Thursday, September 5, 2013

इतनी रात इकट्ठी थी


एक बुढ़िया का इच्छा-गीत

-लीलाधर जगूड़ी

मैं लगभग बच्ची थी
हवा कितनी अच्छी थी
घर से जब बाहर को आई
लोहार ने मुझे दराँती दी
उससे मैंने घास काटी
गाय ने कहा दूध पी
दूध से मैंने, घी निकाला
उससे मैंने दिया जलाया
दीये पर एक पतंगा आया
उससे मैंने जलना सीखा
जलने में जो दर्द हुआ तो
उससे मेरे आँसू आए
आँसू का कुछ नहीं गढ़ाया
गहने की परवाह नहीं थी
घास-पात पर जुगनू चमके
मन में मेरे भट्ठी थी
मैं जब घर के भीतर आई
जुगन-जुगनू लुभा रहा था
इतनी रात इकट्ठी थी

1 comment:

Sushil Kumar Joshi said...

बहुत कुछ है और नहीं भी
आग धधकती है कहीं है जुगनू भी !