Sunday, January 3, 2016

धरती मिट्टी का ढेर नहीं है अबे गधे


अकेला तू तभी 
-वीरेन डंगवाल

तू तभीअकेला है जो बात न ये समझे

हैं लोग करोडों इसी देश में तुझ जैसे
धरती मिट्टी का ढेर नहीं है अबे गधे
दाना पानी देती है वह कल्याणी है
गुटरू-गूँ कबूतरों की, नारियल का जल
पहिये की गति, कपास के ह्रदय का पानी है
तू यही सोचना शुरू करे तो बात बने
पीडा की कठिन अर्गला को तोडें कैसे!

1 comment:

kuldeep thakur said...

जय मां हाटेशवरी...
आपने लिखा...
कुछ लोगों ने ही पढ़ा...
हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...

इस लिये दिनांक 04/01/2016 को आप की इस रचना का लिंक होगा...
चर्चा मंच[कुलदीप ठाकुर द्वारा प्रस्तुत चर्चा] पर...
आप भी आयेगा....
धन्यवाद...