Monday, October 14, 2013

सज्जाद हुसैन के बहाने एक रीपोस्ट – ५

सिगरेट, सिनेमा, सहगल और शराब – ५

(पिछली पोस्ट से जारी)


इन बातों ने ऐसा सुरूर पैदा किया कि हमें वक़्त और जगह का अहसास ही नहीं रहा। बाहर देखा तो लहर पर लहर दिखाई दे रही थी और शाम का सुर्मा फ़िज़ा पर छा रहा था। रात होते ही हम हंडेनी पहंच गए। हमारी बस बाज़ार के बीच रुकी। रात की वजह से सफ़र वहीं बंद हो गया और सबको बस में ही रहने की हिदायत दी गई। हम बस के बाहर निकले तो हज़ारों जुगनू सितारों की तरह उड़ रहे थे। ऐसा लग रहा था एक आसमान हमारे नीचे है और एक ऊपर। भाई ने ऊपर की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘यह जो चमकते हुए सितारे नज़र आ रहे हैं, करोड़ों बरस सफ़र करने के बाद इनकी रौशनी हम तक पहुँच रही हैं। जब इनकी रोशनी का सफ़र शुरू हुआ था, कृष्ण, राम, मूसा, ईसा, बुद्ध और मोहम्मद पैदा भी नहीं हुए थे। इस रोशनी ने सब दौर देखे हैं। हमें भी देख रही है।’ हम रात की यह ख़़ूबसूरती थोड़ी ही देर सराह सके। मच्छरों के लश्कर ने हम पर हमला कर दिया। फिर तो रात हमने बड़ी मुश्किल से गुज़ारी। एक घंटा भाई सोते तो मैं मच्छर उड़ाता और जब मैं सोता तो वह। हंडेनी के मच्छर दुनिया के सबसे ज़हरीले मच्छर हैं। सुबह शरीर पर लाल-लाल चकत्ते नज़र आ रहे थे। भाई ने कहा, ये थी पानीपत की लड़ाई जिसमें दो फ़ौजों ने एक दूसरे का ख़़़ून किया। लेकिन फ़र्क़ यह है कि हमारे बदन पर जो ख़़ून था वह अपना ही था। मुझे ताज्जुब हो रहा था, मैं तो मुसीबत में था, वह ख़ुश नज़र आ रहे थे। उन्होंने कहा बलिदान के बगै़र कुछ काम नहीं बनता। अब मुझे यक़ीन है कि हमें गाना सुनने को मिलेगा।

दूसरे दिन बस का सफ़र फिर शुरू हुआ। लेकिन शहर के कुछ मील बाहर पहुँचते ही देखा सिंगासी नदी में बाढ़ आई हुई है। पुल पानी में डूबा हुआ है। सारा दिन इंतज़ार में गुज़रा कि नदी का पानी कब जाए और बस आगे बढ़े। बस में, साथ जा रहे अफ्ऱीक़़ी लोगों की देहाती मासूमियत का सबूत मिलने लगा। उनके पास खाने पीने के लिए जो कुछ भी था, बाँटकर खाने लगे। हमें भी दिया। रंग, भेदभाव सब कुछ ख़त्म हो गया। सब लोग बस यही चाहते थे कि पानी उतर जाए तो बस पुल के पार हो। शाम तक नदी पुल के नीचे उतर गई। जब पानी से पुल निकला तो बड़ा डरावना लग रहा था जिसे आज भी सोचकर दहशत होती है। पक्का पुल तो पिछले साल टूट गया था। उसकी जगह बाँस का पुल साइसेल की रस्सी से लटकाया गया था। बस ड्राइवर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा। ये एक्सप्रेस बस है, रुक नहीं सकती। यही पुल पार करके जाएगी। अगर आप लोगों को यहीं जंगल में रुकना है, तो यहाँ के भूखे शेर, चीते देख रहे हैं, वह आप सबको हड़प जाएंगे। अब आप लोगों की मर्ज़ी रुकिए या चलिये। पाँच मिनट में बस में नहीं बैठे तो मैं समझ जाऊँगा कि आप लोगों को नहीं जाना है।


उस वक़्त मेरे भाई के मुँह से यह मिसरा पहली बार मैंने सुना, ‘क़दो गेसू में क़ैसो कोहकन की आज़माइश है’ (ग़ालिब)। उन्होंने कहा, इस पुल को साइसेल की रस्सी ने बाँघा है। इसी रस्सी के बल पर हम सब एक हैं। मुझे भरोसा है यह रस्सी टूटेगी नहीं। पुल को फिर से देखकर मेरे दिमाग़ में एक बादल सा उठा और एक ख़याल दिमाग़ में आया कि क्यों हम अफ्ऱीक़़ा के बियाबान जगहों में इंडिया से और भी दूर एक फ़िल्मी गाना ढूँढ़ने के लिए जा रहे हैं? अगर यह पागलपन नहीं है तो हमारे दिमाग़ के ढीले स्क्रू का सबूत ज़रूर है। ड्राइवर ने गाड़ी स्टार्ट कर दी थी। फ़ैसले के लम्हे सामने थे, यह ख़याल दूर हो गया।

जिस चीज़ ने हमें रोटी दी है अगर हम उसके वफ़ादार नहीं हैं तब हम न तो इंसान हैं, न आदमी। मेरे भाई को साइसेल पर भरोसा था और मुझे भाई पर। ज्योंही हम दोनों बस पर चढ़े सब काँपते-काँपते साथ हो लिये। बस पुल पर आ गई है और हिंडोेले जैसे पुल पर झूलते हुए आगे बढ़ने लगी। पुल के दूसरी ओर पहँुचने पर ड्राइवर ने गाड़ी रोककर ताली बजाई और कहा जब आप जैसे लोग सफ़र करते हैं तो लगता है हमारे साथ सेना है। आप लोगों ने हमारी लाज रख ली। आज तो आप लोगों ने एक नयी कहानी गढ़ी है। मैं अब ये बात सबको बताऊँगा कि हमने पुल कैसे पार किया। ड्राइवर ने कहा आज मेरी एक ग़लतफ़हमी दूर हो गई कि ये दो मुहिंदी (हिंदुस्तानी) जिनकी नस्ल को हम डरपोक व्यापारी समझते हैं ऐसा सोचना ग़लत है। मेरे भाई ने कहा, ‘मुझे आज फिर भरोसा हुआ कि साइसेल के बल पर हमारी ज़िंदगी का चक्कर चलता रहेगा और दुनिया इसे क्यों सुनहरा धागा मानती है। सुनहरी इनकी क़ीमत है। लेकिन इसमें स्टील की ताक़त है। सफ़र के दूसरी ओर पहाड़ियों की दीवार नज़र आई। भाई ने बताया वह उलूगरू पहाड़ है। उनकी गोदी में है मोरोगोरो शहर, जहाँ हम जा रहे हैं। थोड़े ही आगे जाने पर रेल नज़र आने लगी। ट्रेन देखते ही हमने इत्मीनान की साँस ली क्योंकि ट्रेन अफ्ऱीक़़ा में हिंदुस्तान की लकीर है।

मोरोगोरो में बालूसिंह से मुलाक़ात

दोपहर को हम मोरोगोरो पहुँचे। सीधे भाई के दोस्त बलवंत बालूसिंह के यहाँ गए। दो बच्चों के साथ वह घर के बाहर ही बैठे थे। देखते ही बड़ी ख़ुशी ज़ाहिर की। हम लोग नहाये, घोये। चाय नाश्ते के लिए तैयार हो गए। तब उन्होंने अपनी राम कहानी सुनाई। कहने लगे वक़्त बहुत ख़राब हो गया है। कभी भी उनकी नौकरी जा सकती है। वो दारेस्सलाम-टबोरा रेलवे लाइन में इंजिन के फ़ायरमैन थे। कहने लगे, ‘कोयले का इंजिन जाने वाला है और डीज़ल इंजिन आ जाएगा तो हमारी नौकरी चली जाएगी। अगर कहीं श्मशान घाट की कोई नौकरी हो तो बता देना। एक बहुत माहिर आग का काम करने वाला है।’ इस पर हम लोग बहुत हँसे। उन्होंने कहा, भाभी को नहीं बताना। हमने उन्हें कुछ ख़बर नहीं की है। मुझे लगा था, इन्हीं के पास वह गाना होगा। उनकी नौकरी जाने का मज़ाक़ खत्म हुआ तो वह बहुत गंभीर हो गए। कहने लगे, ‘मुझे नहीं लगता कि जिस गीत को सुनने के लिए आप आए हैं, वह काम पूरा हो जाएगा। क्योंकि हाजीभाई जिनके पास रिकार्ड है, शक्की भी हैं। तुम लोग एक दिन लेट आए हो। उनके मुताबिक़ अच्छा समय निकल गया। फिर भी चलो, कोशिश करके देखते हैं। कोशिश करना इंसान के हाथ में है।’ वह हमें रेलवे शेड में ले गए हाजीभाई से मिलने के लिए। जाते समय उन्होंने नसीहत दी, रिकार्ड का नाम मुँह पर न लाना। ऐसा कुछ भी हुआ तो ज़रा भी काम नहीं बनेगा। मैं बस कहूँगा, मेहमान आए हैं तो आपसे मिलाने के लिए ले आया। बाक़ी उन्होंने तो इंतज़ाम किया हुआ होगा। शेड की तरफ़ जाते समय रास्ते से गुज़रे तो वहाँ सिनेमा में फ़िल्म बरसात लगी हुई थी। बालूसिंह ने बताया ‘सब लोग शंकर जयकिशन के संगीत पर इस फ़िल्म को बारबार देख रहे हैं। लेकिन मैं फ़ाली मिस्त्री की जादूगरी देखने जाता हूँ। उन्होंने धूप और छाँव मिला कर एक रंगीन फ़िल्म बनाई है। गीत ”हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का“ जो फ़िल्म के ब्लैक एंड व्हाइट होते हुए भी लाल नज़र आता है और कोयला जब जलता है तो इसमें से कितने ही रंग निकलते हैं।’


हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का
ओ जी ओ जी...


वह ठीक कह रहे थे। फ़ाली मिस्त्री बहुत अच्छे कैमरामेन थे। फिर भाई और बलवंत में बहस हो गई। उन्होंने कहा, ‘अय्यूब, तुम्हें फ़िल्म संगीत अच्छा लगता है कि तुम कुछ और देखते ही नहीं। सिवाय नौशाद, सी रामचंद्र, शंकर जयकिशन के अलावा तुम्हें फ़िल्म में किसी और की कला नज़र ही नहीं आती। उनका विचार था फ़िल्म पहले आँख के लिए है, फिर कान के लिए है। संगीतकारों ने इंडियन पब्लिक को अंधा बना दिया है। वह फ़ाली मिस्त्री, आर डी माथुर, फ़रीदून ईरानी, जाल मिस्त्री इनकी कारीगरी पहचानते ही नहीं। भाई ने इसके जवाब में कहा, बालू यह तुम्हारी ग़लतफ़हमी है। हिंदुस्तानी फ़िल्म पहले कानों तक पहुचती है, फिर आँखों तक।

(जारी)

1 comment:

Pramod Singh said...

पहले आंख कि पहले कान.. पहले सपनों में उतर लेने की हुमस?