Wednesday, March 26, 2014

बेहतर हो चावड़ी बाज़ार उतरना और रिक्शा कर लेना बल्लीमारान गली कासिमजान के लिये


मैट्रो महिमा

- वीरेन डंगवाल

        पहली

        सीमेन्ट की ऊंची मेहराब पर
दौड़ती रुपहली मैट्रो
गोया सींगों को तारों पर उलझाये हिरनी कोई .
मेरा मसोसा हुआ दिल
गोया एक हमसफ़र तेरा हमराह.
मुझे भी ले चल ज़ालिम अपने साथ
चांदनी चौक करौलबाग विश्वविद्यालय वगैरह
मेरे लिये भी खोल अपने वे शानदार द्वार
जो कभी बायें खुलते हैं कभी दायें सिर्फ आवाज़ के जादू से.


दूसरी       

अस्पताल की खिड़की से भी
उतनी ही शानदार दिखती है मैट्रो
गोया धूप में चमचमाता एक तीर

या शाम में खुद की ही रौशनी में जगमगाता एक तीर

एक तीर दिल को लगा जो कि हाय – हाय !
बेहतर हो चावड़ी बाज़ार उतरना और रिक्शा कर लेना बल्लीमारान गली कासिमजान के लिये.

  
तीसरी

दृश्य तो वह क्षणांश का ही था मगर कितना साफ़
वह छोटी बच्ची चिपकी हुई खिड़की से देखती मैट्रो से बाहर की दुनिया को
उसके पार पृष्ठभूमि बनाता
दूसरी खिड़की का संध्याकाश एकदम नीला
मुझे देखने पाने का तो उसका खैर सवाल ही क्या , पर मुझे क्या –क्या नहीं याद आया उसे देखकर
माफ़ करना ज़रूरी कामों जिन्हें गंवाया मैंने तुच्छताओं में
जिन्हें मुल्तवी करता रहा मैं आजीवन . 


चौथी

हाय मैं होली कैसे खेलूँ तेरी मैट्रो में
तेरी फ़ौज पुलिस के सिपाही
ली लीन्हा मेरी जामा तलासी तेरी मैट्रो में
एक छोटी पुड़िया हम लावा
उससे ही काफ़ी काम चलावा
बिस्तर पर ही लेटे – लेटे खेल लिये जमकर के होली
आं – हां तेरि मैट्रो में .

पांचवीं


सुनु क्रसानम सुनु क्रसानम सुनु क्रसानम चलो नहाने
सुनुक सुल्लू छ तप्तधारा वसन्तकाले अति भव्यभूती
जब तुम राजीव चौक पहुँचो
हे अत्यन्त चपलगामिनी
तो कनाटप्लेस की समस्त नैसर्गिक तथा अति प्राकृतिक सुगंधियों को मंगवा लेना अवश्य
तुम्हारा कोई भी भक्त किंवा दास
यह कार्य सहर्ष कर देगा बिना किसी उजरत के
मध्य रात्रि के बाद जब मोटे – मोटे पाइपों की गुनगुनी धारा से भरपूर नहला दिये जाने के बाद
(ऐसे पाइप अब पुलिस के पास भी होने लगे हैं दंगा निरोधन के लिये)
जब तुम्हे तपतपाता हुआ और एकाकी छोड़ दिया जाय
अपनी नीरव रंगशाला में
तब तुम बिना झिझक अपनी अदृश्य सुघड़ बाहें उठा कर
कांख और वक्ष में जमकर लगा लेना उन सुगंधियों को
मानो अभिसार तत्परता के लिये
तथा
अपनी कांच से बनी सुन्दर आँखों से टिम टिम देखना अपना अप्रतिम सौंदर्य
जो सिर्फ इक्कीसवीं सदी में ही संभव था भारत में
अपने वैधता और औचित्य प्रमाणित करने के लिये
इसीलिये अक्लमंद लुटेरे तुम्हे सबसे आगे करते हैं .


मार्च 13, 2014 , दिल्ली     

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नोट: वीरेन डंगवाल की कुछ सद्यःरचित कवितायेँ संजय जोशी ने अभी अभी मुझे मेल की हैं. कविताओं के नीचे लिखी तारीखें हौसला दिलाने वाली हैं. भयंकर बीमारी से जूझ रहे वीरेनदा फिर से कविताएँ लिख रहे हैं. और लगातार लिख रहे हैं. कुछ और कवितायेँ कल.

2 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

वीरेंद्र जी के स्वस्थ होने की कामना है। एक से बढ़कर एक रचनाऐं ।

Leena Malhotra said...

शानदार।