 

धारचूला की गर्मी और मच्छरों को प्रकोप इन्हें धौलीगंगा के द्वारा दिये गये गम की तरह लग रहा है. अभी तक तो ये मात्र एक चटार्इ के सहारे सीलन भरे कमरे में लेटे हुए थे. बाहर हो रही बारिश की बूँदें छतों से टपक कर इनके कमरों में इनकी शान्ति को भंग कर रही है और साथ ही इनके चैन को इनसे छीनती जा रही है. एक सप्ताह बाद भाकपा (माले) के हस्तक्षेप के चलते तहसील प्रशासन ने 50 गद्दे यहाँ बांटे गये हैं. बताये गये कि 150 गद्दे और बन रहे हैं. इससे इनके बिस्तरों की समस्या तो पूरी नहीं होगी लेकिन कुछ आराम तो मिलेगा. इण्टर कालेज के कमरे 15 दिनों से बन्द थे. कमरों में सीलन की बदबू अलग है और पानी रिसने के कारण पूरा कमरा निमोनिया और टाइफाइड जैसी कर्इ बीमारियों को न्यौता दे रही है. खिड़कियों में जालियां नहीं हैं. मच्छरों के अलावा कर्इ प्रकार के कीट कमरों में घुस कर इन परिवारों को परेशान कर रहे हैं. 

पहले से ही घर और गाँव खोने से परेशान इन परिवारों को कीट मच्छर तो नहीं पहचानते लेकिन सरकार को जानती थी, उसके बाद भी उसने क्यों बन्दोबस्त नहीं किया. आपदा राहत शिविर का नाम इसे दिया गया. सीधे तौर पर कह सकते हैं यह राहत नहीं आफत शिविर है. एक आफत से बचकर यहाँ पहुँचे इन पीडि़तों को इन आफतों से गुजरना पड़ रहा है. एक कमरे में चार से छ: परिवारों को जानवरों की तरह ठूँसा गया है. स्कूल के कुर्सी व टेबल ही इनके सहारे हैं. धारचूला के कर्इ स्कूली बच्चों ने इस सवाल को भी उठाना शुरू कर दिया है कि अब वे कहाँ पढ़ेंगे. इन गाँवों के नेता और प्रशासनिक अधिकारी आपदा पीडि़तों के जख्मों पर मरहम लगाने की जगह उनका डांटते फिर रहे हैं. ''अरे हमने कमरा तो दे दिया, अब हम क्या करें? इतना बहुत है” - इन बातों से नाराज आपदा पीडि़त परिवारों के सदस्यों का कहना है कि हमें हमारे गाँवों से क्यों यहाँ लाया गया. 

स्कूल जाने वाले बच्चे इस स्कूल के आंगन में खेल रहे हैं. उनका बस्ता धौली गंगा में बह गया है. उन्हें आज भी पहाड़े व गिनती और कुछ कवितायें याद हैं. गणित के सवाल भी उनके दिमाग में हैं लेकिन उनको उकरने के लिए उनके पास कापी पेन्सिल नहीं है. बच्चों का कहना था कि हमारा स्कूल भी तो बह गया है. अब हम कहाँ पढ़ने को जायेंगे. इन बच्चों की तोतली आवाज से दिल को चीरने वाली जो पुकार निकल रही है. उसे यहाँ बार-बार आने वाले विधायक, सांसद, मंत्री और प्रशासनिक अमले के अधिकारी सुन तक नहीं पा रहे हैं. कन्च्यौती के मोहन सिंह का कहना है कि तीन महिने कैसे गुजरें? यह हमारी पहली समस्या है. स्कूल में ज्यादा समय नहीं रह सकते. आपदा मंत्री टिन शैड बनाने की बात कह गये हैं. इसे बनने में तो महीने बीत जायेंगे. जब गद्दे व कम्बल देने में इतने दिन बीत गये. 

खिम की सरस्वती बिष्ट का कहना है कि हमारे खेत बह गये. जानवर भी साथ में धौली में बह गये. हम हम क्या करें. कैसे अपनी जिन्दगी गुजारें. इस जिन्दगी को गुजारने के लिए कौन हमारी मदद करेगा. न्यू ग्राम की नीरू देवी तो काफी दु:खी है. कहती है कि ''कभी न सोचा था कि कभी अपना गाँव छोड़ेगे. अब हमें कैसे एक गाँव मिलेगा. जहाँ हम सब महिलायें इस त्रासदी को आपस में एक दूसरे में बांट सकेंगी. सोबला के नेत्र सिंह का कहना है कि गाँव तो गया. अब नहीं लगता है कि दुबारा हमारा कोर्इ गाँव होगा. सरकारें तो झूठ बोलती हैं. झूठ से कुछ दिनों तक सन्तोष मिल सकता है लेकिन आगे नहीं. यह बात तो केवल चार उन गाँवों की है. जो अपना सब कुछ धौलीगंगा को सौंपकर खाली हाथ इण्टर कालेज के शरण स्थली में बैठकर टकटकी लगा बैठे हैं कि अब क्या होगा?

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