Sunday, July 13, 2014

अभी बहुत प्यार और जगह है तुम्हारे लिये - मार्केज़ के लिये वीरेन डंगवाल की कविताएँ


दिवंगत मार्केज़ के लिये दो बातें
-      
                 - वीरेन डंगवाल

                    (बज़रिये अशोक पांडे)

(1)

वे पीले फूल पीले गुलाब हैं
छोटे-छोटे भीने-पीले
छाती और माथे पर रखे हुए.
उनकी सुगंध
प्रविष्ठ नहीं हो सकेगी
मृत नथुनों के भीतर
जैसे किसी पीढ़ी के सपनों के रंग
व्यर्थ हो जाते हैं मृतकों के लिये.
केवल जीवन के काम के ही हैं.
सपने सुगन्ध और रंग
और ये काम का होना भी क्या !

हवाएं पृथ्वी को दुलराने के लिये
चली थीं
मगर उनकी चपेट में आता गया जल
और अब वह आकाश से भी
टपकता रहता है
शीत
नीरव शीरीं रातों में
जब एक दूसरे को ठेलते
हाथियों का रात्रिचारी झुंड
वन में बदलने को अपना बसेरा
उनके खंभों जैसे पैरों की गदेलियां
जब तपती हुई
रोड़ी-पत्थरों से भरी
नदी के बीचोंबीच
क्षीण जलधार में पहुंचते हैं यकायक
तो कैसे विस्मित
वे चित्रवत खड़े रह जाते हैं.
दरअसल उस शीतल जलता में
उन्होंने सुन ली होती है प्रतिकूल दिशा से आती जेठ की पदचाप !

भालू का गदबदा छौना
मकड़ी के जल से भरे गुलाबों के झाड़ में
सुगंध से प्रमत्त
और उसकी देह में अटक गये
धूल-जाल के साथ
वे नन्हें पीले फूल.
मां भालू एकदम निहाल
अपने बेटे की नयी सज्जा देख !

पृथ्वी ने कहा
आओ मेरे बेटे
मेरे ऊष्म पेट में,
रत्नगर्भा हूं मैं अभी बहुत
प्यार और जगह है
तुम्हारे लिये.
(2)

फिर आता है जेठ
अग्नि का बड़ा भाई, पिता सप्तऋषियों का
शनि के वलय की तरह
तीव्रगति से उसकी परिक्रमा करता है
पछुआ से बना आरी जैसे दांतों वाला
तेज दीप्त घेरा
संग में उसकी पत्नी
कराल रात्रि
गदहे पर सवार निर्वसन तरुणी
बिखरे बालों सुर्ख़ आंखों वाली श्यामा
जिसके दृष्टिपात मात्र से
धधक उठते हैं हरे-भरे जंगल.
उसकी संपूर्ण युवा
पुष्ट काली देह पर
चमकते हैं
श्रम और ताप जनित स्वेद बिंदु
नक्षत्रों की तरह.

किंतु उसकी बुद्धि तो चलती है
उसके वाहन के बताए रास्ते पर
लिहाज़ा
सैकड़ों-हज़ारों जेठ बैसाख
व्यर्थ ही गए.