Friday, April 4, 2014

जो तुम से शहर में हों एक, दो,तो क्यों कर हो?



१९५८ में जन्मीं पाकिस्तानी गायिका मेहनाज़ बेग़म ने संगीत की तमाम विधाओं में काम किया, ख़ास तौर पर ग़ज़ल, ठुमरी, दादरा, ख़याल और ध्रुपद में. उनकी माँ कज्जन बेग़म भी एक ख्यात गायिका थीं. मेहनाज़ चित्रकारी भी किया करती थीं और उनकी पेंटिंग ‘मास्टरपीस’ बहुत प्रसिद्द हुई.

१९ जनवरी २०१३ को बहरीन के हवाई अड्डे पर उनका निधन हुआ जब वे फ्लोरिडा में अपना इलाज करवाने के बाद कराची वापस लौट रही थीं.


उनकी गाई मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल पेश है -

 

गयी वो बात के हो गुफ्तगू "तो क्यों कर हो"
कहे से कुछ न हुआ, फिर हो, तो क्यों कर हो ?

तुम्हीं कहो के गुज़ारा सनम परस्तों का,
बुतों की हो अगर ऐसी ही ख़ू तो क्यों कर हो?

उलझते हो तुम अगर देखते हो आइना,
जो तुम से शहर में हों एक, दो,तो क्यों कर हो?

4 comments:

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुंदर प्रस्तुति.
इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 05/04/2014 को "कभी उफ़ नहीं की
" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1573
पर.

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुंदर प्रस्तुति.
इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 05/04/2014 को "कभी उफ़ नहीं की
" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1573
पर.

कविता रावत said...

बहुत बढ़िया याद ..

घनश्याम मौर्य said...

ग़ालिब की ग़ज़ल के साथ यह इंसाफ अच्‍छा है। आवाज़ में कशिश हे मेहनाज की। इन मोहतरमा के बारे में पहले कभी नहीं सुना था, आज आपके ब्‍लॉग के जरिये मालूम हुआ। लेकिन इनकी मौत की खबर सुनकर अफसोस भी हुआ। एक अच्‍छे फ़नकार का इस तरह दुनिया छोड़ जाना वाकई अफसोसनाक है।