Friday, December 6, 2013

मैंने श्वेत प्रभुत्व के खिलाफ संघर्ष किया. मैं अश्वेत प्रभुत्व के खिलाफ भी संघर्ष करूंगा


अनवरत संघर्ष के मंडेला

-शिवप्रसाद जोशी

नेल्सन मंडेला ऐसे समय में इस दुनिया में नहीं रहे जब फिर अंधेरा घिर आया है, कई क़ब्ज़े किए जा चुके हैं, युद्ध की नई छायाएं मंडरा रही हैं, नफ़रत, हिंसा और जातीय, धार्मिक, सांस्कृतिक और नस्लभेद के रूप नए होकर आ गए हैं. मंडेला ने जिस लड़ाई के लिए अपना जीवन खपा दिया वो अब भी जारी है और हम नहीं जानते कि कितने मंडेला चाहिए होंगे इस दुनिया को अन्याय से मुक्त कराने के लिए. जो अब गोरे और काले का ही नहीं, अलग अलग रूपों और अलग अलग व्याख्याओं और अलग अलग जातीय राजनैतिक सांस्कृतिक उत्पीड़नों और समीकरणों में फिर से भीषण और हिंसक कूदफांद मचा रहा है मानो कई सिर वाला दैत्य.

लेकिन हम ये नहीं मानते हैं जैसा कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने शोक संदेश में कहा है कि "अब वे हमारे नहीं रहे. अब वे इतिहास के हो गए." न जाने ओबामा का ऐसा कहने का क्या तात्पर्य रहा हो, लेकिन हम नहीं मानते कि वे हमारे नहीं रहे और वे इतिहास के हो गए. रहेंगे तो वे हमारे ही, जाएं वो कहीं भी. हम उन्हें इतिहास के हवाले से याद नही करते रहेंगे, आने वाली पीढ़ियां उन्हें अपने संघर्षों और यातनाओं और मुसीबतों और जीतों में याद करती रहेगी. वे इन लड़ाइयों में पैबस्त रहेंगे. यही मंडेला होने का अर्थ है.

वरना तो नस्लभेद से मुक्त एक देश ने उन्हें एक महाविराट छवि में बदल दिया था. एक चलतेफरते संग्रहालय, जब तक चल सके, और एक स्थिर संग्रहालय जब बिस्तर के हो गए. दक्षिण अफ्रीका ने मंडेला के संघर्ष से मिली नेमतों को एक सरकारी खजाने की तरह चलाया और लुटाया. कोई नहीं जानता कि मंडेला की मुक्ति की कामना को एक कारखाना बना देने के उपक्रम को देखदेखकर उनपर क्या गुजरती होगी. आज हैरानी की बात नहीं है कि मंडेला को घोटघोट कर श्रद्धांजलि देने वालो में वे ताकतें और वे लोग भी पीछे नहीं हैं जिन्होंने इस दुनिया को बदरंग और अस्थिर और अशांत और खूंखार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

मंडेला का अखिल वैश्विक गुनगान करने वालों में सत्ताओं के वे सूरमा भी हैं जिनके रहते बढ़ते फैलते मंडेला जेल में रहे. जेल से बाहर आए तो उनके महत्त्वपूर्ण साल छीन लिए गए थे. उन्हें कुछ पहले से तै चीज़ों पर हस्ताक्षर करने थे और देश को उस एजेंडे पर आगे चलाना था जो 90 के दशक का विकासशील देशों में मुक्त बाजार और भूमंडलीकरण का एजेंडा था. एक ओर मंडेला जेल से मुक्त हुए और दूसरी ओर दुनिया के विकासशील मुल्कों में मुक्त बाजार हुआ.

जेल की सलाखों के अंधेरों और कष्टों के बीच मंडेला ने एक नए दक्षिण अफ्रीका और एक नए न्यायसंगत समाज का सपना देखा था. उस सपने के साथ वो बाहर आए. शांतिपूर्ण सत्ता हस्तातंरण के भागीदार बने, देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने, एक विशाल पार्टी के नेता, पीढियों से दबे कुचले और शोषित समाज की आत्मा की आवाज़, उसके महानायक. मंडेला ने देश को कठिन बेड़ियों से छुटकारा दिला दिया लेकिन शायद उन्हें भी अंदाज़ा न रहा होगा कि कुछ नई बेड़ियां देश की विराटता के पिछवाड़े तैयार की जा रही हैं. एक नया भूमंडल उनके सामने आने ही वाला है. बुजुर्ग और बीमार मंडेला ने पूरी दुनिया के साथ उस महागेट में प्रवेश किया. फिर नहीं दिखे. पिछले सालों में जो ख़बरें आई थीं उनके मुताबिक मंडेला की अंतिम यात्रा के टेलीकास्ट राइट्स उनके पोते ने बेच दिए थे. मंडेला उस समय गंभीर रूप से बीमार और बिस्तर पर थे. बाद में पारिवारिक विवाद के बीच उनके पोते को खंडन करना पड़ा कि ऐसा कुछ नहीं किया गया है. एक विवाद मंडेला के परिवार में उन्हें दफ़नाने की जगह को लेकर भी छिड़ा है. परिवार से बाहर कॉरपोरेट मीडिया में भी मंडेला के अंतिम संस्कार की कवरेज को लेकर विवाद रहे हैं और दक्षिण अफ्रीका की अश्वेत जनता अपने प्रिय नायक को लेकर चल रहे इस विवाद को लेकर आक्रोशित रही है.


"मैंने श्वेत प्रभुत्व के खिलाफ संघर्ष किया. मैं अश्वेत प्रभुत्व के खिलाफ भी संघर्ष करूंगा. मैंने एक लोकतांत्रिक समाज का सपना देखा है, जहां हर कोई बराबरी से रह सके." मंडेला ने अपने जेल दिनों में अदालत के सामने यही कहा था. भारत की तरह दक्षिण अफ्रीका भी विकास और प्रभुत्व की नई छलांगों की ओर अग्रसर है. मार्टिन लूथर हों या मंडेला या मोहनदास- वे पहले मौन फिर मृत्यु की ओर धकेले जाते हैं. भूमंडलीकृत विश्व अपार श्रद्धांजलियां देते हुए उन्हें स्मारकीय महत्त्व की वस्तु में बदल देता है. लेकिन जो नहीं दिखता, न सत्ता को न बाजार को, वो मूल्य है जो मंडेला जैसों के जीवन से दुनिया की आम जनता तक आया है और चुपचाप आने वाली पीढ़ियों में जाता है. ये संघर्ष का मूल्य है. मंडेला इसी मूल्य के संवाहक थे और रहेंगे. 

4 comments:

मुनीश ( munish ) said...

ऐसी तमाम आत्माएँ परमपिता परमेश्वर की ही इच्छा से संसार में अवतरित होती हैं और एक दिन उसी के पास चली जाती हैं । हे पिता ऐसी आत्माओं से इस संसार को भर दो । उन्हें नए नए शरीरों में भारत को डिस्पैच करो ।यहाँ कई मंडेला आज भी चाहिएं , हम एक के बस की बात न थे , न हैं ।

alka sarwat said...

हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि
कुछ लोगों का जाना आखर जाता है ,भले ही उनसे हमारा कोई रिश्ता न रहा हो.

कुछ जड़ी बूटियों को घड़े में हल्दी के साथ बंद करके मैंने एक दवा तैयार की है जो बुढ़ापे के असर को अस्सी प्रतिशत तक कम कर देगी ,नये बाल उग जायेंगे ,टूटे दांत भी निकल सकते हैं हड्डियों और जोड़ों के सारे दर्द गायब हो जायेंगे। अगर आपको चाहिए तो फोन कीजिये मुझको।

मुनीश ( munish ) said...
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गणेश जोशी said...

नेल्सन मंडेला को लेकर वर्तमान की हकीकत को दर्शाते हुए लिखा गया लेख पढ़ा बहुत अच्छा लगा। निश्चित तौर पर आज पता नहीं विश्व को कितने नेल्सन मंडेला चाहिए।