Monday, January 4, 2016

क्‍या करूं कि रात न हो


क्या करूं

-वीरेन डंगवाल


क्‍या करूं 
कि रात न हो 
टीवी का बटन दबाता जाऊं देखूं खून-खराबे या नाच-गानों के रंगीन दृश्‍य 
कि रोऊं धीमे-धीमे खामोश 
जैसे दिन में रोता हूं 
कि सोता रहूं 
जैसे दिन-दिन भर सोता हूं 
कि झगड़ूं अपने आप से 
अपना कान किसी तरह काट लूं 
अपने दांत से 
कि टेलीफोन बजाऊं 
मगर आंय-बांय-शांय कोई बात न हो

1 comment:

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 05 जनवरी 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!