Sunday, June 14, 2015

घरों में मैय्यतें ठहरी हुई हैं बरसों से : पाकिस्तान से आधुनिक कवितायेँ - 5

१९०८ में हैदराबाद में जन्मे मख़दूम मोहिउद्दीन ने वहीं के उस्मानिया विश्वविद्यालय से एम.ए. किया. शुरुआती दिनों से ही अपने क्रांतिकारी रुझान के कारण वे ख़ासे चर्चित हो गए. सक्रिय कम्युनिस्ट नेता और ट्रेड यूनियनिस्ट मख़दूम मोहिउद्दीन को अपने विचारों के कारण १९४६ से १९५१ के बीच कई दफ़ा जेल जाना पड़ा. बाद में वे आंध्र प्रदेश की विधान सभा में कम्युनिस्ट पार्टी के नेता बने. उनका लम्बा सम्बन्ध प्रगतिशील लेखक संघ से रहा. अपने समकालीनों में सबसे अधिक लोकप्रिय शायरों में शुमार हुए. १९६९ में निधन से पहले उनके तीन कविता संग्रह सुर्ख सवेरा, गुलेतर और बिसात-ए-रक्स प्रकाशित हुए.


अपना शहर

ये शहर अपना
अजब शहर है के
रातों में
सड़क पे चलिए तो सरगोशियाँ सी करता है
वो लाके ज़ख्म दिखाता है
राजे दिल की तरह

दरीचे बंद
गली चुप
निढाल दीवारें
किवाड़ मुह्र-ब-लब
घरों में मैय्यतें ठहरी हुई हैं बरसों से
किराए पर  -!


[सरगोशियाँ: कानाफूसी, मुह्र-ब-लब: मौन धरे हुए]

मखदूम मोहिउद्दीन

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