Tuesday, December 15, 2015

आठ साल पुरानी पोस्ट - सफ़दर हाशमी की बहादुर अम्मा जी

अम्मा जी

चार पांच साल पहले मरहूम सफ़दर हाशमी की बहन सबीहा हाशमी और उनकी अम्मा जी बच्चों के साथ पेंटिंग की एक वर्कशॉप के सिलसिले में करीब माह भर रानीखेत में रहे थे. इत्तफ़ाक़न वे मेरे दोस्त अक्षय शाह के घर के पीछे बनी उसी काटेज में रह रहे थे जहाँ मैं खुद करीब आठ माह काट चुका था. रानीखेत जाना हुआ तो अक्षय के घर ही रुका. वहां रात को खाने के बाद सबीहा जी और अम्मा जी से काफी देर तक बातचीत करने का सौभाग्य मिला. अम्मा जी की शख्सियत में विकट हिम्मत और बहादुरी है. और उनकी राजनैतिक सजगता और निष्ठा पानी की तरह साफ और स्पष्ट है. सुबह उन्होने मेरे इसरार पर सफ़दर पर लिखी अपनी किताब की एक प्रति भेंट की. 

दुनिया में कितनी माएँ होंगीं जो क़त्ल कर दिए अपने जवाहरात सरीखे बेटे की जीवनी लिख सकेंगी? क़मर आज़ाद हाशमी नाम की इस बहादुर माँ ने किसी वैरागी की निगाह से इस किताब में सफ़दर के बहाने पूरे एक युग का बयान किया है. 'सहमत' द्वारा प्रकाशित इस नायाब किताब को पढ़ कर आप की आँखें भी नम होंगी, आपको गुस्सा भी आएगा लेकिन सब से ऊपर आप अम्माजी से मिलने को लालायित हो उठेंगे.

'पांचवां चिराग़' नाम की इस किताब की प्रस्तावना एक अनूठा दस्तावेज़ है. पढ़िए और उस के बाद संभव हो तो कहीं से यह किताब खोज कर पढ़ डालिए. बहुत सारी चीजों के जवाब अपने आपको मिल जायेंगे. 



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सफ़ेद-ओ-सियाह में फैली हुई ये दास्ताँ, जिसका कुछ हिस्सा हमारी नस्ल पर बीता और कुछ मौजूदा नौजवान नस्ल पर, एक दफ़ा फिर एक नए ज़ाविये और नए मक़सद से बयान करने की कोशिश है. ये काम 'मुश्किल अगर नहीं तो आसान भी नहीं' के जुमले में आता है. 

ये सफर तय करने के सिलसिले में जिन नौजवान बांहों और ज़हनों का सहारा लिया, वो अनगिनत हैं. इतना ज़रूर कहूंगी कि इस पूरे अरसे एक आँखमिचौली की-सी कैफ़ीयत से दोचार रही हूँ. अभी जो ग़म ज़ाती था, चश्मेज़दन में तमाम आलम का हिस्सा बन जाता था. और तन्हाई में फिर ये दावा झूठा और बेमानी लगने लगता था. अपनी ज़ात, जिसे पूरी कूव्वत से निहाखानों में धकेलने की कोशिश जारी रही है, डूबते हुए इंसान की तरह बार-बार अपना चेहरा दिखाती रही है. 'आ जाओ मैंने दर्द से बाजू छुडा लिया' के दावे बातिल और मेमसरफ हो जाते हैं. ये एक फरेब से ज्यादा कुछ नहीं. कोशिश तो बहुत की लेकिन ग़ालिब का -सा जिगर कहाँ से लाऊँ, जिसने कहा था 'बाज़ीचा-ए-अत्फाल है दुनिया मेरे आगे'.

अपनी तस्सल्ली के लिए दिल ने ये मुगालता दिया की हर जिंदगी ग़मों से चूर देखी और सब को ही दुःख झेलते पाया. फिर अगर ऐसा है तो दांत भींच कर अपने रास्ते पर जाओ, जैसा और अनगिनत लोगों ने किया है. आहे-सर्द भर कर खामोश हो जाओ या एह्तिजाज़ का रास्ता लो और गम-ओ-गुस्से का इजहार करो. पर मैंने जो निहाखाना-ए-याददाश्त से निकल कर ये यादें कागज़ पर बिखेर दी हैं, जो चाहे इस दर्द में हिस्सा बटा ले, जो नोक-ए-कलम से टपक पड़ा और कतरा-ए-खूं की तरह जम कर सियाह हो गया.

सिर्फ चंद बातें बारह-ए-रास्त कहना चाहती हूँ. तकसीम-ए-हिंद के जो वाकियात दर्ज हुए हैं. उनमें कुदरती तौर पर वो ही हालत और वाकियात ज्यादा सफाई और तफसील से लिखे गए हैं, जो आपबीती का हिस्सा हैं. जो इस दायरे में नहीं आ पाए, उनका सिर्फ ज़िक्र है, पूरी शिद्दत से उनका इजहार नहीं हो पाया है. अगरचे मैंने दर्द और गम में कहीं तफरीक करने की कोशिश नहीं की है. मैं सदी के इस अलामिये को एक पूरे ज़माने पा अलामिया तसव्वुर करती हूँ. जब इस बर्ग-ए-सगीर के इंसान बिला तफरीक-ए- मज़हब दुबारा बर्बरीयत के अंधे गारों में पहुंच गए थे और हज़ारों साल की सीखी हुई तहजीब को मिट्टी में मिला दिया गया था, सालेह अक्दार टूट फूट गईं और जिंदगी खला के उस दौर में आ गई जिस से हम आज तक छुटकारा हासिल नहीं कर पाए हैं.

साथ ही ये मफरूज़ा गलत होगा के अब उजाला नहीं फूटेगा. सिर्फ निगाह के जाविये का फर्क है. जिंदगी में आज भी दोस्ती, मोहब्बत और खुशियों के जजीरे हैं. कौन जानता है के कब ये मिल कर एक नया बर्रे-आज़म तैयार कर देंगे जो हज़ारों साल से इंसान का एक ख्वाब है और उम्मीद को जिंदा रखे हुए है:

खोल आँख, ज़मीन देख, फलक देख, फिजा देख
मशरिक से उभरते सूरज को ज़रा देख!


... तमाम उन साथियों और सफदर के दोस्तों और बच्चों का शुक्रिया जिन्होंने सफदर के बारे में अपने खयालात का इजहार कर मेरी मालूमात में इजाफा किया. दससल इस दास्ताँ को लिखना मेरे लिए सफदर को नए सिरे से समझने का एक ज़रिया भी बन पाया है. 

(सफ़ेद-ओ-सियाह: सफ़ेद और काला, जाविया: कोण, ज़ुमरे: पृष्ठभूमि, कैफियत: दशा, ज़ाती: व्यक्तिगत, निहाखाना: अंतर्मन, बातिल: झूठ, बेमसरफ: बेकार, एह्तिजाज़: प्रतिरोध, बराह-ए-रास्त: सीधे, तकसीम-ए-हिंद: भारत का विभाजन, तफरीक: भेद, तसव्वुर: कल्पना, बर्ग-ए-सगीर: उपमहाद्वीप, तफरीक-ए-मजहब: धर्म का भेद, बर्बरीयत: जंगलीपन, सालेह अक्दार: सही मूल्य, खला: शून्य, मफरूजा: माना हुआ, ज़जीरे: द्वीप, बर्रे-आज़म: महाद्वीप, फलक: आसमान)

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ठीक आठ साल पहले लिखी गयी इस पोस्ट के कोई पांच साल बाद 1 फ़रवरी 2013 को ब्रेन हैमरेज के कारण अम्मा जी का निधन हो गया. उनकी आँखें उनकी इच्छा के मुताबिक़ दान कर दी गईं. उनकी इच्छा के अनुसार उनकी मृत्यु पट कोई भी धार्मिक अनुष्ठान नहीं किया गया और 2 फ़रवरी को शाम साढ़े सात बजे दिल्ली के लोधी रोड विद्युत शवदाह गृह में उनकी अंत्येष्टि हुई. 

1 comment:

Varun Mishra said...

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